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जलभराव की वजह से खेत बेचने को मजबूर हरियाणा के किसान, किसानी छोड़ने को मजबूर

जो लोग केवल खेती पर निर्भर हैं, उन्होंने अपने गांवों में भूमि होने के बावजूद, खेती के लिए अन्य गांवों में पट्टे पर जमीन ली है। तस्वीर- सत सिंह

जो लोग केवल खेती पर निर्भर हैं, उन्होंने अपने गांवों में भूमि होने के बावजूद, खेती के लिए अन्य गांवों में पट्टे पर जमीन ली है। तस्वीर- सत सिंह

  • चरखी दादरी के कृषि क्षेत्रों में सालभर जलभराव की वजह से जमीन खेती लायक नहीं रह गई है। किसान वैकल्पिक व्यवसाय अपना रहे हैं, या खेती जारी रखने के लिए दूसरे गांवों में पट्टे पर जमीन ले रहे हैं।
  • उत्तर भारत के कई हिस्सों में भूजल की कमी एक समस्या है। जबकि इसके विपरीत हरियाणा के 319 गांवों में भूजल के उच्च स्तर के कारण जलभराव की समस्या बनी रहती है।
  • चरखी-दादरी में सरकार के हस्तक्षेप, खारे पानी की निकासी के प्रयास और फसल विविधीकरण के लिए सब्सिडी, खेती पर अस्थायी प्रतिबंध जैसे उपायों को इस मुद्दे का संभावित समाधान माना जा रहा है।

हरियाणा के चरखी दादरी जिले के इमलोटा गांव के रहने वाले 42 वर्षीय किसान सोनू कलकल अपनी जमीन पर खेती कर खुशहाल जीवन जी रहे थे। उनके खेत में बंपर पैदावार होती थी। पर अब ये भूमिहीन हो गए हैं। ऐसा नहीं कि उन्होंने जमीन बेच दी या किसी ने हड़प लिया। बल्कि उनके खेत में जरूरत से अधिक पानी रहने लगा और जलजमाव की स्थिति बन गई। इससे खेती करने का उनका विकल्प खत्म हो गया। 

कृषि क्षेत्रों में जल स्तर में वृद्धि से उपजाऊ भूमि भी किसी लायक नहीं रहती। शायद यही वजह है कि हरियाणा के इस हिस्से में कलकल और कई किसानों को अपनी खेती की जमीन बेचनी पड़ी।

“अब नुकसान सहने की क्षमता मुझमें नहीं है। मुझ पर लाखों का कर्ज चल रहा था और उस पर चक्रवृद्धि ब्याज देना पड़ता था। मेरी खेती की जमीन कभी सोना उगलती थी, लेकिन अब यह एक बोझ में बदल गई थी,” चिंतित कलकल कहते हैं। आखिरकार, उन्हें अपनी पांच एकड़ जमीन बेचनी पड़ी। 

“डेढ़ दशक हो गए हैं। जैसे-जैसे जल स्तर बढ़ रहा था, इलाके में किसानों की जमीन का भाव उसी गति से गिर रहा था,” उन्होंने कहा।

जब यहां खेतों में पानी नहीं जमता था तब गांव में लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती ही था। वे अब गुरुग्राम में कारखानों में मोटरसाइकिल मैकेनिक, छोटे दुकानदार या मजदूर के रूप में काम करते हैं।

दादरी स्थित जनता डिग्री कॉलेज से स्नातक मनोज कलकल ने कहा कि 1,700 एकड़ कृषि भूमि में से 1,200 एकड़ इस मौसम में बिना बुवाई के रह गई थी। उनके जैसे लोग जिन्हें खेती के अलावा कुछ और काम नहीं आता, उन्होंने दूसरे गांवों में पट्टे पर जमीन ली है और वहां खेती करना शुरू किया है। 

