- भारत का डेयरी उद्योग अपनी ओर से प्रसंस्कृत दूध की तुलना में 2.5 गुना ज्यादा गंदा पानी उत्पन्न करता है। इसका पर्यावरण पर दुष्प्रभाव बहुत ज्यादा है, लेकिन इस पर चर्चा बहुत कम होती है।
- कुदरती कौयगुलांट (पानी को साफ करने का तरीका जिसमें छोटे-छोटे प्रदूषक बड़े टुकड़ों में बदल जाते हैं) अपशिष्ट पानी के पारंपरिक रासायनिक उपचार का जैविक विकल्प उपलब्ध कराते हैं।
- जानकार पानी के बढ़ते संकट के बीच डेयरी से निकलन वाले गंदे पानी के प्रबंधन के लिए टिकाऊ, फिर से इस्तेमाल करने और पर्यावरण के अनुकूल तरीकों पर जोर देते हैं।
भारत 1998 से दूध उत्पादन में दुनिया भर में सबसे आगे है। फिलहाल वैश्विक दूध उत्पादन में भारत का योगदान करीब एक-चौथाई है। अकेले 2024 में देश में 239 मिलियन टन से ज्यादा दूध का उत्पादन हुआ। हालांकि, डेयरी क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण आजीविका की रीढ़ है। लेकिन इससे उद्योग से बड़ी मात्रा में गंदा पानी निकलता है जिस पर चर्चा ना के बराबर होती है। यह ऐसी पर्यावरण संबंधी चुनौती है जिसकी अक्सर अनदेखी की जाती है।
अध्ययन बताते हैं कि डेयरी से निकलने वाले गंदे पानी की मात्रा इस उद्योग में प्रसंस्कृत दूध से करीब ढाई गुना है। कच्चे दूध से दही, मक्खन और पनीर जैसी उपभोक्ता वस्तुएं बनाते समय भारी मात्रा में अपशिष्ट जल निकलता है। हालांकि, इस पानी को साफ करने क लिए दशकों से पारंपरिक तरीके अपनाए जा रहे हैं जिसमें रसायनों का इस्तेमाल शामिल है। लेकिन, उनकी लागत और पर्यावरण संबंधी दुष्प्रभाव चिंता बढ़ाते रहे हैं।
एनवायरनमेंटल मॉनिटरिंग और असेसमेंट में प्रकाशित एक नए अध्ययन में प्राकृतिक कौयगुलांट का पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में सुझाव दिया गया है। अध्ययन की प्रमुख लेखिका और एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी की सहायक प्रोफेसर लिप्सा मिश्रा कहती हैं, “दुनिया भर में पानी की मांग बढ़ रही है, इसलिए गंदे पानी को इस तरह से साफ करना जरूरी है जिससे पारिस्थितिकी तंत्र साफ-सुथरा रहे और प्रदूषण कम हो।”
कुदरती कौयगुलांट के फायदे
अपने अध्ययन में मिश्रा और उनकी टीम ने प्राकृतिक कौयगुलांट के रूप में पपीते के बीज, मौसंबी के छिलके, और सहजन के पाउडर का इस्तेमाल किया। पपीते के बीज पानी में प्रदूषकों से चिपक सकते हैं और नीचे बैठ सकते हैं। अध्ययन में बताया गया है कि मौसंबी के छिलके फिर से इस्तेमाल के लिए अहम पोषक तत्व भी प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही, पानी की गुणवत्ता में भी सुधार कर सकते हैं।
सबसे अहम बात यह है कि सहजन के जीवाणुरोधी गुण पानी में बैक्टीरिया की बढ़ोतरी को रोकने, पानी की गुणवत्ता में सुधार लाने और पानी से होने वाली बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद करते हैं। मिश्रा और उनके सहयोगियों ने अध्ययन में बताया कि प्राकृतिक कौयगुलांट पानी के पीएच संतुलन को बनाए रखने के साथ ही जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (बीओडी), रासायनिक ऑक्सीजन मांग (सीओडी) और गंदगी के स्तर को कम करने में भी मदद करते हैं। उदाहरण के लिए, सहजन सूक्ष्मजीवों के विघटन से होने वाले ऑक्सीजन के नुकसान को रोकता है और बीओडी को कम करने में मदद करता है, जो स्वस्थ जलीय आवासों को बनाए रखने के लिए जरूरी है।

