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अरुणाचल में मेंढकों की तीन नई प्रजातियां मिली, आवास के आधार पर रखे गए उनके नाम

अंडों के साथ ग्रैसिक्सलस पैटकैएन्सिस, नर की तरफ आकर्षित होते हुए। तस्वीर-अभिजीत दास 

अंडों के साथ ग्रैसिक्सलस पैटकैएन्सिस, नर की तरफ आकर्षित होते हुए। तस्वीर-अभिजीत दास 

  • अरुणाचल प्रदेश के कमलंग-नामदाफा के जैव विविधता हॉटस्पॉट में तीन नई मेंढक प्रजातियां पाई गई हैं।
  • इनका नामकरण उनके आवासों के नाम पर किया गया है। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि उनका ये नाम आवासों और प्रजातियों के बेहतर संरक्षण को बढ़ावा देगा।
  • अब तक भारत में लगभग 470 उभयचर प्रजातियां दर्ज की गई हैं। अभी और कई प्रजातियां है जिनकी खोज की जानी बाकी है। हालांकि, जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप दुनियाभर में उभयचरों की गिरावट का कारण बन रहा है।

भारत में जैव विविधता वाले हॉटस्पॉट में पाई जाने वाली उभयचर प्रजातियों के विशाल भंडार में अरुणाचल प्रदेश के नामदाफा-कमलांग लैंडस्केप से खोजी गई तीन नई मेंढक प्रजातियां भी शामिल हो गई हैं। ये खोजें दो अलग-अलग कारणों से महत्वपूर्ण हैं: उनके अनोखे आवास जहां उन्हें पाया गया था और उनके द्वारा बनाया गया नया जैविक वर्गीकरण।

भारतीय वन्यजीव संस्थान के प्रमुख शोधकर्ता अभिजीत दास के मुताबिक, ये खोजें देश में उच्च जैव विविधता वाले टाइगर रिजर्व के रूप में घोषित नामदाफा राष्ट्रीय उद्यान की विशिष्टता को रेखांकित करती हैं। म्यांमार और भारत के बीच स्थित ‘नामदाफा’ को दुनिया में उष्णकटिबंधीय वर्षावन की सबसे उत्तरी सीमा माना जाता है। दास के अनुसार, “इस लैंडस्केप की एक और विशेषता इसकी एलिवेशनल डाइवर्सिटी ग्रेडिएंट (एलिवेशनल डाइवर्सिटी ग्रेडिएंट एक पारिस्थितिक पैटर्न है जहां जैव विविधता ऊंचाई के साथ बदलती है) है जो 100 मीटर से शुरू होकर 5000 मीटर तक जाती है और यह क्षेत्र की जैव विविधता के बारे में बहुत कुछ कहती है”। वह आगे बताते हैं, “हमारे शुरुआती अवलोकन से पता चलता है कि निचले इलाकों में दक्षिण-पूर्व एशियाई जीवों का प्रभाव अधिक है जबकि ऊपरी इलाकों में अधिकतर हिमालयी जीव पाए जाते हैं। हालांकि, इन जीवों की सीमाओं का पता लगाने के लिए और अधिक सर्वेक्षणों की जरूरत है।” दास ने कहा कि सीमा पर स्थित नामदाफा क्षेत्र में बढ़ती इंसानी दखलंदाजी संरक्षण के लिए चुनौतियां पेश कर रही हैं।

जेली जैसा दिखाई देने वाला हरा मेंढक ‘ग्रैसिक्सलस पेटकैएंसिस’ अरुणाचल प्रदेश के नामदाफा-कमलांग क्षेत्र से खोजी गई तीन नई मेंढक प्रजातियों में से एक है और इसका नाम पटकाई पहाड़ियों के नाम पर रखा गया है। तस्वीर- अभिजीत दास 
जेली जैसा दिखाई देने वाला हरा मेंढक ‘ग्रैसिक्सलस पेटकैएंसिस’ अरुणाचल प्रदेश के नामदाफा-कमलांग क्षेत्र से खोजी गई तीन नई मेंढक प्रजातियों में से एक है और इसका नाम पटकाई पहाड़ियों के नाम पर रखा गया है। तस्वीर- अभिजीत दास

