- मोरिंगा यानी सहजन को सुपरफूड के रूप में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिल चुकी है और तमिलनाडु इस क्षेत्र में सबसे आगे है।
- तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में मोरिंगा का उत्पादन और व्यापार बढ़ाने के लिए इसका निर्यात संवर्धन बोर्ड गठित किया है।
- हालांकि, तुड़ाई के बाद होने वाले नुकसान, कोल्ड स्टोरेज की कमी और छोटे किसानों का बाजार में शोषण बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं।
दक्षिण भारतीय रसोई की प्रमुख सब्जी सहजन या मोरिंगा (मोरिंगा ओलीफेरा) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुका है। इसे अक्सर “सुपरफूड” कहा जाता है। इसे तमिलनाडु में स्थानीय रूप से मुरुंगई के नाम से जाना जाता है। यह राज्य भारत में मोरिंगा के उत्पादन और रकबे में सबसे आगे है।
मोरिंगा भारत में पाई जाने वाली स्थानीय प्रजातियों में से एक है। अपने गुणों की वजह से यह लंबे समय से विभिन्न पारंपरिक प्रथाओं में मूल्यवान माना जाता रहा है। इस पौधे के विभिन्न भागों यानी बीज से लेकर जड़ तक का इस्तेमाल भोजन और इलाज में किया जाता है। इसे विटामिन, एंटीऑक्सीडेंट, अमीनो एसिड और खनिजों का स्रोत माना जाता है। “शोध के अनुसार, इसमें संतरे की तुलना में सात गुना ज्यादा विटामिन सी और दूध की तुलना में 17 गुना अधिक कैल्शियम होता है। इन्हीं गुणों ने मोरिंगा को लेकर दुनिया भर में खासकर स्वास्थ्य और प्राकृतिक स्वास्थ्य उद्योगों में दिलचस्पी पैदा की है।”
भारत दुनिया में मोरिंगा का सबसे बड़ा उत्पादक है। मदुरै स्थित मोरिंगा निर्यात क्षेत्र (एमईजेड) और विशेष निर्यात सुविधा केंद्र का ध्यान तमिलनाडु से मोरिंगा निर्यात क्षमता बढ़ाने पर है। मोरिंगा की खेती के तहत आने वाले 19,867 हेक्टेयर क्षेत्र में से 93% इलाका एमईजेड जिलों में आता है, जिसमें तमिलनाडु के नौ प्रमुख जिले शामिल हैं।

बाजार की चुनौतियां और किसान
डिंडीगुल जिले के किसान राजेंद्रन ने कहा, “बचपन में मेरे माता-पिता मुख्य रूप से चावल जैसी पारंपरिक फसलें उगाते थे। इस क्षेत्र में अनियमित बारिश और बढ़ते जल संकट के कारण साल-दर-साल उन फसलों पर निर्भर रहना धीरे-धीरे मुश्किल होता गया।”
उन्होंने तुरंत सहजन की खेती शुरू नहीं की। उन्होंने आगे कहा, “मोरिंग नया था, लेकिन पारंपरिक फसलों की तुलना में इसे कम पानी की जरूरत होती है। इसके अलावा, यह शुष्क परिस्थितियों में भी अच्छी तरह उगता है, जो हमारे क्षेत्र के लिए आदर्श है।” क्षेत्र के कई अन्य लोगों की तरह, राजेंद्रन भी सूखे को झेलने वाली फसल की ओर आकर्षित हुए, क्योंकि जलवायु परिवर्तन ने ज्यादातर पारंपरिक खेती को खतरे में डाल दिया था और चावल की तुलना में मेरा मुनाफा लगभग 30% बढ़ गया।”
हालांकि, सहजन के अनुकूल और पौष्टिक होने के बावजूद, चुनौतियां बनी हुई हैं। राजेंद्रन ने कहा, “हम सहजन तोड़ते तो हैं, लेकिन उसे अच्छी हालत में बाजार तक पहुंचाना मुश्किल होता है, क्योंकि अगर पाउडर, चाय और सप्लीमेंट के रूप में इस्तेमाल होने वाली पत्तियों का तुड़ाई के तुरंत बाद प्रसंस्करण नहीं किया जाए, तो वे बहुत जल्दी अपना पोषण खो देती हैं।”
डिंडीगुल से दूर, हरियाणा के सोनीपत के एक गांव में, अलग-अलग परीक्षणों और प्रयोगों की मदद से सहजन की खेती में सुधार किया जा रहा है। यहां, अपनी पत्नी सरला मान के साथ “हसबैंड वाइफ फार्म्स” चलाने वाले जितेंद्र मान ने जैविक खेती की खोज के लिए बड़ी टेक कंपनी की नौकरी छोड़ दी।
खेती का अनुभव नहीं होने के बावजूद पौधों के प्रति सहज प्रेम के कारण, मान ने एक फार्म बनाया। इस फार्म में मोरिंगा की खेती के तरीके पर भी पुनर्विचार किया जाता है। मान ने कहा, “हम प्राकृतिक रूप से उगने वाले पौधों को नहीं उखाड़ते। ये पौधे विविध जीवाणुओं को पोषित करते हैं, जिससे मोरिंगा के पत्तों में पोषण का स्तर बढ़ता है।”
उन्होंने कहा, “हमारे क्षेत्र में मोरिंगा के लिए कोई उचित कोल्ड स्टोरेज या वेयरहाउसिंग यूनिट नहीं हैं। हम आमतौर पर सुखाने के लिए छोटे सेटअप पर निर्भर रहते हैं, लेकिन जब आप बड़े खरीदारों या निर्यातकों के लिए गुणवत्ता बनाए रखना चाहते हैं, तो यह पर्याप्त नहीं है।”
