- जलवायु परिवर्तन का याक की आबादी से गहरा संबंध है। पिछले 10-11 सालों से याक के प्रजनन के मौसम में बदलाव आया है।
- याक कृषि जैव विविधता के संरक्षण और ऊंचाई पर स्थित चारागाहों के पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- यह जानवर हिमालय के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक परंपराओं, आजीविका और सामाजिक-आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण है।
नामचे बाजार नेपाल में स्थानीय शेरपा समुदाय का एक गांव है। यहां से एक खड़ी चढाई वाला रास्ता नेपाल के एवरेस्ट क्षेत्र में स्यांगबोचे के घास के मैदानों तक ले जाता है। घास के मैदान के ठीक बीच में, समुद्र तल से 3,885 मीटर की ऊँचाई पर, पत्थर और टिन-शेड से बना याक जेनेटिक रिसोर्स सेंटर स्थित है।
नेपाल सरकार के कृषि और पशुधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले इस संसाधन केंद्र के चारों ओर के घास के मैदान को छोटी दीवारों और उन पर लगे कंटीले तारों से घेरा गया है। मई की शुरुआत है और पालतू याक (बोस ग्रुन्निएन्स) और उनके बछड़ों का झुंड घास चरने में ध्यानमग्न है।
याक जेनेटिक रिसर्च सेंटर में पिछले 24 साल से तकनीकी अधिकारी के तौर पर काम कर रहे रामललन यादव ने मोंगाबे इंडिया को बताया, “याक इस क्षेत्र की जीवन रेखा हैं। इस केंद्र में करीब 155 याक हैं और हम इस हाई एल्टीट्यूड वाली प्रजाति, जो आमतौर पर एवरेस्ट क्षेत्र में पाई जाती है, के आनुवंशिक (जेनेटिक) मेकअप में विविधता पर शोध करते हैं और उसे (विविधता को) बनाए रखते हैं।”
यादव कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन का याक की आबादी से गहरा संबंध है। वे कहते हैं, “पिछले 10-11 सालों से याक के प्रजनन के मौसम में बदलाव आया है। पहले प्रजनन का मौसम जून और जुलाई के महीनों में होता था, लेकिन अब यह सितंबर में पहुँच गया है।”
याक के प्रजनन का मौसम घास की उपलब्धता और उनके पोषण पर निर्भर करता है। लेकिन, घास के इन मैदानों पर तेजी से अतिक्रमण हो रहा है, साथ ही बढ़ते तापमान और वर्षा के पैटर्न में अनियमितता के चलते इनका क्षरण भी हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ आक्रामक विदेशी पौधों की प्रजातियों में भी वृद्धि हुई है। यादव को आशंका है कि जलवायु परिवर्तन ने याक के प्रजनन और जीवन को प्रभावित किया है।
“पहले हमें हल्की बारिश मिलती थी, लेकिन अब हमें भारी बारिश मिलती है। पहले तूफान बहुत कम आते थे, लेकिन अब हमारे पास कई तेज तूफान आते हैं। बर्फबारी का पैटर्न भी बदल गया है। पहले सितंबर से फरवरी के बीच बर्फबारी होती थी, लेकिन अब फरवरी और मार्च के आखिर में बर्फबारी होती है,” यादव बताते हैं।
भारतीय हिमालयी क्षेत्र सहित हिमालय के ऊंचे इलाकों में याक की आबादी घट रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रजनन के बदलते मौसम से याक के लिए हालात और खराब हो जाएंगे।
स्यांगबोचे से 500 किलोमीटर पूर्व में अरुणाचल प्रदेश के दिरांग में भारत सरकार का राष्ट्रीय याक अनुसंधान केंद्र स्थित है। यह भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत आता है। भारत में याक पालन के सतत विकास के लिए अनुसंधान रणनीति तैयार करने के लिए आईसीएआर-एनआरसी (ICAR-NRC) एकमात्र प्राधिकरण है।
आईसीएआर-एनआरसी के साथ काम कर चुके वरिष्ठ वैज्ञानिक और पूर्वोत्तर भारतीय हिमालय में याक पर एक शोध पत्र के सह-लेखक सपुनी स्टीफन हनाह ने मोंगाबे इंडिया को बताया, “अरुणाचल प्रदेश के ऊंचाई वाले इलाकों में याक पालकों ने याक के प्रजनन के मौसम में बदलाव की जानकारी दी है। यह बदलाव जलवायु परिवर्तन के कारण हो सकता है। हालांकि, आईसीएआर-एनआरसी के याक फार्म में यह बदलाव नहीं देखा गया है।”
