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[वीडियो] सूखाग्रस्त इलाके में लगा 13000 एकड़ का सोलर पार्क, कितनी बदली किसानों की जिंदगी?

पावागढ़ सौर पार्क का नाम शक्ति स्थल रखा गया है। इसे भारत का सबसे बड़ा और विश्व का दूसरे नंबर का सोलर पार्क माना जाता है। तस्वीर- अभिषेक एन. चिन्नप्पा/मोंगाबे

पावागढ़ सौर पार्क का नाम शक्ति स्थल रखा गया है। इसे भारत का सबसे बड़ा और विश्व का दूसरे नंबर का सोलर पार्क माना जाता है। तस्वीर- अभिषेक एन. चिन्नप्पा/मोंगाबे

  • कर्नाटक के पावागढ़ में जिन स्थानों पर सौर ऊर्जा से बिजली बनाई जा रही है, वहीं के गांवों में बिजली की सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसी ही स्थिति कोयले से बिजली पैदा करने वाले स्थानों पर भी देखी जाती रही है।
  • सौर पार्क में जमीन देने वालों लोगों के लिए आमदनी का एक जरिया तो खुला, लेकिन आय का यही एकमात्र स्रोत होने की वजह से इन्हें भविष्य की चिंता सताती है।
  • किसानों को सोलर पार्क के लिए जमीन किराये पर देने का एक फायदा नियमित आय के रूप में हुआ, लेकिन इससे उनकी सांस्कृतिक पहचान खत्म होती चली गई। आय बढ़ने से इनके जीवनस्तर में भी सुधार हुआ।

“अगर हमारे पास पानी की व्यवस्था होती तो यह शहर काफी पहले विकसित हो गया होता,” यह कहना है गिरिश आर का जो कि पावागढ़ में रहते हैं। पावागढ़ कर्नाटक का एक पहाड़ी शहर है जहां बीते आधी सदी से सूखे की समस्या रहती है। बैंगलुरु से 160 किलोमीटर दूर स्थित पावागढ़ तालुक तुमकुर जिला का हिस्सा है। 2,50,000 आबादी वाले इस इलाके को पिछले 60 वर्ष में 54 बार सूखाग्रस्त घोषित किया गया है।

पावागढ़ के ऊपर सूरज ने हमेशा अपना रौद्र रूप दिखाया है। इस वजह से गर्मियों में यहां का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। यहां के किसान सूखे में होने वाली फसल जैसे अरंडी, दालें, मूंगफली, मिलेट्स या मोटे अनाज और मॉनसून के दौरान कुछ फलों की खेती करते हैं। मॉनसून में यहां औसतन 600 मिलिमीटर बारिश होती है जो कि किसानों की जरूरत के लिए काफी नहीं है। बारिश की कमी का असर किसानों की आमदनी पर भी हो रहा है।

वर्ष 2015 में पावागढ़ को सोलर पार्क के लिए चुना गया। यह पार्क कर्नाटक के सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में से एक है। 

सौर ऊर्जा उत्पादन करने वाले इस पार्क का नाम शक्ति स्थल रखा गया है। इसे भारत का सबसे बड़ा और विश्व का दूसरे नंबर का सोलर पार्क बनाने का संकल्प लिया गया। पार्क की क्षमता 2,050 मेगावॉट है। इस स्थान पर प्रति वर्ग मीटर प्रति दिन 5 केडब्लूएच (किलोवॉट आवर) की दर से ऊर्जा का उत्पादन होता है। यह इलाका पथरीली पहाडियों से घिरा होने की वजह से सौर पार्क के लिए मुफीद स्थान है। यह परियोजना 2018 से चल रही है। परियोजना की एक और खास बात है इसमें किसानों की जमीन को शामिल करना। किसानों ने 28 वर्ष के लिए अपनी 13000 एकड़ जमीन किराये पर दी। हर साल 21,000 रुपए प्रति एकड़ की दर से किसानों को किराया दिया जाता है। हर दो साल में इस राशि में पांच फीसदी का इजाफा किया जाता है। 

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पावागढ़ सोलर पार्क बैंगलुरु से 160 किमी दूर स्थित है। यह 13000 एकड़ में फैला हुआ है। मैप— टेक्नोलॉजी फॉर वाइल्डलाइफ.

