कश्मीर: मछली पकड़ने के उत्सव से जुड़ा एक झरने का अस्तित्व

पंजथ नाग का एरियल व्यू। यहां मछली पकड़ने के दौरान झरने की सफाई भी हो जाती है। तस्वीर- वसीम दार

हालांकि, पंजथ नाग के उप निरीक्षक अहमद का कहना है कि सामूहिक मछली पकड़ने की गतिविधि से होने वाले लाभ से इनकार नहीं किया जा सकता है। “जब एक या दो हजार लोग पानी उतरते हैं तो हलचल होती है। इससे खरपतवार की वजह से रुके हुए पानी को बहने का रास्ता मिलता है। इसके अलावा, यह प्रथा लोगों के लिए पारंपरिक महत्व का है। हम उन्हें रोक नहीं सकते,” वह कहते हैं। 

चली आ रही पुरानी परंपरा 

त्योहार के इतिहास के बारे में पूछे जाने पर बुजुर्गों ने भी अनभिज्ञता जाहिर की। “यह प्राचीन काल से हमारी परंपरा का हिस्सा है। यह महाराजाओं के युग (1846-1947 ई.) से चला आ रहा है। पर हमारे पूर्वज भी इससे उतने ही अनजान थे। उन्हें भी नहीं मालूम कि यह त्योहार कब शुरू हुआ,” 60-वर्षीय मोहम्मद इब्राहिम कहते हैं।

मछली पकड़ने पानी में उतरा एक किशोर। मछली पकड़ने के लिए जाल का इस्तेमाल नहीं होता बल्कि एक विशेष टोकरी का इस्तेमाल किया जाता है। टोकरी की मदद से मछलियों को पानी छानकर, निकाला जाता है। तस्वीर- वसीम दार
मछली पकड़ने पानी में उतरा एक किशोर। मछली पकड़ने के लिए जाल का इस्तेमाल नहीं होता बल्कि एक विशेष टोकरी का इस्तेमाल किया जाता है। टोकरी की मदद से मछलियों को पानी छानकर, निकाला जाता है। तस्वीर- वसीम दार
एक साथ कई लोग जब पानी उतरते हैं तो हलचल होती है। इससे खरपतवार की वजह से रुके हुए पानी को बहने का रास्ता मिलता है। तस्वीर- वसीम दार
एक साथ कई लोग जब पानी उतरते हैं तो हलचल होती है। इससे खरपतवार की वजह से रुके हुए पानी को बहने का रास्ता मिलता है। तस्वीर- वसीम दार

पंजथ झरने की एक पौराणिक प्रासंगिकता है, जिसका उल्लेख नीलमाता पुराण और राजतरंगिणी में मिलता है। इसका जिक्र कश्मीरी इतिहासकार कल्हण द्वारा लिखित 12 वीं शताब्दी के कश्मीर के पौराणिक इतिहास में भी है। वह इसे पंचहस्त का नाग कहते हैं। 

यह एक ऐसा शुद्ध स्थान है।  इसे वितस्ता नदी या झेलम के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसे संत कश्यप की प्रार्थना द्वारा दोबारा लाया गया। यह नदी किसी पापी पुरुष के स्पर्श से गायब हो गई थी। 

आज झरने को संरक्षित करने के लिए गांव आगे आया है। स्थानीय लोग इसे कश्मीर के पर्यटन मानचित्र पर देखने की आस में है। ऐसा होने से इसकी बेहतर देखभाल हो सकेगी।

 

बैनर तस्वीरः हर साल मई के तीसरे सप्ताह में धान के खेतों की जुताई से पहले गांव के बुजुर्ग मछली पकड़ने जाने के लिए एक दिन चुनते हैं। साथ ही, वे पंजथ नाग झरने की सफाई भी करते हैं। तस्वीर- वसीम दार

क्रेडिट्स

Assistant Editor

विषय

नए लेख

सभी लेख

बादल बरसे, फिर भी पानी की कमी… झारखंड के इस गांव ने यह पहेली कैसे सुलझाई?

ओडिशा के तट पर ज्यादातर मादा कछुए ही क्यों पैदा हो रहे हैं

सीमा पार व्यापार और हथियारों ने नागालैंड के वन्यजीवों पर शिकार का दबाव बढ़ाया

तीन बांध के बावजूद पानी को तरसते मेलघाट के आदिवासी गांव

गोडावण का 410 दिनों का सफर बता गया कि इसे कैसे बचाया जा सकता है

झारखंड के हाथियों वाले जंगल सारंडा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, बनेगा अभयारण्य

बढ़ते वायु प्रदूषण से खतरे में पड़ी बच्चों की ज़िन्दगी

दक्कन में गिद्ध कम अंडे क्यों दे रहे हैं?