“न्युकमदुंग में स्थित इस फार्म में बेहतर पशु उत्पादन के लिए आवश्यक सुविधाएं, जैसे कि पूरे मौसम में पर्याप्त चारा और पानी, मौजूद हैं। इसके विपरीत, खानाबदोश चरवाहों को याक के लिए चारा उपलब्ध कराने में खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, खासकर सर्दियों के मौसम में,” उन्होंने आगे बताया।

मैदानी परिस्थितियों में याक मौसम के हिसाब से प्रजनन करते हैं। “ऊंचाई वाले चारागाहों में हरी घास अप्रैल से उपलब्ध होना शुरू हो जाती है, जिससे याक के स्वास्थ्य में सुधार होता है। जैसे-जैसे उनका स्वास्थ्य बेहतर होता है, मादा याक, जिन्हें ‘नाक’ या ‘ड्री’ के नाम से जाना जाता है, ओव्यूलेट करना शुरू कर देती हैं, और प्रजनन का मौसम शुरू हो जाता है। प्रजनन का मौसम जुलाई और अगस्त में अपने चरम पर पहुँच जाता है जब तापमान सबसे अधिक होता है और घास का विकास सबसे अच्छा होता है। सर्दियों में, सब कुछ बर्फ से ढका होने के कारण चारे की उपलब्धता काफी कम हो जाती है जिससे याक का वजन कम हो जाता है,” हनाह बताते हैं।
एक महत्वपूर्ण प्रजाति
याक विशेष रूप से अधिक ऊंचाई वाले वातावरण के अनुकूल हैं और हिंदू कुश हिमालय (एचकेएच) क्षेत्र के लिए एक प्रमुख प्रजाति है। यह आमतौर पर समुद्र तल से 3,000 – 6,000 मीटर ऊपर पाए जाते हैं और कम वायुमंडलीय ऑक्सीजन सांद्रता और उच्च स्तर के सौर विकिरण के साथ अत्यंत ठंडे, कठोर वातावरण में जीवित रहते हैं।
पर्वतीय क्षेत्रों में प्रकृति, समुदायों और आजीविका पर काम करने वाली संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के अनुसार, यह जानवर न केवल कृषि जैव विविधता के संरक्षण और ऊंचाई पर स्थित चारागाहों के पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, बल्कि हिमालय के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक परंपराओं, आजीविका और सामाजिक-आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण है।
याक मुख्य रूप से मांस और दूध के लिए पाले जाते हैं। दूध का उपयोग मक्खन/घी और पनीर (चुरपी) जैसे उत्पादों के लिए किया जाता है। यह उत्पाद मुख्य रूप से बेचे जाते हैं, और घरेलू खपत और ‘नमकीन मक्खन वाली चाय’ बनाने के लिए भी उपयोग किए जाते हैं। याक के ऊन का उपयोग रस्सी और तम्बू बनाने के लिए किया जाता है। चूँकि याक ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में हर दिन 15 किमी तक की यात्रा कर सकते हैं और 100 किलोग्राम तक का भार ले जा सकते हैं इसलिए इनका उपयोग मालवाहक जानवरों के रूप में भी किया जाता है।
याक की घटती आबादी
घरेलू याक की वर्तमान आबादी पर सटीक डेटा की कमी है, लेकिन अनुमान बताते हैं कि यह लगभग 13-14 मिलियन है, जिनमें से अधिकांश चीन में हैं।
अगस्त 2022 के एक शोध पत्र में कहा गया है, “चीन के बाहर, कई देशों, जैसे कि भारत, भूटान और नेपाल में घरेलू याक की आबादी घट रही है। इसके अलावा, बढ़ते संकरण (हाईब्रिडाइज़ेशन) ने स्थानीय याक आबादी की पहचान करना मुश्किल बना दिया है।”
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में याक की आबादी में गिरावट आई है। भारत सरकार द्वारा जारी 20वीं पशुधन जनगणना, 2019 में याक की आबादी में लगभग 25% की गिरावट का संकेत मिलता है। यह आबादी साल 2012 में 77,000 से घटकर 2019 में 58,000 हो गई। इस दौरान नर याक की संख्या 35,000 से घटकर 26,000 और मादा याक की संख्या 42,000 से घटकर 32,000 हो गईं।
