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गहरे मतभेद के बीच बॉन से बेलेम तक आगे बढ़ती वैश्विक जलवायु वार्ता

जहरीली हवा की चपेट में दिल्ली। शहरी भारत का बड़ा हिस्सा अभी भी झुग्गी-झोपड़ियों या अनौपचारिक बस्तियों में रहता है और वायु प्रदूषण की स्थिति गंभीर बनी हुई है। विकिमीडिया कॉमन्स के जरिए (CC BY SA 4.0) Prami.ap90 द्वारा ली गई तस्वीर ।

जहरीली हवा की चपेट में दिल्ली। शहरी भारत का बड़ा हिस्सा अभी भी झुग्गी-झोपड़ियों या अनौपचारिक बस्तियों में रहता है और वायु प्रदूषण की स्थिति गंभीर बनी हुई है। विकिमीडिया कॉमन्स के जरिए (CC BY SA 4.0) Prami.ap90 द्वारा ली गई तस्वीर ।

  • कॉप-29 में जलवायु वित्त पर समझौते के बावजूद बॉन में जून में आयोजित जलवायु वार्ता में इससे जुड़े मतभेद छाए रहे।
  • जस्ट ट्रांजिशन वर्क प्रोग्राम और अनुकूलन पर वैश्विक लक्ष्य में कुछ प्रगति हुई, जिस पर कॉप-30 में आगे की बातचीत की जाएगी।
  • जैसे-जैसे कॉप-30 नजदीक आ रहा है, ब्राजील के सामने तापमान में 1.5° सेल्सियस की कमी से जुड़े लक्ष्यों को मजबूत करने और जलवायु वित्त व जलवायु कार्रवाई में अंतर दूर करने के लिए सभी पक्षों को एकजुट करने की चुनौती है।

हर साल दो हफ्ते तक होने वाला बॉन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 26 जून को कुछ प्रगति के साथ संपन्न तो हो गया, लेकिन इसने ऐसे समय में पार्टियों के बीच गहरे मतभेद भी उजागर किए, जब वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के दुष्प्रभाव तेजी से महसूस किए जा रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के तहत साल के बीच में आयोजित होने वाली बैठक का उद्देश्य जलवायु वार्ता के तकनीकी और वैज्ञानिक पहलुओं पर विचार करना और संगठन के आगामी कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप) के एजेंडे को तय करना था।

एजेंडे पर असहमति की वजह से बैठक लगभग दो दिन आगे खिसक गई, क्योंकि विकासशील देशों ने विकसित देशों के जलवायु वित्त से जुड़ी जिम्मेदारियों और यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) जैसे एकतरफा व्यापार उपायों के प्रभावों पर औपचारिक चर्चा की मांग की थी। पक्षों के बीच खास तौर पर वित्त और उत्सर्जन में कमी को लेकर पहले के मतभेद जारी रहे और इससे कई अन्य एजेंडों पर प्रगति प्रभावित हुई।

इसके बावजूद, बॉन ने अनुकूलन पर वैश्विक लक्ष्य और जस्ट ट्रांजिशन वर्क प्रोग्राम जैसे मुद्दों पर पर्याप्त प्रगति देखी।

दरअसल, इस साल की यह बैठक पिछले साल बाकू में अजरबैजान की अध्यक्षता में हुए कॉप-29 में आखिरी वक्त में पारित कराए गए जलवायु वित्त समझौते के बाद आयोजित की गई थी। इस समझौते पर कई पक्षों ने निराशा जताई थी और यही भावना बॉन सम्मेलन में भी दिखी। 24 जून को छोटे द्वीपीय राज्यों के गठबंधन (AOSIS) ने निराशा जताते हुए कहा, “जलवायु परिवर्तन और उसके विनाशकारी दुष्प्रभाव तेज हो रहे हैं, इसके बावजूद हम उसी गति से कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है?” सत्र के आखिर में, अल्प विकसित देशों (एलडीसी) के समूह ने विज्ञान पर हमलों पर इसी तरह की निराशा व्यक्त करते हुए कहा, “यह चिंताजनक है कि वैज्ञानिक तथ्यों को चुनौती दी जा रही है। 1.5° सेल्सियस के जिक्र को महज खतरे की आहट मानना बेहद चिंताजनक है।” समूह ने कहा कि मौजूदा कोशिशें बेपटरी हो रही हैं और संगठन ने और ज्यादा महत्वाकांक्षी लक्ष्यों पर जोर दिया।

