- बेंगलुरु में पक्षियों की 19 प्रजातियों का विश्लेषण करने वाले एक अध्ययन में पाया गया है कि पक्षियां शहर में हरी-भरी जगहों के साथ-साथ गर्मी को ध्यान में रखकर अपना बसेरा बनाती हैं।
- हरी-भरी जगहें हमेशा पक्षियों की प्रजातियों के लिए फायदेमंद नहीं होती हैं। कुछ प्रजातियां वनस्पति वाले क्षेत्रों को पसंद करती हैं और इसे उनकी जरूरत होती है। अन्य प्रजातियां भोजन की उपलब्धता और शहरी जीवन के अनुकूल होने के कारण शहरी क्षेत्रों में फलती-फूलती हैं।
- नागरिक विज्ञान और उपग्रह डेटा मिलकर शहरी नियोजन के लिए कार्रवाई के योग्य जानकारियां देते हैं और देशी पेड़-पौधे, हरित गलियारे और परिसरों जैसी शहरों की हरी-भरी जगहों को संरक्षण क्षेत्रों के रूप में मान्यता देने पर जोर देते हैं।
पक्षियां शहर में कहां रहती हैं, यह किस बात से तय होता है?
अगर आपका जवाब हरी-भरी जगहें हैं, तो शायद आप सही हैं। लेकिन बेंगलुरु में गर्मी और हीट आइलैंड की मौजूदगी पक्षियों की बसाहट पर असर डालने वाले शायद उससे भी ज्यादा अहम कारक हो सकते हैं।
ईबर्ड (eBird) से प्राप्त नागरिक विज्ञान रिकॉर्ड और उपग्रह डेटा का इस्तेमाल करते हुए भारतीय मानव आवास संस्थान (IIHS) के वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया कि गर्मी और हरित आवरण बेंगलुरु में पक्षियों की 19 प्रजातियों पर किस तरह असर डालते हैं। नतीजे बताते हैं कि ये सभी प्रजातियां शहर के गर्म इलाकों से बचती हैं। अध्ययन यह भी दिखाता है कि कुछ प्रजातियां हरियाली को ज्यादा पसंद करती थी। वहीं अन्य प्रजातियां कंक्रीट के जंगल के अनुकूल ढल रही हैं और उसका फायदा भी उठा रही हैं।
शहर में पक्षियों की मौजूदगी का पता लगाना
शोधकर्ताओं ने बेंगलुरु में वनस्पतियों के आवरण और सतही तापमान को मापने के लिए उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों का इस्तेमाल करके शहर के हरित आवरण और “गर्म” व “ठंडे” क्षेत्रों का व्यापक नक्शा तैयार किया। फिर इसके आधार पर जनवरी 2014 से मार्च 2021 तक सात सालों में 43,000 से ज्यादा ई-बर्ड चेकलिस्ट से प्राप्त 19 पक्षी प्रजातियों की मौजूदगी/गैर-मौजूदगी के आंकड़ों जुटाए गए। इनके आधार पर 2 किमीx2 किमी के ग्रिड बनाए गए। वैसे बेंगलुरु में पक्षियों की अच्छी-खासी 379 प्रजातियां पाई जाती हैं, लेकिन सिर्फ 19 प्रजातियों के लिए ही उम्दा आंकड़े मिले। इसलिए, विश्लेषण के लिए इन्हें चुना गया।
बायेसियन सांख्यिकीय विश्लेषण का इस्तेमाल करते हुए, टीम ने यह पता लगाया कि किस तरह हरियाली और गर्मी ने बेंगलुरु में पक्षी की प्रजातियों की मौजूदगी पर असर डाला। आईआईएचएस में पर्यावरण एवं स्थायित्व स्कूल (एसईएस) के डीन और अध्ययन के लेखक जगदीश कृष्णस्वामी कहते हैं, “पारंपरिक तरीकों के विपरीत, बायेसियन विश्लेषण पहले से मौजूद जानकारी को शामिल करता है और नए डेटा उपलब्ध होने पर अनुमानों को अपडेट करता है।” वह कहते हैं, “यह हमें पर्यावरण से जुड़े चर के आधार पर पक्षियों की मौजूदगी का अनुमान लगाने की सुविधा देता है, जिससे खास आवास को लेकर प्रजातियों की पसंद के बारे में बारीक जानकारी मिलती है।”

गर्मी के असर के नतीजे स्पष्ट थे। पक्षियों की सभी 19 प्रजातियों ने सतह के बढ़ते तापमान के साथ नकारात्मक संबंध दिखाए। शहर के गर्म इलाकों में सभी प्रजाति की पक्षियां कम दिखीं।