कर्नाटक अक्षय ऊर्जा विकास लिमिटेड (केआरईडीएल), सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एसईसीआई) और कर्नाटक सौर ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (केएसपीडीसीएल) ने मिलकर इस परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण और जरूरी अनुमति ली थी। थिरुमणि ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले पांच गांवों- थिरुमणि, वल्लूर, बालासमुद्र, रायचारलू और क्याथागनाचारलू में भूमि का अधिग्रहण किया गया था।

कुल 2,050 मेगावाट क्षमता में से, नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) ने 600 मेगावाट सौर पीवी क्षमता स्थापित की, जबकि एसईसीआई और केआरईडीएल ने क्रमशः 200 मेगावाट और 1,250 मेगावाट की स्थापना की। केएसपीडीसीएल के महाप्रबंधक एन. अमरनाथ ने मोंगाबे-हिन्दी को बताया कि एसपीवी ने भूमि खरीद में देरी से बचने और जमीन के मालिकों  के हितों की रक्षा के लिए एक पट्टा मॉडल अपनाया।

“किसानों को जमीन का किराया मिलता है और हम उनकी जमीन पर पार्क का संचालन करते हैं,” उन्होंने कहा।

इलाके में लगभग 30 प्रतिशत साक्षरता दर है और लगभग आधे परिवार की मासिक आय 20 हजार से कम है। यह आंकड़ा दो परियोजना प्रभावित गांवों, थिरुमणि और रायचारलू पर सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण के दौरान जुटाए गए थे। पावागढ़ को राज्य के सबसे पिछड़े तालुकों में से एक माना जाता था।

यहां की एक और पहचान है। वह है जाति-आधारित हिंसा। 1970 के दशक में वामपंथी उग्रवाद का भी उदय हुआ। अधिकांश भूमि और धन उच्च जाति के जमींदारों के पास रहे जबकि सीमांत किसान और भूमिहीन दलित गरीब बने रहे। किसानों को सोलर पार्क में एक तरह से भागीदार बनाकर तकनीकी रूप से अच्छे मेगा सोलर पार्क में इस सामाजिक अन्याय रूपी बुराई से लड़ने की क्षमता भी थी। सौर पार्क के छह साल बाद, इसके प्रभाव पर विभिन्न सामाजिक आर्थिक अध्ययन सामने आए लेकिन इसके परिणाम विपरीत दिख रहे हैं।

पावागढ़ सोलर पार्क से बनी बिजली को आगे पहुंचाने के लिए सड़क किनारे बिजली लाइन। तस्वीर- अभिषेक एन. चिन्नप्पा/मोंगाबे
पावागढ़ सोलर पार्क से बनी बिजली को आगे पहुंचाने के लिए सड़क किनारे बिजली लाइन। तस्वीर- अभिषेक एन. चिन्नप्पा/मोंगाबे

क्या भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया से बचने के लिए ली किराये पर जमीन?

कागज पर लीज या पट्टा मॉडल निष्पक्ष और न्यायसंगत है। लेकिन ग्रामीणों के साथ बातचीत से आश्चर्यजनक बात सामने आती है। बालासमुद्र निवासी केएस चक्करैया ने कहा, “बलराम, (तत्कालीन) केआरईडीएल के एमडी, पावागढ़ के निवासी थे और उन्होंने हमें बताया कि पावागढ़ एक बंजर भूमि जैसा दिखता है जिसमें कृषि के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने कहा कि सोलर पार्क से हमें फायदा होगा। तत्कालीन ऊर्जा मंत्री डी.के. शिवकुमार ने ग्रामीणों से कहा कि यदि वे प्रस्ताव के साथ आगे नहीं बढ़े, तो मल्लिकार्जुन खड़गे (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता) इस योजना को अपने निर्वाचन क्षेत्र कलबुर्गी में ले जाएंगे।

