- भारत में निर्मित एक टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (TED) को अमेरिका से मंज़ूरी मिलने के बाद यह उम्मीद जगी है कि पिछले पांच सालों से लगे झींगा निर्यात पर प्रतिबंध जल्द ही हट सकता है।
- भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप और अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक डिज़ाइन किया गया यह स्वदेशी TED समुद्री कछुओं के बाय-कैच को रोकता है, साथ ही झींगा के कैच में कोई नुकसान नहीं करता।
- हालांकि, कुछ चुनौतियाँ बनी हुई हैं, लेकिन भारतीय अधिकारी मछुआरों द्वारा TED को अपनाने के लिए देश के नौ समुद्री राज्यों के 100 बंदरगाहों में जागरूकता शिविर और लाइव प्रदर्शन आयोजित कर रहे हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका भारत के समुद्री खाद्य उत्पादों का सबसे बड़ा विदेशी बाजार है। भारत के कुल निर्यात राजस्व यानि एक्सपोर्ट रेवेन्यू का 34.53% (अमेरिकी डॉलर में) अमेरिका को बेचे गए समुद्री खाद्य उत्पादों से आता है। हालांकि, पिछले पाँच सालों में अमेरिका द्वारा जंगली झींगा (वाइल्ड-कॉट श्रिम्प) के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध के कारण भारत को 500 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है, जैसा कि समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA) ने रिपोर्ट किया है।
साल 2019 में लगे इस प्रतिबंध का कारण भारतीय ट्रॉलर जहाजों द्वारा टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (TED) का उपयोग नहीं किया जाना है।
टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस एक साधारण जाली होती है, जिसे ट्रॉलर जाल के कोड एंड (संकरे सिरे) से पहले इस प्रकार लगाया जाता है कि वह ऊपर या नीचे की ओर एक निकास द्वार की दिशा में झुकी होती है। इस जाली के बीच की दूरी से छोटे जीव जैसे कि झींगे (श्रिम्प) निकलकर जाल में बने रहते हैं, जबकि बड़ी मछलियाँ और समुद्री स्तनधारी जीव उस जाली में फंसने से बच जाते हैं और निकास द्वार से बाहर निकल जाते हैं। इससे पानी में रहने वाले समुद्री कछुए भी पकड़े जाने और लंबे समय तक जाल में फंसकर मरने से बच सकते हैं।
हालांकि, भारतीय जहाजों में उस समय जो डिवाइस उपयोग में थे, वे भी अमेरिका की नेशनल मरीन फिशरीज सर्विस (NMFS) के मानकों पर खरे नहीं उतरते थे।
अमेरिका के सार्वजनिक कानून की धारा 609 के तहत, ऐसे जंगली झींगे (वाइल्ड-कॉट श्रिम्प) या उनसे बने उत्पाद जो समुद्री कछुओं की संरक्षित प्रजातियों को नुकसान पहुंचा सकने वाली तकनीक से पकड़े गए हों, उनका आयात अमेरिका में प्रतिबंधित है।
जंगली झींगे को कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजारों में दोगुनी हो जाती है, और इसी कारण यह प्रतिबंध भारत के समुद्री खाद्य निर्यात राजस्व पर भारी असर डाल रहा है। मोंगाबे इंडिया को समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA) द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इस प्रतिबंध के चलते अन्य बाजारों में निर्यात किए गए जंगली झींगे की यूनिट वैल्यू $9.87 प्रति किलोग्राम से घटकर $5.68 प्रति किलोग्राम हो गई है, जो कि 42% की गिरावट है। MPEDA के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, यह प्रतिबंध भारत को हर साल लगभग ₹4,500 करोड़ का नुकसान पहुंचा रहा है।