समापन सत्र के दौरान पूरे माहौल का सार तब सामने आया जब संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन के कार्यकारी सचिव साइमन स्टील ने कहा, “बेलेम (कॉप-30) में दोबारा मिलने से पहले हमें बहुत कुछ करना होगा। विज्ञान की मांग के अनुसार, 1.5 को बनाए रखने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना जरूरी है।”

एसबी62 के उद्घाटन के दौरान हुआ पूर्ण अधिवेशन। एजेंडे पर असहमति के कारण बैठक लगभग दो दिन देरी तक चली। तस्वीर सौजन्य: फ़्लिकर (CC BY-NC-SA 4.0) के जरिए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन-लारा मुरिलो द्वारा ली गई तस्वीर।
एसबी62 के उद्घाटन के दौरान हुआ पूर्ण अधिवेशन। एजेंडे पर असहमति के कारण बैठक लगभग दो दिन देरी तक चली। तस्वीर सौजन्य: फ़्लिकर (CC BY-NC-SA 4.0) के जरिए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन-लारा मुरिलो द्वारा ली गई तस्वीर।

जस्ट ट्रांजिशन और अनुकूलन पर प्रगति

बॉन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, एसबी62 (जून में होने वाली जलवायु वार्ताएं) में बातचीत के दो प्रमुख बिंदुओं पर प्रगति देखी गई: जस्ट ट्रांजिशन वर्क प्रोग्राम (जेटीडब्ल्यूपी) और अनुकूलन पर वैश्विक लक्ष्य (जीजीए)।

पहली बार वार्ताकारों ने जेटीडब्ल्यूपी पर मसौदा निर्णय और अनौपचारिक नोट तैयार किया, जिस पर कॉप-30 में आगे चर्चा की जाएगी। यह नोट विकासशील देशों को जस्ट ट्रांजिशन से जुड़ी रणनीतियों को लागू करने में सहायता के लिए वित्तपोषण, क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के संभावित तरीकों की रूपरेखा प्रस्तुत करता है। यह देशों को अपनी राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं में जस्ट ट्रांजिशन संबंधी विचारों को शामिल करने के लिए भी प्रोत्साहित करता है। इनमें राष्ट्रीय स्तर पर तय योगदान (NDC\एनसीडी), राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाएं (NAP) और लंबी अवधि में कम उत्सर्जन के लिए विकास रणनीतियां (LT-LEDS) शामिल हैं।

स्वतंत्र थिंक टैंक इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईआईएसडी) के नीति सलाहकार जोनास कुएहल का कहना है कि यह पेरिस समझौते के मुख्य ढांचे में सामाजिक बराबरी और श्रम मुद्दों को शामिल करने की दिशा में शुरुआती कदम है।

जेटीडब्ल्यूपी का मसौदा जलवायु वित्त को जस्ट ट्रांजिशन के व्यापक सामाजिक और आर्थिक पहलुओं से जोड़ता है। इसमें मानवाधिकारों, लैंगिक समानता और मूल निवासियों व अन्य कमजोर समूहों के अधिकारों का उल्लेख है। कुएहल कहते हैं कि ये संदर्भ जलवायु वित्त के दायरे को व्यापक बनाते हैं और संकेत देते हैं कि संसाधनों को ना सिर्फ बुनियादी ढांचे, उत्सर्जन में कमी और एडेप्टेशन के लिए, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, कौशल विकास को नया आयाम देने और समावेशी योजना के लिए भी मददगार होना चाहिए।

