- भारत में जनवरी के आखिर से गुलियन-बैरी सिंड्रोम के बढ़ते मामले देखे जा रहे हैं।
- संदिग्ध कैम्पिलोबैक्टर नामक बैक्टीरिया मुश्किल वातावरण में जीवित रहने के लिए जाना जाता है।
- पहले के अध्ययनों से पता चलता है कि दुनिया भर में मौसम बदलने की वजह से खाने से जुड़ी बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं।
फरवरी के मध्य में, भारत के कुछ हिस्सों में गुलियन-बैरी सिंड्रोम के मामले फिर से बढ़ने लगे हैं। ये एक ऐसी बीमारी है जिसमें नसों में दर्द होता है और लकवा भी मार सकता है। साथ ही सांस लेने और निगलने में भी दिक्कत होती है। ये बीमारी पहले जनवरी के आखिर में महाराष्ट्र में फैली थी और फिर फरवरी में आंध्र प्रदेश में भी इसके कई मामले सामने आए। माना जा रहा है कि ये पेट में होने वाले संक्रमण के कारण होता है।
खबरों के मुताबिक, पश्चिमी भारत के एक राज्य (महाराष्ट्र) में 19 फरवरी तक गुलियन-बैरी सिंड्रोम के 211 से अधिक मामले सामने आए हैं और 11 लोगों की मौत हो गई। इसके अलावा, मीडिया ने दक्षिण भारत के राज्य आंध्र प्रदेश में फरवरी के मध्य से अब तक 17 मामले सामने आने और दो लोगों की मौत की रिपोर्ट की है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का कहना है कि गुलियन-बैरी सिंड्रोम (GBS) का सही कारण तो पता नहीं है, लेकिन ज्यादातर मामले वायरस या बैक्टीरिया के संक्रमण के बाद होते हैं। इसका एक आम कारण कैम्पिलोबैक्टर जेजुनी बैक्टीरिया का संक्रमण है, जिससे पेट में इन्फेक्शन (गैस्ट्रोएन्टराइटिस) होता है। इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाती है और शरीर की बाहरी नसों पर हमला करती है।
वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में माइक्रोबायोलॉजी की प्रोफेसर सियारा राव अज्जमपूर का कहना है कि इस बार भी बीमारी के फैलने के लिए कैम्पिलोबैक्टर जेजुनी को ही सबसे संभावित कारणों में से एक माना जा रहा है।
जलवायु और फूड बग
बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस में जेनेटिक्स के प्रोफेसर मनोजित देबनाथ, जो तंत्रिका संबंधी विकारों, खासकर गुलियन-बैरी सिंड्रोम (जीबीएस) पर अध्ययन कर रहे हैं, के अनुसार, जीबीएस के मामलों में मौसमी वृद्धि देखी गई है। खासतौर पर सर्दियों के दौरान मामलों की संख्या बढ़ जाती है।
गुलियन-बैरी सिंड्रोम संक्रमण के बाद प्रतिरक्षा प्रणाली में होने वाली एक गड़बड़ी है। सर्दियों में इसके मामलों का बढ़ना शायद श्वसन तंत्र के संक्रमण और फ्लू के मामलों से जुड़ा है, जो सर्दियों में बढ़ जाते हैं। देबनाथ 2013 से 2016 तक फ्रेंच पॉलीनेशिया और लैटिन अमेरिका में ज़ीका वायरस महामारी की वजह से और हाल ही में 2019 में पेरू में, सी. जेजुनी की वजह से फैली इस बीमारी का उदाहरण देते हैं।

दुनिया भर के वैज्ञानिक इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या ग्लोबल वार्मिंग के कारण होने वाले पर्यावरणीय बदलाव, खासतौर पर अत्यधिक तापमान और बाढ़, खाद्य जनित सूक्ष्मजीवों, जैसे कैंपिलोबैक्टर एसपी, साल्मोनेला और एस्चेरिचिया कोलाई के प्रसार को बढ़ा सकते हैं।
अज्जमपुर कहती हैं कि भारत से प्राप्त आंकड़ों ने जलवायु परिवर्तन और मौजूदा समय में जीबीएस के प्रसार के लिए जिम्मेदार बैक्टीरिया ‘कैम्पिलोबैक्टर’ और बढ़ते वैश्विक तापमान के साथ इसके संबंध पर व्यापक मेटा-विश्लेषण में योगदान दिया है। वह बताती हैं, “यह कई कारणों से होता है, जिसमें बैक्टीरिया के जीवित रहने के तरीके और जल व भोजन की कमी सहित तापमान में वृद्धि के कारण इंसानों के व्यवहार में बदलाव शामिल है।”
उनके मुताबिक, कैंपिलोबैक्टर बैक्टीरिया का ज्यादातर लैब में संवर्द्धन मुश्किल होता है, यही वजह है कि उनके बारे में कम जानकारी मिलती है। लेकिन कैंपिलोबैक्टर की अधिकांश प्रजातियां मुश्किल वातावरण में जीवित रहने के लिए कई तरीके अपनाती हैं, खासकर पानी में। इनमें जैव रासायनिक मार्गों को सक्रिय करना और ‘बायोफिल्म्स’ बनाना शामिल है, जिनमें कैंपिलोबैक्टर प्रजातियां अन्य बैक्टीरिया और सूक्ष्मजीवों के साथ मिलकर एक सुरक्षात्मक आवरण बना लेती हैं, जो उन्हें मुश्किल परिस्थितियों में टिके रहने में मदद करता है। अज्जमपूर का कहना है, “आंकड़ों से पता चलता है कि वे ठंडे तापमान में विशेष रूप से कुएं के पानी में लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं।”
