- मछली पालन से जुड़ी महिलाओं को न केवल आर्थिक अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा हैं, बल्कि मछली पकड़ने की कम होती जगहें भी उनकी परेशानी बढ़ा रही हैं।
- भारत की ब्लू इकोनॉमी पॉलिसी के मसौदे में महिलाओं के रोजगार को ज्यादा महत्व नहीं दिया गया है।
- विशेषज्ञों का कहना है कि महिला मछुआरों को सशक्त बनाने के लिए, एक ऐसी पॉलिसी बनाना जरूरी है जिसमें सबको शामिल किया जाए। साथ ही, पारंपरिक तटीय गतिविधियों को मजबूत करना और पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा करना महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकते हैं।
शैला डी’मेलो सुबह 4 बजे उठकर पहले अपने परिवार के लिए खाना बनाती हैं और फिर जल्दी-जल्दी अपने सभी काम निपटा कर गोवा के तिस्वाड़ी तालुका के कैकरा गांव में घाट की और निकल पड़ती हैं। सुबह करीब 6.30 बजे, मछली पकड़ने वाली नावें आना शुरू हो जाती हैं और उनमें से एक नाव में उनके पति भी सवार हैं, जो सार्डिन मछली पकड़ने के लिए बीच समुद्र में गए हुए थे। 26 फीट लंबी डोंगी को समुद्र तट पर खींच कर लाने में डी’मेलो और उसके पति को मुश्किलें आ रही थीं, तभी उनकी मदद के लिए कुछ पड़ोसी भी आगे आ गए।
अगले एक घंटे तक, दंपत्ति मछलियों को छांटने के काम में जुटे रहे। अगर मछली ज्यादा पकड़ी जाती हैं, तो वो इन्हें पंजिम बाजार में बेचने के लिए ले जाते हैं। लेकिन आज कम ही मछलियां हैं, सो गांव में ही इनकी खपत हो जाएगी। यहां का काम पूरा होने के बाद, डी’मेलो को अपने रोजमर्रा के काम पर भी निकलना है, वह कैकरा के आसपास की पहाड़ियों पर बने कुछ बड़े घरों में खाना बनाने का काम करती हैं। जब से मछली पकड़ने से होने वाली आय कम होने लगी, डी’मेलो ने घर का खर्च चलाने के लिए दूसरे काम करने शुरू कर दिए। शाम को, वह एक अंशकालिक नगरपालिका कर्मचारी के तौर पर अपने गांव की टेढ़ी-मेढ़ी सड़कों को साफ करने के लिए चल पड़ती हैं।
मछली पकड़ने के नुकसानदायक तरीके
डी’मेलो ऑल गोवा स्मॉल स्केल रिस्पॉन्सिबल फिशर्स यूनियन (AGSSRFU) की अध्यक्ष हैं, जो गोवा में छोटे पैमाने के मछुआरों के अधिकारों और उनकी समस्याओं के लिए काम करने वाला एक संगठन है। यह यूनियन अवैध और मछली पकड़ने के काफी हद तक नुकसानदायक तरीकों, जैसे “बुल ट्रॉलिंग” और “एलईडी फिशिंग” से निपटने की तत्काल आवश्यकता पर जोर देता रहा है। ये तरीके समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
बुल ट्रॉलिंग में दो नावों से एक बड़े मछली पकड़ने वाले जाल को पानी में घसीटा जाता है, जिससे जरूरत से ज्यादा मछली पकड़ी जाती हैं, तो वहीं बहुत सारी दूसरी मछलियां भी पकड़ में आती हैं और समुद्र के तल को भी काफी नुकसान पहुंचता है। वहीं, एलईडी फिशिंग में रात में मछली पकड़ने के लिए तेज रोशनी यानी लाइट-एमिटिंग डायोड (एलईडी) का इस्तेमाल किया जाता है। ये दोनों अवैध, अप्रतिबंधित और अनियमित तरीके (आईयूयू) क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मछली पालन कानूनों का उल्लंघन करते हैं और समुद्री जीवन के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा हैं।
इन सबके अलावा छोटे स्तर के मछुआरे बढ़ते ईंधन खर्च, अपर्याप्त सब्सिडी और नियमों की खामियों से भी जूझ रहे हैं; उनकी मदद की गुहार सरकार तक पहुंचाना अब और भी जरूरी हो गया है।
