- भारत के कई हिस्सों में भीषण गर्मी से बचाव के लिए कूल रूफ यानी ठंडी छत जैसी पहल को आगे बढ़ाया जा रहा है। इनमें सोलर रिफ्लेक्टिव व्हाइट पेंट जैसी आधुनिक और खपरैल की छतों जैसी पारंपरिक तकनीकें शामिल हैं।
- लाभुकों का कहना है कि इन तकनीकों के इस्तेमाल के बाद कमरे के अंदर के तापमान में कमी आई है। ऐसी पहलों को आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग, खासकर महिलाओं के लिए अच्छा बताया जा रहा है।
- जानकार इन पहलों को आवास से जुड़ी सरकारी योजनाओं में शामिल करने का सुझाव देते हैं, क्योंकि लू का दुष्प्रभाव निम्न आय वाले परिवारों की कमाई और बच्चों की शिक्षा पर सबसे ज़्यादा पड़ता है।
एक तंग कमरे में गोल पत्थर के ऊपर गाड़े गए बांस के डंडे पर बड़ी-सी कील लगी है। इस कील के आस-पास पिंकी देवी के हाथ तेजी से बाजूबंद बना रहे हैं। पास रखी थाली में कई रंग-बिरंगे बाजूबंद रखे हैं। मलेरिया से पीड़ित पिंकी की बेटी पास में ही सो रही है। सुबह हुई बारिश के बाद जोधपुर की रावटी घोड़ा-घाटी बस्ती का मौसम सुहाना है। पिंकी चाहती हैं कि आज वह ज्यादा से ज्यादा काम पूरा कर लें, ताकि भीषण गर्मी वाले दिनों में कमाई में होने वाले नुकसान की कुछ भरपाई हो सके।
पिंकी देवी पिछले एक साल से बाजूबंद बना रही हैं। वह मोंगाबे हिंदी से कहती हैं, “पैर में चोट लग जाने से पति काम पर नहीं जा पाते। इसलिए, कुल पांच लोगों की गृहस्थी की गाड़ी खींचने की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई है।“
वैसे, पिंकी देवी एक दिन में करीब 100 बाजूबंद बना लेती हैं। लेकिन, पिछले साल लू वाले दिनों में जब उनका कमरा किसी भट्टी की तरह धधक रहा था, तो वह 30 से ज्यादा बाजूबंद भी नहीं बना पाती थीं। दो महीने पहले उन्होंने अपनी छत पर सोलर रिफ्लेक्टिव व्हाइट पेंट (ऐसा पेंट जो कमरे के भीतर सूरज की तपिश को कुछ हद तक कम करता है) करा लिया है। अब पिंकी दोपहर में भी कमरे में बैठकर काम कर सकती हैं और उनके बच्चे सो सकते हैं।

ऐसे काम करता है मॉडल
वैसे, जोधपुर में 217 झुग्गियां हैं जिनमें करीब 20 हजार परिवार रहते हैं। इन्हीं में से एक घोड़ा-घाटी कालोनी के ज्यादातर घर पत्थरों से बने हैं। छतें भी पत्थर, टिन या एसबस्टस की हैं। इसलिए ये जल्दी गर्म हो जाती हैं और देरी से ठंडी होती हैं। गलियां कच्ची हैं और बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है।
इन बस्तियों की ज्यादातर महिलाएं बाजूबंद बनाने के साथ ही रद्दी से सादे कागज अलग करने, शादियों में पूड़ी बेलने और पत्थर खदानों में काम करती हैं। महिला हाउसिंग ट्रस्ट (एमएसटी) सीएसआर फंड की मदद से छत पर सफेद पुताई करने में मदद कर रहा है।
पांच लीटर पेंट की लागत करीब 1800 रुपए तक आती है। अगर 10 बाय 10 फ़ीट का कमरा है, तो उसकी छत पर दो या तीन बार पेंट करने के लिए 10 लीटर रंग चाहिए। इसमें ट्रेनिंग और दूसरे खर्चों के साथ करीब 5000 रुपए की लागत आती है। हालांकि, लाभुकों से 350 रुपए लिए जाते हैं और इसके बदले उन्हें सोलर लाइट, एलईडी बल्ब जैसी टिकाऊ चीजें दी जाती हैं।