दिसंबर 2024 में “वन हेल्थ” नामक पत्रिका में जलवायु परिवर्तन और खाने से होने वाली बीमारियों पर प्रकाशित एक रिपोर्ट, जिसमें कैंपिलोबैक्टर प्रजाति भी शामिल है, इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि “अधिकांश उपलब्ध अध्ययन दुनिया भर में, जलवायु परिवर्तन की वजह से खाने से होने वाली बीमारियों के मामले बढ़ने की बात कह रहे हैं। और ऐसा अलग-अलग बैक्टीरिया और मौसम के हिसाब से बीमारियां फैलने के बदलते पैटर्न के कारण है।
रिपोर्ट में कहा गया है, “जलवायु परिवर्तन के लगातार हो रहे प्रभावों ने दुनिया भर की आबादी के लिए दो बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं: खाने से फैलने वाले रोगजनकों का प्रसार और एंटीमाइक्रोबियल रजिस्टेंस (एएमआर) का बढ़ना, जो खाद्य श्रृंखला के जरिए होता है।” यह रिपोर्ट हाल ही में उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी का इस्तेमाल करके की गई समीक्षा पर आधारित थी, जिसमें इस बात की जांच की गई थी कि जलवायु से जुड़े कारक जैसे कि बारिश, बाढ़, तूफान, चक्रवात, धूल, तापमान और आर्द्रता, खाद्य जनित रोगजनकों, जैसे साल्मोनेला, ई. कोलाई, कैंपिलोबैक्टर, विब्रियो, लिस्टेरिया और स्टैफिलोकोकस ऑरियस के प्रसार को कैसे प्रभावित करते हैं।
लेखकों ने पर्यावरणीय बदलावों और खाद्य जनित बीमारियों के बढ़ते खतरे के बीच जटिल संबंधों का भी अध्ययन किया। उन्होंने वन्यजीवों, कीड़ों और दूषित वातावरण द्वारा एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के प्रसार और जलवायु परिवर्तन में योगदान का विश्लेषण किया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कैंपिलोबैक्टर से होने वाले कुल मानव संक्रमणों में से लगभग 30% चिकन खाने से होते हैं, 20–30% बीफ से और एक छोटा प्रतिशत संक्रमण अन्य स्रोतों, जैसे जंगली जानवरों से होता है। हालांकि मुर्गियों के बेड़े में कैंपिलोबैक्टर का स्तर तापमान और नमी के साथ बदलता रहता है, लेकिन मानव संक्रमण के मामले तापमान और वर्षा में उतार-चढ़ाव से जुड़े होते हैं, खासकर जब अधिक बारिश होती है।

रिपोर्ट में, कनाडा के ओंटारियो में हुई एक स्टडी का हवाला दिया गया, जिसमें “जलवायु और बैक्टीरिया की मौजूदगी के बीच सीधा संबंध” दिखाया गया था। 2024 में आई “द लांसेट डिस्कवरी” सीरीज की एक दूसरी रिपोर्ट कहती है कि “हर 1 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने पर, नॉन-टाइफाइड साल्मोनेला और कैम्पिलोबैक्टर संक्रमण का खतरा 5% बढ़ जाता है।” पिछले 10 सालों में ऐसी ही कई रिपोर्ट आई हैं। अगस्त 2023 में प्रकाशित ‘यूरोपियन क्लाइमेट एंड हेल्थ ऑब्जरवेटरी’ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि “गर्म और आद्र जलवायु, जिसमें अधिक चरम मौसमी घटनाएं होंगी, बैक्टीरिया को बढ़ाने और लोगों के रोगजनकों के संपर्क में आने में मदद करेगी।” 2021 में “लांसेट रीजनल हेल्थ” में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि खाने से होने वाली बीमारियों के लिए जिम्मेदार कई रोगजनक “पर्यावरण में बने रहने में सक्षम हैं, बढ़ती गर्मी को झेल सकते हैं, और कम खुराक पर भी संक्रमण फैला सकते हैं।” इनमें से, कैंपिलोबैक्टर, जो विकसित देशों में डायरिया का सबसे आम जीवाणु कारण है, “मौसम और जलवायु परिवर्तनशीलता के साथ एक मजबूत संबंध दिखाता है, मुख्य रूप से बढ़ते तापमान के साथ जो खाद्य श्रृंखला में विभिन्न बिंदुओं पर बैक्टीरिया का खतरा बढ़ा सकता है।”
“चूंकि कैंपिलोबैक्टर मेजबान (शरीर) के बाहर नहीं बढ़ सकता है, इसलिए गर्म वातावरण वास्तव में लोगों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है, न कि बैक्टीरिया के बढ़ने की दर को। दूसरे शब्दों में, गर्मी के कारण बैक्टीरिया की संख्या नहीं बढ़ती, बल्कि लोगों के खाने के तरीके बदलने (मसलन खाना ठीक से स्टोर न करना और खाने के चयन में सावधानी न बरतना) से बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ जाता है।”