प्रदूषित पानी में कार्बनिक प्रदूषण का आकलन करने के लिए बीओडी और सीओडी जरूरी मानदंड हैं। अध्ययन में बताया गया है कि बीओडी, प्राकृतिक तरीके से सड़ने वाले पदार्थों (बायोडिग्रेडेबल) के विघटन के लिए सूक्ष्मजीवों के लिए जरूरी ऑक्सीजन को मापता है। वहीं सीओडी, बायोडिग्रेडेबल और नॉन-बायोडिग्रेडेबल दोनों यौगिकों के रासायनिक ऑक्सीकरण के लिए जरूरी कुल ऑक्सीजन की मात्रा को मापता है। सीओडी और बीओडी का ज्यादा स्तर जलीय जीवन को खत्म कर सकता है। ऐसा इसलिए हो सकता है, क्योंकि सूक्ष्मजीव कार्बनिक यौगिकों को विघटित करते समय तेजी से ऑक्सीजन का उपभोग करते हैं, जिससे ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।
ओडिशा प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर प्रज्ञान दास कहते हैं, “जब हम डेयरी से निकलने वाले गंदे पानी को बिना साफ किए नदी और तालाब में बहा देते हैं, तो इससे पोषक तत्वों की कमी होती है। साथ ही, घुली हुई ऑक्सीजन की कमी से समुद्री जीवन और जलीय पौधे ऐसे वातावरण में जीवित नहीं रह पाते हैं।” दास साल 2022 में प्रकाशित एक अध्ययन, “डेयरी अपशिष्ट जल और अपशिष्ट प्रबंधन में इसकी क्षमता” के लेखक भी हैं।
गंदे पानी को बिना साफ किए नदियों और तालाबों में बहाए जाने से नुकसानदायक शैवालों का विकास भी हो सकता है। इससे ऑक्सीजन का स्तर और कम हो जाता है और जलीय पौधों का बढ़ना रुक जाता है। इसके अलावा, अध्ययन में विस्तार से बताया गया है कि डेयरी से निकलने वाले प्रदूषित पानी मे डिटर्जेंट और सैनिटाइजर जैसे विषैले यौगिक जलीय पारिस्थितिक तंत्र के लिए खतरा पैदा करते हैं।
अलग-अलग डेयरी उत्पादों में 2016 के एक अध्ययन में पाया गया कि मीठा मट्ठा (ठोस पनीर का उप-उत्पाद) सबसे ज्यादा प्रदूषणकारी डेयरी अपशिष्ट है। इसकी जैव-रासायनिक संरचना कार्बनिक पदार्थों (लैक्टोज, प्रोटीन, फॉस्फोरस, नाइट्रेट और नाइट्रोजन) से भरपूर होती है और घरेलू सीवेज की तुलना में 60 से 80 गुना ज्यादा प्रदूषणकारी होती है।
हालांकि, डेयरी से निकलने वाले गंदे पानी को ठीक से साफ नहीं करने से पर्यावरण के लिए खतरा पैदा होता है। फिर भी इस पर अक्सर अन्य उद्योगों जितना ध्यान नहीं दिया जाता। मिश्रा कहती हैं, “कपड़ा, दवा उद्योग, कोयला खनन, इस्पात संयंत्र और अन्य उद्योगों से ज्यादा नजर आने वाले खतरनाक प्रदूषक या भारी धातु निकलते हैं। इस वजह से डेयरी के गंदे पानी की तुलना में इनके बारे में अक्सर ज्यादा चर्चा होती है।”
अध्ययन से पता चला है कि मौसंबी के छिलकों ने बीओडी को 93.8% तक कम करने की क्षमता दिखाई। वहीं पपीते के बीजों और सहजन ने मैलापन और कुल घुलित ठोस (टीडीएस) को हटाने में उल्लेखनीय कुशलता दिखाई, जो क्रमशः 94% और 68% तक पहुंच गई। मिश्रा कहती हैं, “तुलनात्मक रूप से, फिटकरी ने 99% से ज्यादा मैलापन हटाने में मदद की थी, लेकिन इसमें रसायन की मात्रा ज्यादा थी। हालांकि, पपीते के बीजों, मौसंबी के छिलकों और सहजन के पाउडर ने बायोडिग्रेडेबल गाद के साथ 93% से ज्यादा कुशलता दिखाई। मौसंबी के छिलकों ने लगभग 94% बीओडी हटाने में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया।”
