[वीडियो] नर्मदा: बरगी जलाशय में न के बराबर रह गया मछली-उत्पादन, मछुआरों का बुरा हाल

मंडला जिले में ग्राम पिपरिया मछुआरे का निवास स्थल है। यह काफी घनी बस्ती है। इस क्षेत्र में बरगी बांध से विस्थापित जलाशय में घट रही मछली उत्पादन का मामला स्थानीय विधायकों से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री के सामने तक उठा चुके है। साथ ही मछुआरों द्वारा कई बार मुख्यमंत्री को आवेदन देकर भी मछली पकड़ने के काम में अपना मेहनताना बढ़ाने की मांग की है। तस्वीर-जितेंद्र बर्मन

कामयाबी की यह कहानी ज्यादा दिनों तक नहीं चली

वर्ष 2001 में मध्य-प्रदेश राज्य मत्स्य महासंघ ने राज्य सरकार द्वारा बरगी जलाशय में ग्राम मछुआरा सहकारी समितियों को दिए गए मछली-पालन के निर्णय के विरुद्ध जबलपुर उच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल की। याचिका में दलील दी गई कि ग्राम मछुआरा समितियों द्वारा किए जाने वाला मछली उत्पादन राज्य के सालाना औसत मछली उत्पादन से कम होता है।

इस बारे में बरगी बांध विस्थापित संघ के नेता राजकुमार सिन्हा बताते हैं, “तब उच्च-न्यायालय ने राज्य सरकार के निर्णय पर स्टे लगा दिया। इसके बाद उसी वर्ष राज्य मत्स्य महासंघ ने बरगी जलाशय में मछली उत्पादन का अधिकार निजी ठेकेदारों को दे दिया। हालांकि, तब राज्य मत्स्य उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई थी।”

राजकुमार सिन्हा के मुताबिक इस समिति की जिम्मेदारी थी कि वह ठेकेदारों द्वारा किए गए उत्पादन का आंकलन करें और यदि ठेकेदारों के प्रबंधन के कारण मछली उत्पादन घटता या बढ़ता है तो उसकी रिपोर्ट बनाए। लेकिन, पिछले 20 वर्षों में मछली उत्पादन लगातार घटने के बावजूद मत्स्य उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता वाली समिति ने इस संबंध में कोई रिपोर्ट नहीं बनाई। इस तरह, बरगी बांध विस्थापित मत्स्य उत्पादन व विपणन संघ से मछली पालन का अधिकार छीने जाने के बाद दोबारा उन्हें मछली पालन का काम देने के बारे में नहीं सोचा गया, बल्कि इसके विपरीत राज्य मत्स्य संघ ने इस सेक्टर को निजी ठेकेदारों के अनुकूल बनाने की दीर्घकालिक नीति पर कार्य किया।


और पढ़ेंः नर्मदा के उद्गम से ही शुरू हो रही है नदी को खत्म करने की कोशिश


इस तरह, बरगी जलाशय में मछली पालन के प्रबंधन का सहकारी मॉडल ढह गया और पांच-छह वर्षों के अंतराल के बाद नौकरशाह व ठेकेदारों का आधिपत्य स्थापित हो गया। इसका एक नतीजा यह हुआ कि मछुआरों से उनके अपने उपभोग के लिए कुल मछली उत्पादन का 20 प्रतिशत हिस्सा रखने का अधिकार भी छिन गया और वे मालिक से एक बार फिर मजदूर बन गए।

वहीं, बरगी बांध विस्थापित मत्स्य उत्पादन व विपणन संघ के अध्यक्ष मुन्ना बर्मन के मुताबिक पिछले वर्षों में इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि निजी ठेका प्रणाली ने राज्य के मत्स्य क्षेत्र को लाभ पहुंचाया हो।

मुन्ना बर्मन कहते हैं, “स्थानीय जनप्रतिनिधि से लेकर राज्य सरकार तक न तो किसी को बरगी जलाशय में मछली उत्पादन की चिंता है और न ही मछुआरों की स्थिति को लेकर ही कोई संवेदनशील है। इसलिए इस हालत से बाहर निकलने की बात तो दूर, कोई इस हालत की जवाबदेही लेने तक को तैयार नहीं है, जबकि सभी को पता है कि बरगी में मछली भंडार बढ़ाने का एक ही उपाय है और यह है ग्राम मछुआरा सहकारी समितियों को फिर से मछली पालन का जिम्मा देना।

गर्मियों के दिनों में मंडला जिले के गांव खमहरीया के मछुआरे बरगी जलाशय में सामूहिक मत्स्याखेट करते हुए। बरगी नर्मदा नदी पर बना सबसे पहला बांध है जो इस नदी के सबसे महत्त्वपूर्ण बांधों में भी गिना जाता है। बरगी जलाशय न सिर्फ मछुआरों और बागवानों के रोजगार का प्रमुख स्त्रोत्र रही है, बल्कि इससे जबलपुर शहर की जलापूर्ति भी होती है। साथ ही इससे सिंचाई की परियोजनाएं भी संचालित की जा रही हैं। जबलपुर जिले में स्थित बरगी बांध वर्ष 1975 से बनना शुरू हुआ था और वर्ष 1988 में यह पूरी तरह बनकर तैयार हो गया था। तस्वीर- जितेंद्र बर्मन
गर्मियों के दिनों में मंडला जिले के गांव खमहरीया के मछुआरे बरगी जलाशय में सामूहिक मत्स्याखेट करते हुए। बरगी नर्मदा नदी पर बना सबसे पहला बांध है जो इस नदी के सबसे महत्त्वपूर्ण बांधों में भी गिना जाता है। बरगी जलाशय न सिर्फ मछुआरों और बागवानों के रोजगार का प्रमुख स्त्रोत्र रही है, बल्कि इससे जबलपुर शहर की जलापूर्ति भी होती है। साथ ही इससे सिंचाई की परियोजनाएं भी संचालित की जा रही हैं। जबलपुर जिले में स्थित बरगी बांध वर्ष 1975 से बनना शुरू हुआ था और वर्ष 1988 में यह पूरी तरह बनकर तैयार हो गया था। तस्वीर- जितेंद्र बर्मन