IIHS के इस अध्ययन के लेखकों में से एक रवि जम्भेकर कहते हैं, “हम जानते हैं कि अन्य अध्ययनों ने भी उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में इसी तरह के पैटर्न दिखाए हैं।” वह कहते हैं, “लेकिन समशीतोष्ण क्षेत्रों में हीट आइलैंड के असर में बदलाव हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, उत्तरी अमेरिका में कुछ पक्षियां सर्दियों के कम तापमान से बचने के लिए शहर के बीचोंबीच इकट्ठा हो जाती हैं।”
हालांकि, बेंगलुरु में यह स्पष्ट है कि तेजी से हो रहा शहरी विस्तार, हरियाली में कमी और निर्माण वाली जगहें बढ़ने से शहरी परिदृश्य पक्षियों की विविधता के लिए प्रतिकूल होता जा रहा है।
हर जगह एक जैसी हरियाली नहीं
गर्मी के दुष्प्रभाव ने पक्षियों को समान रूप से हतोत्साहित किया, लेकिन हरी-भरी जगहों की भूमिका ज्यादा जटिल थी। काले पंख वाला चील, काला ड्रोंगो, भारतीय नाइटजार और कठखोरा जैसी कुछ प्रजातियां हरे-भरे क्षेत्रों को पसंद करते थे। हालांकि मैना, श्वेत उल्लू, काली चील, एशियाई कोयल और हीरामन या राजहंस तोता जैसी अन्य प्रजातियां कम वनस्पति वाले सघन शहरी क्षेत्रों में ज्यादा संख्या में पाई गई।
यह अंतर खान-पान की आदतों से हो सकता है। श्वेत उल्लू जैसे पक्षी ने शहर में फैले कूड़े के ढेरों में भोजन की तलाश करने वाले चूहों का शिकार करने में महारत हासिल कर ली है। मैना और काली चील आसानी से उपलब्ध मानवजनित भोजन को खोजती हैं।
हरे-भरे इलाकों को पसंद करने वाली प्रजातियों में काले पंखों वाली चील सक्रिय शिकारी है जो शिकार खोजने के लिए हरे-भरे इलाकों पर निर्भर रहता है। इसी तरह फल-भक्षी कठखोरा को जीवित रहने के लिए इन हरे-भरे इलाकों की जरूरत होती है।

पक्षियों के जानकार और नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन के शोधकर्ता अश्विन विश्वनाथन कहते हैं, “ऐसे संबंधों (जैसे हरित आवरण और पक्षियों की मौजूदगी के बीच) का पहले से अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि शहरी पक्षियों और उनकी जरूरतों के बारे में हमारी जानकारी बहुत शुरुआती अवस्था में है।” इस शोध से जुड़े नहीं रहे विश्वनाथन कहते हैं, “काले पंखों वाली चील की ज्यादा मौजूदगी और हरित आवरण के बीच संबंध जैसे नतीजे सतही तौर पर हैरान करने वाले हैं, क्योंकि यह ऐसी प्रजाति है जो ‘खुले’ भू-भागों से जुड़ी है, लेकिन बेंगलुरु जैसे शहर में भी खुली जगहें उन परिसरों और ऐसे ही अन्य क्षेत्रों से गहराई से जुड़ी हैं जहां हरियाली भी है।”
हैरान करने वाली खोज यह रही कि फल खाने वाली प्रजातियां राजहंस तोता और एशियाई कोयल का हरे क्षेत्रों को लेकर उदासीन रवैया दिखा, जबकि इन्हें वनस्पति पर बहुत ज्यादा निर्भर होनी चाहिए।
जम्भेकर कहते हैं, “ऐसा शायद इसलिए है, क्योंकि कई शहरी हरित क्षेत्रों में विदेशी प्रजातियों (पेड़-पौधों) का बोलबाला है जो शायद उपयुक्त संसाधन उपलब्ध नहीं कराते हैं।” वे बताते हैं, “उपग्रह डेटा देशी वनस्पतियों के हरित आवरण के कुछ हिस्से और विदेशी प्रजातियों के बागानों के बीच अंतर नहीं करता।”
कृष्णास्वामी कहते हैं, “उपग्रह आधारित हरित सूचकांक पेड़ों से आच्छादित क्षेत्रों के लिए ज्यादा होने की संभावना है, हालांकि पक्षियों की कुछ प्रजातियों को घास और झाड़ियों वाले ज्यादा खुले आवासों की जरूरत होती है।” यह बारीकी इस धारणा को और जटिल बना देती है कि ज्यादा हरियाली का मतलब जैव-विविधता का बेहतर होना ही है।