एमएचटी के जोधपुर समन्वयक जयेंद्र सिंह चावड़ा मोंगाबे-हिंदी को बताते हैं, “वैसे जोधपुर में पायलट प्रोजेक्ट 2014-15 में शुरू हुआ, लेकिन काम में तेजी कोरोना के बाद आई। इस साल 750 घरों समेत पिछले पांच साल में 2500 घरों में पेंट किया गया है। लाभुकों से बातीचत में पता चला है कि कमरे के अंदर दिन के तापमान में एक से दो डिग्री सेल्सियस तक की कमी आई है।”
इस पहल की सुस्त चाल पर एमएचटी की प्रोग्राम मैनेजर बिंदिया पटेल ने मोंगाबे-हिंदी को बताया, “इस काम के लिए कोई सब्सिडी उपलब्ध नहीं है। इसलिए, हमारे पास जैसे-जैसे फंड उपलब्ध होता है, हम इसे आगे बढ़ाते हैं।”

हालांकि, यह पहल शुरू करने पर नगर निगम ने ब्लू सिटी का स्वरूप बनाए रखने के लिए नीला रंग इस्तेमाल करने पर जोर दिया। चावड़ा बताते हैं, “जब एसआरआई (Solar Reflectance Index) देखा गया, तो नीले रंग का 80 फीसदी से कम था, जबकि सफेद में सूरज की किरणों का 100 फीसदी परावर्तन हो रहा था।”
संजना देवी इसी कॉलोनी के स्वयं सहायता समूह की सचिव हैं। उन्होंने दो साल पहले अपनी छत पर सफेद पेंट कराया था। उन्होंने मोंगाबे हिंदी को बताया, “पहले दिन में कमरे के अंदर बैठना भी मुश्किल था। चारों तरफ पत्थर ही पत्थर हैं जो तेजी से गर्म होते हैं। अब हम बहनें अंदर बैठक कर लेते हैं।”
तीन महीने पहले अपने एक कमरे के घर में पेंट कराने वाली गुड्डी कहती हैं, “पहले दोपहर में कमरा बहुत ज्यादा गर्म हो जाता था। खाना खाने के लिए भी आसपास छायादार जगह खोजनी पड़ती थी। अब कुछ राहत हो गई है।”
संजना के मुताबिक कॉलोनी में हैंडपंप के पानी में आयरन ज्यादा है, इसलिए महिलाओं को पीने का पानी आधा किलोमीटर दूर से लाना पड़ता है।
“पानी भी दोपहर 12 बजे आता है जब सूरज सिर पर होता है। सप्लाई दो या तीन दिन में एक बार होती है। लू वाले दिनों में कामकाजी महिलाओं की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ जाती है,” वह कहती हैं।
इस कॉलोनी में बस या टैंपो की सुविधा भी नहीं है। आठवीं कक्षा के बाद के बच्चों को पैदल या फिर साइकिल से स्कूल आना-जाना पड़ता है। जब बच्चे स्कूल से वापस आते हैं, तब भी गर्मी बहुत होती है।
जोधपुर की झुग्गियों में यह पहल शुरू करने पर एमएचडी की फील्ड समन्वयक अल्का पुरोहित कहती हैं, “लोगों से बातचीत में बुनियादी सुविधाओं की कमी के बारे में पता चला। वहीं, महिलाओं ने गर्मी से होने वाली दिकक्तों की जानकारी दी। तब व्हाइट पेंट का विचार सामने आया।”
ठंडी छत के अलग-अलग तरीके
साल 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में 6.54 करोड़ लोग झुग्गी बस्तियों में रह रहे थे। इन परिवारों की संख्या 1.39 करोड़ थी। झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या 1993 में 56,311 से घटकर 2012 में 33,510 हो गई। लेकिन, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले परिवारों की संख्या 1993 में 59 लाख से बढ़कर 2012 में 88 लाख हो गई।
सर्वे से मिले आंकड़ों से पता चलता है कि ज्यादातर मलिन बस्तियां आवासीय क्षेत्रों से घिरी हुई हैं। इसलिए इन बस्तियों पर अर्बन हीट आइलैंड का दुष्प्रभाव ज्यादा होता है। इस वजह से कई संस्थाएं ठंडी छत यानी कूल रूफ की सुविधा मुहैया कराने के लिए काम कर रही हैं।