जम्मू और कश्मीर (लद्दाख को मिलाकर), जहां देश की सबसे बड़ी याक आबादी है, में सबसे तेज गिरावट देखी गई है। दूसरी ओर, पूर्वोत्तर में अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में वास्तव में वृद्धि देखी गई है। याक की आबादी पर कई कारक दबाव डाल रहे हैं, जैसे कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का बंद होना जो जीन मिश्रण को सीमित करता है, घटती चराई भूमि, पशु चराई और आवाजाही पर प्रतिबंध, और निश्चित रूप से—जलवायु परिवर्तन।
साल 2019 की सर्दियों में सिक्किम में सैकड़ों याक भूख से मर गए थे, जो अब तक की सबसे बड़ी आपदा थी। आईसीएआर-एनआरसी की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, भारी बर्फबारी और प्राकृतिक आपदाओं के कारण उत्तरी सिक्किम में 500 से अधिक याकों की मौत हुई थी।
कृषि और वानिकी विश्वविद्यालय के सह-प्राध्यापक शंकर राज बरसिला ने याक की आबादी में गिरावट के कारणों पर बात करते हुए कहा कि चारे की उपलब्धता, मौसम की स्थिति और बारिश जैसे कारक सबसे ज्यादा मायने रखते हैं।
“याक पालन के लिए, चारे की उत्पादकता और उपलब्धता महत्वपूर्ण कारक हैं, खासकर स्थानीय मौसम की परिस्थितियों जैसे समय पर होने वाली वसंत की बारिश को ध्यान में रखते हुए,” बरसिला, पर्वतीय क्षेत्रों में पशुपालन और चराई क्षेत्रों की पारिस्थितिकी के एक विशेषज्ञ, बताते हैं।
“याक पालतू हैं लेकिन उनमें जंगलीपन बरकरार है, और वे मौसमी प्रजनक हैं। प्रजनन के लिए चारा और पोषण महत्वपूर्ण हैं, और बारिश से चारागाह स्वस्थ रहते हैं। दुर्भाग्य से, घास के मैदान खराब हो रहे हैं, और पहाड़ी भेड़ों और बकरियों से चराई का अतिरिक्त दबाव है,” वह बताते हैं।

हनाह कहते हैं, “युवा पीढ़ी पारंपरिक याक पालन, जो कि मौसम पर निर्भर होने की वजह से बहुत मुश्किल है, जारी रखने को तैयार नहीं है।”
ट्रांसह्युमन्स, जिसमें पशुपालक समुदाय मौसम और घास की उपलब्धता के अनुसार अपनी जगह बदलते रहते हैं, हिमालयी क्षेत्रों की सबसे प्रचलित प्रथा है। याक विभिन्न ऊंचाइयों पर सर्दी और गर्मी के चरागाहों के बीच मौसमी रूप से प्रवास करते हैं।
पारंपरिक मौसमी प्रवासन प्रणाली में, अल्पाइन चारागाहों (4,500 मीटर और उससे अधिक) में जून और सितंबर के बीच चराई होती है। मध्य पहाड़ियों (3,500 – 4,500 मीटर) में मार्च से मई तक चराई होती है क्योंकि जानवर ऊंचाई वाले चारागाहों की ओर पलायन करते हैं और अक्टूबर और नवंबर के दौरान वापस लौटते हैं। फिर सर्दी (दिसंबर से फरवरी के अंत तक) 3,000 मीटर से नीचे चराई करते हुए बिताई जाती है।
“अरुणाचल प्रदेश के याक पालक, जिन्हें ब्रोकपा के नाम से जाना जाता है, अप्रैल की शुरुआत में अपने याक को सर्दियों के चरागाहों से गर्मियों के चरागाहों में ले जाना शुरू कर देते हैं। यह अवधि जानवरों के प्रजनन और दूध देने की शुरुआत का प्रतीक है। इन रास्तों के किनारे ताज़ी घास की उपलब्धता के कारण याक की शारीरिक स्थिति में सुधार होता है,” हनाह, जो फिलहाल नागालैंड में आईसीएआर के नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन मिथुन में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, बताते हैं।
वह आगे बताते हैं कि गर्मियों में, मई से सितंबर तक, याक अल्पाइन चारागाहों में रहते हैं। “अक्टूबर-नवंबर के पतझड़ में याक ग्रीष्मकालीन चरागाहों से शीतकालीन चरागाहों में जाने के लिए निचले इलाकों या गांव के घास के मैदानों में चले जाते हैं,” हनाह कहते हैं।
इस प्रवासन के बावजूद, अक्टूबर से मार्च तक, सर्दियों के चारागाहों पर बर्फ की मोटी परतों के कारण चारे की कमी आम है। अपर्याप्त चारा, विशेष रूप से सर्दियों में, खराब पोषण, धीमी वृद्धि, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, और कम प्रजनन क्षमता का कारण बनता है, आईसीआईएमओडी की एक रिपोर्ट ‘याक ऑन द मूव’ कहती है। कई याक पालन क्षेत्रों में ये समस्याएं पशुधन की बढ़ती संख्या से और बढ़ जाती हैं, जिससे चरागाहों पर अधिक दबाव पड़ता है।

