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कठिन मौसम और बढ़ते पर्यटन के बीच बढ़ती लद्दाख की कचरे की समस्या

लेह में साल 2022 की पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च के बीच 244.53 टन कचरा उत्पन्न हुआ वहीं इस दौरान कारगिल में 36 टन कचरा उत्पन्न हुआ। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे

लेह में साल 2022 की पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च के बीच 244.53 टन कचरा उत्पन्न हुआ वहीं इस दौरान कारगिल में 36 टन कचरा उत्पन्न हुआ। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे

  • लेह में बढ़ते कचरे की समस्या के पीछे कुछ लोग पर्यटकों में हुई अचानक वृद्धि को जिम्मेदार बताते हैं। साल 2021 में लद्दाख में 3,04,077 पर्यटक आये जिसमें से 3,03,023 भारतीय और 1,054 विदेशी नागरिक थे।
  • लेह के 13 वार्डों से टूरिस्ट सीजन में प्रतिदिन करीब 12 से 13 टन ठोस कचरा निकलता है, जिसमे से सूखा कचरा 9-10 टन और गीला कचरा 2-3 टन होता है।
  • लद्दाख जैसे बड़े पर्यटन स्थल के लिए इतनी महत्वपूर्ण नीति के न होने की स्थिति में प्रशासन के लिए प्रभावी रूप से कचरे का निपटान करना एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाता है।

केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख पिछले कुछ सालों में एक बड़े पर्यटन स्थल के रूप में उभरा है। हर साल गर्मी के मौसम में यहां सैलानियों की भीड़ लगी होती है। सिर्फ देश ही नहीं बल्कि दुनिया के विभिन्न भागों से पर्यटक यहां खासी तादाद में आते हैं। 

जहां एक और पर्यटकों की संख्या और उनके लद्दाख में रुकने की अवधि बढ़ने से प्रदेश की आमदनी में इज़ाफ़ा हो रहा है वहीं इसकी वजह से यहां पर कचरे की मात्रा बढ़ रही है। इस बढ़ते कचरे का सबसे ज़्यादा भार लद्दाख के प्रमुख शहर लेह को उठाना पड रहा है। लेह में पैदा होने वाले कचरे में प्लास्टिक का योगदान काफी बड़ा है और लोगों का मानना है कि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह पर्यटन और पर्यटकों का गैर जिम्मेदाराना तरीका है। 

बढ़ते कचरे के साथ-साथ इस क्षेत्र की ऊंचाई और ख़राब मौसम के कारण कचरे का निपटान ठीक से ना हो पाना भी एक गंभीर समस्या के रूप में उभर रहा है। 

सर्दियों और गर्मियों के कचरे की मात्रा में अंतर 

लेह म्युनिसिपल कमिटी के अनुसार लेह के 13 वार्डों से टूरिस्ट सीजन में प्रतिदिन करीब 12 से 13 टन ठोस कचरा निकलता है, जिसमे से सूखा कचरा 9-10 टन और गीला कचरा 2-3 टन होता है। सर्दियों के दिनों में जब लद्दाख में सैलानियों की संख्या बिलकुल ना के बराबर होती है, उन दिनों में लेह के कचरे में भी कमी आती है, और सूखे कचरे की मात्रा करीब 3-4 टन हो जाती है। 

लद्दाख प्रशासन द्वारा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में प्रस्तुत किये गए एक प्रेजेंटेशन के अनुसार लेह में साल 2022 की पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च के बीच 244.53 टन कचरा उत्पन्न हुआ वहीं इस दौरान कारगिल में 36 टन कचरा उत्पन्न हुआ; दूसरी तिमाही में लेह में 1033.47 टन और कारगिल में 759.80 टन कचरा उत्पन्न हुआ; तीसरी तिमाही में लेह में 658.84 टन और कारगिल में 593.20 टन कचरा उत्पन्न हुआ; चौथी तिमाही में लेह में 319.08 टन और कारगिल में 278.22 टन कचरा उत्पन्न हुआ। 

कठिन मौसम और बढ़ते पर्यटन के बीच बढ़ती लद्दाख की कचरे की समस्या

साल की पहली और चौथी तिमाही में बर्फ़बारी और सर्दी की वजह से कचरे की मात्रा कम होती है। वहीं दूसरी तिमाही में पर्यटन और प्रवासी मजदूरों की संख्या की वजह से कचरे की मात्रा बढ़ जाती है। इन आंकड़ों से ये भी पता चलता है कि पर्यटन के बिना लेह और कारगिल में उत्पन्न होने वाले कचरे की मात्रा में बहुत ज़्यादा अंतर नहीं होता है लेकिन टूरिस्ट सीजन में ये अंतर 274 टन हो जाता है। 

लेह और कारगिल की, साल 2011 की जनगणना के अनुसार, आबादी क्रमशः 30,870 और 16,338 है। लद्दाख प्रशासन द्वारा ये दावा किया जाता है कि लेह के सभी 7,360 घरों और 586 व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाले कचरे का 100% कलेक्शन किया जाता है।  

