- मार्च 2020 में वाराणसी से उत्तर प्रदेश के अन्य ज़िलों में विस्थापित हुई कछुआ सैंक्चुअरी में अभी तक अण्डों की सुरक्षा के प्रयास तक शुरू नहीं हो पाए हैं।
- गंगा में बसने वाले कछुओं की प्रजातियाँ असुरक्षित (vulnerable), संकटग्रस्त (endangered), व गंभीर रूप से संकटग्रस्त (critically endangered) श्रेणियों में आती हैं।
- अधिकारियों के अनुसार सैंक्चुअरी क्षेत्र में रेत का खनन रुकवा दिया है मगर स्थानीय लोग संरक्षित क्षेत्र से बालू के उठाव के चालू होने की पुष्टि करते हैं।
उत्तर प्रदेश में संकटग्रस्त कछुओं को बचाने का कार्य कछुओं की ही गति से चल रहा है। वाराणसी से देश की इकलौती कछुआ सैंक्चुअरी को डिनोटिफाई यानि विस्थापित करके इसे नई जगह पर बसाने की आधिकारिक घोषणा को छः साल से भी ज़्यादा का समय हो चूका है पर अभी तक मूलभूत कार्य भी पूरे नहीं हुए हैं। कछुआ सैंक्चुअरी के लिए नोटिफाई किए गए नए इलाके में ना तो संरक्षित क्षेत्र की सीमा तय की गयी है, ना प्रजनन स्थलों की सुरक्षा की जाती है, और ना ही कछुओं के लिए हानिकारक गतिविधियों पर रोक लग पायी है।
पिछले कुछ दशकों में गंगा नदी में पाए जाने वाले कछुओं की संख्या और उनके हैबिटैट यानी रहने की जगहों की भौगोलिक सीमा में भारी गिरावट आई है। अवैध बाज़ार में कछुओं की बहुत माँग रहती है—इनके माँस के लिये और पालतू पशु के रूप में रखने के लिये भी। जल प्रदूषण, नदियों से रेत खनन, व मछली पकड़ने के जाल में फँसना अन्य कारण हैं जिनकी वजह से यह जीव, जो कभी गंगा में प्रचुरता में पाए जाते थे, अब ना के बराबर दिखते हैं।
अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संस्था इंटरनैशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर की रेड लिस्ट के अनुसार गंगा में बसने वाले कछुओं की प्रजातियाँ असुरक्षित (vulnerable), संकटग्रस्त (endangered), व गंभीर रूप से संकटग्रस्त (critically endangered) श्रेणियों में आती हैं। कछुओं को भारत का वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972, भी सर्वोच्च सुरक्षा प्रदान करता है और स्वीकारता है कि संरक्षण के बिना यह विलुप्त हो सकते हैं।
इनके बचाव के लिये उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1989 में वाराणसी में गंगा के एक हिस्से को कछुआ अभ्यारण्य/सैंक्चुअरी घोषित किया था, पर मार्च 17, 2020, को उसे गैर-अधिसूचित कर दिया और राज्य के ही प्रयागराज, भदोही, व मिर्ज़ापुर ज़िलों में गंगा के 30-कि.मी.-लंबे क्षेत्र को सैंक्चुअरी बना दिया।
इन ज़िलों के अधिकारियों ने मोंगाबे-हिंदी से बातचीत में माना कि अभी तक संरक्षण के लिए आधारभूत कार्य भी पूरे नहीं हुए हैं, कार्य जैसे कि कछुओं के प्रजनन स्थल की रक्षा करना।

प्रजनन भगवान भरोसे
कछुए नदी के तट पर या नदी के बीच में टापुओं पर अंडे दे कर उन्हें रेत से ढक देते हैं। सुरक्षा के अभाव में यह अंडे अथवा नवजात कछुए आवारा कुत्तों या चील-कौव्वों का शिकार बन सकते हैं। इंसानों और गाड़ियों के आवागमन से भी कछुओं के घोंसले नष्ट हो सकते हैं। इन प्रजनन स्थलों को रेत खनन से भी खतरा रहता है। यह सभी कारक कछुओं की प्रजनन दर को गंभीर रूप से गिरा देते हैं।
उत्तर प्रदेश में कछुओं और पर्यावरण के संरक्षण में जुटी संस्था सोसाइटी फ़ॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर के सेक्रेटरी-जनरल राजीव चौहान ने मोंगाबे-हिंदी को बताया कि मादा कछुआ नदी किनारे अंडे दे कर पानी में चली जाती है व उनकी रक्षा नहीं करती, इसलिए इस जीव के संरक्षण के लिये इसके प्रजनन स्थलों की सुरक्षा अति आवश्यक है।
भदोही ज़िले के संभागीय वन अधिकारी (डिविज़नल फ़ॉरेस्ट ऑफ़िसर—डी.एफ़.ओ.) विवेक यादव ने मोंगाबे-हिंदी को बताया कि सैंक्चुअरी में प्रजनन-अनुकूल क्षेत्रों की पहचान का कार्य नहीं हुआ है। “यह बहुत नई सैंक्चुअरी है और अभी बहुत सारे काम किये जाने हैं,” उन्होंने इस साढ़े छः साल पुरानी सैंक्चुअरी के बारे में कहा।