इसके अलावा, पेड़-पौधों पर आधारित कौयगुलांट ना सिर्फ सस्ते हैं, बल्कि पर्यावरण संबंधी जोखिम भी कम करते हैं।

गंदे पानी की बड़ी मात्रा
डेयरी उद्योग में सभी कामों में पानी का इस्तेमाल होता है, जिसमें गर्म करना, ठंडा करना और धोना शामिल है। मिश्रा का अनुमान है कि हर 1,000 लीटर दूध प्रसंस्करण में लगभग 3,000 लीटर गंदा पानी निकलता है।
डेयरी के गंदे पानी में बड़ी मात्रा में कार्बनिक पदार्थ जैसे घुले हुए ठोस, निलंबित ठोस, तेल और ग्रीस से लेकर डिटर्जेंट और औद्योगिक सफाई के दौरान इस्तेमाल होने वाले बेंजीन, पारा, जस्ता, अमोनिया और क्रोमियम जैसे विभिन्न रसायन तक कई तरह के अपशिष्ट पाए जा सकते हैं। अगर इनका उचित निपटान नहीं किया जाए, तो ये समुद्री जीवन को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
मिश्रा कहती हैं, “कार्बनिक पदार्थों की ज्यादा मौजूदगी से बीओडी और सीओडी का स्तर बढ़ जाता है, जो गंदा पानी साफ किए बिना छोड़े जाने पर जल निकायों में ऑक्सीजन की कमी कर सकता है। इससे हाइपोक्सिक स्थितियां पैदा होती हैं जो जलीय जीवन के लिए खतरा बनती हैं और पोषक तत्वों के चक्र को बाधित करती हैं।”
भूमि पर प्रदूषित पानी के अनुचित निपटान से भूमिगत जल दूषित हो सकता है और सतही जल की गुणवत्ता खराब सकती है। अगर यही गंदा पानी जल निकायों में छोड़ दिया जाता है, तो वे मलेरिया और डेंगू बुखार, पीत ज्वर और चिकनगुनिया जैसी अन्य बीमारियां फैलाने वाली मक्खियों और मच्छरों के प्रजनन स्थल बन सकते हैं।
डेयरी के गंदे पानी को खास तौर पर भौतिक, रासायनिक और जैविक तकनीकों से साफ किया जा सकता है। सामान्य तौर पर इस्तेमाल में लाया जाने वाला एक अन्य तरीका कृत्रिम आर्द्रभूमि है। कृत्रिम आर्द्रभूमि का विशाल सतही क्षेत्र कार्बनिक पदार्थ, निलंबित ठोस और पोषक तत्वों जैसे प्रदूषकों को हटाने के लिए सही वातावरण प्रदान करता है। ये लागत-प्रभावी और टिकाऊ होते हैं।
सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल में लाए जाने वाले रासायनिक तरीकों में से एक है कौयगुलांट। डेयरी के गंदे पानी की सफाई के लिए पारंपरिक रूप से फिटकरी (एल्युमिनियम सल्फेट) और फेरस सल्फेट जैसे कौयगुलांट पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, इनसे उत्पन्न होने वाली गाद में ऐसे रसायन होते हैं जो जल निकायों और पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए, हाल के शोध वैकल्पिक कौयगुलांट पदार्थों की खोज पर केंद्रित रहे हैं जो प्राकृतिक, मनुष्यों के लिए सुरक्षित, बायोडिग्रेडेबल हों और कम से कम गाद पैदा करें।

प्रदूषित पानी की सफाई
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की 2024 की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत के शहरों से निकलने वाले गंदे पानी और सीवेज का एक-तिहाई से भी कम साफ किया जाता है। इसका मतलब है कि बाकी पानी नदियों, झीलों और जमीन में बह जाता है।
मिश्रा बताती हैं कि पानी या गंदे पानी को साफ करने के पारंपरिक तरीकों में तीन चरण होते हैं: शुरुआती या प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक उपचार। शुरुआती उपचार में सिर्फ भारी कणों या तैरते पदार्थों को हटाया जाता है। प्राथमिक उपचार में, पारंपरिक रूप से फिटकरी और फेरस सल्फेट जैसे कौयगुलांट मिलाए जाते हैं जो बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं।
