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विश्व जल दिवसः नर्मदा नदी के किनारे क्यों सूखने लगे बोर, गिरता जा रहा भूजल स्तर

तवा नदी नर्मदा नदी की सबसे लंबी सहायक नदी है। गर्मियों में यह नदी अब सूखने लगी है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे

तवा नदी नर्मदा नदी की सबसे लंबी सहायक नदी है। गर्मियों में यह नदी अब सूखने लगी है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे

  • मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलने वाली नर्मदा देश की सातवीं सबसे बड़ी नदी है। नदी किनारे के क्षेत्र में बोरवेल सूखने लगा है।
  • जानकार मानते हैं कि भूजल का यह संकट नर्मदा में पानी की कमी की वजह से हो सकता है।
  • नदी के प्रवाह में रुकावट, सहायक नदियों का सूखना, अंधाधुंध खनन, पानी का अत्यधिक दोहन और रासायनिक खेती के बढ़ते चलन की वजह से भूजल स्तर नीचे जा रहा है।
  • भूजल के गिरते स्तर की समस्या सिर्फ नर्मदा नदी के क्षेत्र में ही नहीं है बल्कि देशव्यापी है। विश्व जल दिवस विश्वभर में 22 मार्च को मनाया जाता है। इस साल विश्व जल दिवस की थीम ग्राउंडवाटर यानि भूजल है।

नर्मदापुरम (होशंदाबाद) जिले के पिपरिया में बीजनवाड़ा गांव के निवासी सत्यनारायण पटेल का घर पासा नदी के बिल्कुल करीब है। मध्य प्रदेश के इस क्षेत्र के लिए नदी के इतने करीब होने का मतलब है घर में पानी की कोई कमी न हो। न पीने के पानी की कमी होनी चाहिए न ही फसलों की सिंचाई के लिए पानी कम पड़ना चाहिए। लेकिन गांव की तस्वीर बिल्कुल इसके उलट है। एक के बाद एक गांव के कुएं सूख रहे हैं। दो-तीन साल पहले सत्यनारायण पटेल का कुआं भी सूख गया। 

“पहली बार जब मेरा कुआं सूखा तो काफी आश्चर्य हुआ। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। नदी का पानी भूजल के रूप में कुएं से मिलता था,” पटेल ने बताया। 

वह पुराने दिनों को याद कर आगे कहते हैं, “हमने इस नदी के किनारे बचपन बिताया है। हमें याद नहीं कि कभी नदी सूखी हो, लेकिन बीते कुछ साल से इस नदी में एक या दो महीने ही पानी रहता है। नदी सूखने का असर ही शायद कि हमारे गांव के कुएं सूख गए। 200-250 फीट वाले बोर भी सूखने लगे हैं,” सत्यानारायण पटेल ने मोंगाबे-हिन्दी से कहा। 

बीजनवाड़ा से 20 किलोमीटर दूर सोहागपुर खिमारा महुआखेड़ा खुर्द गांव में सत्यनारायण पटेल का परिवार खेती करता है। दो साल पहले खेत में लगे बोरवेल ने भी पानी देना बंद कर दिया।
“यह स्थान नर्मदा नदी के पांच किलोमीटर के दायरे में आता है। नदी के इतने नजदीक होने के बावजूद जमीन के भीतर का पानी नीचे जा रहा है,” पटेल ने मोंगाबे-हिन्दी को बताया। 

पासा नदी किनारे सत्यनारायण पटेल का घर है। वह दिखा रहे हैं कि पासा नदी का प्रवाह रेत खनन की वजह से रुक रहा है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे
पासा नदी किनारे सत्यनारायण पटेल का घर है। वह दिखा रहे हैं कि पासा नदी का प्रवाह रेत खनन की वजह से रुक रहा है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे

मध्य प्रदेश में पटेल के अलावा लाखों किसान परिवार भूमिगत जल स्तर नीचे जाने की समस्या से जूझ रहे हैं। वर्ष 2019 में जिले में 600 से अधिक नलकूपों से पानी निकलना बंद हो गया। इसके बाद लगभग हर साल नलकूप और बोरवेल के सूखने का सिलसिला जारी है। पिपरिया के बनखेड़ी में ही अकेले 400 बोरवेल सूख गए। 

इलाके में खेती-किसानी और नदियों पर शोध करने वाले लेखक बाबा मायाराम इसकी वजह बताते हैं भूमिगत जल का दोहन। वह कहते हैं, “हर साल जलस्तर थोड़ा नीचे खिसक जाता है। इस वजह से लोग पानी की तलाश में बोर की गहराई और अधिक कर देते हैं। सिंचाई, पेयजल और फैक्ट्री के लिए धरती से सबसे अधिक पानी निकाला जाता है,” उन्होंने कहा। 