हरियाणा में चरखी दादरी जिले के इमलोटा गांव में जलभराव से बंजर हुई जमीन को दिखाता एक किसान। तस्वीर- सत सिंह
हरियाणा में चरखी दादरी जिले के इमलोटा गांव में जलभराव से बंजर हुई जमीन को दिखाता एक किसान। तस्वीर- सत सिंह

उन्होंने कहा, “पानी के नीचे हमारी अपनी जमीन है लेकिन जीने के लिए हमें दर-दर की ठोकर खानी पड़ रही है।”

इमलोटा निवासी मनीष कुमार ने इस समस्या से जुड़ी एक और सामाजित मुश्किल का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि खेतों में लगातार जलभराव ने न केवल भूमि बंजर हुई है, बल्कि इमलोटा के युवाओं के शादी में भी मुश्किलें आने लगी। 

“मेरे गांव के हर घर में एक लड़का है, जो विवाह योग्य उम्र का है, लेकिन लड़कियां इन्हें नकार देती हैं। इन लड़कों को लायक नहीं समझा जा रहा। हरियाणा में, एक उपयुक्त दुल्हन मिलने की दो शर्त होती है, या तो सरकारी नौकरी हो या कृषि भूमि,” कुमार कहते हैं। 

जो लड़के अविवाहित हैं उनके पास जमीन तो है लेकिन 15 वर्षों से इस जमीन पर खेती नहीं होती। 

सर्वेक्षण में सामने आई जलभराव की स्थिति

कृषि विभाग के द्वारा हुए गांवों में जलभराव खारे क्षेत्रों के सर्वे में चरखी दादरी में 2017 से 2022 तक कुल 79,595 एकड़ कृषि भूमि में से 9,190 एकड़ में 2017 में जलभराव पाया गया। यह संख्या हर साल बढ़ती गई। 2018 में जलभराव क्षेत्र बढ़कर 9,540 एकड़ हो गया और 2019 में यह बढ़कर 9,840 एकड़ हो गया। 2020 में यह 9,840 एकड़ पर स्थिर रहा। हालांकि, 2021 में जिले में जलभराव के दायरे में 10,490 एकड़ हो गई है।

जिला कृषि विभाग के अनुसार 2022 में यह पाया गया कि 10,490 एकड़ भूमि जलमग्न हो गई थी और उस वर्ष फिर से बुवाई नहीं हो पाई थी। इमलोटा में सर्वेक्षण किए गए कुल 3,450 एकड़ में से 1,900 एकड़ में जलभराव और फसल का न होना पाया गया। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि 2017 में इमलोटा में 600 एकड़ भूमि जलमग्न हो गई थी और 2022 में यह क्षेत्र बढ़कर 1,900 एकड़ हो गया।

अतिरिक्त भूजल बनाम भूजल की कमी

जहां उत्तर भारत के कुछ हिस्से भूजल के गिरते स्तर से प्रभावित हैं, वहीं चरखी दादरी का कुछ हिस्सा भूजल स्तर में अत्यधिक वृद्धि से प्रभावित है। 

यहां तक कि हरियाणा के करीब 25.9 फीसदी गांव गंभीर रूप से भूजल संकट से जूझ रहे हैं और इसी तरह की स्थिति उत्तर प्रदेश और बिहार में भी बन रही है। इसके अतिरिक्त, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि 1998 और 2018 के बीच, प्रत्येक वर्ष पंजाब के 22 जिलों में से 18 में जल स्तर एक मीटर से अधिक गिर गया। पीएयू के अध्ययन में इसकी कई वजहें बताई गयी हैं। इसमें खेती के बदलते स्वरूप, नलकूपों में वृद्धि और नहर के पानी की उपलब्धता में कमी शामिल है। हालांकि, हरियाणा के गांवों में समस्या इसके विपरीत है। हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण (HWRA) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा के 319 गांव संभावित जल भराव वाले गांव हैं, जिनमें जल स्तर की गहराई 1.5 से 3 मीटर तक है। हरियाणा में 85 गांव ऐसे हैं जो गंभीर रूप से जलजमाव की समस्या से जूझ रहे हैं। यहां जल स्तर की गहराई 1.5 मीटर से कम है। 5-10 मीटर की गहराई पर पानी की मौजूदगी आमतौर पर एक अच्छा स्तर होता है।

