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गन्ना फसल में पानी की खपत भारत के इथेनॉल लक्ष्य को प्राप्त करने में बड़ी चुनौती

अपने गन्ने के खेत दिखाता एक किसान। तस्वीर- सुप्रिया वोहरा/मोंगाबे

अपने गन्ने के खेत दिखाता एक किसान। तस्वीर- सुप्रिया वोहरा/मोंगाबे

  • भारत आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल उसकी इसी रणनीति का हिस्सा है। सरकार का लक्ष्य 2025 तक इथेनॉल के 20 प्रतिशत सम्मिश्रण को पूर्ण रूप से हासिल करना है, जिसके लिए 1,000 करोड़ लीटर इथेनॉल की जरूरत होगी।
  • मौजूदा समय में इथेनॉल का ज्यादातर हिस्सा गन्ने का एक सह-उत्पाद – मोलेसेस (शीरे) से बनाया जाता है। एक लीटर इथेनॉल के लिए 2,860 लीटर पानी की जरूरत होती है। कुछ अध्ययनों से संकेत मिलता है कि मोलेसेस की बजाय गन्ने के रस से इथेनॉल बनाना ज्यादा किफायती तरीका है, क्योंकि इसमें पानी की खपत कम होती है।
  • उधर महाराष्ट्र में गन्ना किसान अपनी फसल के लिए दिए जा रहे उचित और लाभकारी मूल्य, किस्तों में मिलने वाले भुगतान, तौल प्रणाली में पारदर्शिता की कमी और कच्चे माल की बढ़ती लागत से नाखुश हैं।
  • हालांकि गन्ने से प्राप्त इथेनॉल को बढ़ावा देने के लिए सरकार इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल के इस्तेमाल पर खासा जोर दे रही है, लेकिन गन्ने की खेती में बेतहाशा पानी की जरूरत और किसानों के लिए उचित पारिश्रमिक को लेकर चिंता बनी हुई है।

पिछले साल 2 नवंबर को, केंद्र ने अपने इथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम (ईबीपी) के तहत 1 दिसंबर, 2022 से 31 अक्टूबर, 2023 तक विभिन्न गन्ना-आधारित कच्चे माल से प्राप्त इथेनॉल के लिए नई उच्च कीमतों को मंजूरी दी थी। यह इथेनॉल आपूर्ति वर्ष मौजूदा चीनी सीजन के साथ मेल खाता है। केंद्र सरकार की आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी ने इस उच्च कीमत को मंजूरी देते हुए अपनी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा था कि तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) के लिए गन्ने से बनने वाले इथेनॉल की उच्च कीमत, डिस्टिलरी को लाभ पहुंचाने की एक कोशिश है और यह “गन्ना किसानों के बकाया भुगतान में भी मदद करेगी।” 

भारत आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल उसकी इसी रणनीति का हिस्सा है। जैव ईंधनइथेनॉलजीवाश्म ईंधन का एक स्वच्छ विकल्प भी है। इसके अलावा, इथेनॉल को चीनी और स्टार्च युक्त कृषि उप-उत्पादों से प्राप्त किया जाता है। इस वजह से इन उत्पादों का अतिरिक्त इस्तेमाल किया जा सकेगा और किसानों की आय भी बढ़ जाएगी। 

मानचित्रः टेक्लॉलिजी फॉर वाइल्डलाइफ फाउंडेशन
मानचित्रः टेक्लॉलिजी फॉर वाइल्डलाइफ फाउंडेशन

राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति-2018 चीनी के शीरे, गन्ने के रस, चीनी युक्त सामग्री मसलन चुकंदर, मीठा ज्वार और स्टार्च युक्त सामग्री जैसे, गले हुए आलू, मकई, कसावा, गेहूं, टूटे चावल, सड़े हुए अनाज आदि से इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन देती है। यह सब कचरा है और इसका इस्तेमाल खाने के लिए नहीं किया जा सकता है। मौजूदा समय में भारत 450 करोड़ (4.5 बिलियन) लीटर इथेनॉल के उत्पादन के साथ 10 प्रतिशत सम्मिश्रण लक्ष्य तक पहुंच चुका है। सरकार का लक्ष्य 2025 तक इथेनॉल के 20 प्रतिशत सम्मिश्रण को पूर्ण रूप से हासिल करना है, जिसके लिए इसे 1000 करोड़ लीटर इथेनॉल के उत्पादन की जरूरत होगी।

इसके अलावा, उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने घरेलू खपत के लिए 275 लाख मीट्रिक टन (LMT) चीनी, इथेनॉल उत्पादन के लिए 50 लाख मीट्रिक टन से अधिक चीनी और निर्यात के लिए 60 लाख मीट्रिक टन से अधिक की उपलब्धता को प्राथमिकता दी है।

