- छत्तीसगढ़ सरकार प्रति एकड़ 3,100 रुपए की दर से 21 क्विंटल धान की ख़रीदी करती है और कुल 65,100 रुपए का भुगतान करती है।
- लेकिन राज्य का वन विभाग फसलों को वन्यजीवों से होने वाले नुकसान के लिए किसानों को प्रति एकड़ अधिकतम महज 9,000 रुपए का भुगतान करता है।
- छत्तीसगढ़ में पिछले पांच सालों में हाथियों द्वारा फसलों के नुकसान पहुंचाने के, हर साल औसतन 14,690 मामले दर्ज़ किए गए हैं। यानी हर दिन हाथियों ने कम से कम 40 जगहों पर फसलों को नुकसान पहुंचाया है।
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में ‘वन्यजीवों द्वारा नुकसान’ को शामिल किया जा सकता है लेकिन इसके लिए राज्य को अतिरिक्त प्रीमियम का भुगतान करना पड़ेगा।
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ इलाके के शनिराम दुखी और परेशान हैं। सिंघिझाप के जंगल से लगे गांवों में घूम रहे 17 जंगली हाथियों के दल ने, इस महीने उनकी खेत में लगी हुई पूरी फसल नष्ट कर दी। शनिराम की चिंता इस बात को लेकर है कि इस बार धान की फसल का क्या हाल होगा? उसी रात हाथियों ने गेरसा औऱ बरतापाली में कई किसानों की फसल बर्बाद कर दी। पड़ोस के आमगांव में भी धान की फसल को हाथियों ने रौंद दिया।
असल में अभी धान की रोपाई भी पूरी नहीं हुई है और खेतों में हाथियों द्वारा नुकसान पहुंचाने का सिलसिला शुरू हो चुका है।
वन विभाग का दावा है कि अकेले धरमजयगढ़ वन मंडल में 27 नर और 68 मादा समेत कुल 139 हाथी हैं। इतनी बड़ी संख्या में हाथियों की मौजूदगी के कारण किसान डरे हुए हैं। हाथी लगातार फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, घरों को ध्वस्त कर रहे हैं और लोगों को भी मार रहे हैं। इसी महीने की 22 जुलाई को धर्मजयगढ़ इलाके में ही हाथियों ने तीन लोगों को मार डाला।
मूलतः खेती के भरोसे अपनी आजीविका चलाने वाले रायगढ़ के किसान जयदीप राठिया का कहना है कि एक बार हाथियों से जान बच भी जाएगी लेकिन हाथी जिस तरह से फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, उससे तो भूखों मरने की नौबत आ सकती है।

राठिया ने मोंगाबे हिंदी से कहा, “छत्तीसगढ़ में सरकार ने जब से 3,100 रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान की ख़रीदी शुरु की है, हम जैसे किसानों को लगने लगा कि अब हमारी ज़िंदगी सुधर जाएगी। लेकिन हाथियों के कारण होने वाले नुकसान से हमारी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। मुश्किल ये है कि इस नुकसान के लिए वन विभाग जो मुआवज़ा देता है, वह हमारे लिए ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। लेकिन कोई भी हमारी नहीं सुन रहा है।”
धान की क़ीमत का गणित
धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में, पिछले कुछ सालों से पूरी राजनीति इसी धान के आसपास घूम रही है। छत्तीसगढ़ की लगभग 80 फीसदी आबादी की आजीविका खेती पर निर्भर है। कहा जाता है कि राज्य में सरकार, धान के खेत से ही उगती है।
केंद्र सरकार ने 2018-19 में समर्थन मूल्य पर धान ख़रीदी की दर 1,550 रुपए प्रति क्विंटल से बढ़ा कर 1,750 रुपए कर प्रति क्विंटल कर दिया था। लेकिन 2018 में होने वाले चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी ने किसानों से 2,500 रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी करने का वादा किया और हालत ये हुई कि अधिकांश किसानों ने चुनाव परिणाम के बाद ही समर्थन मूल्य पर धान बेचने का फ़ैसला किया। इस चुनाव में 90 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस को 68 सीटें मिली थीं। कांग्रेस पार्टी ने पांच सालों तक केंद्र सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य के अलावा अपनी तरफ़ से रकम देते हुए किसानों से 2,500 रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान की खरीदी भी की।
