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[वीडियो] गंगा डॉल्फिन को बचाने की डगर में कई मुश्किलें, प्रदूषण और बांध बड़ी समस्या

कहलगांव के 65 वर्षीय दशरथ सहनी डॉल्फिन मित्र के तौर पर संरक्षण का काम करते हैं। वह हर दिन नाव से आठ से दस किमी की गश्त करके संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखते हैं। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

कहलगांव के 65 वर्षीय दशरथ सहनी डॉल्फिन मित्र के तौर पर संरक्षण का काम करते हैं। वह हर दिन नाव से आठ से दस किमी की गश्त करके संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखते हैं। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

  • एक ओर सरकार गंगा डॉल्फिन के संरक्षण के लिए कई अभियान चला रही है। दूसरी ओर गंगा में राष्ट्रीय जलमार्ग का निर्माण और मानवीय हस्तक्षेप डॉल्फिन के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।
  • गंगाटिक डॉल्फिन भारत, नेपाल और बांग्लादेश में पाई जाती हैं, लेकिन तीनों देशों के बीच इस लुप्तप्राय जीव के संरक्षण के लिए कोई समझौता नहीं है। विशेषज्ञ ऐसे समझौते की जरूरत बता रहे हैं।
  • परंपरागत मछुआरों की उपेक्षा डॉल्फिन संरक्षण की कोशिशों पर पानी फेर रही है। डॉल्फिन मित्र के रूप में उन्हें बचाने में लगे मछुआरों को लंबे समय से मजदूरी नहीं मिली है।

कोरोना के दौरान लगे लॉकडाउन के बाद मीडिया ने गंगा में इंसानी गतिविधियों में कमी के चलते नदी के स्वच्छ होने की खबरें दीं। कहा गया कि इससे देश के राष्ट्रीय जलीय जीव लुप्तप्राय गंगा डॉल्फिन को लाभ होगा।

इन दावों के बाद इस साल ठंड के आखिरी दिनों में ‘मोंगाबे’ ने देश के एकमात्र विक्रमशिला डॉल्फिन अभयारण्य (बिहार के भागलपुर जिले में) का कहलगांव में डॉल्फिन मित्रों के साथ दौरा किया। इस दौरान कई डॉल्फिन को नदी में अठखेलियां करते देखा गया। इसके बावजूद जानकार इस दावे पर भरोसा करने के लिए तैयार नहीं हैं कि डॉल्फिन की संख्या बढ़ी है। बिहार राज्य गंगा कायाकल्प, संरक्षण और प्रबंधन समिति के सदस्य और प्रोफेसर डॉ सुनील कुमार चौधरी ने कहा कि ऐसे दावों का वैज्ञानिक आधार नहीं है।

वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट, मुंबई में रिवराइन इकोसिस्टम्स एंड लाइवलीहुड प्रोग्राम के प्रमुख नचिकेत केलकर ने एक इमेल साक्षात्कार में बताया कि बेशक महामारी के दौरान नौवहन गतिविधियां कम हुईं, लेकिन मछली पकड़ना जारी रहा। नदी डॉल्फिन को कहीं भी स्पष्ट रूप से ट्रैक नहीं किया गया है। इसलिए लॉकडाउन के सकारात्मक असर की खबरों में बिना ज्यादा सोचे-विचारे डॉल्फिन को शामिल कर लेना उस समय के विमर्श का उदाहरण है।

वहीं बॉन स्थित कन्वेंशन ऑन द कंजरवेशन ऑफ माइग्रेटरी स्पेसिस ऑफ वाइड एनिमल्स (सीएमएस) की कार्यकारी सचिव एमी फ्रेंकल ने मोंगाबे से साक्षात्कार में कहा, “हम भारत में डॉल्फिन की स्थिति पर लॉकडाउन के असर को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। डॉल्फिन पर लॉकडाउन के असर को परखा नहीं जा सकता है।“