भारत में समुद्री कछुओं को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत संरक्षित प्रजातियों की श्रेणी में रखा गया है। अधिकांश समुद्री राज्यों के मरीन फिशिंग रेगुलेशन एक्ट्स (MFRA) के अनुसार, यांत्रिक ट्रॉलर जहाज़ों के मछली पकड़ने वाले जालों में टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (TED) का उपयोग अनिवार्य है, ताकि अनजाने में जाल में फंसे समुद्री कछुए बाहर निकल सकें।
हालांकि, जमीनी स्तर पर इसका पालन सीमित रूप से ही हुआ है, जिसके कारण 2018 और 2019 में अमेरिकी अधिकारियों द्वारा उनके सीफ़ूड इम्पोर्ट मॉनिटरिंग प्रोग्राम (SIMP) के तहत की गई जांच के बाद यह प्रतिबंध लगाया गया।
भारत 1995 के फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (FAO) के कोड ऑफ कंडक्ट के हस्ताक्षरकर्ताओं में से एक है, इसके तहत भारत पर यह जिम्मेदारी है कि वह संकटग्रस्त समुद्री कछुओं की सुरक्षा के लिए शोध करे, इसके लिए उपयुक्त उपकरण और नियम बनाए, और आवश्यक नियमों को लागू करे।
अब, प्रतिबंध के पाँच साल बाद, MPEDA और ICAR – केंद्रीय मात्स्यिकी प्रौद्योगिकी संस्थान (ICAR-CIFT) ने एक स्वदेशी टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (TED) तैयार किया है, जिसे अमेरिका की नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) से स्वीकृति और अनुशंसा प्राप्त हो गई है।

कछुओं को बचाने के लिए बेहतर उपकरण
साल 2019 में अमेरिका ने भारतीय ट्रॉलर जहाजों में उपयोग किए जा रहे टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (TED) को यह कहकर अस्वीकार कर दिया था कि वह अमेरिका की NOAA (नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन) की तकनीकी आवश्यकताओं पर खरे नहीं उतरते। इस प्रतिबंध के बाद, MPEDA द्वारा शुरू की गई एक परियोजना के तहत, ICAR-CIFT ने अमेरिका के साथ मिलकर स्वदेशी TED के अनुमोदन की दिशा में काम किया।
“हमने अपने TED को उनके मानकों के अनुसार परिष्कृत और बेहतर बनाया। फिर हम उसे अमेरिका ले गए जहाँ उसका ‘डाइव इवैल्यूएशन’ किया गया,” ICAR-CIFT के फिशिंग टेक्नोलॉजी डिविजन के प्रमुख वैज्ञानिक और प्रमुख, एम. पी. रेमेसन बताते हैं। “वहाँ उन्होंने कुछ सुधारों का सुझाव दिया, जिन्हें हमने शामिल किया और फिर फरवरी 2024 में जब वे कोच्चि स्थित CIFT के अनुसंधान केंद्र में आए, तो हमने उसका प्रदर्शन किया और उन्होंने उसे स्वीकृति दे दी,” उन्होंने आगे बताया।
केंद्रीय मात्स्यिकी प्रौद्योगिकी संस्थान (ICAR-CIFT) की रिपोर्ट के अनुसार, टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (TED) के ‘डाइव इवैल्यूएशन’ से यह सामने आया कि इसके निकास द्वार (escape opening) की सीलिंग उत्कृष्ट थी, जिससे झींगा (श्रिम्प) के कैच में कोई नुकसान नहीं हुआ।
“दिलचस्प बात यह रही कि TED में लगे दो फ्लोट्स ने कोड एंड (जाल का अंतिम सिरा) को समुद्र तल से ऊपर उठा दिया, जिससे उसमें एक तरह का ‘वॉशिंग इफेक्ट’ आया और कैच काफी साफ-सुथरा मिला,” रेमेसन ने बताया।
MPEDA ने अब अमेरिका की NOAA द्वारा अनुमोदित डिज़ाइन के साथ ओडिशा में ट्रॉलर जहाज़ों पर फील्ड परीक्षण (ऑनबोर्ड फील्ड ट्रायल्स) शुरू कर दिए हैं। “परिणाम (फील्ड परीक्षण के) काफी सकारात्मक रहे हैं — कैच में तुलनात्मक रूप से कम नुकसान हुआ है, कैच की गुणवत्ता बेहतर रही है, कोड एंड में कचरा कम मिला है और समुद्री कछुए सफलतापूर्वक जाल से बाहर निकल पाए हैं,” MPEDA ने मोंगाबे इंडिया को बताया।