बाबा मायाराम के दावे की पुष्टि केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की रिपोर्ट करती है। बनखेड़ी को बोर्ड की ग्राउंड वाटर रिसोर्स असेसमेंट 2020 में सेमी क्रिटिकल श्रेणी में रखा गया है।यानी यहां 70 से 90 फीसदी तक भूजल का दोहन होता है। 

जल शक्ति मंत्रालय द्वारा जारी  डायनेमिक ग्राउंड वाटर रिसोर्स ऑफ इंडिया की वर्ष 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017 के मुकाबले 2020 में भूमिगत जल का दोहन बढ़ा है। मध्य प्रदेश में 317 ब्लॉक में से 26 को ओवर एक्सप्लॉयटेड श्रेणी में रखा गया है जिसका मतलब भूमिगत जल के रिचार्ज होने की तुलना में उसका दोहन अधिक मात्रा में किया जा रहा है। आठ स्थान क्रिटिकल श्रेणी में रखे गए हैं। क्रिटिकल मतलब जहां भूजल का दोहन रिचार्ज की तुलना में 90 से 100 फीसदी हो। वहीं 50 स्थानों को सेमी क्रिटिकल माना गया है, जिसमें 70 से 90 फीसदी तक भूजल का दोहन होता है।

पिपरिया के खेतों में मानसून में भी भूजल से सिंचाई की जाती है। जानकार मानते हैं कि रासायनिक खेती की वजह से पानी की खपत अधिक होती है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे
पिपरिया के खेतों में मानसून में भी भूजल से सिंचाई की जाती है। जानकार मानते हैं कि रासायनिक खेती की वजह से पानी की खपत अधिक होती है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे

नदी विशेषज्ञ और भूवैज्ञानिक केजी व्यास बोर सूखने की समस्या को नदी सूखने से जोड़कर देखते हैं। 

मोंगाबे-हिन्दी से बातचीत में वह कहते हैं, “एक बोरवेल चारो तरफ से पानी खींचता है। नदी किनारे कोई बोरवेल चल रहा है तो भले ही वह जमीन के भीतर से पानी ले रहा हो पर वह पानी नदी का ही होता है। नर्मदा और गंगा के कछार की समस्या एक जैसी है, भूजल का दोहन। नदी सूखने की वजह से होशंगाबाद में वाटर टेबल प्रभावित हुआ है।”

जलविहीन हो रहे नर्मदा के कछार 

मध्य प्रदेश के जिन स्थानों पर बोरवेल सूखने की घटना हो रही है वह नर्मदा के बिल्कुल किनारे हैं। यह क्षेत्र नर्मदा बेसिन या नर्मदा कछार में शामिल है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नर्मदा बेसिन का भूजल स्तर कम हो रहा है। 

नर्मदा को लेकर मिनिस्ट्री ऑफ वाटर रिसोर्सेज (जल शक्ति मंत्रालय) की एक रिपोर्ट कहती है कि नर्मदा देश की सातवीं सबसे बड़ी नदी है। पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों में यह देश की सबसे बड़ी नदी है। नर्मदा की 19 प्रमुख सहायक नदियों को मिला दें तो नर्मदा घाटी का इलाका 92,672.42 वर्ग किलोमीटर का है जो कि देश के तीन प्रतिशत हिस्से के बराबर है। इस क्षेत्र का बड़ा हिस्सा 56.90 प्रतिशत खेतों से ढका है और 32.88 प्रतिशत हिस्से पर जंगल है। 

नर्मदा बेसिन का क्षेत्र लगभग 98,796 वर्ग किलोमीटर में आता है जिसका सबसे बड़ा हिस्सा (88.58 %) मध्य प्रदेश में है। नदी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और गुजरात में भी बहती है। 

ताजा रिपोर्ट (2020) के मुताबिक मध्य प्रदेश में भूमिगत जल निकालने की दर 56.82 प्रतिशत है। जबकि वर्ष 2017 में यह दर 54.76 प्रतिशत थी।

ग्राउंड वाटर ईयरबुक 2020-21 में भी भूजल स्तर को लेकर चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। वर्ष 2009 से लेकर 2019 तक के दस साल के आकड़ों के आधार पर तैयार इस रिपोर्ट में सामने आया कि 25.80 प्रतिशत स्थानों पर भूजल स्तर नीचे गया है। बीते 10 सालों में 63.24 प्रतिशत तक भूमिगत जल में गिरावट आई है।

नर्मदा घाटी का इलाका 92,672.42 वर्ग किलोमीटर का है जो कि देश के तीन प्रतिशत हिस्से के बराबर है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे
नर्मदा घाटी का इलाका 92,672.42 वर्ग किलोमीटर का है जो कि देश के तीन प्रतिशत हिस्से के बराबर है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे

जबलपुर स्थित जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय के चार प्रोफेसर सौरभ नेमा, एम के नेमा, एम के अवस्थी एवं आर के नेमा ने साल 2019 में एक अध्ययन प्रकाशित किया था। इसमें एक मॉडल के सहारे भूजल स्तर में उतार चढ़ाव का का पूर्वानुमान लगाया गया। शोध में निष्कर्ष निकला कि भूजल दोहन हर वर्ष 12 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रही है। अगर ऐसा चलता रहा तो 2030 तक जल स्तर में 3.9 से लेकर 8.8 मीटर तक की गिरावट आएगी। 

जल शक्ति मंत्रालय की रिपोर्ट में सामने आया है कि नर्मदा कछार के बड़े हिस्से का भूजल प्रदूषित भी हो रहा है। मध्य प्रदेश के मंडला, डिंडोरी, धार, सीहोर, रायसेन और सिवनी जिले में भूजल में फ्लोराइड की अधिकता पाई गई है। गुजरात के भरूच, वड़ोदरा, नर्मदा जिले का पानी भी फ्लोराइड से प्रदूषित है। भरूच में चल रहे रासायनिक संयंत्रों का कचरा भी जमीन के नीच पंप के माध्यम से डाला जाता है, जिसकी वजह से भूजल प्रदूषित हो रहा है। जांच में सामने आया है कि अंकलेश्वर  औद्योगिक क्षेत्र के भूजल में मर्करी की मात्रा 100 गुना अधिक है। 

जानकार मानते हैं कि नर्मदा कछार का भूगर्भ काफी जटिल है और उसमें एक रूपता नहीं है। इसलिए भूजल को लेकर कोई स्पष्ट रुझान देखना एक मुश्किल काम है। 

“नर्मदा कछार की मिट्टी कहीं कोमल है तो कहीं पत्थर वाली। ऐसा भी हो सकता है कि किसी खेत का बोरवेल सूख जाए और बगल के खेत का चालू रहे। पानी जमीन के भीतर बने फ्रैक्चर से आता है और यह अगर रिचार्ज न हो पाए तो बोर सूख सकते हैं। इसे समझने के लिए अध्ययन की जरूरत है,” केंद्रीय भूजल बोर्ड के मध्य क्षेत्र के क्षेत्रीय निदेशक पी के जैन ने मोंगाबे-हिन्दी को बताया। 

साथ ही उन्होंने कहा कि नर्मदा नदी के प्रवाह के लिए भूजल काफी महत्वपूर्ण है। “न सिर्फ नदी भूजल को रिचार्ज करती है, बल्कि कई स्थानों पर भूजल भी नदी की धारा में सहयोग देती है,” जैन ने बताया। 

भूजल स्तर को लेकर सरकार का आंकड़ा स्पष्ट नहीं है, जबकि स्थानीय स्तर पर काम करने वाले पर्यावरण कार्यकर्ता इसे गिरता हुआ बताते हैं। 

जल संरक्षण मंच के संस्थापक और पिछले दो दशक से नर्मदा नदी पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता विनोद शर्मा बताते हैं कि नर्मदा किनारे किसानों का बोरवेल सूखना अब आम बात है। “भूजल सूखने के बाद अब नर्मदा से सीधे पानी निकालकर सिंचाई की जा रही है। जबलपुर से लेकर होशंगाबाद तक तकरीबन 85000 पंपों के माध्यम से नर्मदा का जल खींचा जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि नर्मदा नदी में पानी कम होता जा रहा है और इसका असर भूजल पर भी हो रहा है,” शर्मा ने मोंगाबे-हिन्दी को बताया। 

जानकार पानी के अत्यधिक दोहन और रासायनिक खेती को भी भूजल रिचार्ज होने की राह में एक रुकावट मानते हैं। नर्मदा बेसिन पर सरकार की रिपोर्ट में सामने आया है कि नर्मदा के मैदानी इलाकों से लिया गया 40 फीसदी पानी का नमूना प्रदूषित निकला। कृषि बाहुल्य क्षेत्र में खाद और कीटनाशक के इस्तेमाल की वजह से नाइट्रेट की मात्रा 100 एमजी प्रति लीटर से लेकर 300 एमजी प्रति लीटर तक पहुंच गई है। 

बाबा मायाराम कहते हैं, “रासायनिक खेती की वजह से भूमिगत जल प्रदूषित होता है। हालांकि, इसका दोष मैं किसानों को नहीं देता। वे बाजार के कुचक्र में फंस गए हैं जहां रासायनिक खाद-कीटनाशक और संकर बीज की वजह से पानी की खपत बढ़ रही है। लागत बढ़ने से किसान इस चक्र में फंसते ही जा रहे हैं,” उन्होंने कहा। 