हालांकि, मान छोटे किसानों के सामने आने वाली व्यवस्थागत चुनौतियों की ओर इशारा करते हैं। किसानों की मेहनत और बदले में उन्हें होने वाली आमदनी के बीच बड़ा अंतर है। कई किसानों को अपनी उपज थोक विक्रेताओं को सस्ते दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जो सीधे बाजार तक पहुंच और सौदेबाज़ी की क्षमता के अभाव का नतीजा है। उन्होंने आगे कहा, “कुछ किसान समय बचाने के लिए पत्तियों को बिना धोए धूप में सुखा देते हैं। इससे उनकी पौष्टिकता 90% तक कम हो जाती है।”

महिला उद्यमी और पहल
सहजन में बढ़ती दिलचस्पी ने महिला उद्यमियों को मजबूत बनाने में भी भूमिका निभाई है। दैविक सहजन की संस्थापक देविका बजाज ने प्रसव के बाद होने वाली थकान के दौरान सहजन के फायदों की खोज की। उन्होंने याद करते हुए कहा, “मेरे विटामिन और आयरन का स्तर कम था और मैं जो सप्लीमेंट ले रही थी, उनके दुष्प्रभाव भयानक थे।”
अपनी दादी द्वारा इस्तेमाल किए गए घरेलू नुस्खे के बाद, उन्होंने मोरिंगा का सहारा लिया। उन्होंने कहा, “मैंने इसे मन से लेना शुरू किया और तुरंत नतीजे देखने को मिले।” बजाज ने कहा, “कुछ ही हफ्तों में मेरी ऊर्जा का स्तर बढ़ गया, मेरी त्वचा और बालों में सुधार हुआ और मेरी खून की रिपोर्ट भी अच्छी दिखने लगी।” इसी से प्रेरित होकर, उन्होंने मोरिंगा के ज़रिए सभी के स्वास्थ्य पर आधारित स्थायी ब्रांड बनाया।
ल्यूक कॉउटिन्हो होलिस्टिक की मुख्य पोषण अधिकारी और पोषण विशेषज्ञ दीपिका राठौड़ ने कहा, “लगातार इस्तेमाल के कुछ ही हफ्तों में ग्राहक बेहतर ऊर्जा स्तर, स्वस्थ त्वचा और बेहतर आंत्र कार्यप्रणाली जैसे लाभ देखना शुरू कर देते हैं।”
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हालांकि मोरिंगा पीढ़ियों से भारतीय पारंपरिक आहार का हिस्सा रहा है, लेकिन आधुनिक समय में इसके मशहूर होने का श्रेय काफी हद तक पश्चिमी मान्यता को जाता है। बजाज ने कहा, “अब, जब पश्चिमी देशों ने इसे सुपरफूड कहना शुरू कर दिया है, तो हमें अचानक इसकी क्षमता का अहसास हो रहा है।”
आगे का रास्ता
भंडारण की समस्या को सुलझाने और वैश्विक निर्यात क्षमता का दोहन करने की अहमियत को समझते हुए, भारत सरकार ने सहजन की अर्थव्यवस्था के विकास को बढ़ावा देने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे में निवेश शुरू कर दिया है। यह निवेश तमिलनाडु में सहजन की खेती और निर्यात को बढ़ावा देने पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य मूल्यवर्धित सहजन उत्पादों की मांग को बढ़ावा देना, किसानों और निर्यातकों की पहचान करना और उन्हें खेती के अच्छे तरीकों का प्रशिक्षण प्रदान करना है।
मान ने बताया, “हमने मोरिंगा के पत्तों को ठीक से सुखाने के लिए एक सेटअप पर ₹18 से 19 लाख खर्च किए।” उन्होंने कहा, “हम उन्हें सात से आठ घंटे में सुखा लेते हैं, ताकि पोषक तत्व नष्ट ना हों। छोटे किसानों को इतना निवेश करने में सालों लग जाएंगे।”
इससे होने वाले लाभों के बावजूद, मोरिंगा के बारे में जागरूकता का अभाव है। मान ने बताया कि जब से उन्होंने मोरिंगा बेचना शुरू किया है, वे इसे सुपरफूड के रूप में देखते हैं। तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में उत्पादन और व्यापार को बढ़ाने के लिए मोरिंगा निर्यात संवर्धन बोर्ड की स्थापना की है। बजाज ने कहा, “हालांकि यह अहम प्रगति है, लेकिन मुझे नहीं पता कि महाराष्ट्र से काम करने वाला ब्रांड इसका फायदा किस तरह उठा सकता है।”
गोपालकृष्णन, एल., डोरिया, के., और संतोष कुमार, डी. (2016)। मोरिंगा ओलीफेरा: पोषण संबंधी महत्व और इसके औषधीय अनुप्रयोग पर एक समीक्षा। खाद्य विज्ञान और मानव कल्याण, 5(2), 49–56।
समसाई टी. तमिलनाडु के दक्षिणी क्षेत्र में मोरिंगा उत्पादन और विपणन पर एक अध्ययन। फार्मा इनोवेशन जर्नल। 2023; 12(11 S): 1947-1952।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 7 जुलाई, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: मोरिंगा से उपज को छांटती हुई महिलाएं। मोरिंगा में बढ़ती दिलचस्पी ने महिला उद्यमियों को जन्म दिया है जो प्रसव के बाद थकान, ऊर्जा स्तर में सुधार, त्वचा वगैरह के लिए मोरिंगा के लाभों के बारे में बताती हैं। तस्वीर सौजन्य: हसबैंड वाइफ फार्म्स।