पर्यावरण समूह के भार्गवी राव, जो हार्वर्ड-कैनेडी स्कूल समर्थित परियोजना गवर्नेंस ऑफ सोशियोटेक्निकल ट्रांसफॉर्मेशन के प्रमुख जांचकर्ताओं में से एक हैं। वह कहते हैं कि जमीन को खरीदने के बजाय पट्टे पर देना, जमीन से जुड़े विभिन्न नियमों और कानूनों को दरकिनार करने का एक तरीका था। अधिग्रहण और एक मेगा सोलर पार्क जल्द से जल्द शुरू करने का यह आसान और तेज तरीका था।

“यदि वे भूमि खरीदना चाहते थे, तो भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्वास अधिनियम, 2013 के तहत किया जाना चाहिए था। इसके तहत लोगों को उचित मुआवजा मिलता और पारदर्शिता के अधिकार के अनुसार भूमि अधिग्रहण की एक उचित प्रक्रिया अपनाई जाती। इस प्रक्रिया में सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन अध्ययन की तैयारी, जन सुनवाई होता,” उन्होंने कहा। “आज भी परियोजना से प्रभावित लोगों के पास पट्टा समझौते (कॉन्ट्रेक्ट) की प्रतियां नहीं हैं। तो, यह जन-केंद्रित प्रक्रिया  कैसे हुई?”

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हालांकि, अमरनाथ ने भूमि-पट्टे की प्रक्रिया में उचित कार्यप्रणाली अपनाए जाने की बात दोहराई। “लोगों को जागरूक करने और उन्हें समझौते की व्याख्या करने के लिए हमारे पास बहुत सारे सहायक कर्मचारी थे। सभी जमीन मालिकों के पास समझौते की मूल प्रति होनी चाहिए। वे इसे अपने पास रख सकते हैं,” उन्होंने कहा।

केएसपीडीसीएल ने हर भुगतान के बाद जमीन संबधित रिकॉर्ड को हर साल अपडेट किया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसानों का उनकी भूमि के साथ संबंध बना रहे।

मोंगाबे-हिन्दी से बातचीत में ग्रामीणों ने कहा कि किसी को भी उनकी भूमि पर पार्क के प्रभाव या पट्टे की अवधि के अंत में डीकमिशनिंग प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी। पार्क को बंद करते समय जो प्रक्रिया अपनाई जाती है उसे डीकमिशनिंग कहते हैं। नाइट फ्रैंक द्वारा दो गांवों, थिरुमणि और रायचारलू में किए गए पर्यावरण प्रभाव आकलन किया गया। इस दौरान थिरुमणि में आयोजित पार्क के विभिन्न पहलुओं पर हितधारकों के साथ चर्चा के दौरान महज 10 से 12 ग्रामीणों ने भाग लिया। जबकि यहां की आबादी 2000 के करीब है।

मोंगाबे-हिन्दी को ग्रामीणों ने बताया कि उनमें से किसी को भी इस बारे में जानकारी नहीं दी गई थी।

जैविक खेती करने वाले किसान महेश ने अपनी जमीन देने से इनकार कर दिया। वह कहते हैं, “लोग जमीन से वार्षिक आय की संभावना के बारे में इतने उत्साहित थे कि वे अपने घरों के लिए बिजली जैसी सबसे बुनियादी चीजों पर भी बातचीत करना भूल गए।” “चूंकि मेरी जमीन पर कई फलदार पेड़ थे, उन्होंने मुझे रुपये का एक बड़ा मुआवजा देने की पेशकश की। यह राशि 2.5 करोड़ की थी और इसके बदले मुझे अपने पेड़ों को काटना था,” उन्होंने कहा।

पावागढ़ का सोलर पार्क देश का सबसे बड़ा सौर पार्क है। इस प्रोजेक्ट के तहत 28 साल के लिए जमीन पट्टे पर ली गई थी। तस्वीर- अभिषेक एन चिन्नप्पा/मोंगाबेपावागढ़ का सोलर पार्क देश का दूसरा सबसे बड़ा सौर पार्क है। इस प्रोजेक्ट के तहत 28 साल के लिए जमीन पट्टे पर ली गई थी। तस्वीर- अभिषेक एन चिन्नप्पा/मोंगाबे