इसलिए बढ़ गया था मछली उत्पादन

मुन्ना बर्मन बताते हैं कि जब ग्राम मछुआरा सहकारी समितियों के पास जलाशय की मछलियों की उत्पादकता की जिम्मेदारी होती थी तब स्थानीय मछुआरे हर वर्ष 15 जून से 15 अगस्त यानी मछलियों के प्रजनन-काल के दौरान जलाशय की सुरक्षा करते थे और इस मौसम में अवैधानिक तरीके से होने वाली मछलियों के शिकार को रोकते थे। लेकिन, ठेका पद्धति आने के बाद कुछ वर्षों में चोरी-छिपे मछली मारने वालों का एक संगठित गिरोह तैयार हुआ है जिसे जलाशय और उसमें रहने वाली मछलियों के अस्तित्व से कोई मतलब नहीं है।

इस बारे में रमेश बर्मन कहते हैं, “जब जलाशय का जिम्मा हमारे हाथों में था तब जलाशय में खूब मछलियां होती थीं, क्योंकि हम मछलियों की ब्रीडिंग के टाइम पूरी सख्ती के साथ मछलियों के शिकार को रोकते थे। यदि आज भी जलाशय की अच्छी तरह से सुरक्षा की जाए तो बरगी में मछलियों की कमी कभी हो ही नहीं सकती है।”

दूसरी तरफ, राज्य मत्स्य महासंघ स्टॉफ और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। यही वजह है कि अधिकारियों के भरोसे इस विशाल जलाशय की सुरक्षा व्यवस्था कर पाना बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। हालांकि, महासंघ के क्षेत्रीय प्रबंधक सीबी मोहने ने मोंगाबे-हिन्दी से बात करते हुए मछुआरों के आरोपों को खारिज करते हैं, “जलाशय की सुरक्षा का ध्यान रखा जा रहा है। इसके अलावा हमारे निर्देश पर जलाशय में पर्याप्त मछलियों के बीज डाले जा रहे हैं।”

वहीं, मंडला जिले में खमहरिया गांव के मछुआरे रामकुमार बर्मन विभागीय अधिकारी और ठेकेदारों पर यह आरोप लगाते हुए कहते हैं कि मछलियों के बीज डालने को लेकर भी कहीं किसी तरह की पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है। इसलिए कई बार बताई गई मात्रा से काफी कम मछलियों के बीज जलाशय में डाले जाते हैं। इसी तरह, आमतौर पर मछलियों के बीजों की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती है। रामकुमार बर्मन के मुताबिक कायदे से जलाशय में 60 प्रतिशत कतला और 40 प्रतिशत रोहू तथा मृगल प्रजातियों की मछलियों के बीज डाले जाने चाहिए, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।


और पढ़ेंः राहुल राम: संगीत और पर्यावरण के मुद्दों के समागम के प्रयास में


 

बैनर तस्वीरः नर्मदा पर बने बरगी बांध के जलाशय के पास खड़ा एक मछुआरा। बीते कुछ वर्षों में यहां मछली पकड़ने का काम मंदा हो चला है, जिससे इनकी आजीविका प्रभावित हो रही है। तस्वीर- अजय धाबर्डे

क्रेडिट्स

संपादक

विषय

कोयला कॉरिडोर या टाइगर कॉरिडोर? पश्चिमी घाट में रेल डबलिंग को लेकर उठ रहे सवाल

विकास और अंधाधुंध खनन, खतरे में अरावली की पहाड़ियां

असम का रामसर वेटलैंड संकट में, शैवाल के बढ़ते प्रकोप से मछलियां और आजीविका प्रभावित

जहां प्लास्टिक बनता है, वहां लोग बीमार क्यों पड़ते हैं?

भारत में समुद्री गाय डुगोंग की संख्या बढ़ी, संरक्षण में मछुआरों की भूमिका

हैरान करने वाला ट्रेंड, उत्तर भारत में शहरों की हवा ग्रामीण क्षेत्रों से बेहतर

वाराणसी में गंगा पर क्रूज पर्यटन और फ्रेट कॉरिडोर के बीच पिसता मल्लाह समुदाय

गोवा में पहली बार दिखा यूरेशियन ऊदबिलाव

नए लेख

सभी लेख

पोखरा एयरपोर्ट पर एक पक्षी विज्ञानी का पहरा, गिद्धों और विमानों को बचाने की जद्दोजहद

मॉनसून के बदलते पैटर्न से बढ़ा पारिस्थितिक सूखा, आईआईटी खड़गपुर का अध्ययन

कभी फुल बुकिंग, आज सन्नाटा, लद्दाख में टूरिज्म का एक मुश्किल साल रहा 2025

[कॉमेंट्री] बहराइच में क्यों नाकाम हो रहे हैं पारंपरिक संरक्षण के तरीके?

ऊंचाई के हिसाब से बदलते हैं हिमालयी घास के मैदान: स्टडी

मिथुन क्या है, और क्यों अरुणाचल के जंगलों में इसे लेकर तनाव बढ़ रहा है?

कोयला कॉरिडोर या टाइगर कॉरिडोर? पश्चिमी घाट में रेल डबलिंग को लेकर उठ रहे सवाल

विकास और अंधाधुंध खनन, खतरे में अरावली की पहाड़ियां