डी’मेलो का कहना है कि मछली पकड़ने के विनाशकारी तरीकों का असर मछली पालन के काम से जुड़ी महिलाओं पर भी पड़ा है। वह कहती हैं, “हम जैसे छोटे पैमाने के मछुआरों के लिए, मछली पकड़ना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। हमारी आजीविका खतरे में है।” महिलाएं मछली पालन से जुड़े हर तरह के कामों में शामिल होती हैं – मछली छांटने और साफ करने से लेकर बाजार और घर-घर जाकर बेचने तक। डी’मेलो ने आगे बताया कि वह मछली सुखाती भी हैं और मूल्य वर्धित उत्पाद भी बनाती हैं।

मछली पालन में महिलाओं पर 2024 का एक रिसर्च पेपर बताता है कि, चार मिलियन समुद्री मछुआरों में से 47% महिलाएं हैं और 23 मिलियन अंतर्देशीय मछुआरों में से 44% महिलाएं हैं। महिलाएं मुख्य रूप से फिश प्रोसेसिंग और मार्केटिंग का काम करती हैं। समुद्री क्षेत्र में मार्केंटिंग में शामिल 86% महिलाएं हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि महिलाएं मछली पकड़ने के बाद के कामों मसलन उन्हें सुखाने, झींगा की पीलिंग करने, प्रोसेसिंग और मजदूर के रूप में काम करने में प्रमुख भूमिका निभाती हैं।
डी’मेलो जैसे मछुआरिनों को चिंता है कि एक तरफ तो समुद्र में मछली की आबादी घट रही है, जिससे मछली पकड़ना आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं रहा है और दूसरी तरफ, मछली से कमाई बढ़ाने वाली गतिविधियों के लिए खुली जगहें और साझा संसाधन उनकी पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं। वह कहती हैं, “छोटे मछुआरों को मिलने वाली सरकारी सब्सिडी भी या तो कम हो रही है या समय पर नहीं मिल रही है। हमें हमारी पारंपरिक आजीविका से बाहर निकाला जा रहा है।” भारत की ब्लू इकोनॉमी को दिशा देने पर काम कर रहे नीति निर्माताओं से वह एक सवाल पूछती हैं: “क्या वह हमारी आजीविका को सुरक्षित करने और हमें आगे बढ़ने के अवसर प्रदान करने की कोई योजना बना रहे हैं?”
ये अकेले डी’मेलो की नहीं, बल्कि भारत के 7500 किलोमीटर के तटीय क्षेत्र में मछली पकड़ने से जुड़ी गतिविधियों में लगे हर महिला और पुरुष की आवाज भी हैं। नेशनल फिशवर्कर्स फोरम (एनएफएफ) के महासचिव ओलेंसियो सिमोस, जिन्होंने नवंबर 2024 में ब्राजील में आयोजित वर्ल्ड फोरम ऑफ फिशर्स पीपल्स (डब्लूएफएफपी) की 8वीं जनरल असेंबली में भारत का प्रतिनिधित्व किया था, कहते हैं कि भारत के मछुआरा समुदाय का सबसे बड़ा और सबसे पुराना संगठन होने के बावजूद, एनएफएफ को भारत की ब्लू इकोनॉमी पोलिसी की रूपरेखा का मसौदा तैयार करने में परामर्श के लिए आमंत्रित नहीं किया गया। उनके अनुसार, रूपरेखा के तहत बनाई जी रही कई परियोजनाएं मछुआरों के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने मोंगाबे इंडिया से कहा, “खासकर महिलाएं बहुत मुश्किल में हैं और मछली पालन से दूर होती जा रही हैं।”
एनएफएफ से जुड़ी आंध्र प्रदेश पारंपरिक मछली कामगार संघ की अध्यक्ष लक्ष्मी कोव्वदा, मछली पालन से जुड़ी उन महिलाओं की बढ़ती संख्या को लेकर चिंतित हैं जिन्हें घरेलू सहायिका के रूप में काम ढूंढने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। वह कहती हैं, “मछुआरा होना मुश्किल है. लेकिन मछुआरिनों की स्थिति तो और भी बदतर है।”
भारत की आगे बढ़ती ब्लू इकोनॉमी
भारत का समुद्री अमृत काल विजन 2047 एक प्रमुख पहल है जिसका उद्देश्य आर्थिक विकास के लिए समुद्री संसाधनों का जिम्मेदार तरीके से उपयोग करना है, साथ ही समुद्री पर्यावरण की रक्षा सुनिश्चित करना है। इसका लक्ष्य 2047 तक सागरमाला एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन और डीप ओशन मिशन जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से बंदरगाहों का आधुनिकीकरण करना, शिपिंग ढांचे में सुधार करना और अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देना है।

संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों में से लक्ष्य 14 विशेष रूप से महासागरों, समुद्रों और समुद्री संसाधनों के संरक्षण और टिकाऊ उपयोग से संबंधित है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि ब्लू इकोनॉमी को “आर्थिक विकास, सामाजिक समावेशन के साथ-साथ आजीविका के संरक्षण या सुधार को भी बढ़ावा चाहिए, साथ ही महासागरों और तटीय क्षेत्रों की पर्यावरणीय स्थिरता भी सुनिश्चित करनी चाहिए।”
अपनी ब्लू इकोनॉमी की क्षमता को पहचानते हुए, भारत उन कुछ देशों में से एक है जिसने ब्लू इकोनॉमी नीति ढांचे का मसौदा प्रकाशित किया है। भारत सरकार ने 2030 तक तटीय क्षेत्रों के माध्यम से $1 से $3 ट्रिलियन तक की संभावित आय का अनुमान लगाया है। इसके अतिरिक्त, यह क्षेत्र, जो चार मिलियन से अधिक तटीय लोगों को रोजगार देता है, लाखों नौकरियां पैदा करने की क्षमता रखता है। भारत का ब्लू इकोनॉमी पॉलिसी फ्रेमवर्क- मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 (एमआईवी 2030) और अमृत काल विजन 2047 – सभी ब्लू इकोनॉमी क्षेत्रों में भारत के समुद्री दृष्टिकोण को समावेशी रूप से साकार करने के प्रयासों रेखांकित करती हैं। एमआईवी 2030 में भारत को वैश्विक समुद्री नेतृत्व की ओर ले जाने के उद्देश्य से 150 पहल की रूपरेखा दी गई है।
हालांकि मसौदा नीति का अध्ययन करने वाले मछली पालन समूह और शोधकर्ता ब्लू इकोनॉमी ढांचे में महिलाओं के रोजगार की सीमित प्राथमिकता को उजागर कर रहे हैं। छोटे पैमाने की मछली पालन में महिलाओं की भूमिका और स्थिति पर एफएओ (खाद्य और कृषि संगठन) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाएं पारंपरिक रूप से लंबे समय से स्थापित तटीय क्षेत्रों का हिस्सा रही हैं, लेकिन उनकी भागीदारी अनौपचारिक, अप्रत्यक्ष और कम आकर्षक ब्लू इकोनॉमी गतिविधियों तक ही सीमित है। महिलाएं की इस भूमिका के लिए सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक, तकनीकी और मनोवैज्ञानिक कारक जिम्मेदार हैं, जो समुद्री अर्थव्यवस्था में उनकी भागीदारी के लिए बाधाओं के रूप में उभरे हैं। जैसे-जैसे जलवायु संवेदनशीलता बढ़ रही है और अवसर व स्थान कम होते जा रहे हैं, महिलाओं को मछली पकड़ने से इतर वाली अन्य नौकरियों में पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इन मुद्दों को एक प्रणालीगत स्तर पर संबोधित न करने से टिकाऊ आजीविका बनाने और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत शामिल परिवर्तनकारी समानता को प्राप्त करने के ब्लू इकोनॉमी के लक्ष्य पर असर पड़ सकता है।
भारत की ब्लू इकोनॉमी की तटीय गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी और रोजगार के लिए प्रमुख बाधाओं पर 2024 के एक पेपर में, शोधकर्ताओं ने भारत की तटीय गतिविधियों में महिलाओं के बाहर निकलने या शामिल होने के स्तर की समीक्षा की। उन्होंने महिलाओं की भागीदारी और रोजगार में आने वाली प्रणालीगत बाधाओं और सहायक कारके का भी पता लगाया।
मुख्य शोधकर्ता मातोवु बेकर कहते हैं कि रिसर्च तटीय गतिविधियों में महिलाओं के सशक्तिकरण के रास्ते तलाशने के सवाल से संबंधित था। उन्होंने बताया, “भारत का अपनी ब्लू इकोनॉमी को विकसित करने पर ध्यान और भारत सरकार का तटीय बुनियादी ढांचे में निवेश, तटीय इलाकों से जुड़ी महिलाओं को सशक्त बनाने का एक शानदार अवसर देता है, जो ऐतिहासिक रूप से कम लाभदायक आर्थिक गतिविधियों में शामिल रही हैं। हमारे शोध में ‘सिस्टम थिंकिंग’ का इस्तेमाल किया गया है, जिससे उन कई कारणों को समझा जा सकेगा जो महिलाओं को सशक्त बनाने में मदद कर सकते हैं।”