डेनमार्क, फिनलैंड, नॉर्वे और स्वीडन के शोधकर्ताओं ने 2020 में “साइंटिफिक रिपोर्ट्स” में बताया कि उनके अध्ययन के नतीजों से पता चला है कि “सिर्फ जलवायु परिवर्तन के कारण, 2040-2049 तक प्रत्येक देश में हर साल औसतन 145 अतिरिक्त कैंपिलोबैक्टर के मामले बढ़ेंगे और 2080 के दशक के अंत तक लगभग 1,500 मामले प्रति वर्ष बढ़ने की संभावना है।” रिपोर्ट में कहा गया है, “वैश्विक जलवायु परिवर्तन से दुनिया भर में बारिश और तापमान के पैटर्न में बदलाव होने की उम्मीद है, जिससे कई संक्रामक रोग प्रभावित होंगे, खासकर खाने से होने वाले संक्रमण जैसे कैंपिलोबैक्टर।”
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इस अध्ययन में, चार स्कैंडिनेवियाई देशों में जलवायु और कैंपिलोबैक्टीरियोसिस नामक बैक्टीरियल इंफेक्शन के बीच संबंध का विश्लेषण करने के लिए राष्ट्रीय निगरानी डेटा का उपयोग किया गया। इसका उद्देश्य भविष्य में बीमारियों के पैटर्न पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का अनुमान लगाना था। रिपोर्ट में कहा गया है, “हमने दिखाया है कि कैंपिलोबैक्टर के मामले तापमान में वृद्धि और विशेष रूप से, बीमारी से एक हफ्ते पहले हुई बारिश से जुड़े हैं, जिसे पता चलता है कि ये बीमारी खाने से नहीं फैलती है।” रिपोर्ट आगे कहती है, “इन चार देशों में 2080 के दशक के अंत तक कैंपिलोबैक्टर के मामलों दोगुने हो सकते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन के कारण हर साल लगभग 6,000 अतिरिक्त मामले सामने आ सकते हैं।”
शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि “कैंपिलोबैक्टीरियोसिस से पूरी दुनिया में होने वाली गंभीर नुकसान को देखते हुए, समय पर सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन और अनुकूलन रणनीतियों को शुरू करने के लिए जलवायु परिवर्तन के स्थानीय और क्षेत्रीय प्रभावों का आकलन करना जरूरी है।”
पानी के गुणवत्ता से संबंध
विदेशों में हुए अन्य अध्ययनों में पानी की सामान्य गुणवत्ता और कैंपिलोबैक्टर के प्रकोप के बीच संबंधों की जांच की गई है। उदाहरण के लिए, चेक गणराज्य के शोधकर्ताओं द्वारा 2021 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में चार अलग-अलग मौसमों में अपशिष्ट और सतही जल में सी. जेजुनी और सी. कोलाई का अध्ययन किया गया।
उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि पानी में कैंपिलोबैक्टर की उपस्थिति भौतिक-रासायनिक मापदंडों, जैसे अमोनिया और क्लोराइड आयनों की सांद्रता से प्रभावित होती है। उन्होंने बताया कि “पानी का वातावरण कैंपिलोबैक्टर का एक वैकल्पिक स्रोत है।” उन्होंने आगे कहा कि अमोनिया और क्लोराइड आयनों की सांद्रता का उपयोग भविष्य में अपशिष्ट जल और सतही जल सी. जेजुनी और सी. कोलाई की संभावित उपस्थिति की सफल भविष्यवाणी के लिए एक आधार के रूप में किया जा सकता है।
और इससे भी बहुत पहले 2012 में, फिनलैंड के वैज्ञानिकों ने बताया था कि जलीय पर्यावरण में सी. जेजुनी कई तरह के तापमान के संपर्कों में आता है, जो इसके अस्तित्व और जलजनित संक्रमणों के कारण बनने की क्षमता को प्रभावित करता है। रिपोर्ट में कहा गया था, “सी. जेजुनी में एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध बढ़ रहा है, और सी. जेजुनी के अस्तित्व पर एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध के प्रभाव के बारे में बहुत कम डेटा उपलब्ध हैं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 24 फरवरी 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: कैम्पिलोबैक्टर जेजुनी कोशिकाओं और संबंधित संरचनाओं के सर्पिल आकार को दर्शाती एक स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप इमेज। तस्वीर- डी वुड और पूली, युनाइटेड स्टेट डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकलचर के एग्रीकल्चर रिसर्च सर्विस के सौजन्य से।