“हालांकि, इस ट्रांसह्युमन्स पशुचारण प्रणाली का उपयोग पीढ़ियों से किया जा रहा है, लेकिन युवा पीढ़ी इस परंपरा में अपने माता-पिता का साथ नहीं दे रही है। परिणामस्वरूप, याक और चरवाहों की संख्या घट रही है,” हनाह कहते हैं।
जलवायु परिवर्तन से बढ़ती दिक्कतें
याक परिस्थितियों के अनुकूल होते हैं। वे -40 डिग्री सेल्सियस में भी जीवित रह सकते हैं और सबसे अच्छा प्रदर्शन तब करते हैं जब औसत वार्षिक तापमान 5 डिग्री सेल्सियस से नीचे और सबसे गर्म महीने में औसत तापमान 13 डिग्री सेल्सियस से कम होता है। बढ़ते तापमान और वर्षा के बदलते पैटर्न का असर याक के प्रजनन और उनकी उत्पादकता पर भी पड़ रहा है।
साल 2022 में प्रकाशित एक अध्ययन में दावा किया गया था कि अत्यधिक ठंड की घटनाओं (ठंडी रातें, ठंडे दिन और पाले के दिन) की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है और इसके साथ ही अत्यधिक गर्मी की घटनाओं (गर्म रातें, गर्म दिन और गर्मी के दिन) की संख्या में वृद्धि हुई है। पश्चिमी हिमालय में भी इसी तरह के रुझान सामने आए हैं।
यह अध्ययन हिंदू-कुश हिमालय क्षेत्र के 478 मौसम विज्ञान स्टेशनों से साल 1961 और 2015 के बीच एकत्र किए गए आंकड़ों के आधार पर किया गया था।
इस अध्ययन के अनुसार, याक का प्रजनन प्रदर्शन जलवायु और मौसम से गहरा संबंध रखता है। इसमें कहा गया है, “प्रजनन के मौसम की शुरुआत और अंत परिवेश के तापमान और सापेक्ष आर्द्रता से निर्धारित होते हैं… प्रजनन के मौसम का समय जलवायु को निर्धारित करने वाले कारकों, यानी अक्षांश, देशांतर और उन चारागाहों की ऊँचाई से गहरा संबंध रखता है जहाँ याक रखे जाते हैं।”
बरसिला कहते हैं, “पिछले 10 वर्षों में, मैंने ऐसे लोगों को सुना है जो दावा कर रहे हैं कि याक का प्रजनन अब दो महीने तक के लिए स्थगित हो रहा है।”
‘याक ऑन द मूव’ का कहना है कि इस क्षेत्र से उपलब्ध जलवायु आंकड़े तापमान में वृद्धि का सुझाव देते हैं, जो ज़्यादा ऊंचाई पर अधिक है। रिपोर्ट में कहा गया है, “अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र में तापमान बढ़ने का याक की आबादी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि उनमें गर्मी सहन करने की क्षमता कम होती है। आवास में कमी याक की जीवित रहने और/या प्रजनन में गिरावट से जुड़ी हो सकती है।”
तापमान में परिवर्तन का अर्थ यह भी है कि उच्च-ऊंचाई वाली, ठंड के अनुकूल पौधों की प्रजातियां अधिक ऊंचाइयों पर चली गई हैं और उनकी जगह उन प्रजातियों ने ले ली है जो गर्म तापमान के लिए बेहतर अनुकूलित हैं। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप वनस्पतियों के प्रकार में परिवर्तन हुए हैं, अल्पाइन घास के मैदान और जड़ी-बूटियों की जगह झाड़ियाँ आ गई हैं। झाड़ियों का अतिक्रमण शायद हिमालय में चराई वाली वनस्पति की उपलब्धता और गुणवत्ता को कम करने वाला प्रमुख जलवायु परिवर्तन द्वारा जनित कारक है।
कुछ अध्ययनों में बढ़ते तापमान को याक में गर्मी के तनाव और उनके दूध देने की क्षमता में कमी से जोड़ा गया है। हनाह स्वीकार करते हैं कि बहुत कम शोध संगठन याक पर काम कर रहे हैं और याक पालकों का समर्थन कर रहे हैं।
समय की जरूरत
स्यांगबोचे में याक जेनेटिक रिसोर्स सेंटर के यादव ने संस्थान में बजटीय सहायता की कमी की ओर इशारा करते हुए कहा, “याक खतरे में हैं और फंड की कमी है।”