ICAR-CIFT ने शुरू में अमेरिका द्वारा सुझाए गए टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (TED) के आकार-मानकों को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार संशोधित किया था। उन्होंने TED में लगी छड़ों (bars) के बीच की दूरी चार इंच (101.6 मिमी) से बढ़ाकर 145 मिमी कर दी थी। हालांकि, इस बदलाव को लेकर अमेरिका की NOAA (नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन) ने कड़ी आपत्ति जताई।
“हमारा मुख्य उद्देश्य कैच लॉस को कम करना था। हमने बार स्पेसिंग लगभग 100 मिमी से बढ़ाकर 145 मिमी कर दी ताकि ज्यादा मछलियाँ जाल में आ सकें। लेकिन NOAA ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि अगर बार स्पेसिंग बहुत ज्यादा होगी, तो छोटे समुद्री कछुए भी जाल में घुस सकते हैं। लेकिन ऐसा कोई मामला हमने कभी देखा नहीं है — भारत में कहीं भी छोटे समुद्री कछुए ट्रॉलर के जाल में फंसे हुए नहीं पाए गए हैं,” रेमेसन ने बताया।

“ट्रॉलिंग के दौरान मछुआरों को कभी-कभी बड़ी मछलियाँ या रे (rays) जैसी प्रजातियाँ भी मिलती हैं, जिन्हें वे खोना नहीं चाहते। यही वजह है कि TED में बार स्पेसिंग को फिर से चार इंच करना मछुआरों के लिए चिंता का विषय बन सकता है,” रेमेसन बताते हैं। “अमेरिका जैसे समशीतोष्ण (temperate) देश में जहाँ केवल झींगा ट्रॉलिंग होती है, वहाँ चार इंच की स्पेसिंग पर्याप्त है। लेकिन हमारे यहाँ बहुप्रजातीय फिशरी होती है — हमारे मछुआरे झींगा, मछली, स्क्विड — कुछ भी खोना नहीं चाहते। इसलिए जब बार स्पेसिंग कम की जाती है, तो मछुआरे असंतुष्ट होते हैं,” उन्होंने आगे कहा।
हालांकि, अमेरिकी सिफारिशों के अनुरूप काम करने के लिए CIFT को अपने स्वदेशी TED की बार स्पेसिंग वापस चार इंच करनी पड़ी, जिससे अब बड़ी मछलियाँ जैसे कि रे जैसी प्रजातियाँ जाल में नहीं आ पातीं।
ट्रॉलर और कछुए
भारत में ट्रॉलर मछली पकड़ने का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जो देश के कुल समुद्री मत्स्य उत्पादन का लगभग 52% योगदान देता है। साल 2022 में ट्रॉलरों से वार्षिक मछली पकड़ने की मात्रा का अनुमानित औसत 2.027 मिलियन टन रहा।
हालांकि, बॉटम ट्रॉलिंग (समुद्र ताल के पास की ट्रॉलिंग) झींगे जैसी तलछटी (demersal) प्रजातियों के लिए एक कुशल तकनीक है, लेकिन ट्रॉल जाल की ग़ैर-चयनात्मक प्रकृति के कारण बड़ी संख्या में दुसरे जीव भी जाल में फँस जाते हैं — जिनमें संरक्षित और संकटग्रस्त प्रजातियाँ, जैसे समुद्री कछुए, भी शामिल हैं।
“जाल में समुद्री कछुओं का अनजाने में फँसना चिंता का विषय है। यह ज्यादातर पूर्वी तट — विशेष रूप से ओडिशा — में होता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि भारत के अन्य हिस्सों में कछुए जाल में नहीं फँसते,” रेमेसन कहते हैं।
पीटर मैथियास, अध्यक्ष, ऑल केरला फिशिंग बोट ओनर्स एसोसिएशन, के अनुसार भारत के पश्चिमी तट पर समुद्री कछुओं की संख्या बहुत सीमित है। “केरल और पश्चिमी तट पर सामान्यतः समुद्री कछुओं की उपस्थिति बहुत कम है। इसके विपरीत, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में इनकी संख्या बहुत अधिक है,” उन्होंने बताया। “केरल में समुद्र की उथल-पुथल, तटों का तेज क्षरण और बड़े पैमाने पर बने सीवॉल्स (समुद्री दीवारें) के कारण समुद्री कछुओं के लिए प्रजनन के खुले स्थान लगभग नहीं बचे हैं। केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (CMFRI) के अध्ययन भी इसी बात की पुष्टि करते हैं,” उन्होंने आगे बताया।

