- एक नए अध्ययन से पता चला है कि गुजरात के बन्नी घास के मैदानों में 27 मिलियन टन कार्बन जमा है।
- घास के मैदानों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में शायद ही कभी मददगार माना जाता है, जबकि मिट्टी कार्बन सोखने में अहम भूमिका निभाती है।
- अध्ययन के नतीजों में मिट्टी को संरक्षित करने तथा उन हिस्सों को फिर से संवारने पर जोर दिया गया है जहां बड़े पैमाने पर आक्रामक पौधा विलायती बबूल (प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा) फैला हुआ है।
गुजरात में बन्नी घास का मैदान अपनी विविध वनस्पतियों और जीवों के लिए लंबे समय से वैज्ञानिकों को आकर्षित करता रहा है। यहां घास की ऐसी प्रजातियां भी हैं जो आमतौर पर कहीं और नहीं देखी जाती। 2,300 वर्ग किलोमीटर में फैला यह एशिया का सबसे बड़ा उष्णकटिबंधीय घास का मैदान है। यही नहीं भारत में सबसे अनोखी लवण वाली घास के मैदान-आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक है। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि इस विशाल विस्तार के नीचे मृदा ऑर्गेनिक कार्बन (सॉइल ऑर्गेनिक कार्बन\SOC) का भंडार है, जो इस पारिस्थितिकी तंत्र की अहमियत को और भी बढ़ा देता है।
ज्यादातर शुष्क, अर्ध-शुष्क या मौसमी रूप से जलमग्न सवाना के विपरीत, बन्नी घास के मैदान स्वाभाविक रूप से लवणीय मिट्टी से विकसित हुए हैं। अध्ययन के सह-लेखक और वन्यजीव संरक्षण ट्रस्ट के वन्यजीव पारिस्थितिकीविद् चेतन मिशर ने कहा, “बन्नी घास के मैदान के भूमि अपेक्षाकृत नई हैं और मिट्टी सदियों से नदियों की रेत के जमा होने से बनी है।” मिट्टी की बनावट महीन है, जो कुछ हिस्सों में गाद और चिकनी मिट्टी जैसी दिखती है, जिससे यह बहुत घनी हो जाती है। उन्होंने आगे कहा, “गाद सघन है और लंबे समय तक अप्रभावित रही है।”
बन्नी घास के मैदानों में मिट्टी की प्रकृति इसे कार्बन भंडारण के लिए आदर्श बनाती है। अध्ययन के अनुसार, इसमें 27.69 मिलियन टन कार्बन भंडार पाया गया। वैसे, भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार, पूरे गुजरात में 67 मिलियन टन मृदा ऑर्गेनिक कार्बन भंडार बताया गया है।
राष्ट्रीय जैविक विज्ञान केंद्र में वन्यजीव जीव विज्ञान और संरक्षण कार्यक्रम की निदेशक जयश्री रत्नम ने कहा, “इस तरह के अनुसंधान से भूमिगत कार्बन भंडार और संवारने (ऐसी जगहों को) की अहमियत को समझा जा सकता है, क्योंकि लंबी अवधि में और टिकाऊ कार्बन भंडार के लिए सिर्फ वृक्षारोपण को ही पारिस्थितिकी रूप से बेहतर साधन माना जाता है जो पर्यावरण सम्बंधी आवरणों के हिसाब से होते हैं, जिसमें वे पाए जाते हैं।”
संवारी गई जगहों में ऑर्गेनिक कार्बन की ज्यादा मात्रा
आमतौर पर, कार्बन भंडारण बढ़ाने के उद्देश्य से बनाई गई घरेलू नीतियों का केंद्रबिंदु पेड़ और जंगल रहे हैं। घास के मैदानों को जलवायु परिवर्तन में मददगार के रूप में शायद ही कभी देखा जाता है, जबकि मिट्टी में देश का 55% कार्बन भंडार है। इस अध्ययन में शामिल नहीं रहे रत्नम ने कहा, “भारत में घास के मैदानों के संरक्षण की बड़ी चुनौती उस विरासत से उपजी है जहां इन खुली प्रणालियों को ‘कम उत्पादक’ माना जाता रहा है। इसलिए ऐतिहासिक रूप से इन्हें कृषि व उद्योग और हाल ही में नवीन ऊर्जा जैसे भूमि के अन्य इस्तेमाल में लगाने का लक्ष्य रखा गया है।”

शोधकर्ताओं ने बन्नी घास के मैदानों में कार्बन स्टॉक का अध्ययन करने की कोशिश की, क्योंकि अध्ययन में कहा गया है कि “यहां तक कि वैश्विक या क्षेत्रीय मेटा-विश्लेषणों ने बन्नी के डेटा को बाहर रखा है, जिससे यह उष्णकटिबंधीय घास के मैदानों में एसओसी स्टॉक के अध्ययन में अपवाद बन गया है।”