इन्हीं में से एक है सस्टेनेबल एनवायरनमेंट एंड इकोलॉजिकल डेवलपमेंट सोसाइटी यानी SEEDS (सीड्स) जो दिल्ली में यह काम कर रही है। संस्था अगले दो सालों में 1450 घरों को बहुत ज्यादा गर्मी से बचाने के उपाय करेगी। इस साल 650 घरों में यह काम किया जाएगा।

कूल रूफ के लिए सीड्स की दिल्ली में दो प्रयोगशालाएं हैं। इसमें समुदायों के साथ मिलकर जूट बैग, बांस की चटाई व हरे कपड़े और लताओं के साथ बांस के फ्रेम जैसी कम लागत वाली और आसानी से उपलब्ध सामग्री का इस्तेमाल करके ठंडी छत के लिए इनोवेशन किए जाते हैं। ये कुदरती तरीके स्वाभाविक रूप से अंदर के तापमान को नियंत्रित कर सकते हैं। इसके अलावा खपरैल जैसी पुरानी तकनीकों का इस्तेमाल भी किया जाता है।
अन्य इनोवेशन में फेंक दिए गए भेड़ के रेशे से बना कपड़े का फ्रेम भी शामिल है। बांस पर फैलाकर बनाया जाने वाला यह महीन छिद्र वाला कपड़ा घर को हावादार बनाता है। समुदाय इनमें से अपनी पसंद का विकल्प चुन सकते हैं।
सीड्स के डायरेक्टर ऑफ बिल्ट एनवायरनमेंट सुमित अग्रवाल कहते हैं, “कूलिंग के महंगे समाधानों (जैसे एयरकंडीशन) पर शुरुआती खर्च ज्यादा आता है। फिर हर साल रख-रखाव पर आने वाली लागत है। दूसरी तरफ, प्राकृतिक उत्पादों से तैयार समाधान कम लागत में बन जाते हैं और अक्सर इस तथ्य को अनदेखा कर दिया जाता है।”
दरअसल, इन समाधानों को सस्ता रखने के पीछे बड़ी वजह यह है कि अगर कोई परिवार इसे अपनाता है, तो शायद उसे देखकर दूसरे परिवार भी आगे आएं और अपने खर्च पर यह काम करें।
वैसे कम आया वाले परिवार छत का इस्तेमाल कपड़े और खाने-पीने की चीजें सुखाने और जरूरी सामान रखने के लिए करते हैं। इसे वे अपने छोटे-से घर का विस्तार समझते हैं। इसलिए, छत को कूलिंग के उद्देश्य से इस्तेमाल करने का फैसला लेने में समय लगता है।
अग्रवाल कहते हैं, “ये पहल उन कमजोर समुदायों के लिए हैं जिनके पास संसाधन बेहद कम हैं। इसलिए, इन समुदायों के लिए ऐसे समाधान सुलभ, किफायती होने चाहिए।”
हालांकि, बिंदिया पटेल दूसरा पहलू सामने रखती हैं। वह कहती हैं, “लोग ऐसी पहलों को तभी स्वीकार करेंगे जब समाधान सस्ते और बाजार में आसानी से उपलब्ध होंगे। ऐसा खास मार्केट भी बनाना होगा जो इन्हें बढ़ावा दे और मरम्मत में आने वाली चुनौतियों को दूर कर सके।”
सस्ती होने के साथ-साथ कूलिंग टेक्नोलॉजी का पर्यावरण हितैषी होना भी जरूरी है। एयरकंडीशन जैसी टेक्नोलॉजी महंगी होने के साथ-साथ बाहर का तापमान भी बढ़ाती है।
पटेल कहती हैं, “प्रकृति आधारित समाधान ही टिकाऊ होगा। हर शहर का अपना अलग-अलग प्रकृति आधारित सोल्यूशन होगा। सभी शहरों में एक जैसे सोल्यूशन काम नहीं करेंगे। इसलिए, स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखना होगा।“
अग्रवाल मानते हैं, “पारंपरिक तकनीकों का पर्यावरण पर दुष्प्रभाव नगण्य है। पर्यावरण को नुकसान से बढ़ती समस्याओं और जलवायु परिवर्तन में इसकी भूमिका को देखते हुए यह फायदा सबसे अहम हो सकता है।“
जलवायु न्याय के लिए जरूरी