नए जेटीडब्ल्यूपी दस्तावेज में एकतरफा व्यापार उपायों पर भी बात है। विकासशील देशों ने ऐसे उपायों पर चर्चा के लिए दबाव डाला है, जिनके बारे में उनका कहना है कि ये जलवायु कार्रवाई के नाम पर थोपे गए हैं। उनकी दलील है कि ये नीतियां जलवायु परिवर्तन से प्रभावी ढंग से निपटने की उनकी क्षमता को सीमित करती हैं। हालांकि, विकसित देशों की दलील है कि ऐसे मुद्दों का हल विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) जैसे व्यापार मंचों पर किया जाना चाहिए। जानकार जेटीडब्ल्यूपी में व्यापार उपायों को शामिल करने को सकारात्मक पहल मानते हैं, लेकिन आगाह करते हैं कि इसे जस्ट ट्रांजिशन के अन्य अहम पहलुओं पर हावी नहीं होना चाहिए।

नई दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) में जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम की कार्यक्रम प्रबंधक अवंतिका गोस्वामी कहती हैं, “ऐसी आशंकाएं थी कि जेटीडब्ल्यूपी चर्चा में व्यापार उपायों को शामिल करने से जस्ट ट्रांजिशन पर अन्य सभी चर्चाएं पीछे छूट जाएंगी। सौभाग्य से, नागरिक समाज के समर्थन से अन्य तत्वों को शामिल करते हुए मसौदा तैयार किया गया और इस पर बेलेम में बातचीत की जाएगी।”

विकासशील देश जलवायु कार्रवाई को लागू करने के लिए जरूरी वित्त पोषण पर लगातार जोर दे रहे हैं। तस्वीर: मनीष कुमार/मोंगाबे।
विकासशील देश जलवायु कार्रवाई को लागू करने के लिए जरूरी वित्त पोषण पर लगातार जोर दे रहे हैं। तस्वीर: मनीष कुमार/मोंगाबे।

जेटीडब्ल्यूपी के अलावा, एसबी62 बैठक में अनुकूलन पर भी प्रगति देखी गई। यह लक्ष्यों को हासिल करने में प्रगति का आकलन करने के लिए आगामी संकेतकों की सूची में लागू करने के साधनों और वित्त को शामिल करने पर थी। आईआईएसडी में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन के लिए निगरानी, मूल्यांकन और शिक्षण प्रमुख एमिली ब्यूचैम्प कहती हैं, “मौजूदा नतीजों से यूएई बेलेम वर्क प्रोग्राम पर काम कर रहे विशेषज्ञ समूह ऐसे संकेतक शामिल कर सकते हैं जो खास तौर पर लागू करने के साधनों की समस्या को दूर करते हैं, जिसमें अनुकूलन के लिए वित्त का प्रकार और उसे हासिल करना शामिल है।”

पिछले अनुभवों के आधार पर, विकसित देश अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताओं पर कुछ हद तक नजर रखने से बचते रहे हैं, क्योंकि ये वादे अक्सर जरूरत से कम पड़ जाते हैं। ब्यूचैम्प कहते हैं, “यही वजह है कि वित्त संबंधी संकेतकों को शामिल करने की अनुमति देने वाला यह नया कदम सकारात्मक है। यह अभी तक कोई बड़ा बदलाव नहीं है, लेकिन यह जलवायु वित्त पर ज्यादा पारदर्शिता की तरफ एक कदम जरूर है।”

वित्तीय मदद पर टकराव

वैसे 2024 में बाकू में आयोजित कॉप-29 में जलवायु वित्त पर नए सामूहिक मापने योग्य लक्ष्य (NCQG\ एनसीक्यूजी) पर सहमति बनी थी, जिसमें सभी पक्षों ने 2035 तक विकसित देशों से विकासशील देशों को 300 बिलियन डॉलर की धनराशि देने की प्रतिबद्धता जताई थी। फिर भी SB62 में जलवायु वित्त सबसे ज्यादा विवादास्पद मुद्दों में से एक बना रहा।

इसे लेकर मतभेद पहले दिन से ही स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा था, जब विकासशील देशों ने पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 पर औपचारिक चर्चा की मांग की। इस अनुच्छेद में वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने के लिए विकसित देशों की जिम्मेदारियों का उल्लेख है। उन्होंने इसे शुरुआती पूर्ण अधिवेशन के एजेंडे में शामिल करने पर जोर दिया, लेकिन विकसित देशों, खासकर यूरोपीय संघ ने इस कदम का पुरजोर विरोध किया।