आइयूसीएन (इंटरनेशनल यूनियन फॉर द कंजर्वेशन ऑफ नेचर) की रेड लिस्ट में डॉल्फिन भी लुप्तप्राय जीव के रूप में शामिल है। इस प्रजाति का आखिरी बार 2004 में आकलन किया गया था। आइयूसीएन के मीडिया और संचार अधिकारी मथायस फेचरटर ने मोंगाबे को बताया, “गंगा डॉल्फिन की कुल संख्या पांच हजार होने का उल्लेख दस्तावेज में है। हालांकि बांग्लादेश में अधिकतर डॉल्फिन रेंज का सर्वे नहीं किया गया है, ऐसे में वास्तविक संख्या कहीं अधिक हो सकती है।“

इस मसले पर सूचना के अधिकार के तहत भी भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) से पूछा गया कि क्या ऐसा कोई विवरण उपलब्ध है? जवाब में संस्थान ने बताया,  “डॉल्फिन की संख्या गिनना मुश्किल है। इस संबंध में नाव सर्वेक्षण से अनुमान लगाया जा सकता है।”

विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य में एक डॉल्फिन। तस्वीर- मृणाल कौशिक / विकिमीडिया कॉमन्स
विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य में एक डॉल्फिन। तस्वीर– मृणाल कौशिक / विकिमीडिया कॉमन्स

डॉल्फिन सेंचुरी से परे बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में गंगा में कम डॉल्फिन देखी गईं। मछुआरों, स्थानीय समुदाय, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों से इसकी वजहों को जाना  गया।

केलकर ने डॉल्फिन के लिए तीन मुख्य खतरे बताए। प्रदूषण, एक्सिडेंटल बायकैच और अवैध शिकार एवं डैम व बराज के चलते नदी का धीमा प्रवाह, जिससे डॉल्फिन के आवास का बड़े पैमाने पर नुकसान होता है। वहीं उभरते खतरों में नदियों पर औद्योगिक जलमार्गों का विकास और नदी को जोड़ने जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं शामिल हैं।

प्रदूषण, बांध और आधारभूत संरचना से खतरा

डॉल्फिन को स्वस्थ नदी का सूचक माना जाता है। वे नदी इकोसिस्टम के लिए अंब्रेला प्रजाति की तरह हैं। लेकिन देश की नदियां सीवेज, रासायनिक अपशिष्ट और कचरे के चलते मर रही हैं। डॉलफिन भी इसका शिकार हो रही हैं।

दरअसल, देश में प्रदूषित नदियों की संख्या बढ़ती जा रही है। संसद में दिए गए एक जवाब के मुताबिक 2015 में 302 के मुकाबले प्रदूषित नदियों की संख्या 2018 में बढकर 350 हो गई। सीएमएस की कार्यकारी सचिव एमी फ्रेंकेल ने मोंगाबे से बातचीत में जोर दिया,“एशिया में प्लास्टिक प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। यह डॉल्फिन के लिए प्रमुख खतरा है। लुप्तप्राय प्रजातियों में 36 फीसदी के प्लास्टिक कचरे में फंसने और उलझने का खतरा है।“

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साहिबगंज कॉलेज में भूगर्भ विज्ञान के सहायक प्रोफेसर डॉ रणजीत कुमार सिंह कहते हैं, “झारखंड के साहिबगंज जिले में गंगा के तट पर बड़े स्तर पर पत्थर का उत्खनन होता है। इससे पैदा होने वाली धूल डॉल्फिन और उनके आवास के लिए खतरनाक है।” वहीं गंगा के डेल्टा में फसलों के लिए कीटनाशकों का व्यापक उपयोग भी एक खतरा है। उदाहरण के लिए किसान बैगन व अन्य सब्जियों की फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए उसमें फ्यूरडॉन (अमेरिका में प्रतिबंधित) का छिड़काव करते हैं। भागलपुर में गंगा की जैव विविधता पर काम करने वाले अऱविंद मिश्रा ने कहा कि ये कीटनाशक उन प्रवासी पक्षियों को प्रभावित करते हैं, जो नदी में तैरते हैं। ये डॉल्फिन और मछली दोनों को नुकसान पहुंचाते हैं।