चराग तले अंधेराः सोलर पार्क के पास बार-बार कटती बिजली

जहां हजारों एकड़ में सौर पैनल लगे हैं उसी इलाके में बिजली की समस्या हो रही है। ग्रामीण चक्करैया एक किराना बेचने के लिए एक दुकान चलाते हैं। जमीन से होने वाली आय से उन्होंने दुकान शुरू किया था। दुकान में रंग-बिरंगी चीजें रखी हैं, पर बिजली जाने से उनकी चमक खो गई है। बिजली न होने से रेफ्रिजरेटर में रखा दूध खराब हो गया, सो वह ब्लैक कॉफी पीने की पेशकश करते हुए कहते हैं, “हमने शुरुआत में गांव के लिए सौर ऊर्जा न मांगकर गलती की। वे हमारी जमीन पर बिजली का उत्पादन करते हैं और इसे कहीं और भेजते हैं।”

ग्रामीणों ने कहा कि उन्हें हर दूसरे दिन बिजली कटौती होती है, कभी-कभी 8 से 10 घंटे बाद बिजली आती है।

जिस गांव में बिजली पैदा हो रहा हो वहां के लोग बिजली की दिक्कत से जूझ रहे हों, यह बात एनर्जी पॉवर्टी यानी ऊर्जा गरीबी का एक उदाहरण है। इस तरह का विरोधाभास देश में तेजी से ऊभर रहा है। विभिन्न ऊर्जा प्रणालियों के सामाजिक-पारिस्थितिक प्रभाव पर काम करने वाली शोधकर्ता प्रिया पिल्लई ने कहा कि सौर और जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा प्रणालियों के संचालन के बीच उल्लेखनीय समानताएं हैं।

“सिंगरौली (मध्य प्रदेश में) में भारत की कोयला आधारित ऊर्जा का 10 प्रतिशत उत्पादन होता है। यहां के गांवों में बिजली की पहुंच नहीं है। यदि बिजली का उत्पादन करने वाले गांवों में बिजली वितरित की जाती है, तो ग्रामीण इन प्रणालियों को खुले मन से स्वीकारते,” पिल्लई ने कहा।

उन्होंने जोर देकर कहा कि गांवों में बिजली का उत्पादन जो शहरों या ग्रिड में जाता है, यह एक असमान वितरण है। ऊर्जा न्याय की दृष्टि से यह एक बड़ी समस्या है जिसपर स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में ध्यान देने की जरूरत है।

हालांकि, अमरनाथ ने कहा कि पूरे राज्य को पावागढ़ में उत्पन्न सौर ऊर्जा से लाभ हुआ है, जिसमें इसके निवासी भी शामिल हैं, यह अप्रत्यक्ष रूप से ग्रिड के माध्यम से हुआ है। “अगर उन्हें केवल सौर ऊर्जा दी जाती, तो वे शाम को और ऑफ-सीजन के दौरान क्या करते जब बिजली उत्पादन कम होता?” उन्होंने पूछा।

पावागड़ा के थिरुमणि गांव में मशाल की रोशनी में सब्जी खरीदती महिला। सोलर पार्क को जमीन पट्टे पर देने वाले गांवों को नियमित बिजली कटौती का सामना करना पड़ता है। तस्वीर- अभिषेक एन. चिन्नप्पा/मोंगाबे
पावागड़ा के थिरुमणि गांव में मशाल की रोशनी में सब्जी खरीदती महिला। सोलर पार्क को जमीन पट्टे पर देने वाले गांवों को नियमित बिजली कटौती का सामना करना पड़ता है। तस्वीर- अभिषेक एन. चिन्नप्पा/मोंगाबे

यहां के निवासियों ने कहा कि सोलर पार्क की स्थापना से पहले किसानों से बेहतर जल निकासी व्यवस्था, बेहतर स्कूलों और अस्पतालों के वादे किए गए थे, जिनमें से किसी को पूरा नहीं किया गया। समझौते में भी इनका उल्लेख नहीं किया गया। यहां मूलभूत जरूरतों के लिए आधारभूत संरचना की कमी है। जहां सोलर पार्क के साथ सड़कें दोनों ओर स्ट्रीट लाइट के साथ अच्छी तरह से बिछाई गई हैं, वहीं गांवों से गुजरने वाली सड़कें, कुछ गड्ढों से भरी, कुछ कच्ची, एक अलग कहानी कहती हैं।