लगभग तीन वर्ष पहले प्रकाशित एक मीडिआ रिपोर्ट में प्रयागराज के तत्कालीन डी.एफ़.ओ. ने कहा था कि अंडो की ख़ास निगरानी के लिये एक ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है, मगर वर्तमान डी.एफ़.ओ. अरविंद यादव ने मोंगाबे-हिंदी को बताया कि अभी तक ऐसे स्थानों को चिह्नित नहीं किया गया है जहाँ कछुए अंडे देते हैं।
उन्होंने कहा कि प्रशासन ने सैंक्चुअरी क्षेत्र में रेत का खनन रुकवा दिया है और खनन की सूचना मिलने पर कार्यवाही होती है। भदोही व मिर्ज़ापुर के डी.एफ़.ओ. ने भी बताया कि सैंक्चुअरी में रेत खनन का कोई नया पट्टा नहीं दिया गया है और पुराने पट्टों को रद्द कर दिया गया है।
वहीं प्रयागराज ज़िले के कोठरी गाँव के निवासी धर्मराज सिंह ने मोंगाबे-हिंदी को बताया कि संरक्षित क्षेत्र से बालू का उठाव अब भी चालू है। “अगर यहाँ पुलिस या वन विभाग की चौकी होगी तो ऐसे तत्वों के मन में भय होगा,” उन्होंने कहा।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया) ने 2023 में सैंक्चुअरी का सर्वेक्षण करने के बाद वहाँ छः सिक्योरिटी पोस्ट और 15 वॉच/निगरानी टावर स्थापित करने का सुझाव दिया था। साथ ही दिसंबर 2023 में प्रयागराज ज़िला प्रशासन ने सैंक्चुअरी की निगरानी के लिये एक फ़ॉरेस्ट रेंज के गठन का प्रस्ताव सरकार को भेजने की बात कही थी। वन विभाग के एक सूत्र ने मोंगाबे-हिंदी को बताया कि अभी तक ऐसी कोई सिक्योरिटी फ़ोर्स अस्तित्व में नहीं आई है। बहरहाल, सैंक्चुअरी क्षेत्र से रेत के खनन की खबर आती रहती है।

संवेदनशील मगर लंबित
सैंक्चुअरी की सीमाओं से सटे बाहरी क्षेत्र भी संरक्षण की दृष्टि से संवेदनशील होते हैं और यहाँ उद्योगों, प्रदूषण, खनन आदि पर प्रतिबंध होता है। यह क्षेत्र सैंक्चुअरी और बाहरी दुनिया के बीच में बफ़र का काम करता है और इसको इको-सेंसिटिव ज़ोन कहते हैं।
अप्रैल 2024 में नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को शिकायत प्राप्त हुई थी कि उत्तर प्रदेश की कछुआ सैंक्चुअरी के इको-सेंसिटिव ज़ोन का निर्धारण लंबित है, और फिर ट्रिब्यूनल ने राज्य सरकार से इस पर रिपोर्ट माँगी थी। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की संयुक्त जाँच समिति की रिपोर्ट ने स्वीकारा था कि राज्य सरकार ने संरक्षण के लिहाज से इस अति महत्वपूर्ण वैधानिक दायित्व का निर्वहन नहीं किया है।
इस रिपोर्ट के 26 महीने बाद, यानी आज भी स्थिति ज्यों की त्यों है। सैंक्चुअरी की आधिकारिक घोषणा को साढ़े छः वर्ष हो चुके हैं लेकिन इसके इको-सेंसिटिव ज़ोन का निर्धारण अभी तक नहीं हुआ है, तीनों ज़िलों के वन प्रभाग के डी.एफ़.ओ. ने मोंगाबे-हिंदी से बातचीत में माना।
इन अधिकारियों ने कहा कि इस बफ़र ज़ोन के निर्धारण में एकरूपता आवश्यक है, इसलिए तीनों ज़िलों और वन प्रमंडल को साथ मिल के तय करना है कि इस क्षेत्र में कौन-कौन सी गतिविधियाँ प्रतिबंधित होंगी। मिर्ज़ापुर डी.एफ़.ओ. राकेश कुमार बताते हैं कि उनके ज़िले ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार अपने सुझाव आगे भेजे हैं। इन विषयों पर निर्णय प्रयागराज ज़िलाधिकारी की अध्यक्षता वाली समिति को लेना है।
प्रयागराज के एक वन अधिकारी ने मोंगाबे-हिंदी को बताया कि तीनों ज़िलों के प्रस्ताव आ चुके हैं और आगे की कार्यवाही के लिए 14 सितंबर को एक बैठक होनी थी पर किन्हीं कारणों से वह टल गई। उन्होंने कहा कि तीनों ज़िलों की समन्वय समिति की ओर से पारित प्रस्ताव लखनऊ भेजा जाएगा और वहाँ से फिर दिल्ली।
भदोही डी.एफ़.ओ. ने भी बताया कि प्रशासन वन्यजीव दिशा-निर्देश बना कर केंद्र सरकार को भेजेगा और भविष्य में रिसर्च सेंटर बनाने के लिये भी प्रयास करेगा।
कहाँ हैं कछुए?