इमलोटा गांव के किसान एक चौपाल पर भूजल के मुद्दों से निपटने के तरीकों पर चर्चा करते हुए। तस्वीर- सत सिंह
इमलोटा गांव के किसान एक चौपाल पर भूजल के मुद्दों से निपटने के तरीकों पर चर्चा करते हुए। तस्वीर- सत सिंह

जलभराव बन गया एक बारहमासी मुद्दा

इमलोटा हरियाणा के चरखी दादरी जिले के सात गांवों के समूह का एक हिस्सा है, जो 2008-09 से बारहमासी जलभराव के मुद्दों का सामना कर रहे हैं। अन्य छह गांव स्वरूपगढ़, सत्तोर, मोरवाला, कान्हेती, बिगोवा और बडवी हैं। इमलोटा में लगभग 2,000 लोग रहते हैं और इस तरह यह सात गांवों में सबसे बड़ा है। यह झज्जर-दादरी राजमार्ग पर स्थित है। राजमार्ग पर चलने वाले लोग लगभग साल भर पानी से भरी सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि को देख सकते हैं।

इमलोटा में 15 एकड़ जमीन के मालिक 39 वर्षीय जसवीर कलकल ने मोंगाबे-हिन्दी को बताया कि गांव की जमीन काफी उपजाऊ हुआ करती थी और किसान मुख्य फसल के रूप में गेहूं, सरसों, चना और धान की खेती करते थे। लेकिन किसानों द्वारा लंबे समय से लगातार धान की बुवाई करने से भूजल स्तर गड़बड़ा गया और यह 2008-18 में 20 फीट की गहराई से आज सतह के स्तर से 2 फीट नीचे हो गया।

जसवीर के अनुसार ये सात गांव अन्य गांवों की तुलना में निचले इलाके में स्थित हैं। आस-पास के गांवों से बारिश का पानी इमलोटा में जाता है और उचित निकास न होने की वजह से यह कृषि क्षेत्रों में पानी जमा हो जाता है। बरसात के मौसम में आसपास के गांवों से जमा होने वाला पानी इन सात गांवों में फंसा रहता है। 

जसवीर ने कहा कि किसान अब खाने के लिए शहर से गेहूं खरीदते हैं। जसवीर ने बताया, “हरियाणा में गेहूं एक बुनियादी फसल है जिसकी खेती करने पर हर किसान गर्व करता है।  लेकिन हम गेहूं की बुवाई भी नहीं कर सकते क्योंकि कृषि भूमि पानी के नीचे चली गई है और बंजर हो गई है।” उन्होंने कहा कि वे ट्रैक्टर को खेत में नहीं ले जा सकते, क्योंकि जमीन के दलदली बनावट के कारण ट्रैक्टर-ट्रेलरों के टायर धंस जाते हैं।

2021 के एक अध्ययन के अनुसार जलभराव वाली मिट्टी जल्दी से ढह जाती है। यह विशेष रूप से उच्च सोडियम और कैल्शियम अनुपात वाली मिट्टी में होता है।  इन मिट्टी को सॉडिक मिट्टी कहा जाता है।

एक अन्य अध्ययन में कहा गया है कि अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के सिंचित क्षेत्र में, विशेष रूप से उत्तर पश्चिम भारत में, भूजल के काफी पुनर्भरण से जल जमाव और मिट्टी में लवणता हो जाती है। कई क्षेत्रों में भूजल को निकाला जाता है जिससे जल स्तर गिरता है। इससे पानी में नमक की मात्रा बढ़ जाती है। उत्तर-पश्चिम भारत में 10 लाख हेक्टेयर सिंचाई से बने खारे क्षेत्र में से लगभग पांच लाख हेक्टेयर हरियाणा में है।