गांवों के ऊपर से बिजली के बड़े-बड़े तार गुजरते हैं। पास के नागलामाडिके गांव में स्वामी विवेकानंद निजी सहायता प्राप्त स्कूल के बगल में एक ट्रांसमीटर स्टेशन बनाया गया है। शिक्षकों में से एक ने चिंता व्यक्त की कि ट्रांसमीटरों की निकटता बच्चों में स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकती है।

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) फंड और कंपनियों के वार्षिक स्थानीय क्षेत्र सुधार फंड का इस्तेमाल कहीं और हो रहा है। कायदे से इन फंड का इस्तेमाल परियोजना प्रभावित गांवों पर होना चाहिए था। हालांकि, अमरनाथ ने आश्वासन दिया कि स्थानीय क्षेत्र की विकास परियोजनाओं के लिए सरकार द्वारा 57 करोड़ (570 मिलियन रुपये) की मंजूरी दी गई है, जिसमें 23 करोड़ रुपए पहले ही वितरित किए जा चुके हैं। उन्होंने कहा, “आरओ का पानी उपलब्ध कराने, स्कूलों और अस्पतालों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, तिरुमणि में एक प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज सभी परियोजना का हिस्सा हैं।”

रोजगार में विविधता की कमी एक बड़ी आर्थिक चुनौती

रायचार्लू के रास्ते में मोंगाबे-हिन्दी की मुलाकात थिरुमणि निवासी अमरेंद्र से होती है। वे एक खाली खेत पर अपने दो भैंसों को चरा रहे थे। 32 एकड़ जमीन पार्क को सौंपने के बाद भी उन्हें अभी तक पार्क में नौकरी नहीं मिली है। उनसे नौकरी का वादा किया गया था। उनका कहना है कि ठेकेदारों के माध्यम से नौकरियों का आवंटन किया जाता है जो उन लोगों को तरजीह देते हैं जिन्हें वे जानते हैं। इसी तरह, अशोक एक आईटीआई स्नातक है जिसे सोलर पार्क में घास काटने के लिए नौकरी की पेशकश की गई थी, जिसे उन्होंने मना कर दिया।

कई किसानों ने कहा कि गांवों से बहुत कम लोगों ने पार्क में नौकरी की है, उनमें से ज्यादातर दैनिक मजदूरी के काम में लगे हुए हैं जैसे घास काटने या सौर पैनलों की धुलाई का काम। अब तक, ग्रामीणों को समझौते से जो सबसे अच्छा काम मिला है, वह सुरक्षा गार्ड या मैकेनिक का काम है।

अमरनाथ मानते हैं कि जमीन देने वाले 50 फीसदी से ज्यादा जमीन की मालिक महिलाएं हैं। हालांकि, बावजूद इसके कंपनियों में एक भी महिला कार्यरत नहीं है। यहां तक ​​कि तकनीशियन भी ज्यादातर बाहर से आए पुरुष हैं। बाहरी लोगों को नौकरी देने के आरोपों का जवाब देते हुए अमरनाथ कहते हैं कि अधिकांश स्थानीय लोगों को नौकरियां मिली। अमरनाथ ने कहा कि 80 प्रतिशत पद ग्रामीणों द्वारा भरे गए थे। उनके अनुसार, युवाओं को सूर्यमित्र योजना के तहत कौशल विकास में प्रशिक्षित किया गया है। जबकि ग्रामीणों का कहना है कि उन प्रशिक्षित युवाओं को भी तकनीकी नौकरियों से वंचित कर दिया गया है। रायचारलू के अक्कलप्पा सहित किसानों ने आरोप लगाया कि कंपनियों को स्थानीय लोगों के लिए “अविश्वास” था और वे उन्हें तकनीकी नौकरियों से वंचित कर रहे थे।