साल 2018 में केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (CMFRI) द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह सिफारिश की गई थी कि केरला के तिरुवनंतपुरम और कोल्लम जिलों में ट्रॉलर मछुआरों को टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (TED) लगाना अनिवार्य किया जाना चाहिए। हालाँकि राज्य के उत्तरी भागों और पश्चिमी तट के अन्य क्षेत्रों में समुद्री कछुओं की उपस्थिति बहुत कम होने के कारण वहाँ TED के उपयोग की आवश्यकता नहीं मानी गई।
जब मोंगाबे इंडिया ने समुद्री कछुओं के अनजाने में जाल में फँसने से जुड़े आँकड़ों का विस्तृत विवरण माँगा, तो MPEDA ने ईमेल के माध्यम से बताया: “भारतीय ट्रॉलर मत्स्य उद्योग में समुद्री कछुओं के बायकैच को लेकर सटीक और नियमित आँकड़े सीमित हैं।”
“हम 100 दिनों तक मछली पकड़ते हैं, लेकिन एक भी दिन ऐसा नहीं आता जब हमारे जाल में समुद्री कछुआ फँसता हो। अगर कभी संयोगवश कोई कछुआ जाल में आ भी जाए, तो हमारे मछुआरे उसे वापस समुद्र में छोड़ देते हैं,” पीटर मैथियास ऐसा दावा करते हैं। हालांकि, भारत के ट्रॉलर मछली पकड़ने के क्षेत्र में सतत और ज़िम्मेदार प्रथाओं को लेकर चिंताएँ अब भी बनी हुई हैं।
“यही समस्या 10–20 साल पहले भी थी। तब हमारे पास TED नहीं था। MPEDA ने अमेरिका से ‘सुपर शूटर्स’ नामक TED मंगवाया और हमारे जहाज़ों पर इसका परीक्षण किया। लेकिन उसमें कैच लॉस बहुत ज़्यादा था — 10, 15 या यहाँ तक कि 20 प्रतिशत तक। कोई मछुआरा इतना नुकसान सहने को तैयार नहीं था। यहीं से हमने CIFT में अपना स्वदेशी TED विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया,” रेमेसन बताते हैं।
MPEDA-NETFISH (नेटवर्क फॉर फिश क्वालिटी मैनेजमेंट एंड सस्टेनेबल फिशिंग) का जिम्मा है कि वह मछुआरों में जागरूकता फैलाए और जमीनी स्तर पर टर्टल एक्सक्लूडर डिवाइस (TED) को अपनाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाए। इसके तहत देश के सभी प्रमुख बंदरगाहों पर जागरूकता शिविर और प्रायोगिक प्रदर्शन (live demonstrations) आयोजित किए जा रहे हैं, ताकि ट्रॉलर नावों के मछुआरों और अन्य हितधारकों को TED लागू करने की आवश्यकता समझाई जा सके।
“हम मछुआरों को स्पष्ट रूप से बताते हैं कि हम TED क्यों लागू करना चाहते हैं। हम उन्हें अमेरिका के प्रतिबंध के प्रभाव, निर्यात राजस्व में गिरावट और बंदरगाहों पर उनके रेट कैसे नीचे चले गए — यह सब समझाते हैं। फिर हम TED के फोटो और वीडियो दिखाते हैं, जिससे उसके फ़ायदे सामने आ सकें। उसके बाद हम लाइव डेमोंस्ट्रेशन करते हैं,” MPEDA के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया।
TED के फायदे और चिंताएं
MPEDA के एक अधिकारी के अनुसार, ट्रॉलर जालों में TED लगाने के स्पष्ट और व्यावहारिक लाभ इसे मछुआरों के लिए काम की चीज बनाते हैं।
वे बताते हैं, “ट्रायल्स से हम यह दिखा सकते हैं कि कैच की मात्रा कैसे बढ़ी है — क्योंकि जाल के कोड एंड (आखिरी हिस्से) में अब कचरा नहीं आता, सिर्फ साफ मछली और झींगा पहुँचते हैं। इसका एक और फायदा यह हुआ है कि खींचने का दबाव कम हो गया है, जिससे डीजल की खपत भी घट गई है। और सबसे ज़रूरी बात — समुद्री कछुओं का संरक्षण। इसलिए TED को लागू करना पूरी तरह से तार्किक और लाभकारी है।”