डॉल्फिन के लिए गंगा में तेजी से बढता शोर भी खतरा है। अभयारण्य क्षेत्र में शामिल सुल्तानगंज में गंगा पर पुल बन रहा है। पटना स्थित जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक गोपाल शर्मा ने कहा कि इस निर्माण ने वहां से डॉल्फिन को दूर भगा दिया है।

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी अंतरदेशीय जलमार्ग परिेयोजना के तहत कम से कम 1500 टन क्षमता के जहाजों की आवाजाही के लिए प्रयागराज से हल्दिया तक 1620 किमी लंबा राष्ट्रीय जलमार्ग बनाया जा रहा है। इस परियोजना पर सवाल उठाते हुए डॉ सुनील चौधरी ने कहा, मालवाहक जहाजों से निकलने वाले शोर से जलीय जीवन विशेषकर डॉल्फिन को नुकसान होगा। हालांकि इस मसले पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ  अन्य आदेश पारित करने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने जलमार्ग बनाने का पक्ष में फैसला दिया था।

पश्चिम बंगाल में कटुआ के निकट नयाचार में गंगा नदी। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे
पश्चिम बंगाल में कटुआ के निकट नयाचार में गंगा नदी। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

कहलगांव के 65 वर्षीय डॉल्फिन मित्र दशरथ सहनी ने बड़े बांध बनाने पर सवाल उठाते हुए कहा, “यदि एक आदमी का हाथ और पैर बांध दिया जाए तो क्या वह दौड़ने में सक्षम हो पाएगा? आपने मां गंगा के प्राकृतिक प्रवाह को फरक्का और टेहरी डैम में बांध दिया, ऐसे में पानी में करंट कैसे आएगा?”

दशरथ सहनी पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं, “1971 तक जब फरक्का बैराज चालू नहीं हुआ था, समुद्री मछलियों की कम से कम 50 प्रजातियां यहां आती थीं और प्रयागराज तक जाती थीं। अकेले हिल्सा मछली से मछुआरा समुदाय के लिए कई महीनों का गुजर-बसर निकल जाता था। इसके अलावा सोंकची, परवा और सिलन गंगा में आती थीं। बैराज बनने के बाद इन मछलियों का पश्चिम की ओर आना बंद हो गया।” वे सवाल करते हैं, अगर स्थानीय मछलियों की संख्या में गिरावट आती है तो डॉल्फिन क्या खाएंगी और उनकी रक्षा कैसे होगी?

पश्चिम बंगाल में फरक्का बैराज के पास मछली मारने के अपने जाले को सुलझाते हुए 70 साल के मछुआरा सुस्ती हलदार ने कहा, “पूर्व की तुलना में अब महज एक-चौथाई मछली बची हैं। बैराज के चलते गंगा की गहाई और बहाव बदल गया है। इससे मछलियों की संख्या और डॉल्फिन पर प्रतिकूल असर पड़ा है।”

विशेषज्ञ भी मछुआरों की चिंताओं से सहमत दिखते हैं। इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चर की (इंटक) की एक रिपोर्ट के अनुसार, गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों पर 942 बांध, बैराज और वियर काम कर रहे हैं। इनमें 11 बांध और बैराज गंगा की मुख्यधारा पर बने हुए हैं। साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डेम्स, रिवर एंड पिपल की एक रिपोर्ट के मुताबिक इन संरचनाओं ने 30 से 40 सालों में गंगा के प्रवाह में 47 प्रतिशत की कमी लाई है। पर्यावरणविद मनोज मिश्रा ने कहा, “लगभग 1000 संरचनाएं नदी के प्राकृतिक प्रवाह और इसके प्राकृतिक बाढ़ चक्र को रोकती हैं। इसके चलते नदी वनस्पति व पशु इसके पोषक तत्वों और आहार से वंचित होते हैं। बांध, जलाशय और बैराज डॉल्फिन की आबादी के विखंडन (कमी) का कारण बने हैं।”

