- महाराष्ट्र के पुणे में किए गए एक मॉडलिंग अध्ययन में पाया गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण निकट भविष्य में डेंगू से होने वाली मौतों में 13% का इजाफा हो सकता है।
- प्रदूषण के स्तर से प्रभावित हुए बिना डेंगू से होने वाली मौतों की बढ़ती संख्या का कारण तापमान में वृद्धि और वर्षा का बदलता पैटर्न रहेगा।
- शोधकर्ताओं का कहना है कि मच्छरों के प्रजनन और उनकी मौत के बीच का समय प्रारंभिक चेतावनी के लिए पर्याप्त है।
भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में पाया गया है कि ग्लोबल वार्मिंग से मानसून में होने वाले परिवर्तनों के कारण निकट भविष्य में पुणे, महाराष्ट्र में डेंगू से होने वाली मौतों में 13% की वृद्धि हो सकती है। यह डेंगू से होने वाली मौतों का क्षेत्रीय विश्लेषण करने वाले पहले अध्ययनों में से एक है, जिसमें जलवायु परिवर्तन के नए मॉडलों का उपयोग किया गया है।
राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण के आंकड़ों के अनुसार, भारत दुनिया के डेंगू हॉटस्पॉट में से एक है, जहां 2021 से हर साल 1,90,000 से लेकर 2,89,000 मामले सामने आए थे। डेंगू के मामले मानसून के मौसम की शुरुआत में बढ़ने लगते हैं, जब बीमारी के फैलने के लिए परिस्थितियां काफी अनुकूल होती हैं।
अध्ययन में पुणे शहर में डेंगू से होने वाली मौतों के भविष्य के बारे में अनुमान लगाया गया है। यहां तक कि अगर प्रदूषण का स्तर कम भी हो जाए और दुनिया का तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाए, तब भी डेंगू से मरने वाली मौतों में इजाफा होने की संभावना है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के चलते तापमान पहले ही पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.1 डिग्री बढ़ चुका है। अध्ययन में कहा गया है कि निकट भविष्य में, शहर में 2040 तक डेंगू से होने वाली मृत्यु दर “प्रदूषण के स्तर से प्रभावित हुए बिना” 12-13% बढ़ जाएगी।
अगर प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा रहा और तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ गया, तो डेंगू से होने वाली मौतें मध्यम अवधि (2041-2060) में 23% से 40% तक और लंबी अवधि (2081-2100) में 30% से 112% तक बढ़ सकती हैं, जो प्रदूषण की मात्रा पर निर्भर करेगा। आईआईटीएम की शोधकर्ता और अध्ययन की मुख्य लेखक सोफिया याकूब ने मोंगाबे इंडिया को ईमेल में बताया, “जलवायु और डेंगू के बीच का यह संबंध क्षेत्र-विशिष्ट है। हालांकि, इस अध्ययन में इस्तेमाल किया गया तरीका और मॉडल ढांचे को अन्य क्षेत्रों के लिए भी क्षेत्र-विशिष्ट डेंगू मॉडल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, बशर्ते शहर या जिला हमें स्थानीय स्वास्थ्य डेटा प्रदान करें।”