लंबित कार्यों और प्रस्तावित योजनाओं के बीच में फँसा है सैंक्चुअरी और कछुओं का निराशाजनक वर्तमान। कछुओं की तस्करी की खबर आती रहती है, सैंक्चुअरी के दायरे में आने वाले गाँवों के निवासी कहते हैं नदी में कछुए दिखते नहीं हैं, और आधिकारिक तौर पर कछुओं की संख्या का पता नहीं है।
मोंगाबे-हिंदी के सूचना का अधिकार आवेदन के उत्तर में भारतीय वन्यजीव संस्थान ने बताया कि उसने गंगा समेत अन्य नदियों में कछुओं की स्थिति पता लगाने के लिए सर्वेक्षण किया है और अभी इस जानकारी का विश्लेषण चल रहा है।
टर्टल सवाईवल एलायंस फाउंडेशन इंडिया ने नवंबर 2022 में वन विभाग के साथ सैंक्चुअरी का सर्वेक्षण किया था, जिसमें उत्तर प्रदेश में गंगा में पायी जाने वाली कछुओं की 11 प्रजातियों में से पाँच की ही मौजूदगी दर्ज हो पाई।
सक्रिय परियोजनाएँ संरक्षित जीव की बढ़ती-घटती संख्या पर नज़र रखती हैं क्योंकि यही आँकड़े बताते हैं कि संरक्षण के प्रयास सफ़ल हो रहे हैं या नहीं।
सोसाइटी फ़ॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर के राजीव चौहान ने कहा कि यदि वास्तव में संरक्षण के लिए कदम उठाए जाएं तो चार-पाँच सालों में कछुओं की संख्या में वृद्धि दिखने ही लगती है। उन्होंने उदाहरण दिया कि जब चंबल नदी के एक भाग को वर्ष 2006 में घड़ियालों के अनुकूल बनाया गया था, तो दो-तीन सालों में उधर कछुओं की आबादी भी बढ़ गयी थी, क्योंकि जब किसी प्राकृतिक वास स्थल की स्थिति सुधरती है तो उसमें रहने वाले सभी जीवों की स्थिति में भी सुधार होता है।
मोंगाबे-हिंदी में हाल ही में प्रकाशित एक लेख दर्शाता है कि कैसे बिहार में गंडक नदी में संरक्षण के सतत प्रयासों से घड़ियालों की संख्या 16 वर्षों में लगभग 100 गुना बढ़ गई। घड़ियाल भी कछुओं की तरह रेतीले तट पर अंडे देते हैं, लेकिन बिहार में कार्यदायी संस्था ऐसे स्थलों की निगरानी कर अंडों की सुरक्षा करती है।
गंगा में पाए जाने वाले कछुए हर साल अंडे देते हैं। एक बार में मादा कछुआ 30–40 अंडे देती है।

गोलपोस्ट शिफ्टिंग
पर्यावरणविद व विशेषज्ञ एकमत हैं कि कछुआ सैंक्चुअरी के लिए वाराणसी अधिक उपयुक्त है। दिसंबर 1989 से मार्च 2020 तक सैंक्चुअरी वाराणसी में ही थी। मार्च 17, 2020, को राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की मंज़ूरी के साथ उत्तर प्रदेश सरकार ने वाराणसी-स्थित सैंक्चुअरी को गैर-अधिसूचित कर के प्रयागराज-भदोही-मिर्ज़ापुर में सैंक्चुअरी बनाने की घोषणा की।
वाराणसी निवासी और पानी से जुड़े मुद्दों के जानकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता सौरभ सिंह बताते हैं कि उनके शहर को कछुओं की ज़रुरत क्यों है। उन्होंने कहा वाराणसी में मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाटों पर बड़ी संख्या में शवदाह होता है, और अस्थियों व अवशेष को गंगा में बहाया जाता है। यहाँ पाया जाने वाला इंडियन सॉफ़्ट शेल टर्टल माँसाहारी होता है और अवशेष को खा कर नदी को साफ़ रखने का महत्वपूर्ण कार्य करता है।