वर्लड वाइड फंड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के अनुसार, डैम, बैराज और तटबंधों ने एशिया में डॉल्फिन के घनत्व को 50 से 70 प्रतिशत तक कम कर दिया है, जबकि दक्षिण अमेरिका में ऐसा महज 10 फीसदी हुआ है।

अविवेकपूर्ण तरीके से मछली पकड़ने का प्रभाव

वहीं मछली पकड़ने के लिए मच्छरदानी का इस्तेमाल अभयारण्य क्षेत्र और पश्चिम बंगाल में बड़ा खतरा है। इस पर डॉ चौधरी ने कहा, “कृत्रिम जाल के उपयोग से नदी में प्लास्टिक कचरा तेजी से फैलता है। डॉल्फिन अक्सर मछली पकड़ने के बारीक सिंथेटिक जाल के बॉयकैच में फंस जाते हैं या उसे खा लेते हैं।“ यह तथ्य है कि एशिया में डॉल्फिन की मौत का सबसे बड़ा कारण एक्सीडेंटल बॉयकैच यानी दुर्घटनावश जाल में फंस जाना है। भारतीय वन्य जीव संस्थान ने भी आरटीआइ जवाब में गंगा में डॉल्फिन संरक्षण के लिए अवैध शिकार और जाल में फंसने से मौत को सबसे बड़ा खतरा बताया। यही नहीं, मच्छरदानी में बहुत छोटी मछलियां फंस जाती हैं, जो डॉल्फिन का आहार होती हैं। वहीं एसएएनडीआरपी ने रिपोर्ट किया है कि बोट एवं स्टीमर के प्रोपेलर से डॉल्फिन की मौत वन विभाग के लिए चिंता की बड़ा कारण है।

चौधरी ने कहा,  “मछली पकड़ने के पेशे में माफिया तत्व घुस आए हैं, जिन्हें नदी पारिस्थितिकी तंत्र की बहुत संकीर्ण समझ होती है और वे इस जैव विविधता को नष्ट कर रहे हैं। परंपरागत मछुआरे जानते हैं कि मछली कब पकड़नी है। लेकिन, आजीविका के अभाव में उन्हें नदी माफिया के कर्मचारी के रूप में काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।”

फरक्का के पास जाल सुलझाता एक मछुआरा। कृत्रिम जाल के उपयोग से नदी में प्लास्टिक कचरा तेजी से फैलता है। डॉल्फिन अक्सर मछली पकड़ने के बारीक सिंथेटिक जाल के बॉयकैच में फंस जाते हैं या उसे खा लेते हैं। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे
फरक्का के पास अपनी जाल सुलझाता एक मछुआरा। कृत्रिम जाल के उपयोग से नदी में प्लास्टिक कचरा तेजी से फैलता है। डॉल्फिन अक्सर मछली पकड़ने के बारीक सिंथेटिक जाल के बॉयकैच में फंस जाते हैं या उसे खा लेते हैं। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

वन्यजीव कानून के तहत पाबंदी होने के बावजूद हर साल डॉल्फिन के शिकार के कई मामले सामने आते हैं। प. बंगाल में डॉल्फिन संरक्षण के लिए काम करने वाले गणेश चौधरी ने दावा किया, “राज्य के कल्याणपुर से नवाद्वीप तक 56 किमी लंबे मार्ग में मार्च 2021 से अगस्त 2021 तक नौ डॉल्फिन मृत मिली।”