इमलोटा गांव सात गांवों का एक हिस्सा है जिसे सतगामा (सात गांवों का समूह) कहा जाता है जहां धान की अत्यधिक खेती के कारण जलभराव हो गया है। तस्वीर- सत सिंह
इमलोटा गांव सात गांवों का एक हिस्सा है जिसे सतगामा (सात गांवों का समूह) कहा जाता है जहां धान की अत्यधिक खेती के कारण जलभराव हो गया है। तस्वीर- सत सिंह

2017 में चरखी दादरी में एक पंचायत का आयोजन किया गया और उनकी कृषि भूमि में धान की बुवाई पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की गई। इसका उद्देश्य धान की खेती के कारण बिगड़े जलस्तर को ठीक करना था।

इमलोटा के एक बुजुर्ग जगबीर नुंबदार ने कहा कि इन सात गांवों में किसी भी किसान को धान बोने की अनुमति नहीं है, भले ही जमीन खेती योग्य हो या नहीं। “यह एकमात्र संभावित समाधान है जो काम कर सकता है लेकिन इसके लिए वर्षों के धैर्य की आवश्यकता होगी। चूंकि जल स्तर को खराब होने में वर्षों लग गए, इसलिए इसे ठीक करने के लिए उतने ही समय की आवश्यकता हो सकती है, ” उन्होंने कहा।

सरकार का हस्तक्षेप

मई 2020 में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने मेरा पानी, मेरी विरासत योजना शुरू की और घोषणा की कि राज्य सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर मक्का और दाल खरीदेगी। उन्होंने घोषणा की कि ‘वाटर गज़लर’ या पानी की अधिक खपत करने वाली फसल धान के स्थान पर वैकल्पिक फसलों की ओर जाने वाले किसानों को 7,000 रुपए प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। यदि किसान कम से कम 50% भूमि में धान के अलावा दूसरी फसल लगाते हैं तो वे इस योजना के लिए पात्र हो जाएंगे। 

हरियाणा लगभग 68 लाख मीट्रिक टन धान का उत्पादन करता है। जिसमें लगभग 32 लाख (3.2 मिलियन) एकड़ में बासमती किस्म के 25 मीट्रिक टन धान का उत्पादन शामिल है। 

मोंगाबे-हिन्दी से बात करते हुए, हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण (HWRA) की अध्यक्ष केशनी आनंद अरोड़ा ने कहा कि राज्य सरकार ने कई विभागों के साथ काम करने के लिए एक टीम बनाया है और इस समस्या को ठीक करने की कोशिश हो रही है। इसमें कृषि विभाग, मत्स्य पालन और सूक्ष्म सिंचाई विभाग भी जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि जल निकासी प्रौद्योगिकी के माध्यम से खारे पानी को निकालने का काम प्रगति पर है।


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झज्जर, रोहतक और चरखी दादरी में उन किसानों से आवेदन मांगे गए हैं जो अपनी जमीन को लवणता और जलभराव से मुक्त करना चाहते हैं। किसानों को लागत का 20 प्रतिशत वहन करना होगा जबकि शेष सरकार द्वारा वहन किया जाएगा। राज्य सरकार वर्टिकल फार्मिंग की तकनीक को अपनाने पर भी विचार कर रही है और किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने और पारंपरिक बाढ़ पद्धति की जगह स्प्रिंकलर या फुहारों के माध्यम से भूमि की सिंचाई करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। पंचायतों को लंबी अवधि के लिए मत्स्य पालन के लिए पट्टे पर देने के लिए मुफ्त जमीन दी गई है, जिसे लवणता के संकट से निपटने के लिए एक सफल तरीके के रूप में देखा जा रहा है।

 

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बैनर तस्वीरः जो लोग केवल खेती पर निर्भर हैं, उन्होंने अपने गांवों में भूमि होने के बावजूद, खेती के लिए अन्य गांवों में पट्टे पर जमीन ली है। तस्वीर- सत सिंह

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