इसलिए, अध्ययन में हरित आवरण को पारिस्थितिकी मूल्य के साथ तुलना करने में सावधानी बरतने का आग्रह किया गया है, क्योंकि बेंगलुरु की हरियाली में अक्सर सजावटी ताड़ के पेड़ और पेड़ों की विदेशी प्रजातियां शामिल होती हैं, जो देशी भारतीय पक्षियों के खान-पान और आश्रय में बहुत कम मददगार हैं।
शहरी योजनाकारों के लिए, ये नतीजे व्यावहारिक जानकारी देते हैं। बेंगलुरु को ना सिर्फ अपने मौजूदा हरित क्षेत्रों को संरक्षित करना होगा, बल्कि बिखरे हुए आवासों को हरित गलियारों से जोड़ने के लिए भू-निर्माण परियोजनाओं में देशी पौधों का इस्तेमाल करके उनका विस्तार करने की योजना भी बनानी होगी। सार्वजनिक स्थानों के पूरे डिजाइन में अब इंसान और वन्यजीव दोनों के आराम को ध्यान में रखना होगा। ऐसा गर्मी से बचाव के लिए करना होगा।
विश्वनाथन कहते हैं, “मुझे यह देखकर बहुत खुशी हुई कि जनता द्वारा तैयार किए गए नागरिक विज्ञान के आंकड़ों का इस्तेमाल शहरी नियोजन के पक्षियों पर पड़ने वाले प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने के लिए किया गया है। यह अध्ययन और इसी तरह के अन्य अध्ययन शहरी नियोजन में जैव-विविधता को अधिकतम करने के लिए बहुत उपयोगी हो सकते हैं जिससे जनता को खुशी और रहने की सुखद स्थितियां मिल सकें।”
यह काम नागरिक विज्ञान की ताकत को दिखाता है। ईबर्ड पर शौकिया पक्षी-प्रेमियों से प्राप्त डेटा का इस्तेमाल करके, शोधकर्ता शहरव्यापी जैव-विविधता का नक्शा तैयार कर सकते हैं और वास्तविक दुनिया के प्रभावों वाले मॉडल बना सकते हैं। इससे पता चलता है कि विज्ञान सिर्फ प्रयोगशालाओं में ही नहीं होता, बल्कि इसे घर के अहाते, बालकनी और शहर के पार्कों से भी जन-जन तक पहुंचाया जा सकता है।

संरक्षण के अवसर
इस अध्ययन में वनस्पति के मानचित्रों का विश्लेषण शहर के भीतर उन हरे-भरे क्षेत्रों की पहचान करता है जो दोहरी भूमिका निभा सकते हैं। एक तरफ ये पक्षियों सहित शहरी वन्यजीवों के लिए आवास का काम करते हैं। दूसरी ओर, ये कार्बन सिंक के रूप में काम करके और पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण, भूजल को रिचार्ज करने और गर्मी कम करने जैसी पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाएं प्रदान करके इंसानों को भी फायदा पहुंचाते हैं।
यह तालमेल अलग तरह की संरक्षण रणनीति का रास्ता तैयार करता है। यह अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपाय (ओईसीएम) है। पारंपरिक आरक्षित क्षेत्रों के विपरीत ओईसीएम परिसरों, पार्कों और शहरी खेतों जैसी जगहों की जैव-विविधता को मान्यता देते हैं जहां भूमि के इस्तेमाल का प्राथमिक लक्ष्य संरक्षण नहीं है।
बेंगलुरु में भारतीय विज्ञान संस्थान और गांधी कृषि विज्ञान केंद्र परिसर ओईसीएम के रूप में उभरे हैं। ये स्थान ना सिर्फ पक्षियों की संकटग्रस्त प्रजातियों का आश्रय स्थल हैं, बल्कि गर्मी कम करने में भी मदद करते हैं। इससे शहर में मनुष्यों और वन्यजीवों दोनों के लिए ठंडा वातावरण उपलब्ध होता है। ऐसे क्षेत्रों की पहचान और संरक्षण से शहरी जैव-विविधता और जलवायु लचीलापन दोनों को बढ़ावा मिल सकता है।
लेखक इन ओईसीएम के रखरखाव और संरक्षण के लिए धन जुटाने के मकसद से भारत के उभरते ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम का फायदा उठाने की वकालत करते हैं। ज्यादा ओईसीएम को नामित करना और उन्हें शहरी नियोजन में शामिल करने से योग्य शहरों की दिशा में मजबूत कदम हो सकता है।