तटीय इलाके में रहने वाली महिलाओं को हाशिए पर रखा जाता है, नेतृत्व और निर्णय लेने की भूमिकाओं में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है। वे जलवायु परिवर्तन के कारण पर्यावरणीय जोखिमों के प्रति भी संवेदनशील हैं। उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में तटीय धान की खेती और तमिलनाडु में समुद्री शैवाल की खेती में लगी महिलाओं को प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और भूमि के नुकसान से चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन के मैरीटाइम थिंक-टैंक में ब्लू इकोनॉमी और क्लाइमेट चेंज समूह की प्रमुख चिमे यूडॉन कहती हैं कि तटीय क्षेत्रों की महिलाओं के योगदान को बढ़ाने के लिए, विशेष रूप से संरक्षण से संबंधित गतिविधियों में, सबको मिलकर काम करने और बराबर की हिस्सेदारी रखने का तरीका अपनाना बहुत जरूरी है।
यूडॉन ने बताया, “तटीय क्षेत्रों में महिलाओं की आजीविका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सीधे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर करता है। पारंपरिक जल संसाधनों के संरक्षक के रूप में, वे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पारिस्थितिक ज्ञान के मामले में, महिलाएं इन पारिस्थितिकी प्रणालियों की प्राथमिक संरक्षक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और इनका संरक्षण सुनिश्चित करती हैं। उनका काम न केवल स्थानीय समुदायों को बनाए रखता है बल्कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में भी ठोस योगदान देता है।”
लेकिन, इन समुद्री इलाकों को जलवायु परिवर्तन से खतरा बढ़ रहा है, जिससे उन महिलाओं की आजीविका को सीधा खतरा है जो इन पर निर्भर हैं। यूडॉन समझाती हैं कि पर्यावरण की चुनौतियों के साथ-साथ, तटीय इलाकों की महिलाओं को अक्सर पैसे और सरकारी मदद पाने में मुश्किल होती है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और भी कमजोर हो जाती है।
यूडन इस बात पर जोर देती हैं कि तटीय महिलाएं ब्लू इकोनॉमी और संरक्षण प्रयासों में प्रमुख हितधारक हैं। “स्थायी और समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए उनकी आवाज और दृष्टिकोण को स्वीकार किया जाना चाहिए, महत्व दिया जाना चाहिए और उन्हें नीतियों में शामिल किया जाना चाहिए।”
तटीय इलाकों में रहने वाली महिलाओं का काम
भारत की ब्लू इकोनॉमी ढांचे के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी पर चर्चा करते हुए, 2024 के अध्ययन में कहा गया है कि समुद्री मछली पकड़ने में शामिल महिलाएं कुल श्रम बल का केवल 19% हिस्सा हैं, लेकिन अंतर्देशीय मछली पकड़ने की गतिविधियों का प्रबंधन करने वाले कार्यबल में महिलाएं की हिस्सेदारी 81% हैं। महिलाओं की कम भागीदारी तब स्पष्ट हो जाती है जब हम समुद्री बनाम अंतर्देशीय मछली पकड़ने में लगे मछुआरों के अनुपात को देखते हैं, मत्स्य विभाग, भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, कुल मछुआरों में से केवल 18% मछुआरे अंतर्देशीय मत्स्य पालन से जुड़े हैं जबकि समुद्र में मत्स्य पालन से 82% मछुआरे जुड़े हैं)।