लेह में बढ़ते कचरे की समस्या के पीछे कुछ लोग पर्यटकों में हुई अचानक वृद्धि को जिम्मेदार बताते हैं। साल 2021 में लद्दाख में 3,04,077 पर्यटक आये जिसमें से 3,03,023 भारतीय और 1,054 विदेशी नागरिक थे। साल 2022 के पहले आठ महीनों में लेह में 4.5 लाख पर्यटक आए।

ऐसे में गर्मी के महीनों में करीब 30,000 की आबादी वाले इस शहर पर लोगों का भार करीब 10 गुना से ज़्यादा बढ़ जाता है। इस ही के साथ इतने सैलानियों की सुविधाओं के लिए कई मजदूर और दुसरे कामों के लिए लोग लेह का रुख करते हैं जिससे यहां की आबादी टूरिस्ट सीजन में और बढ़ जाती है।

लेह म्युनिसिपल कमिटी के अध्यक्ष ईशे नामगियाल पर्यटन की वजह से कचरे की मात्रा में आने वाले बदलाव के बारे में बताते हुए कहते हैं, “पिछले साल टूरिस्ट सीजन के पांच-छः महीनों में पर्यटकों की संख्या 4.5 लाख थी, करीब 50 हज़ार प्रवासी मजदूर थे। तो इन महीनों में करीब 5 लाख लोगों का अतिरिक्त भार है। सर्दियों के दिनों में बहुत कम पर्यटक आते हैं और प्रवासी मजदूर भी लगभग वापस चले जाते हैं। ऐसे में कचरे की मात्रा में बहुत बड़ा उतार-चढाव होता है। इस स्थिति में गर्मियों की अपेक्षा सर्दियों में कचरे की मात्रा सिर्फ 25% ही रह जाती है।”   

कचरे की मात्रा में आने वाले इस बदलाव की वजह से भी कचरे के निपटान में बाधा उत्पन्न होती है।

चुनौती पैदा करती कड़ाके की ठण्ड और ऊंचाई

लेह में वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट साल 2020 में स्कम्पारी में लगाया गया था और उसके पहले शहर का पूरा कचरा शहर के बाहर ‘बम गॉर्ड’ नाम की जगह पर पर फेंका जाता था। सौर ऊर्जा से संचालित इस प्लांट की क्षमता 30 टन प्रतिदिन है। यहां पर सूखे कचरे से प्लास्टिक, टिन, गत्ते, कागज़ जैसी चीज़ों को अलग करके प्रोसेस किया जाता है और गीले कचरे की कम्पोस्टिंग की जाती है और यहां 14 लोग काम करते हैं। 

सर्दियों के दिनों में लेह में गीला कचरा कम पैदा होता है लेकिन इस कम कचरे की कम्पोस्टिंग करने में भी कई प्रकार की दिक्कतें होती हैं। 

लेह-मनाली हाइवे पर जलता हुआ प्लास्टिक कचरा। लेह में बढ़ते कचरे की समस्या के पीछे कुछ लोग पर्यटकों में हुई अचानक वृद्धि को जिम्मेदार बताते हैं। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे
लेह-मनाली हाइवे पर जलता हुआ प्लास्टिक कचरा। लेह में बढ़ते कचरे की समस्या के पीछे कुछ लोग पर्यटकों में हुई अचानक वृद्धि को जिम्मेदार बताते हैं। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे

म्युनिसिपल कमिटी के ईशे नामगियल का कहना है कि सर्दियों की दिनों में गीला कचरा जम जाता है जिसे ट्रीट करना मुश्किल हो जाता है। वह बतातें हैं कि हालांकि कम्पोस्टिंग के लिए चेम्बर का तापमान कड़ाके की ठण्ड में भी नियंत्रित किया जा सकता है इसलिए कम्पोस्टिंग में दिक्कत नहीं आती है लेकिन शून्य डिग्री सेल्सियस से कम के तापमान में काम करने के घंटे और ऊंचाई की वजह से मजदूरों की कार्यक्षमता में खासी कमी आ जाती है। इस वजह से गीले कचरे को ट्रीट करने में देरी होने लगती है। 

लेह शहर में म्युनिसिपल कमिटी द्वारा घर-घर से कचरा इकट्ठा किया जाता है और इसकी वजह से शहर में कचरे के निस्तारण की समस्या पर काफी हद तक काबू भी पाया गया है। लेकिन सर्दियों के मौसम में, खासकर बर्फ़बारी के दौरान कचरा इकठ्ठा करने वाले ट्रकों की आवाजाही में रूकावट आती है और ऐसे में लोग कचरे को अपने अपने तरीके से ठिकाने लगाने पर मजबूर हो जाते हैं। 

निर्धारित नीति का ना होना

देश के दुसरे राज्यों से उलट केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में कोई सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की नीति नहीं है। लद्दाख में प्रशासन ठोस कचरे और प्लास्टिक कचरे के मैनेजमेंट के लिए एक नीति के ड्राफ्ट पर काम कर रही है, हालांकि ये नीति अभी तक अपने अस्तित्व में नहीं आयी है। 