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इससे पहले सितंबर में भारतीय प्रकाशन इकोनॉमिक टाइम्स को दिए गए एक इंटरव्यू में श्री रेणुका शुगर्स के अध्यक्ष अतुल चतुर्वेदी ने कहा था कि देश में अब “चीनी का अतिरिक्त भंडार” है और “चक्रीयता अतीत की बात हो गई है”। इसका मतलब है कि गन्ने की फसल का विकास चक्र 12-14 महीने का होता है, इसके बाद कारखानों में पांच-छह महीने पेराई होती है। लेकिन इथेनॉल उत्पादन पर ध्यान देने से कारखाने पूरे साल चल सकेंगे। श्री रेणुका शुगर्स देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादकों और रिफाइनरों में से एक हैं।

कागवाड़, कर्नाटक (महाराष्ट्र और कर्नाटक की सीमा से सटा हुआ इलाका) में स्थित एक चीनी कारखाने के मालिक ने नाम न छापने की शर्त पर मोंगाबे-इंडिया को बताया कि मौजूदा समय में वे एक दिन में दो लाख लीटर इथेनॉल बनाते हैं। उन्होंने कहा, “ हमारा इरादा इस उत्पादन को साल में 300 दिनों के लिए 30 लाख लीटर प्रतिदिन तक बढ़ाने का है।”

इथेनॉल एक जैव ईंधन है और  जीवाश्म ईंधन का एक स्वच्छ विकल्प है। इसे चीनी और स्टार्च युक्त कृषि सह-उत्पादों से प्राप्त किया जाता है। इसकी मदद से इन उत्पादों का अतिरिक्त इस्तेमाल किया जाता है और यह किसानों की आय को भी बढ़ाता है। तस्वीर- सुप्रिया वोहरा/मोंगाबे 
इथेनॉल एक जैव ईंधन है और  जीवाश्म ईंधन का एक स्वच्छ विकल्प है। इसे चीनी और स्टार्च युक्त कृषि सह-उत्पादों से प्राप्त किया जाता है। इसकी मदद से इन उत्पादों का अतिरिक्त इस्तेमाल किया जाता है और यह किसानों की आय को भी बढ़ाता है। तस्वीर- सुप्रिया वोहरा/मोंगाबे

ज्यादा पानी वाली फसल है गन्ना 

भारत दुनिया में गन्ने के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक प्रमुख चीनी उत्पादक राज्य हैं। देश में 700 से अधिक चीनी मिलें हैं, जिनकी क्षमता 340 लाख मीट्रिक टन चीनी की पेराई करने की है और इनका वार्षिक कारोबार 80,000 करोड़ रुपये का है। चीनी उद्योग लगभग पांच करोड़ लोगों के लिए आजीविका का साधन है।

राज्य के चीनी आयुक्त शेखर गायकवाड़ ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि महाराष्ट्र में 200 से ज्यादा चीनी मिलें हैं और इस साल राज्य ने अपनी 14.87 लाख हेक्टेयर भूमि को गन्ने की खेती के लिए उधार दिया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारत और ब्राजील के बाद महाराष्ट्र अपने आप में दुनिया में गन्ने का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। उनके मुताबिक, “एक अकेले राज्य के तौर पर यह थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ के सभी देशों से आगे है।” गायकवाड़ ने यह भी कहा कि पिछले साल भारत ने 110 लाख मीट्रिक टन चीनी का निर्यात किया था, जिसमें से 70 लाख मीट्रिक टन महाराष्ट्र से आया था। इस साल महाराष्ट्र में 138 लाख टन चीनी का उत्पादन होने की उम्मीद है, जिसमें से 12 लाख टन का इस्तेमाल इथेनॉल उत्पादन के लिए किया जाएगा।

गन्ना एक ज्यादा पानी वाली फसल है और महाराष्ट्र का एक बड़ा हिस्सा सूखा-प्रवण, वृष्टि छाया क्षेत्र के अंतर्गत आता है।

गन्ने के खेत की प्रतीकात्मक तस्वीर। तस्वीर- जो/फ़्लिकर 
गन्ने के खेत की प्रतीकात्मक तस्वीर। तस्वीर– जो/फ़्लिकर

बुवाई से लेकर फसल की कटाई तक, इस नकदी फसल का विकास चक्र 12-15 महीनों तक रहता है। महाराष्ट्र के किसानों ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि औसतन एक एकड़ जमीन में 60-80 टन गन्ना पैदा होता है और महीने में दो बार नौ लाख लीटर पानी की जरूरत होती है। यह मासिक सिंचाई चक्र क्षेत्र, उसकी बनावट, मिट्टी, पानी और बिजली की उपलब्धता पर निर्भर करता है। अगर गन्ने का संपूर्ण विकास चक्र 12-15 महीने का है, तो एक एकड़ जमीन के लिए लगभग 216 लाख लीटर पानी की जरूरत होती है। वास्तव में, एक टन गन्ना अपने विकास चक्र में 3 लाख लीटर पानी सोख सकता है।