पर्यटन क्षेत्र में, महिलाओं का रोजगार 12% के खराब स्तर पर है। यूडॉन संरक्षण से संबंधित तटीय पर्यटन व्यवसायों में महिलाओं के लिए अवसर देखती हैं। वह सिंधुदुर्ग की एक महिला स्वयं सहायता समूह द्वारा चलाए जा रहे मैंग्रोव सफारी का उदाहरण देती हैं, जिसने पर्यटकों को नाव की सवारी कराने का एक लाभकारी बिजनेस बनाया है, जो उनके लिए मजेदार भी है और उससे सीखने को भी मिलता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि समुद्री परिवहन क्षेत्र में, सागरमाला परियोजना की शुरुआत के साथ निवेश तो बढ़ा है, लेकिन बंदरगाह सुविधाओं, समुद्री परिवहन और शिपिंग क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी तुलनात्मक रूप से कम है। समुद्री परिवहन और शिपिंग में कुल कार्यबल का लगभग 20 प्रतिशत महिलाएं हैं। हालांकि, वे अन्य अधिक लाभदायक क्षेत्रों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है, 2019 में, भारत में 234,886 नाविकों में से, केवल 985 महिलाएं थीं (मातोवु और उनके सहयोगी; भारत सरकार पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय)। यह महिलाओं को सौंपी गई “पारंपरिक रूप से सुरक्षित भूमिकाओं” वाली धारणाओं में सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक दोनों तरह के बदलाव की मांग करता है।
कुल मिलाकर, भले ही महिलाओं को कौशल, क्षमता और तकनीक तक पहुंच की कमी से सीमित किया गया है, मसौदा ब्लू इकोनॉमी ढांचा महिलाओं के लिए समावेशी विकास और रोजगार को बढ़ावा देने का एक अवसर प्रदान करता है। लेकिन अवसर में अंतर काफी ज्यादा है, उदाहरण के लिए, तटीय राज्यों में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) काफी कम है, पश्चिम बंगाल में 22.8%, ओडिशा में 26.4% और कर्नाटक में 28.2% (सभी ग्रामीण आंकड़े) सबसे कम में से हैं और ग्रामीण आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु 39.8% और 39.4% LFPR के साथ सबसे आगे हैं। अब नीति निर्माताओं के सामने चुनौती तटीय महिलाओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने और इन आंकड़ों में सुधार करने की है।
नीति ढांचे में सबको शामिल करना, ऐतिहासिक और लंबे समय से चली आ रही तटीय गतिविधियों को मजबूत करना, जिनका पारंपरिक रूप से महिलाएं हिस्सा रही हैं, और “गैर-पारंपरिक” पुरुष वर्चस्व वाली नौकरियों महिलाओं के लिए अवसर पैदा करना आवश्यक है। फंडिंग और क्षमता तक पहुंच महिलाओं के लिए छोटे, कमजोर और कम लाभदायक अनौपचारिक व्यवसायों से नए क्षेत्रों में जाने के लिए रास्ता बना सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए इस मुद्दे को सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत दृष्टिकोण से देखना होगा। प्रतिनिधित्व में सुधार, धारणाओं को चुनौती देना और लैंगिक तटस्थता लाने के लिए संचार के तरीकों को बदलना, सांस्कृतिक रूप से समावेशी नीतियों को तैयार करनाहोगा, इससे महिलाएं सशक्त होंगी और समाज व अर्थव्यवस्था दोनों को बढ़ावा मिलेगा।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 3 फरवरी 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: गोवा के तिस्वाड़ी तालुका के कैकरा गांव की कई मछुआरिनों में से एक शैला डी’मेलो का कहना है कि मछली पकड़ने के नुकसानदायक तरीकों ने उन्हें काफी प्रभावित किया है। वह ऑल गोवा स्मॉल स्केल रिस्पॉन्सिबल फिशर्स यूनियन (AGSSRFU) की अध्यक्ष हैं, जो राज्य में छोटे पैमाने के मछुआरों के अधिकारों के लिए लड़ने वाला एक संगठन है। तस्वीर-प्रियंवदा कौशिक