अक्कलप्पा के अनुसार, युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण नौकरियों की कमी गांवों के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर रही है। यूं चो पावागढ़ में केवल एक लाइसेंस प्राप्त बार है, लेकिन छोटे ढाबों में शराबखोरी बढ़ रही है। ये ढाबे पार्क बनते समय शुरू हुए थे। अब यहां शराब मिलने लगा है। महेश कहते हैं, “शराब निश्चित रूप से बढ़ रही है।”

उन्होंने कहा कि वार्षिक धार्मिक और फसल से संबंधित कार्यक्रम बंद हो गए हैं और नई संपन्नता ने ग्रामीणों को “कम सामाजिक” बना दिया है।

पावागढ़ के नागलामाडिके गांव में शराब की दुकान पर जाता एक व्यक्ति। तस्वीर- अभिषेक एन. चिन्नप्पा/मोंगाबे
पावागढ़ के नागलामाडिके गांव में शराब की दुकान पर जाता एक व्यक्ति। तस्वीर- अभिषेक एन. चिन्नप्पा/मोंगाबे

 

ओब्बलपति (32) पास के सौर पार्क में सुरक्षा गार्ड का काम करते हैं। वह एक मध्यम आयु वर्ग के राजेंद्र के साथ क्याथागनाचेरलु के गांव के चौक पर एक पेड़ के नीचे पगडे (पासा का एक पारंपरिक खेल) खेल रहे हैं। अपनी जमीन को पट्टे पर देने के बाद से उनके पास काफी खाली समय है। नियमित आय ने उसे आर्थिक रूप से सुरक्षित रखा है।

जमीन के बदले में एक अधिक आरामदायक जीवन मिलने में भी लैंगिक असमानता को स्थापित किया है।

जबकि कई पुरुष पेड़ों के नीचे या दिन के दौरान शराब का आनंद लेते थे, अधिकांश महिलाएं पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में और पास के खेतों में दैनिक मजदूरी पर काम करना जारी रखती हैं। परिवार की नियमित बढ़ी आय से लोगों की जीवनशैली पर अधिक फर्क नहीं पड़ा है। गोपाल जो पास के एक खेत में काम करते हैं, उनकी वार्षिक आय 42,000 रुपए है। उन्हें पट्टे पर दी गई दो एकड़ जमीन से यह आय मिलती है। हालांकि यह पैसा उनके घर चलाने के लिए अपर्याप्त है।

पार्क में नौकरियां नियमित आय प्रदान करती हैं। लेकिन अध्ययन के बाद इसके खतरे भी सामने आ रहे हैं। लंबे समय तक ऐसा चला तो आर्थिक जोखिम बढ़ सकता है। यह काम आजीविका में विविधता का विकल्प नहीं देता। यहां जमीन पर सिर्फ बिजली पैदा किया जा रहा है। जबकि अमेरिका के दक्षिण-पश्चिमी ओरेगॉन में पाइन गेट सौर पार्क में फूल उगाकर मधुमक्खियों और तितलियों जैसे परागणकों को प्रोत्साहित किया जाता है। इससे आसपास की खेती में मदद हो रही है।

 

आरती मेनन ने कर्नाटक में पावागढ़ के गांवों की यात्रा की। उन्होंने इंटरन्यूज के अर्थ जर्नलिज्म नेटवर्क के लिए 2021 में भारत में अक्षय ऊर्जा: उद्यमिता, नवाचार और चुनौतियों की कहानी अनुदान के हिस्से के रूप में मेगा सौर पार्कों से संबंधित सामाजिक-पारिस्थितिक मुद्दों पर दो-भाग की श्रृंखला की। यह स्टोरी इस कड़ी की दूसरी स्टोरी है। पहली स्टोरी पढ़ने के लिए इस लिंक पर जाएं।

 

बैनर तस्वीरः पावागढ़ सौर पार्क का नाम शक्ति स्थल रखा गया है। इसे विश्व का दूसरा सबसे बड़ा सोलर पार्क माना जाता है। तस्वीर- अभिषेक एन. चिन्नप्पा/मोंगाबे