जब गोस्वामी से यह पूछा गया कि एनसीक्यूजी समझौते के बावजूद यह मुद्दा फिर क्यों उठा, तो उन्होंने बताया कि बाकू समझौते में अनुच्छेद 9.1 के तहत सार्वजनिक वित्त पर स्पष्टता का अभाव था और लक्ष्य भी तय नहीं थे, जिस वजह से विकासशील देशों ने इस मामले को फिर से उठाया।

बोलीविया ने समान विचारधारा वाले विकासशील देशों (एलएमडीसी) की ओर से 3 जून को कहा, “पेरिस समझौते के लक्ष्यों को तेजी से पूरा करने की जरूरत के बावजूद, समझौते को अपनाए जाने के दस साल बाद भी इसके मुख्य उप-अनुच्छेदों में से एक 9.1 को अभी तक लागू नहीं किया गया है।”

गतिरोध खत्म करने के लिए, एसबी62 के अध्यक्ष ने प्रस्ताव दिया कि इस मुद्दे पर बंद कमरे में विचार-विमर्श किया जाए और उसके नतीजों पर रिपोर्ट बेलेम में प्रस्तुत की जाए। भारत पहले ही संकेत दे चुका है कि वह इस मुद्दे को कॉप-30 में फिर से उठाएगा।

आईआईएसडी की नीति सलाहकार नताली जोन्स ने कहा, “अनुच्छेद 9.1 पर कई बार विचार-विमर्श होने का समझौता हुआ। विचार-विमर्श के दौरान बातचीत में गतिरोध भी दिखा और आगे किस तरह बढ़ना है, इस पर सहमति नहीं बन पाई।”

एसबी62 का पूर्ण अधिवेशन हाल ही में बॉन में संपन्न हुआ। दो सप्ताह तक चला बॉन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 26 जून को कुछ प्रगति के साथ खत्म हुआ, लेकिन इसमें विभिन्न पक्षों के बीच गहरे मतभेद भी सामने आए। तस्वीर सौजन्य: फ्लिकर (CC BY-NC-SA 4.0) के जरिए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन-पीटर क्रोनिश की तस्वीर।
एसबी62 का पूर्ण अधिवेशन हाल ही में बॉन में संपन्न हुआ। दो सप्ताह तक चला बॉन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 26 जून को कुछ प्रगति के साथ खत्म हुआ, लेकिन इसमें विभिन्न पक्षों के बीच गहरे मतभेद भी सामने आए। तस्वीर सौजन्य: फ्लिकर (CC BY-NC-SA 4.0) के जरिए संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन-पीटर क्रोनिश की तस्वीर।

एसबी62 में वित्त पर बहसों में बाकू-से-बेलेम रोडमैप पर भी चर्चा हुई, जिसका लक्ष्य 2035 तक सभी स्रोतों से कुल 1.3 ट्रिलियन डॉलर का जलवायु वित्त जुटाना है। यह रोडमैप कॉप-29 में व्यापक एनसीक्यूजी नतीजे का हिस्सा था।

रोडमैप पर दो बार बातचीत भी हुई जिनमें भी तीखी बहस हुई। विकासशील देशों ने अनुकूलन वित्त बढ़ाने पर जोर दिया और ऐसे वित्तीय तंत्रों का आह्वान किया जो उन पर कर्ज नही बढ़ाएं। इस बीच, विकसित देशों ने निजी वित्त के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल पर जोर दिया। नताली जोन्स ने कहा, ” आखिरकार रोडमैप इन नजरियों को किस तरह संतुलित करेगा, यह देखना बाकी है।” उन्होंने आगे कहा, “जरूरत के हिसाब से वित्त को बढ़ाने के विश्वसनीय और मजबूत संकेतों के बिना, कॉप-30 में जरूरी सफलताएं मिलने की संभावना कम है।”