अध्ययन ने मौजूदा भंडार का अनुमान लगाने के अलावा अलग-अलग प्रकार के भूमि उपयोगों में भंडार का भी नक्शा तैयार किया। भूखंडों के तीन बार 2014, 2017 और 2023 में नमूने लिए गए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि समय के साथ पुनर्स्थापन और क्षरण ने मृदा ऑर्गेनिक कार्बन भंडारण को किस तरह प्रभावित किया। खराब हुई जगहों को उन स्थलों के रूप में माना गया जहां विलायती बबूल व्यापक रूप से फैला हुआ था। इनमें विलायती बबूल वाली घनी वनभूमि और मिली-जुली वनस्पति वाली जगहें शामिल थी।
विलायती बबूल आक्रामक पौधा है जिसे 1960 के दशक में मिट्टी की लवणता कम करने और हरित आवरण को बेहतर बनाने के लिए लाया गया था। लेकिन, तब से यह बन्नी घास के मैदानों के लगभग आधे हिस्से में फैल चुका है। संवारी गई जगहों को स्थानीय रूप से वाडा कहा जाता है और यहां समुदायों या व्यक्तियों द्वारा विलायती बबूल को हटाया गया था। इन जगहों को भी तुलनात्मक रूप से अध्ययन में शामिल किया गया। साथ ही, लवणीय झाड़ीदार भूमि और आर्द्रभूमि को भी शामिल किया गया।
अध्ययन में पाया गया कि वाडा में कार्बन डाइऑक्साइड घनत्व सबसे ज्यादा था, जो लगभग 143 टन प्रति हेक्टेयर था। इससे संवारे गए घास के मैदानों में कार्बन को असरदार ढंग से संग्रहित करने की क्षमता का पता चलता है।” वाडा के बाद आर्द्रभूमि (लगभग 138.59 टन प्रति हेक्टेयर कार्बन संग्रहित) और लवणीय झाड़ीदार भूमि (लगभग 125.75 टन प्रति हेक्टेयर) का स्थान था। इसके विपरीत, विलायती बबूल और मिली-जुली वनस्पति वाले क्षेत्रों में सबसे कम भंडारण घनत्व (105.56 टन प्रति हेक्टेयर) देखा गया।
चूंकि, लवणीय वनस्पति वाले क्षेत्र भूमि उपयोग के सबसे बड़े प्रकार हैं और ये 1,27,521 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हैं। इसलिए उन्होंने बन्नी घास के मैदानों में कुल एसओसी स्टॉक में सबसे ज्यादा योगदान दिया और 16.03 मिलियन टन कार्बन का भंडारण किया।
इस मिट्टी में कार्बन भंडारण ज्यादा
भूमि की बनावट में बदलाव भविष्य में बन्नी की कार्बन भंडारण क्षमता को बदल सकते हैं। हालांकि, बन्नी घास के मैदानों को कानूनन आरक्षित वन के रूप में संरक्षित किया गया है, लेकिन जलवायु परिवर्तन, बढ़ती लवणता और आक्रामक प्रजातियों के अतिक्रमण से क्षरण में तेजी आ सकती है।

वर्ष 2014 से 2023 तक नौ साल की अध्ययन अवधि में लवणीय झाड़ीदार भूमि लगभग 10,000 हेक्टेयर तक सिकुड़ गई। इसकी वजह शायद आर्द्रभूमि पर मौसम का प्रभाव और विलायती बबूल का अतिक्रमण है। इसी अवधि में विलायती बबूल के क्षेत्र में लगभग 2,000 हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई। मिशर ने बताया, “विलायती बबूल अपने नीचे घासों को उगने से रोकता है और इसलिए यह मिट्टी की कार्बन सोखने करने की क्षमता को भी प्रभावित करता है।” उन्होंने आगे कहा, “मिट्टी पर पड़ने वाले दुष्प्रभावो को रोकना यह पक्का करने का अहम तरीका है कि कार्बन मिट्टी में जमा रहे।”
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जहां पेड़ और अन्य वनस्पतियां अपने बायोमास में कार्बन जमा करते हैं, वहीं घास के मैदानों में मिट्टी में ऐसा होता है और सूखाग्रस्त क्षेत्रों में ऐसा ज्यादा असरदार ढंग से हो सकता है। अध्ययन में कहा गया है कि अन्य प्रकार की भूमि की तुलना में बन्नी के वाडी में कार्बन का सबसे ज्यादा अनुपात संग्रहित है, जो दिखाता है कि “उष्णकटिबंधीय घास के मैदानों में ज्यादा पेड़ लगाने से मिट्टी में ज्यादा कार्बन का जमाव नहीं होता है।”
एटीआरईई में पूर्व रेजीडेंस फेलो और इस शोध पत्र के सह-लेखक मनन भान ने कहा कि यह घास के मैदानों को संवारने की जरूरत पर भी प्रकाश डालता है। उन्होंने कहा, “शुरुआत में, विरल वनस्पति वाले विलायती बबूल को हटाने पर ध्यान केंद्रित करने से सामान्य से मध्यम अवधि में मिट्टी में कार्बन ज्यादा जमा होने में मदद मिल सकती है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 8 अगस्त, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: बन्नी घास के मैदानों के करीब आधे हिस्से में विलायती बबूल है जिससे मिट्टी के कार्बन पर असर पड़ता है। तस्वीर: मनन भान।