सामाजिक और आर्थिक असमानता के बीच अब भारत जैसे देशों में जलवायु असमानता भी बढ़ रही है। क्लाइमेट इनइक्वेलिटी रिपोर्ट, 2023 के मुताबिक देशों के भीतर संपन्न आबादी समूहों के मुकाबले कम आय वाले लोगों को जलवायु के दुष्प्रभावों से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है। जलवायु जोखिमों से निचले तबके के 40% लोगों की आमदनी में होने वाला नुकसान निम्न और मध्यम आय वाले देशों में औसत से 70% ज्यादा होने का अनुमान है, क्योंकि इससे कम आय वाले परिवारों को स्वास्थ्य, खान-पान और दवाइयों पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है।
भारत सरकार भी मानती है कि मौसम और जलवायु की चरम स्थितियां कम आय वाले लोगों, महिलाओं, बच्चों और हाशिए पर पड़े समुदायों सहित कमजोर आबादी को असमान रूप से प्रभावित करती हैं। ऐसे में जानकार जलवायु न्याय को तेजी से आगे बढ़ाने जोर देते हैं।

एनआरडीसी इंडिया की जलवायु और स्वास्थ्य विशेषज्ञ रितिका कपूर ने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “शहरी गरीब और कमजोर समुदाय अत्यधिक गर्मी का सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतते हैं। इसलिए, उन्हें ध्यान में रखकर योजना बनाने ने यह दिखाया है कि कूलिंग तक समान पहुंच सिर्फ स्वास्थ्य हस्तक्षेप नहीं है। यह जलवायु न्याय की प्राथमिकता में शामिल है।“
बिंदिया पटेल इन पहलों को आगे बढ़ाने पर कहती हैं, “मौजूदा बजट में पेसिव कूलिंग तकनीक के बजट का प्रावधान भी करना चाहिए, ताकि कमजोर समूहों को भीषण गर्मी से बचाया जा सके।”
वहीं काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवॉयरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) में प्रोग्राम एसोसिएट हिमांशु दीक्षित का मानना है कि सरकार द्वारा दिए जाने वाले आवास में कई तरीकों से ठंडी छत के लिए प्रावधान किया जा सकता है। सबसे पहले, अगर निर्माण खुद लाभार्थी की ओर से किया जाता है, तो बजट में किए गए मूल परिव्यय में इसे एक आइटम बनाकर वित्तपोषित किया जा सकता है। कूल रूफ के लिए लाभार्थियों को एकमुश्त सहायता दी जा सकती है। अगर निर्माण थर्ड-पार्टी कर रही है, तो कूल रूफ से जुड़े मानदंडों को अनिवार्य किया जा सकता है।
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अग्रवाल कहते हैं, गर्मी का असर कमजोर समुदाय की शिक्षा और उनके आजीविका के विकल्पों पर पड़ता है। इससे उनकी बचत बहुत कम हो जाती है। जब खराब स्वास्थ्य और आराम के स्तर का असर बार-बार उनकी आजीविका पर पड़ता है, तो यह अत्यधिक गरीबी से बाहर निकलने की उनकी कोशिशों को कमजोर कर देता है।“
वैसे भी एशिया के वैश्विक औसत के मुकाबले दोगुनी गति से गर्म होने से दिन के साथ-साथ रात का तापमान भी बढ़ रहा है। इससे खुले में काम करने वाले कामगारों के लिए दिन की गर्मी से उबरकर रात में तरोताजा होना मुश्किल होता जा रहा है। एक हालिया अध्ययन के मुताबिक इस हालात का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों, खुले में काम करने वाले मजदूरों और उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसी बीमारियों से ग्रसित लोगों पर पड़ता है।
बैनर तस्वीरः अपनी छत पर व्हाइट पेंट करतीं पिंकी देवी। तस्वीर सौजन्य – महिला हाउसिंग ट्रस्ट