ये खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये सिर्फ तीन नई प्रजातियां नहीं हैं, बल्कि तीन नए वंश (जेनेरा) हैं, जिन्हें भारत में खोजा गया है। दास ने नए मेंढकों को बाकी सबसे से अलग दिखने की खासियत और आवाज के साथ दुर्लभ बताया है। (जेनेरा एक वर्गीकरण श्रेणी है जिसमें समान विशेषताओं को प्रदर्शित करने वाली प्रजातियां शामिल होती हैं) 

अनोखे आवासों में रहने वाले मेंढक

सबसे पहले खोजी गई प्रजाति ‘ग्रैसिक्सलस पेटकैएंसिस’ है। यह एक हरा मेंढक है जो जेली की तरह दिखाई पड़ता है और लगभग पूरी तरह से पारदर्शी है। आकार में बेहद छोटे इस मेंढक की लंबाई लगभग 2.2 सेमी है और यह सदाबहार जंगल के घने मैदान में रहना पसंद करता है। दास ने समझाया, कीट जैसी आवाज वाला ये मेंढक काफी अलग है। उसकी आवाज की वजह से इसे आसपास के कई झींगुरों में से एक समझने की गलती हो सकती है।

इंडोनेशिया में जीनस अल्कलस में आखिरी प्रजाति ए.राजे की खोज एक दशक से भी अधिक समय पहले की गई थी। अब अल्कलस फॉन्टिनालिस नाम के दूसरे मेंढक की खोज से जीनस अल्कलस में प्रजातियों की कुल संख्या छह हो गई है। दास ने इसका वर्णन एक भूरे रंग के बौने मेंढक के रुप में किया है। जिसकी आवाज एक बूंद के टपकने जैसी होती है और यह वनस्पतियों के नीचे बहने वाली तेज धाराओं या नालों में रहता है।

कमलांग टाइगर रिजर्व। हाल ही में अरुणाचल प्रदेश के नामदाफा-कमलांग में तीन नई मेंढक प्रजातियों की खोज की गई है। तस्वीर- अभिजीत दास।
कमलांग टाइगर रिजर्व। हाल ही में अरुणाचल प्रदेश के नामदाफा-कमलांग में तीन नई मेंढक प्रजातियों की खोज की गई है। तस्वीर- अभिजीत दास।

खोजा गया सबसे नया और तीसरा मेंढक दलदली इलाकों में पाया गया है। इसका नाम नामदाफा की जीवन रेखा ‘नोआ-दिहिंग’ नदी के नाम पर रखा गया है। पिछली खोजों में वैज्ञानिकों ने कैनोपी, अंडरस्टोरीज़ और ब्रूक्स जैसे अनोखे आवासों की खोज की थी। इसी तरह इस बार ‘निदिराना नोआदिहिंग’ नामक इस “म्यूजिक फ्रॉग” को क्षेत्र में घुटनों तक गहरे दलदल से खोजा गया है। मेंढक अपनी आवाज की वजह से काफी अलग है जिसकी आवाज में दो अलग-अलग प्रकार के सुर हैं- आवाज की अवधि यानी वह कितनी देर तक टर्राता है और उसकी फ्रीक्वेंसी

भारत में विज्ञान के क्षेत्र में अब तक अधिकांश उभयचर प्रजाति पश्चिमी घाट से खोजी गई हैं, जो देश में एक और जैव विविधता हॉटस्पॉट है। पश्चिमी घाट से 23 मेंढक प्रजातियों की खोज करने वाले वैज्ञानिक के.वी. गुरुराजा उभयचरों के अध्ययन में एक नए उत्साह और तकनीक में प्रगति की ओर इशारा करते हैं। उनके मुताबिक ये मेंढकों की छिपी हुई प्रजातियों को सामने लाने का प्रमुख कारण है। उन्होंने कहा, तकनीक ने मोर्फोलॉजिकल, मोलेक्युलर और ध्वनिकी अध्ययन को संभव बना दिया है। 

एल्केलस फॉन्टिनालिस एक बौना मेंढक है जिसकी आवाज एक बूंद के टपकने जैसी होती है। यह छोटी जलधाराओं में पाया जाता है। तस्वीर- अभिजीत दास।
एल्केलस फॉन्टिनालिस एक बौना मेंढक है जिसकी आवाज एक बूंद के टपकने जैसी होती है। यह छोटी जलधाराओं में पाया जाता है। तस्वीर- अभिजीत दास।

संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए प्रजातियों का नाम उनके आवासों के नाम पर रखे गए 

भारत में उभयचर प्रजातियों के वैज्ञानिक रिकॉर्ड 1799 में पांच प्रजातियों के वर्णन के साथ शुरू हुए थे। आज इसमें लगभग 470 उभयचर प्रजातियां शामिल हो गई हैं। गुरुराजा नामदाफा की खोजों से जुड़े नहीं हैं। उन्होंने कहा कि विज्ञान के जरिए अभी तक 100 या उससे अधिक प्रजातियां खोज की जानी बाकी है, लेकिन चिंता का कारण जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप है, जो दुनियाभर में उभयचरों की गिरावट का कारण बन रहे हैं।

नई मेंढक प्रजातियों की खोज और नामकरण के अपने अनुभव से गुरुराजा ने कहा कि नई प्रजातियों की खोज के बावजूद संरक्षण एक धीमी प्रक्रिया है और नई प्रजातियों का नामकरण इसे पाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। उन्होंने कहा, “जब आप स्थान (जहां यह पाई जाती है) और इसकी विशेषताओं के आधार पर एक नई प्रजाति का नाम रखते हैं, तो स्थानीय समुदायों द्वारा इसे अपनाने और इसके संरक्षण में योगदान देने की संभावना ज्यादा होती है।” उन्होंने पश्चिमी घाट में केरल और तमिलनाडु के स्थानिक बैंगनी मेंढक या पिग्नोज़ मेंढक (नासिकबात्राचस सह्याड्रेन्सिस) के मामले की ओर इशारा किया, जिसे केरल में पूजनीय पौराणिक राक्षस राजा के नाम पर महाबली मेंढक नाम दिया गया था। इसकी वजह से इस प्रजाति के मेढक को लेकर लोगों के बीच उत्सुकता बढ़ी और उन्होंने इसके संरक्षण के लिए भी काम किया। वह कहते हैं, “वैज्ञानिक साइलो (कोठरी) में काम नहीं कर सकते हैं। संरक्षण के लिए सामुदायिक भागीदारी की जरूरत होती है।”

निदिराना नोआदिहिंग मेंढक प्रजाति का नाम नोआ-दिहिंग नदी के नाम पर रखा गया है। यह नदी नामदाफा की जीवन रेखा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रजातियों का नामकरण उनके आवासों के नाम पर करने से संरक्षण को बढ़ावा मिल सकता है। तस्वीर- अभिजीत दास 
निदिराना नोआदिहिंग मेंढक प्रजाति का नाम नोआ-दिहिंग नदी के नाम पर रखा गया है। यह नदी नामदाफा की जीवन रेखा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रजातियों का नामकरण उनके आवासों के नाम पर करने से संरक्षण को बढ़ावा मिल सकता है। तस्वीर- अभिजीत दास

इसी अवधारणा के आधार पर नामदाफा में खोजे गए तीन मेंढकों का नाम उनके आवासों के आधार पर रखा गया, जहां वे पाए गए थे। पहले मेढक का नाम पटकाई पहाड़ियों के नाम पर रखा गया है जहां नामदाफा की निचली ऊंचाई पड़ती है। दूसरे मेंढक का नाम इसके आवास छोटी धारा या जल स्रोत के आधार पर रखा गया है, तो वहीं तीसरे का नाम नोआ-दिहिंग नदी के नाम पर रखा गया है।


और पढ़ेंः केमफोली नाइट मेंढकों की जेनेटिक जानकारी से बेहतर बनेगी संरक्षण की रणनीति


शोधकर्ताओं का कहना है कि नामदाफा क्षेत्र की विविधता का दस्तावेजीकरण करने के लिए और अधिक अध्ययन की जरूरत है। खासतौर पर 1500 मीटर से 4000 मीटर तक की ऊंची ऊंचाईयों पर, जो अब तक अछूती रही हैं। दास ने कहा, इस क्षेत्र की विविधता को दर्शाती फील्ड गाइड और कहानियों पर काम किया जा रहा है, ताकि इन्हें सभी हितधारकों तक पहुंचाया जा सके।

 

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बैनर तस्वीर: अंडों के साथ ग्रैसिक्सलस पैटकैएन्सिस, नर की तरफ आकर्षित होते हुए। तस्वीर-अभिजीत दास

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