अध्ययन में कहा गया है कि डेंगू के फैलने के लिए जरूरी मौसम की स्थिति शुरू होने और डेंगू से होने वाली मौतों के बीच का समय इतना होता है कि डेंगू से बचाव के लिए शुरुआती चेतावनी प्रणाली बनाई जा सकती है।
डेंगू के लिए शुरूआती चेतावनी
डेंगू का खतरा बारिश, नमी और तापमान में बदलाव पर निर्भर करता है। इनमें से प्रत्येक मौसम संबंधी कारक एडीज इजिप्टी और एडीज एल्बोपिक्टस मच्छरों के जीवन चक्र को प्रभावित करते हैं, जो डेंगू फैलाने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
याकूब ने बताया, “वर्षा मच्छरों के अंडों और लार्वा के लिए प्रजनन स्थल बनाती है, लेकिन इससे डेंगू का खतरा तुरंत नहीं बढ़ता है,” उन्होंने आगे कहा, “लार्वा को वयस्क मच्छरों में तब्दील होने में समय लगता है, जो वायरस फैलाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। जब ये वयस्क मच्छर संक्रमित होकर हफ्तों बाद डेंगू फैलाना शुरू करते हैं, तो डेंगू के मामलों पर शुरुआती बारिश का असर साफतौर पर दिखाई देने लग जाता है।”
पुणे में 2004 से 2015 तक के आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद, शोधकर्ताओं ने पाया कि 0.5 मिमी से 150 मिमी के बीच की बारिश वाले हफ्तों में डेंगू से होने वाली मौतें बढ़ीं, जबकि 150 मिमी से अधिक बारिश होने पर डेंगू से होने वाली मौतों का जोखिम कम हो गया, क्योंकि भारी बारिश से मच्छरों के अंडे और लार्वा बह गए। इसी तरह, 60-78% की नमी और 27 डिग्री सेल्सियस से 35 डिग्री सेल्सियस के बीच का तापमान डेंगू से होने वाली मौतों के लिए सबसे अनुकूल था।
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अध्ययन में कहा गया है कि डेंगू मॉडल में अनुकूल मौसम की स्थिति और डेंगू से होने वाली मौतों के बीच के समय को शामिल करना “जरूरी” है, ताकि संक्रमण और बीमारी में शामिल कई प्रक्रियाओं को ध्यान में रखा जा सके। अध्ययन में कहा गया है, “कुल मिलाकर, मच्छर प्रजनन के लिए जलीय आवास की उपलब्धता से लेकर डेंगू से होने वाली मौतों तक [पुणे में], लगभग 1-3 महीने लगते हैं।” अध्ययन में यह भी कहा गया है कि मौसम की स्थिति में बदलाव और डेंगू के फैलने के बीच कुछ समय का अंतर होता है और ये समय हमें डेंगू के प्रकोप के लिए प्रभावी ढंग से तैयार होने और निपटने के लिए पर्याप्त समय के साथ शुरुआती चेतावनी प्रदान करता है।”

जलवायु परिवर्तन और भविष्य की मृत्यु दर
अध्ययन में जलवायु परिवर्तन के कपल्ड मॉडल इंटरकम्पैरिजन प्रोजेक्ट्स 6 (CMIP6) का इस्तेमाल करके जलवायु परिवर्तन की स्थिति में डेंगू के भविष्य के अनुमानों का मॉडल तैयार किया गया है। यह मॉडल जलवायु परिवर्तन पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों और जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) जैसे संगठनों द्वारा व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। CMIP6 मॉडल अलग-अलग प्रदूषण के स्तर और विकास के अलग-अलग सामाजिक-आर्थिक तरीकों पर विचार करता है।

अध्ययन बताता है कि, चाहे प्रदूषण का स्तर कम हो या ज्यादा, डेंगू से मरने वालों की संख्या बढ़ने का मुख्य कारण है तापमान का बढ़ना और बारिश के तरीकों में बदलाव है। तापमान बढ़ने से डेंगू से होने वाली मौतें 12-22% तक बढ़ सकती हैं, जबकि बारिश के तरीकों में बदलाव से ये मौतें 3-4% तक कम हो सकती हैं (क्योंकि ज्यादा बारिश होने से मच्छरों के अंडे बह जाते हैं और ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने के साथ-साथ भारी बारिश की संभावना भी बढ़ जाती है)।
अध्ययन में कहा गया है कि “अगर भविष्य में प्रदूषण को नियंत्रित कर पाए ताकि दुनिया का औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम रहे, तो डेंगू से होने वाली मौतों में बढ़ोतरी 13% से कम होगी। हालांकि, अगर प्रदूषण बढ़ता रहा और तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा हो गया, तो डेंगू से होने वाली मौतों में 23% से 40% तक की बढ़ोतरी हो सकती है।” अध्ययन में आगे कहा गया है, “इसके अलावा, जब दुनिया का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस के निशान को पार कर जाएगा, तो डेंगू से होने वाली मौतों में संदर्भ अवधि की तुलना में 40-112% की वृद्धि होने का अनुमान है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 28 जनवरी 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: एडीज एल्बोपिक्टस मच्छर। विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश मच्छरों के अंडों और लार्वा के लिए प्रजनन स्थल बनाती है। हफ्तों बाद, विकसित वयस्क मच्छर डेंगू फैलाना शुरू कर देते हैं। तस्वीर- जेम्स गैथनी, सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन, यूनाइटेड स्टेट डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ एंड ह्यूमन सर्विस