कटे हुए गन्ने को कारखाने में ले जाया जाता है, जहां इसे मशीन में डालकर गन्ने के रस, मोलेसिस, फिल्टर केक और खोई में अलग किया जाता है। गन्ने के रस से चीनी बनाई जाती है, खोई का इस्तेमाल बिजली उत्पादन में तथा फिल्टर केक खाद के तौर पर इस्तेमाल की जाती है। गन्ने के सह-उत्पाद मोलेसिस से आमतौर पर इथेनॉल बनाया जाता है। इथेनॉल उत्पादन के लिए दो प्रकार के मोलेसिस काम में आता है: मोलेसिस-सी और मोलेसिस-बी। मोलेसिस-सी चीनी प्रसंस्करण से एक अंतिम उप-उत्पाद है जिसमें जरा सी भी चीनी शेष नहीं बचती है। वहीं मोलेसिस-बी एक मध्यवर्ती उप-उत्पाद है, जिसमें थोड़ी-बहुत चीनी बची रह जाती है। 


और पढ़ेंः महाराष्ट्र के गन्ना किसानों तक कितना पहुंच रहा गन्ने से ईंधन बनाने की योजना का लाभ


नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि गन्ने से बनने वाले एक लीटर इथेनॉल में कम से कम 2,860 लीटर पानी की खपत होती है। जुलाई 2020 को एनवायरमेंटल रिसर्च लैटर्स में वॉटर-फूड-एनर्जी चैलेंजेस इन इंडियाः पॉलिटिकल इकोनॉमी ऑफ द शूगर इंडस्ट्रीज नामक एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ था। इसमें कहा गया था कि भारत का 2025 तक 20 प्रतिशत इथेनॉल सम्मिश्रण का लक्ष्य अगर मोलेसिस पर निर्भर है, तो इसके लिए इसके लिए 1320 मिलियन टन गन्ना, 19 मिलियन हेक्टेयर अतिरिक्त जमीन और 348 बिलियन क्यूबिक मीटर अतिरिक्त पानी की जरूरत होगी। गन्ने के उत्पादन में बढ़ोतरी से 161 मिलियन टन अतिरिक्त चीनी उत्पादन होगा। संयुक्त राज्य अमेरिका में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा लिखा गया पेपर  इथेनॉल उत्पादन के लिए मोलेसेस की बजाय सिर्फ गन्ने के रस के इस्तेमाल करने की सिफारिश करता है। क्योंकि इसके लिए अतिरिक्त पानी और भूमि संसाधनों की जरूरत नहीं होगी।

किसानों ने अपनी समस्याओं और  मांगों को उठाया

ज्यादा पानी की जरूरत वाली फसल के बावजूद किसान  गन्ना उगाना पसंद करते हैं। इसकी एक खास वजह है। यह एकमात्र ऐसी फसल है जिसके लिए उन्हें गारंटी से उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) मिल जाता है। एफआरपी राज्य सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य है जिसमें चीनी मिलों को किसानों से मिलने वाले गन्ने का भुगतान करना अनिवार्य है। 1966 का शुगर कंट्रोल ऑर्डर पूरे देश में एफआरपी के भुगतान को नियंत्रित करता है। इसमें मिलों को गन्ने की डिलीवरी के 14 दिनों के भीतर किसानों को भुगतान करना अनिवार्य होता है। इससे पहले फरवरी में महाराष्ट्र सरकार ने चीनी मिलों को किसानों को दो किस्तों में भुगतान करने की अनुमति दी थी – पहली किस्त डिलीवरी के 14 दिनों के भीतर और दूसरी किस्त उत्पाद की अंतिम वसूली के आधार पर की जाएगी। हालांकि किसान इस नए फैसले से खुश नहीं हैं।

मार्च 2022 में, राज्य के सबसे बड़े किसान संगठनों में से एक स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के अध्यक्ष और संस्थापक राजू शेट्टी ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की। याचिका में गन्ने के मूल्य निर्धारण नीति का विरोधाभासी बताते हुए दो हिस्सों में भुगतान के सरकारी फैसले को चुनौती दी गई थी। याचिका कोर्ट में चल रही है।