गोस्वामी ने बाकू-से-बेलेम रोडमैप को सिर्फ राजनीतिक उत्पाद बताया। कॉप-29 में एनसीक्यूजी वार्ता के आखिरी पलों में कुछ देशों ने गतिरोध को दूर करने और आगे बढ़ने के लिए रोडमैप पेश किया था। अब, कॉप-20 के अध्यक्ष के रूप में ब्राजील इसे आगे बढ़ाने के लिए बाध्य है। उन्होंने कहा, “लेकिन यह रोडमैप काफी हद तक प्रतीकात्मक है।”

उन्होंने कहा, “कॉप-29 से पहले कुछ सालों तक एनसीक्यूजी पर कई दौर की चर्चाएं हो चुकी हैं। अब इस पर फिर से बातचीत का विरोध हो रहा है। इसलिए, यह रोडमैप कुछ मार्गदर्शन तो दे सकता है, लेकिन इसे कुछ हद तक ही लागू किया जाएगा।”


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लेकिन एक बात स्पष्ट है कि जलवायु वित्त आगे होने वाली चर्चाओं का एजेंडा तय करता रहेगा। विकासशील देश अपनी जलवायु कार्रवाई को लागू करने के लिए ऐसे साधनों की तलाश में हैं जो वैश्विक लक्ष्यों के मुताबिक हों, लेकिन उन्हें कर्ज के जाल में न फंसाएं। भारत ने अपनी बात रखते हुए कहा, “पर्याप्त जलवायु वित्त के बिना, प्रस्तावित राष्ट्रीय विकास कार्यक्रम (एनडीसी) से फायदा नहीं होगा, भविष्य के राष्ट्रीय विकास कार्यक्रमों में महत्वाकांक्षा के स्तर में बढ़ोतरी की तो बात ही छोड़ दीजिए।”

बेलेम का मुश्किल भरा रास्ता

साल के बीच में बॉन में आयोजित वार्ता बेलेम में होने वाले कॉप-30 के सफर पर अहम पड़ाव साबित हुई, जो क्योटो प्रोटोकॉल के लागू होने के 20 साल और पेरिस समझौते को अपनाए जाने के 10 साल पूरे होने का प्रतीक होगा। इसे कॉप-30 के दौरान सार्थक वार्ता के अवसर के रूप में देखा गया। कॉप-30 की ब्राजीलियाई अध्यक्षता ने 25 मार्च से अब तक चार पत्र जारी किए हैं, जिनमें जलवायु संकट, रिकॉर्ड तोड़ वैश्विक तापमान और धरती की प्रमुख सीमाओं के पार होने पर जोर दिया गया है।

साल 2025 अहम है, क्योंकि सभी देशों से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने अपडेट किए गए और ज्यादा महत्वाकांक्षी एनडीसी प्रस्तुत करें। इससे यह पता चलेगा कि दुनिया अपने जलवायु लक्ष्यों को पाने से कितनी दूर है। हालांकि, देशों के बीच गहरे मतभेद और सीमित कार्बन स्पेस के कारण, ब्राजीलियाई प्रेसीडेंसी के सामने चुनौती बड़ी है। उसे नवंबर में बेलेम में सभी पक्षों को एक साथ लाना होगा और उन्हें साझा, महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्य तय करने की दिशा में आगे बढ़ाना होगा।

जोन्स ने कहा कि कॉप-30 की ओर बढ़ते हुए बड़ी चुनौती भरोसेमंद योजना बनाने की है, क्योंकि एनडीसी से 1.5°सेल्सियस का शायद ही पूरा हो पाए। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि प्रेसीडेंसी इस मुद्दे से किस तरह निपटेगी, फिर भी पेरिस समझौते की मूल भावना को बनाए रखने के लिए यह सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।”


यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 2 जुलाई, 2025 को प्रकाशित हुई थी।


 

बैनर तस्वीर: जहरीली हवा की चपेट में दिल्ली। शहरी भारत का बड़ा हिस्सा अभी भी झुग्गी-झोपड़ियों या अनौपचारिक बस्तियों में रहता है और वायु प्रदूषण की स्थिति गंभीर बनी हुई है। विकिमीडिया कॉमन्स के जरिए (CC BY SA 4.0) Prami.ap90 द्वारा ली गई तस्वीर ।

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