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भारत सरकार ने वर्ष 2021 में नेचुरल फार्मिंग के फायदों को देखते हुए इसको लेकर एक मिशन की घोषणा की। सरकार के मुताबिक नेचुरल फार्मिंग या कुदरती तरीके से खेती करने से 50-60 प्रतिशत तक पानी की खपत कम होती है।

सरकार ने आंध्रप्रदेश में हुए एक शोध का हवाला देते हुए कहा कि रासायन रहित खेती में 45 से 70 प्रतिशत तक कम ऊर्जा की खपत होती है। इसका एक फायदा कार्बन उत्सर्जन में कमी के रूप में भी है। 


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बाबा मायाराम कहते हैं कि कुछ वर्ष पहले तक मध्य प्रदेश में कुदरती तरीके से ही खेती होती थी। तब इतने पानी की खपत नहीं होती थी। 

भूजल पर सरकारी संस्थाओं के कामकाज पर टिप्पणी करते हुए व्यास कहते हैं, “भूजल को लेकर केंद्र और राज्य की संस्थाएं ऐसे डॉक्टर की भूमिका में है जो रोग तो बता रही है, लेकिन इलाज नहीं। गिरते भूजल को सुधारने के लिए आखिर क्या किया जाए वह ये संस्थाएं नहीं बता रहीं।,” 

व्यास सुझाते हैं, “नर्मदा हो या गंगा, समस्या उसके सहायक नदियों के सूखने की है। नर्मदा की सहायक नदियां जैसा दूधी, तवा में अवैज्ञानिक तरीके से खनन की वजह से पानी न के बराबर रह गया है। गर्मियों में ये नदियां सूख जाती हैं। सहायत नदियों में पानी न होने की वजह से नर्मदा सूख रही है। समस्या के समाधान के लिए इन नदियों को भी पुनर्जीवित करना होगा।”

सिर्फ नर्मदा ही नहीं, खतरे की पूरी दुनिया का भूजल 

नर्मदा को भारत की सबसे पुरानी नदियों में से एक माना जाता है। इसे अविरल कहा गया है, मतलब नदी में साल भर पानी रहता है। केजी व्यास के मुताबिक नर्मदा को ताकत इसकी सहायक नदियों से मिलती है। हालांकि, सहायक नदियां खुद दम तोड़ रही हैं। 

नर्मदा की 41 सहायक नदिया हैं जिनमें तवा , बरनेर , बैइयार , दूधी , शक्कर , हिरन , बरना , कोणार , माचक आदि प्रमुख हैं। 

व्यास चिंता जताते हैं कि जो हाल गंगा बेसिन का है कमोबेश वही हाल नर्मदा नदी का भी हो रहा है। 

नर्मदा की 41 सहायक नदिया हैं जिनमें तवा , बरनेर , बैइयार , दूधी , शक्कर , हिरन , बरना , कोणार , माचक आदि प्रमुख हैं। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे
नर्मदा की 41 सहायक नदिया हैं जिनमें तवा , बरनेर , बैइयार , दूधी , शक्कर , हिरन , बरना , कोणार , माचक आदि प्रमुख हैं। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे

केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की ताजा रिपोर्ट बताती है कि देश में रिचार्ज के मुकाबले औसतन 61.6 % प्रतिशत भूजल निकाला जा रहा है। देश के 16 फीसदी इलाकों में भूजल का दोहन इसके रिचार्ज होने की तुलना में अधिक हो रहा है। देश में वर्ष 2020 में 244.92 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) भूजल निकाला गया। 

इस आंकड़ो को अगर 2004 के आंकड़ों से तुलना करें तो स्थिति बदतर होती नजर आएगी। साल 2004 में 50 प्रतिशत भूजल का दोहन हो रहा था, जबकि यह आंकड़ा बढ़कर 62 फीसदी हो गया है। वर्ष 2004 में 231 बीसीएम भूजल निकाला जाता था। 

वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में भूजल पर सबसे अधिक निर्भरता भारत की ही है। विश्व का एक चौथाई भूजल भारत उपयोग करता है। पूरी दुनिया में भूजल की मात्रा और गुणवत्ता गिर रही है। इसी वजह से विश्व जल दिवस 2022 का थीम ग्राउंडवाटर पर आधारित है।  

दुनियाभर में जागरुकता के लिए संयुक्त राष्ट्र ने विश्व जल दिवस मनाने की शुरुआत की गई थी। साल 1992 में ब्राजील के रियो डि जेनेरियो में आयोजित यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन एनवायरमेंट एंड डेवलप्मेंट में विश्व जल दिवस को मनाने का प्रस्ताव पारित किया गया था। 

 

बैनर तस्वीरः तवा नदी नर्मदा नदी की सबसे लंबी सहायक नदी है। गर्मियों में यह नदी अब सूखने लगी है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे

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