किसानों का कहना है कि उन्हें अपने लोन और अन्य खर्चों को हमेशा की तरह समय पर चुकाना पड़ता है। अज्ञात कारणों के आधार पर किश्तों में भुगतान से उन्हें कोई लाभ होने वाला नहीं है। कोल्हापुर के एक गन्ना किसान दत्ताताराही कसोर्डे ने कहा, “हमें फसल, पौधे के लिए कच्चा माल खरीदने और फिर कम से कम एक साल के लिए पैसा इकट्ठा करने के लिए बैंकों से कर्ज लेना पड़ता है। लेकिन गन्ने की डिलीवरी के एक साल और एक महीने के बाद ही हमें अपना पैसा मिल पाता है। हमें पूरा पैसा एक साथ दिया जाना ठीक रहेगा, न कि किस्तों में। ऐसे में तो हम हमेशा कर्ज में डूबे रहेंगे।”

गन्ना किसानों ने अपनी फसल के लिए किस्तों में मिलने वाले भुगतान को लेकर विरोध प्रदर्शन किया।  तस्वीर- सुप्रिया वोहरा/मोंगाबे 
गन्ना किसानों ने अपनी फसल के लिए किस्तों में मिलने वाले भुगतान को लेकर विरोध प्रदर्शन किया।  तस्वीर- सुप्रिया वोहरा/मोंगाबे

अभी हाल ही में 15 अक्टूबर को पूरे महाराष्ट्र के 60,000 से ज्यादा गन्ना किसान गन्ने की एक निश्चित कीमत के लिए एक साथ आए और अपने सामने आने वाले अलग-अलग तरह की समस्याओं और मांगों पर चर्चा की। किसान महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के जयसिंगपुर गांव में स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के 21वें किसान सम्मेलन में शामिल हुए थे।

नवंबर में, जब पेराई शुरू हुई तो महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में गतिरोध देखा गया। किसान अपने गन्ने की उपज के लिए उच्च कीमत की मांग कर रहे थे। उन्होंने फसल को कारखाने तक ले जाने वाली ट्रैक्टर ट्रॉलियों के टायरों की हवा निकाल दी और चीनी आयुक्त कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन किया।

शेट्टी ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि उन्हें इस साल एफआरपी भी ज्यादा चाहिए। उन्होंने कहा, “या तो चीनी का रेट बढ़ाओ या फिर गन्ने का। कच्चे माल – उर्वरक, डीजल आदि का लागत मूल्य बढ़ गया है। अगर यह इंडस्ट्री इतनी बेहतर स्थिति में है जितना कि दावा किया जाता है, तो किसानों को फायदा क्यों नहीं हो रहा है?”

चीनी आयुक्त गायकवाड़ ने कहा,  “आम तौर पर शुगर कंट्रोल ऑर्डर के तहत समय पर भुगतान करना अनिवार्य है। लेकिन इसके बावजूद मिल मालिक किसानों को समय पर उनकी फसल का पैसा नहीं देते हैं। अगर वे 15 दिनों के भीतर किसानों को भुगतान नहीं कर पाते हैं तो उन्हें 15% ब्याज का भुगतान करना होगा। हालांकि ये कानूनी प्रावधान है। लेकिन कोई भी ब्याज नहीं देता है। वे बुनियादी एफआरपी का भुगतान करने में भी असमर्थ हैं।उनके मुताबिक, राज्य की ज्यादातर चीनी मिलें घाटे में चल रही हैं। उन्होंने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “ज्यादातर मिलों के पास नेगेटिव बैलेंसशीट, नेगेटिव नेट-वर्थ हैं। वे एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) में बदल रहे हैं।” 

उन्होंने कहा कि लेकिन अन्य राज्यों की तुलना में महाराष्ट्र काफी बेहतर कर रहा है। उन्होंने अक्टूबर के मध्य में मोंगाबे-इंडिया को दिए गए अपने साक्षात्कार में कहा था, “कल एक पाक्षिक रिपोर्ट भेजी गई है। इसमें जानकारी दी है कि हमने लगभग 99.8% एफआरपी दिया और सिर्फ 65 करोड़ रूपए का भुगतान किया जाना बाकी है। यूपी में 500 करोड़ रूपए, गुजरात में 1200 करोड़ रूपए और  पंजाब में 800 करोड़ रूपए बकाया है। भारी उत्पादन और टर्नओवर के बावजूद हम लगभग 100% भुगतान कर सकते हैं। 

शेट्टी ने कहा कि जहां न्यायपालिका किसानों के पक्ष में हो, वहां विरोध प्रदर्शनों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण हो जाता है। “कोई भी हमारी नहीं सुनता है। जब तक हम खुद को सड़क पर नहीं लाते हैं, तब तक कोई हमारी तरफ ध्यान नहीं देता है। हमारी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो भी हम हार मानने वाले नहीं हैं।

 

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बैनर तस्वीर: अपने गन्ने के खेत दिखाता एक किसानतस्वीर- सुप्रिया वोहरा/मोंगाबे

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