आगे का शोध
पक्षियों पर गर्मी और हरित आवरण के प्रभावों का पता लगाने के अलावा, अध्ययन में एक जैसे संसाधनों का उपयोग करने वाली प्रजातियों के जोड़ों के वितरण पैटर्न में अंतर को देखा गया।
उदाहरण के लिए, प्रवासी शिकारी पक्षी कॉमन केस्ट्रल (खेरमुतिया या सामान्य खरमुटिया) बड़े पैमाने पर शहर के ठंडे बाहरी इलाकों तक ही सीमित था, जबकि इसी आकार का शिकारी पक्षी शिकरा शहर के बीचोंबीच बड़ी संख्या में था।
फलभक्षी पक्षियों में सिपाही बुलबुल और सफेद-गाल वाली बारबेट व्यापक रूप से पाई गई। लाल पेट वाली बुलबुल और कठखोरा ज्यादा स्थानीय थे, जो खास शहरी इलाकों में दिखाई देते थे। फूलों का रस चूसने वाले बैंगनी शकरखोरा (पर्पल सनबर्ड) और बैंगनी पूंछ वाला शकरखोरा दोनों ही हरे-भरे इलाकों में थे, जहां रस से भरपूर फूल मिलते हैं।
लेखकों का अनुमान है कि प्रजातियों के जोड़ों के बीच ये अंतर अनुकूलन, मानवीय व्यवधान के प्रति सहनशीलता और इंसानों से पैदा होने वाली खान-पानी की चीजों पर निर्भरता में अंतर के कारण हो सकते हैं। इसके अलावा, ये अंतर प्रतिस्पर्धा, घोंसले बनाने की जरूरत या स्थानीय वनस्पति के प्रकारों के कारण भी हो सकते हैं।
विश्वनाथन कहते हैं, “इस अध्ययन की कमजोरी यह है कि शहर के पक्षी-प्रेमियों द्वारा अपलोड किए गए आंकड़े थोड़े अस्पष्ट हो सकते हैं, क्योंकि इन आंकड़ों की प्रकृति ही ऐसी है कि सभी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व समान रूप से नहीं हो पाता।” यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि अध्ययन में शामिल पक्षियों की 19 प्रजातियों में सबसे आम शहरी पक्षियों में से एक घरेलू कौवे और कबूतर शामिल नहीं हैं।
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जाम्भेकर इस आकलन से सहमत हैं और आगे कहते हैं, “हालांकि कबूतरों पर पर्याप्त डेटा उपलब्ध था, लेकिन शहर में पाए जाने वाली दूसरी प्रजातियों के कबूतरों पर डेटा पूरा नहीं था। इसलिए, हम इन निकट संबंधी प्रजातियों के जोड़ों के डेटा का विश्लेषण और तुलना नहीं कर पाए। लेकिन कौवों के अवलोकनों की संख्या, खास तौर पर बेंगलुरु के कुछ क्षेत्रों में कम है। यह मुंबई और दिल्ली जैसे अन्य शहरों में मेरे द्वारा देखे गए अवलोकनों के विपरीत है।” अगर बेंगलुरु में कौवों का दिखाई देना कम हो रहा है, तो यह शहर में इन पक्षियों की आबादी के साथ बड़ी समस्या का संकेत हो सकता है, जिसने पहले ही अपनी अधिकांश घरेलू गौरैया आबादी खो दी है। हालांकि, जाम्भेकर इसमें एक शर्त जोड़ते हुए कहते हैं, “यह सिर्फ एक अवलोकन है जो मैंने देखा है। इस प्रवृत्ति को साबित करने के लिए अभी तक कोई औपचारिक विश्लेषण नहीं किया गया है।”
विश्वनाथन कहते हैं, “अधूरे आंकड़ों की समस्या का सबसे अच्छा समाधान, खासकर अगर यह जानकारी शहरी नियोजन में सहायक हो, तो यह है कि आगे बढ़ते हुए, शहर के पक्षी-प्रेमी मिलकर बेंगलुरु पक्षी एटलस बनाएं, जिसमें स्थान और समय के अनुसार एक जैसा नमूना संग्रह शामिल हो। दिल्ली में इस तरह का एटलस बनाया जा रहा है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 9 जुलाई, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: बेंगलुरु में विदेशी पेड़ पर भोजन तलाशती बैंगनी-पंख वाला शकरखोरा (सनबर्ड)। तस्वीर: जगदीश कृष्णस्वामी।