वहीं केलकर ने कहा, “अवैध शिकार दर्ज मामलों से कहीं अधिक हो सकता है, क्योंकि कई मामलों में शव भी नहीं मिलते हैं, क्योंकि उनके शव का उपयोग तेल निकालने के लिए किया जाता है।” इस तेल का इस्तेमाल कैटफिश की एक विशेष प्रजाति को पकड़ने और जोड़ों के दर्द से निजात पाने के लिए किया जाता है।

मछुआरे डॉल्फिन संरक्षण की कुंजी

सरकार ने 60 किमी के अभयारण्य के दायरे में मछुआरों को डॉल्फिन मित्र के रूप में नियुक्त किया है। दशरथ सहनी समेत कई डॉल्फिन मित्र हर दिन नाव से आठ से दस किमी की गश्त करके संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखते हैं। इस तरह वे गंगा डॉल्फिन को बचाने के लिए सरकारी कोशिशों में कुंजी की तरह हैं। सहनी व अन्य डॉल्फिन मित्र का दावा है कि 2019 से उन्हें दस हजार रुपये मासिक भुगतान भुगतान का वादा किया गया था लेकिन अब तक एक पाई भी नहीं मिली है।

सहनी अपने समुदाय को नदी का किसान बताते हैं। उन्होंने कहा, “हमसे बेहतर नदी को कौन समझ सकता है। मां गंगा हमारा जीवन है, इसी से हम कमाते हैं और परिवार पालते हैं। अगर डॉल्फिन को बचाना है तो यह हमारे समुदाय के बिना नहीं होगा।”

सुलतानगंज के डॉल्फिन मित्र बाल्मीकि सहनी ने कहा, “पिछले साल पहचान पत्र के लिए आवश्यक दस्तावेज जमा करने के बावजूद हमें आइडी कार्ड नहीं दिया गया। इसलिए काम के दौरान हम जोखिम में रहते हैं।”

सहनी कहते हैं कि सरकार ने सुलतानगंज से कहलगांव तक डॉल्फिन अभयारण्य घोषित किया है, लेकिन अभयारण्य के भीतर मछली पकड़ने के लिए घाटों की नीलामी की जा रही है, इससे डॉल्फिन को लाभ होने की संभावना नहीं है।

क्या एक नया डॉल्फिन सेंचुरी इसका जवाब है?

झारखंड के साहिबगंज जिले में गंगा नदी में डॉल्फिन सफारी का प्रस्ताव किया गया है, ताकि राष्ट्रीय जलीय जीव का संरक्षण हो सके। साहिबगंज में गंगा का 83किमी का बहाव है और इसकी सीमा प.बंगाल के फरक्का बैराज से महज कुछ किमी पहले खत्म होती है। साहिबगंज के वन प्रमंडल पदाधिकारी मनीष तिवारी ने कहा, “गंगा डॉल्फिन सेंचुरी के लिए साहिबगंज आदर्श स्थान है, क्योंकि यहां कई सहायक नदियों का गंगा में संगम है। यहां पानी का काफी जमाव भी है।” उन्होंने इस बाबत सरकार को प्रस्ताव भेजने की बात भी कही।

डॉ रंजीत कुमार सिंह इससे सहमत है। उन्होंने कहा, “साहिबगंज में गाद जमा होने से गंगा सिकुड़ रही है, जिससे इसकी जैव विविधता और डॉल्फिन को खतरा है। साहिबगंज में डॉल्फिन अभयारण्य किसी तरह इस स्थिति पर कुछ हद तक नियंत्रण और संतुलन बनाए रखेगा।“


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हालांकि अन्य विशेषज्ञ इसे लेकर बहुत आश्वस्त नहीं हैं। केलकर ने कहा, “मछली पकड़ने की गतिविधियों और पानी की कमी के चलते फरक्का के पास का नदीय आवास एक फंदे या भूल भूलैया की तरह बन सकता है – क्योंकि जब बराज पानी छोड़ता है, तब डॉल्फिन उसका उपयोग तो कर सकती हैं, लेकिन फिर गिलनेट में उलझ कर फंस जाती हैं और मर जाती हैं।“

इसके अलावा साहिबगंज देश का पहला प्रमुख नदी बंदरगाह है। यह स्थिति कई लोगों को हैरान करती है कि कैसे एक बंदरगाह और उसके आसपास का पानी इस जलीय जीव के लिए अनुकूल और सुरक्षित हो सकता है।

क्या नदी पर्यटन विकल्प हो सकता है?