टर्टल सर्वाइवल एलायंस के अनुसार लगभग 40 साल पहले भारत सरकार ने गंगा में एक दशक तक ~25,000 इंडियन सॉफ़्ट शैल टर्टल छोड़े ताकि वो नदी में बहाए जाने वाले अधजले शवों का माँस खा कर नदी को साफ़ रख सकें। माना जाता है कि 10 वयस्क कछुए दो दिन में एक शव को हड्डियों के ढाँचे में बदल सकते हैं।
सिंह ने कहा कि इस वजह से कछुओं की प्रासंगिकता वाराणसी में है, मगर इधर जल परिवहन को सुगम करने के लिये और टेंट सिटी की स्थापना के लिये उत्तर प्रदेश सरकार ने सैंक्चुअरी और उसके साथ आने वाले प्रतिबंधों को ही हटा दिया। उन्होंने अफ़सोस जताया कि सैंक्चुअरी को अब ऐसी जगह शिफ्ट कर दिया गया है जहाँ कछुए दिखते ही नहीं।
चौहान ने कहा कि बेहतर होता अगर वाराणसी में सैंक्चुअरी को रहने दिया जाता और प्रयागराज से मिर्ज़ापुर तक नई सैंक्चुअरी अधिसूचित की जाती, मगर सैंक्चुअरी को ऐसे विस्थापित करना सही नहीं है। “सरकार को जब जहाँ विकास परियोजनाओं को लागू करने की ज़रुरत होगी, वह किसी अभ्यारण्य या संरक्षित क्षेत्र को गैर अधिसूचित कर देगी और इससे संरक्षण प्रयास कमजोर होंगे,” उन्होंने कहा।
चौहान ने बताया कि वाराणसी में अत्यधिक मानव हस्तक्षेप और बड़े जहाज़ों के चलते वह इलाका कछुओं के प्रतिकूल हो गया था।
कछुए आम तौर पर धूप और हवा के लिये पानी की सतह पर आते हैं, और बड़े जहाज़ों के पंखों (प्रोपेलर) से उन्हें गंभीर चोट का खतरा रहता है। बड़े जहाज़ों के यातायात के लिये नदी को गहरा करने की प्रक्रिया (ड्रेजिंग) से जल जीवों का वास स्थल नष्ट हो जाता है, और जहाज़ों के इंजन/प्रोपेलर से उत्पन्न तरंगे उनके विचरण, शिकार आदि में विघ्न डालती हैं।
चौहान ने कहा इन कारणों से वाराणसी में रेत के टीले, यानी कछुओं की अंडे देने की जगह, ख़त्म हो चले थे।
उत्तर प्रदेश सरकार ने वाराणसी सैंक्चुअरी को गैर-अधिसूचित करने का यही तर्क दिया था, कि मानव-जनित हस्तक्षेप के चलते कछुओं की समागम दर गिर गई है और यह क्षेत्र अब उनके लिये उपयुक्त नहीं रहा। इससे दो साल पहले भारतीय वन्यजीव संस्थान की सर्वेक्षण रिपोर्ट भी इसी निष्कर्ष पर पहुँची थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि गंगा में मिलने वाली कछुओं की 13 प्रजातियों में से वाराणसी सैंक्चुअरी में मात्र पाँच प्रजातियाँ मिली।
नई जगह सैंक्चुअरी बनने के साढ़े छः वर्ष बाद स्थिति कितनी बदली है? फ़िलहाल सरकार के पास यह जानकारी नहीं हैं। हालाँकि इंटरनैशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर के अनुसार उत्तर प्रदेश में गंगा में बसने वाली कई प्रजातियों के वयस्क कछुओं की संख्या कम ही हो रही है।
बैनर तस्वीर: प्रयागराज जिले के कोठरी गाँव में प्रवेश के पास वन विभाग द्वारा लगाया गया कछुआ वन्य जीव विहार का बोर्ड। तस्वीर – राहुल सिंह/मोंगाबे