साल 2025 के पहले सप्ताह से केरला में जागरूकता शिविर शुरू हो चुके हैं, लेकिन राज्य के ट्रॉलर मछुआरे अब भी अपने जालों में TED लगाने के विचार से सहमत नहीं हैं। मैथियास कैच लॉस को लेकर चिंता जाहिर करते हैं।
“चार इंच से बड़ी मछलियाँ खोना मछुआरों के लिए बहुत बड़ा नुकसान होगा। इसके अलावा, केरल के तट के पास प्लास्टिक और अन्य कचरे की भरमार है, जिससे TED का निकास द्वार बंद हो सकता है और छोटी मछलियों का भी नुकसान हो सकता है,” वे कहते हैं। उन्होंने TED के उपयोग से डीज़ल की खपत में कमी के दावे पर भी सवाल उठाया। “इस डिवाइस का वजन करीब 11 किलो है। जब हम इसे ट्रॉल जाल के कोड एंड पर लगाते हैं, तो यह प्रतिरोध पैदा करता है, ऐसे में डीज़ल की खपत तो ज़रूर बढ़ेगी,” उन्होंने कहा।
मैथियास का तर्क है कि केरला के मछुआरों पर TED थोपना अनुचित है क्योंकि उनके समुद्री क्षेत्र में कछुए नहीं पाए जाते। उनका मानना है कि MPEDA जैसी एजेंसियों को उचित अध्ययन करने चाहिए और अमेरिका को इसकी जानकारी देनी चाहिए, बजाय इसके कि इस बोझ को केरला के मछुआरों पर डाला जाए।

कैच लॉस को लेकर बढ़ती चिंताओं के बारे में पूछने पर MPEDA के अधिकारी ने इसे अटकल मात्र कहकर खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “MPEDA और CIFT ने अमेरिका के साथ मिलकर TED बनाया है। मछुआरों को कैसे पता चलेगा कि इससे ज्यादा कैच लॉस हो रहा है? यह पूरी तरह से एक कयास मात्र है। TED से तो कैच और बढ़ा है। नुकसान की कोई बात ही नहीं है, सिर्फ फायदे हैं।”
इसके विपरीत, CIFT का रुख ज़्यादा संतुलित था। एक आधिकारिक बयान के अनुसार: “निर्यात प्रतिबंध हटने के बाद मिलने वाली ऊँची कीमतें और कछुओं का संरक्षण — ये दोनों ही किसी भी न्यूनतम और अनिश्चित वित्तीय नुकसान की भरपाई कर सकते हैं।”
साल 2019 के प्रतिबंध के बाद, भारत ने अमेरिका के सार्वजनिक कानून की धारा 609 के तहत राज्य या क्षेत्र-आधारित प्रमाणन का प्रस्ताव रखा था, ताकि अन्य राज्य भी प्रमाणन प्राप्त करने के लिए प्रेरित हों और राष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणन की प्रक्रिया तेज़ हो सके। हालांकि, अमेरिका ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और स्पष्ट कर दिया कि वे प्रतिबंध तभी हटाएंगे जब पूरे भारत में TED का क्रियान्वयन हो जाएगा।
हालांकि, अमेरिकी NOAA ने भारत में TED लागू करने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की है, MPEDA इसे एक तात्कालिक प्राथमिकता मानता है ताकि अमेरिका को जंगली झींगे (wild-caught shrimp) का निर्यात फिर से शुरू किया जा सके और लाखों भारतीय मछुआरों की आजीविका सुरक्षित रह सके। MPEDA अधिकारी ने बताया कि सभी ट्रॉल गियर में TED के क्रियान्वयन की समय-सीमा जनवरी 2025 तय की गई है, और सितंबर 2025 तक अमेरिका के NOAA अधिकारियों को धारा 609 के तहत प्रमाणन और सत्यापन के लिए आमंत्रित करने की योजना है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 17 जनवरी 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: भारत में ट्रॉलर मछली पकड़ने का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जो देश के कुल समुद्री मत्स्य उत्पादन का लगभग 52% योगदान देता है। तस्वीर: पूजा राठौड़ द्वारा Wikimedia Commons(CC BY-SA 4.0) के माध्यम से।