मिश्रा कहती हैं, “ये कौयगुलांट गाद बनाते हैं जो टैंक के तल में जम जाता है, जिसे छोड़ने से पहले दोबारा साफ करना पड़ता है। कुछ डेयरी प्लांट गाद को निकालकर जमीन पर फेंक देते हैं, जिससे मिट्टी दूषित होती है और प्रदूषण फैलता है।”
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दास आगे कहते हैं कि रासायनिक कौयगुलांट एजेंट बड़ी मात्रा में गाद पैदा करते हैं जिसका दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। वह कहते हैं, “इस गाद में सिर्फ फैटी एसिड, तेल और ग्रीस होते हैं जिन्हें पर्यावरण में नहीं जाना चाहिए। इसे दोबारा साफ किया जाना चाहिए, लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता।”
हालांकि, रासायनिक कौयगुलांट का अभी भी व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए प्राकृतिक कौयगुलांट की ओर बढ़ने में लंबा वक्त लगेगा। मिश्रा कहती हैं, “फिटकरी और फेरिक क्लोराइड पहले से ही बड़े पैमाने पर बाजार में उपलब्ध हैं। प्राकृतिक कौयगुलांट के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने के लिए जागरूकता बढ़ाने होगी और हमें इन पदार्थों की बाजार में उपलब्धता पक्की करनी होगी।” वह इस बात पर भी जोर देती हैं कि प्राकृतिक कौयगुलांट को व्यापक रूप से अपनाने से पहले बड़े स्तर पर इसे आजमाया जाना चाहिए।
दास जोर देकर कहते हैं कि डेयरी के गंदे पानी को साफ करने के विकल्पों की खोज करते समय, फिर से इस्तेमाल पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। “हम जल संकट के युग में जी रहे हैं। डेयरी अपशिष्ट जल उपचार में सिर्फ पर्यावरण-अनुकूल तरीकों का ही इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इस बात पर भी ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए कि पानी को फिर से इस्तेमाल के योग्य किस तरह बनाया जाए। उदाहरण के लिए, वर्मीफिल्ट्रेशन पर मेरे अध्ययन ने दिखाया कि यह प्रभावी विकल्प हो सकता है। इसमें केंचुओं को फिल्टर बेड में डालकर कार्बनिक प्रदूषकों को विघटित किया जाता है। वर्मीफिल्ट्रेशन के बाद, गंदे पानी का सिंचाई जैसे उद्देश्यों के लिए फिर से उपयोग किया जा सकता है,” दास बताते हैं।
हालांकि, मिश्रा और दास दोनों ही डेयरी के प्रदूषित पानी और साफ करने के स्थायी विकल्पों पर शोध की कमी को देखते हैं। मिश्रा कहती हैं, “डेयरी का गंदा पानी पर्यावरण को किस तरह प्रभावित करता है और इसे साफ करने के विभिन्न तरीकों, खासकर ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल तरीकों, पर अधिक अध्ययन, इंसानों और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद हो सकता है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 6 अगस्त, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: राजस्थान में टोंक जिले के नागर गांव में अपनी गाय को दुहता हुआ किसान। एक नए अध्ययन में डेयरी से निकलने वाले गंदे पानी को साफ करने के लिए प्राकृतिक कौयगुलांट का सुझाव दिया गया है। इनमें पपीते के बीज, मौसंबी के छिलके और सहजन का पाउडर शामिल हैं। विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY 2.0) के जरिए ILRI/स्टीवी मान द्वारा ली गई तस्वीर।