साल 2023 में जब विधानसभा चुनाव होने वाले थे, तब केंद्र सरकार ने धान का समर्थन मूल्य 2,183 रुपए प्रति क्विंटल घोषित किया था। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने पिछले अनुभव को ध्यान में रखते हुए वादा किया कि अगर छत्तीसगढ़ में उसकी सरकार बनती है तो वह किसानों से 3,100 रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान की ख़रीदी करेगी। इस बार किसानों ने भारतीय जनता पार्टी के वादे पर भरोसा किया और पिछले चुनाव में 15 सीटों पर पहुंच चुकी भारतीय जनता पार्टी को 2023 में 54 सीटें मिलीं।

पिछले दो सालों से छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार, प्रति क्विंटल 3,100 रुपए की दर से समर्थन मूल्य पर धान की ख़रीदी कर रही है। हालांकि किसानों से प्रति एकड़ केवल 21 क्विंटल धान ही ख़रीदा जाता है और इसके बदले राज्य सरकार 3,100 रुपए प्रति क्विंटल की दर से 65,100 रुपए का भुगतान करती है।
अब धान की यही बढ़ी हुई क़ीमत, वन्यजीवों से होने वाले फसलों के नुकसान के मामले में किसानों के लिए बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।
पैंसठ हज़ार बनाम नौ हज़ार
असल में पिछले कई सालों से धान को सर्वाधिक नुकसान जंगली हाथी ही पहुंचाते रहे हैं। आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि छत्तीसगढ़ में पिछले पांच सालों में हाथियों द्वारा फसलों के नुकसान पहुंचाने के, हर साल औसतन 14,690 मामले दर्ज़ किए गए हैं। यानी हर दिन हाथियों ने कम से कम 40 जगहों पर फसलों को नुकसान पहुंचाया है। लेकिन इसके बदले किसानों को जो मुआवजा मिलता है, उसे लेकर किसानों के मन में चिंता भी है, दुख भी और आक्रोश भी।
जशपुर ज़िले के पत्थलगांव इलाके के रहने वाले मनोज टोप्पो कहते हैं, “एक एकड़ के धान को अगर हम बेचें तो छत्तीसगढ़ सरकार का खाद्य नागरिक आपूर्ति विभाग हमें 65,100 रुपए का भुगतान करता है लेकिन अगर इसी एक एकड़ में लगी धान की फसल को हाथी नुकसान पहुंचाता है तो छत्तीसगढ़ सरकार का ही वन विभाग अधिकतम केवल 9,000 रुपए प्रति एकड़ का मुआवजा दे कर छुट्टी पा लेता है।”
मनोज का आरोप है कि अगर हाथियों ने 30 फीसदी से कम फसल को नुकसान पहुंचाया है तो आमतौर पर वन विभाग मुआवजा देने से ही इंकार कर देता है।

दिलचस्प ये है कि छत्तीसगढ़ के कुछ पड़ोसी राज्यों में, वन्यजीवों से होने वाले फसलों के नुकसान के लिए जो मुआवजा दिया जाता है, वह छत्तीसगढ़ के मुकाबले कहीं अधिक है। जैसे ओडिशा में अनाज वाली फसलों के नुकसान पर 20,000 रुपए प्रति एकड़ और नकदी फसलों के लिए 25,000 रुपए प्रति एकड़ मुआवजे का प्रावधान है।
जशपुर ज़िले के कुनकुरी इलाके के किसान मनहर भगत चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार मुआवजे के तौर पर कम से कम उतनी रक़म तो ज़रुर दे, जितनी लागत आती है।
उन्होंने मोंगाबे हिंदी से कहा, “एक एकड़ में अगर आप धान लगाएं तो कम से कम 16 से 24 हज़ार तक की लागत आती है। मुनाफ़ा जाने दें, कम से कम सरकार को उतनी रकम तो दे, जितनी किसान अपने खेत में खर्च करता है।”
लेकिन रायगढ़ के युवा किसान देवव्रत साय इससे सहमत नहीं हैं। उनका तर्क है कि जब हाथियों का दल धान के किसी खेत में घुसता है तो फसलों को तो नुकसान होता ही है, नमी वाला पूरा खेत जगह-जगह से इतना धंस जाता है कि उसे हल से फिर से समतल कर पाना मुश्किल होता है। उसके लिए किसान को अतिरिक्त मेहनत लगती है।
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देवव्रत साय कहते हैं, “सरकार फसल का ठीक-ठीक मुआवजा अगर दे भी दे तो खेत को फिर से ठीक करने में जो खर्च आता है, उसका भार तो किसान पर ही आएगा न? अगर सरकार सच में किसानों का भला चाहती है तो उसे खेत को फिर से पुरानी स्थिति में यानी फसल लगाने लायक बनाने की स्थिति में लाने के लिए प्रति एकड़ कम से कम पांच हज़ार रुपये की रकम भी ज़रुर देनी चाहिए।”
देवव्रत का सुझाव है कि छत्तीसगढ़ सरकार हर साल फसल मुआवजे के रुप में दस करोड़ रुपए की रक़म बांटती है, अगर वह चाहे तो वन्यजीवों से फसलों को होने वाले नुकसान के लिए किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा के दायरे में ला सकती है और इससे किसानों को बेहतर मुआवजा भी मिल सकता है।