पश्चिम बंगाल में कटुआ के निकट नयाचार के रहने वाले वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर और जैव विविधता संरक्षक गणेश चौधरी ने अपने गांव में कुछ अनोखे प्रयोग किए हैं। उन्होंने अपने गांव व आसपास के क्षेत्र में युवाओं को पक्षी का शिकार रोकने और पर्यटकों को डॉल्फिन दिखा कर आय अर्जित करने के लिए प्रेरित किया है।

गणेश ने अपने गांव में पर्यटकों के लिए एक कॉटेज बनाया है। यहां बंगाल और देश के अन्य हिस्सों से लोग गंगा डॉल्फिन व पक्षी देखने आते हैं। गणेश की टीम पर्यटकों को नाव से गंगा की सैर कराती है, उन्हें डॉल्फिन व पक्षी दिखाती है। इससे उन्हें कमाई होती है।

मिली जानकारी के अनुसार, भारतीय वन्यजीव संस्थान, नीति आयोग व नमामि गंगे मिशन के साथ मिलकर गणेश के इस मॉडल को आगे बढ़ाना चाहता है ताकि गंगा में जैव विविधता को बढावा मिले।

कहलगांव में गंगा। सुलतानगंज से कहलगांव तक डॉल्फिन अभयारण्य है। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे
कहलगांव में गंगा। सुलतानगंज से कहलगांव तक डॉल्फिन अभयारण्य है। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

सीएमएस की कार्यकारी सचिव एमी फेंकेल ने कहा कि यदि नदी पर्यटन से कमाई होती है, तो इसका उपयोग जैव विविधता को बचाने के लिए किया जाना चाहिए। इसके लिए स्थानीय स्तर पर कुछ दिशा-निर्देश होना चाहिए। यह ध्यान रखना चाहिए कि पर्यटन से कौन पैसा कमा रहा है। उनका मतलब इसका लाभ स्थानीय समुदाय को मिलने से है।

आगे की राह

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ साल 2030 तक नदी डॉल्फिन की संख्या में गिरावट रोकने और इस समय तक सबसे अधिक खतरे वाली प्रजातियों की संख्या दोगुनी करने के मिशन पर काम कर रहा है। स्वच्छ गंगा मिशन और कैंपा परियोजना लोगों को डॉल्फिन संरक्षण के महत्व को लेकर जागरूक कर रहा है। सरकार ने 2021 में प्रोजेक्ट डॉल्फिन  नाम की पहल भी शुरू की है।


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केलकर ने कहा, “गंगा डॉल्फिन के संरक्षण के लिए सीमा पार समझौते की आवश्यकता है। वर्तमान में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ सीमा पार योजनाओं के विकास पर चर्चा करने के लिए विश्व बैंक और अन्य डॉल्फिन विशेषज्ञों के साथ परामर्श कर रहा है। सीमा पार समझौता महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये नदियां साझा हैं और उनमें से अधिकतर पर बांध बने हुए हैं, जिससे जल बंटवारे को लेकर संघर्ष की संभावनाएं हैं, जो जलवायु परिवर्तन और मानव दबाव के साथ बढ़ेगा।“


यह खबर इंटरन्यूज़ के अर्थ जर्नलिज्म नेटवर्क के सहयोग से की गई है।


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बैनर तस्वीरः कहलगांव के 65 वर्षीय दशरथ सहनी डॉल्फिन मित्र के तौर पर संरक्षण का काम करते हैं। वह हर दिन नाव से आठ से दस किमी की गश्त करके संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखते हैं। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे

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