लद्दाख जैसे बड़े पर्यटन स्थल के लिए इतनी महत्वपूर्ण नीति के न होने की स्थिति में प्रशासन के लिए प्रभावी रूप से कचरे का निपटान करना एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाता है जो कि ‘बम गार्ड’ जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। 

म्युनिसिपल कमिटी के अध्यक्ष से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि लेह में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल, 2016 और पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की गाइडलाइन्स के अनुसार सूखे कचरे का निपटान किया जाता है। 

उन्होंने ये भी बताया कि अभी तक म्युनिसिपल कमिटी सिर्फ व्यावसायिक संस्थानों से ही कचरा इकठ्ठा करने की फीस लेती थी लेकिन अब यह फीस घरों से भी ली जाएगी। हालांकि यह फीस बहुत ही कम, करीब 50 रूपए प्रति घर प्रति माह होगी। 

फिलहाल लेह में कचरे के निपटान और इसके लिए की जाने वाली जगरुकता की पूरी जिम्मेदारी म्युनिसिपल समिति के कन्धों पर दिखाई देती है। अन्य विभागों, खासकर पर्यटन विभाग, की जिम्मेदारी इस विषय में काफी कम दिखाई देती है। ऐसे में लोगों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए पर्यटन विभाग की भी जिम्मेदारी होनी चाहिए क्योंकि लेह में बढ़ने वाले कचरे में बढ़ी भूमिका पर्यटन की है। 

गर्मी के महीनों में करीब 30,000 की आबादी वाले लेह शहर पर लोगों का भार करीब 10 गुना से ज़्यादा बढ़ जाता है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे
गर्मी के महीनों में करीब 30,000 की आबादी वाले लेह शहर पर लोगों का भार करीब 10 गुना से ज़्यादा बढ़ जाता है। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे

लद्दाख में आने वाले पर्यटकों को एक एनवायरनमेंट फीस देनी होती है लेकिन यह फीस लेह से बाहर के इलाकों में जाने वाले लोगों को दिए जाने वाले इनर लाइन परमिट के साथ जुडी हुई है। ऐसे में जो लोग सिर्फ लेह तक आकर वापस चले जाते हैं उन्हें ये फीस नहीं देनी पड़ती है। 

लद्दाख आने वाले पर्यटकों में से 90% से ज़्यादा पर्यटक हवाई यात्रा करते हैं ऐसे में सभी यात्रियों को लेह से होकर गुजरना पड़ता है। वहीं प्रशासन द्वारा 48 घंटे की अनुकूलन अवधि अनिवार्य करने के बाद लेह से अपनी यात्रा शुरू करने वाले सभी पर्यटकों को करीब दो दिन इस शहर में बिताने होंगे।  

लद्दाख में कचरे की बढ़ती समस्या पर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था ‘जीरो वेस्ट लद्दाख’ की अपराजिता चौधरी कहती हैं, “लद्दाख में एनवायरनमेंट फीस सामान रूप से नहीं वसूली जाती है। जो लोग सिर्फ लेह में आते हैं और यहां पर प्रदूषण फैलाकर चले जाते हैं उन्हें कोई भी एनवायरनमेंट फीस नहीं देनी होती है।”

लद्दाख इकोलॉजिकल डेवलपमेंट ग्रुप (LEDeG) की आसमा युसूफ का कहना है, “शहरीकरण के साथ कचरा भी बढ़ेगा। हम इसे रोक नहीं सकते हैं। मूल समस्या वेस्ट मैनेजमेंट की है। पर्यावरण के बढ़ने के साथ कई इलाकों में भीड़ बढ़ती जा रहे है, ऐसे में मुनिसिपल कमिटी के लिए कचरे को मैनेज करना बहुत मुश्किल हो जाता है क्योकि इसके लिए उनके पास कोई सिस्टम नहीं है।” 


और पढ़ेंः लेह में पर्यटकों की बढ़ती भीड़ से पर्यावरण प्रभावित होने की आशंका


नीतियों के बारे में बात करते हुए वह कहती हैं, “बहुत सारी नीतियां हैं जैसे स्वच्छ भारत और भी कई और, लेकिन ये नीतियां ऊपर से बनकर आती हैं। असल में इन नीतियों को ज़मीनी स्तर पर बनाया जाना चाहिए। लोगों को हमेशा सरकार से हस्तक्षेप की उम्मीद होती है, लेकिन लोगों को भी इस दिशा में काम करने की पहल करनी होगी।”

 

बैनर तस्वीरः लेह में साल 2022 की पहली तिमाही यानी जनवरी से मार्च के बीच 244.53 टन कचरा उत्पन्न हुआ वहीं इस दौरान कारगिल में 36 टन कचरा उत्पन्न हुआ। तस्वीर- मनीष चंद्र मिश्र/मोंगाबे

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