प्रधानमंत्री फसल बीमा की सीमा
ऐसा नहीं है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में वन्यजीवों से फसलों को होने वाले नुकसान की बीमा का प्रावधान नहीं है। लेकिन इसके अपने पेंच हैं।
लगभग नौ साल पहले 2016 में, जब भारत में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरूआत हुई तो उस बीमा योजना में मुख्य रूप से प्राकृतिक आपदाओं, कीटों और बीमारियों से फसल नुकसान को शामिल किया गया था। लेकिन वन्यजीवों द्वारा नुकसान को इस बीमा योजना में शामिल नहीं किया गया था, क्योंकि इसे “रोका जा सकने योग्य जोखिम” माना गया था।
उसी साल मई 2016 में केंद्रीय वन मंत्रालय ने कृषि मंत्रालय को एक औपचारिक प्रस्ताव भेजा कि वन्यजीवों से होने वाले फसलों के नुकसान को भी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में शामिल किया जाए। इसके बाद 2018 में, कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने संसद में बताया कि जंगली जानवरों द्वारा फसल नुकसान को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत कुछ चुनिंदा जिलों में पायलट आधार पर शामिल किया जा रहा है। यह कदम संसद सदस्यों की मांगों और किसानों के दबाव के कारण उठाया गया था, जो बार-बार इस मुद्दे को उठा रहे थे।

लगभग पांच साल बाद, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में ‘वन्यजीवों द्वारा नुकसान’ को वैकल्पिक अतिरिक्त कवरेज के रूप में शामिल किया गया। लेकिन इस दौरान, राज्यों को यह विकल्प दिया गया कि वे अपने क्षेत्रों में इस कवरेज को अधिसूचित कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए अतिरिक्त प्रीमियम का भुगतान करना पड़ता था, जो राज्य सरकारों की वित्तीय क्षमता पर निर्भर था।
इस साल जनवरी में सरकार ने औपचारिक रूप से घोषणा की कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में अब जानवरों द्वारा फसल नुकसान को भुगतान के आधार के रूप में शामिल किया जा रहा है। लेकिन इसके लिए भी राज्य सरकार को अधिसूचित करना ही होगा।
राज्य सरकार के वन्यजीव बोर्ड की सदस्य और वन्यजीव विशेषज्ञ मीतू गुप्ता कहती हैं, “खनन गतिविधियों, जंगल का क्षरण जैसे कई मुद्दे हैं लेकिन किसानों को पर्याप्त मुआवजा नहीं मिलने से भी, मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं राज्य में लगातार बढ़ रही हैं। पूरे देश के केवल 2 फ़ीसदी हाथी छत्तीसगढ़ में हैं लेकिन छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी संघर्ष देश का 15 फ़ीसदी है। बोर्ड की बैठक में भी मुआवजा बढ़ाने को लेकर कई अवसरों पर बात हुई है।”
हालांकि राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख श्रीनिवास राव का तर्क है कि वन्यजीवों से फसलों को बचाने के लिए जो रकम दी जाती है, वह लागत या खर्च नहीं है, महज मुआवजा भर है। लेकिन वे इस बात से सहमत हैं कि किसानों को और अधिक रकम दी जानी चाहिए।
श्रीनिवास राव ने मोंगाबे हिंदी से कहा, “फसलों के मुआवजे की रकम बेशक बढ़नी ही चाहिए। वन विभाग ने इस संबंध में राज्य सरकार को एक प्रस्ताव भी भेजा है। वह प्रस्ताव विचाराधीन है। हम उम्मीद करते हैं कि जल्दी ही राज्य सरकार इस संबंध में निर्णय लेगी।”
सरकारी फाइलें चलती हैं, लेकिन इतनी धीरे कि किसानों की टूटती उम्मीदें उनसे कहीं आगे निकल जाती हैं। धीरे चलती इन फाइलों की तुलना में हाथियों के कदम की रफ़्तार तेज़ है। हाथी खेत रौंद देते हैं, सरकार आश्वासन बो रही है और मुआवज़ा बढ़ने की उम्मीद में सरकारी दरवाज़ों पर ठिठके किसान, जैसे अभी इस नुकसान को झेलने के लिए अभिशप्त हैं।
बैनर तस्वीरः अभी धान की रोपाई भी पूरी नहीं हुई है और खेतों में हाथियों द्वारा नुकसान पहुंचाने का सिलसिला शुरू हो चुका है। तस्वीर- आलोक प्रकाश पुतुल/मोंगाबे