बरसिला के अनुसार, याक नेपाल की सरकार के लिए कम प्राथमिकता वाली वस्तु हैं क्योंकि यह जानवर नेपाल के 16 पहाड़ी जिलों तक ही सीमित है और ज़्यादा परिवारों द्वारा नहीं पाले जाते हैं। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में याक का समग्र योगदान नगण्य है, और इसलिए, वे वित्त पोषण की प्राथमिकता नहीं हैं।
हालांकि याक सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्रों की जनजातियों से जुड़े हुए हैं, लेकिन याक पलकों को अपने झुंड को बनाए रखने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, हनाह कहते हैं।
“कृषि समुदाय का समर्थन करने के लिए, सरकार, गैर-सरकारी संगठनों और याक पालकों के हित में काम करने वाले निजी क्षेत्र के संगठनों को वित्तीय सहायता और सब्सिडी प्रदान करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, वैज्ञानिक प्रबंधन प्रणालियों, चारागाहों के संरक्षण और बहाली, बेहतर पशु चिकित्सा सेवाओं और बाजार के विकास और पहुंच पर नियमित प्रशिक्षण और शिक्षा को तत्काल लागू किया जाना चाहिए,” हनाह आगे कहते हैं।
अरुणाचल प्रदेश में, याक पालकों को बैंकों से जोड़ने और उन्हें ऋण सुविधाएं उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा याक को खाद्य पशु के रूप में भी नामित किया गया है, जिससे याक पालकों को मदद मिलने की संभावना है। इस मंजूरी से पहले, याक का दूध और मांस पारंपरिक डेयरी और मांस उद्योगों का हिस्सा नहीं थे।
बरसिला कहते हैं कि अधिक ऊंचाई पर पलने वाली इस प्रजाति को बचाने के लिए एक ‘सीमा-पार दृष्टिकोण’ की आवश्यकता है। नेपाल, भारत और भूटान — जो पूर्वी हिमालय में सीमा-पार कंचनजंगा परिदृश्य को साझा करते हैं — सदियों से याक और याक अर्थव्यवस्था के माध्यम से जुड़े हुए हैं, आईसीआईएमओडी ने उल्लेख किया है।
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हालांकि, इस क्षेत्र में चरवाहा समुदायों को अलगाव, अंतःप्रजनन के कारण कम उत्पादकता, और बाजार की चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है, जिससे पूरे क्षेत्र में याक पालने और इसमें रुचि में कमी आई है। ‘द लास्ट डोकपास ऑफ नॉर्थ सिक्किम’ ने डोकपा — जातीय रूप से तिब्बती उच्च-ऊंचाई वाले खानाबदोश — जो अपने याक के झुण्ड के साथ मौसमी रूप से प्रवास करते थे, के जीवन पर तिब्बत और सिक्किम के बीच अंतर्राष्ट्रीय सीमा बंद होने के प्रभाव का दस्तावेजीकरण किया है।
कंचनजंगा लैंडस्केप एंड कंजर्वेशन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (केएलसीडीआई) के माध्यम से, आईसीआईएमओडी ने याक को अपने विषय के रूप में चुना है। इसका कहना है कि नेपाल, भारत और भूटान के भागीदारों ने सीमा पार सहयोग के लाभों का उपयोग करने के लिए याक जर्मप्लाज्म के आदान-प्रदान की आवश्यकता का सर्वसम्मति से समर्थन किया है।
याक दुनिया के नक़्शे पर बनी काल्पनिक रेखाओं और अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं समझता है। अधिक ऊंचाई वाली प्रजातियों की रक्षा के लिए देशों को एक साथ आने की आवश्यकता है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 7 अगस्त 2024 को प्रकाशित हुई थी।
इस कहानी की रिपोर्टिंग नेपाल फोरम ऑफ साइंस जर्नलिस्ट्स द्वारा आयोजित हिमालयन क्लाइमेट बूट कैंप 2024 के एक हिस्से के रूप में की गई है।
बैनर तस्वीर: याक एवरेस्ट बेस कैंप तक आवश्यक सामान पहुंचाते हैं। ये जानवर न केवल कृषि जैव विविधता के संरक्षण और ऊंचाई पर स्थित चारागाहों के पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, बल्कि हिमालय के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक परंपराओं, आजीविका और सामाजिक-आर्थिक विकास में भी महत्वपूर्ण हैं। तस्वीर: चेंको डेमा द्वारा।