- 1980 के दशक से 2000 के शुरुआती वर्षों तक, असम के मानस राष्ट्रीय उद्यान में उग्रवाद का वन्यजीवों पर प्रभाव पड़ा।
- संघर्ष के बीस साल बाद, शोधकर्ताओं ने पाया है कि हाथी, जंगली भैंसा और बाघ की आबादी पिछले आंकड़ों की तुलना में काफी हद तक बहाली हो गई है।
- जहाँ गौर, सांभर और भौंकने वाले हिरण का घनत्व स्थिर दिखाई दिया, वहीं हॉग डियर और जंगली सूअर जैसी शिकार प्रजातियों की आबादी में तेज गिरावट देखी गई।
- शोधकर्ता चेतावनी देते हैं कि शिकार प्रजातियों में लगातार गिरावट शिकार की कमी पैदा कर सकती है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष का जोखिम बढ़ सकता है।
असम के बोडोलैंड क्षेत्र में करीब दो दशकों तक चले संघर्ष ने मानस नेशनल पार्क को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट से एक जंग के मैदान में बदल दिया था। वन विभाग के गार्ड को ये इलाका छोड़ना पडा जिसके कारण तस्करों कब्ज़ा बढ़ गया। इस दौरान इस पार्क के मुख्य जंगल के 40% हिस्से को खेतों या रिहायशी इलाकों में बदल दिया गया। इसके चलते इस पार्क के बाघ, गेंडे, हाथी और हिरण या तो गायब हो गए या विलुप्ति की कगार पर पहुँच गए।
अस्सी और 2000 के दशक के दौरान बोडो उग्रवादी संगठनों और राज्य सरकार के बीच चला यह संघर्ष मानस के अंदर तक फ़ैल गया। विद्रोहियों ने वन विभाग के कर्मचारियों और उसकी इमारतों को निशाना बनाकर पार्क के रख रखाव को पूरी तरह से बंद करवा दिया। पार्क से पहरा हटते ही, शिकार की घटनाएं बढ़ने लगी, वन क्षेत्र ख़राब होने लगा, और वन्यजीवों की जनसंख्या गिरने लगी।
अब, इस क्षेत्र में शान्ति बहाली के करीब 20 साल के बाद एक नए अध्ययन में इस इलाके की जैवविविधता की एक शानदार वापसी का जिक्र किया गया है। हालाँकि, भारतीय वन्यजीव संसथान के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में कुछ ख़ास प्रजातियों की जनसंख्या में हो रही कमी की भी चेतावनी दी गयी है।

अध्ययन में संघर्ष के बाद शिकारी और उनके शिकार की प्रजातिओं का आंकलन किया गया और पाया कि साल 2015 के बेसलाइन डेटा की तुलना में हाथी, जंगली भैंसा, और बाघ की संख्या के घनत्व में वृद्धि हुई है। वहीं, गौर, सांभर, और बार्किंग डियर (भोंकने वाले हिरण) की आबादी का घनत्व में स्थिरता देखि गयी, लेकिन हॉग डियर और जंगली सूअर के घनत्व में कमी देखी गई।
वापसी का रास्ता
मानस नेशनल पार्क, जो पूर्वोत्तर भारत और दक्षिणी भूटान के कई संरक्षित क्षेत्रों के साथ एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संरक्षण क्षेत्र के रूप में काम करता है, ने संघर्ष की अवधि में लगभग सभी जानवरों की संख्या में तेज गिरावट देखी।
इस दौरान संगठित शिकार और हाथी दाँत के व्यापार के कारण एक-सींग वाला गैंडा स्थानीय स्तर पर विलुप्त हो गया और दाँत वाले नर हाथियों (टस्कर) की आबादी लगभग समाप्ति की कगार पर पहुँच गई।
मानस में पाया जाने वाला पूर्वी दलदली हिरण (स्वाम्प डियर) लगभग पूरी तरह समाप्त हो गया और संघर्ष के दौरान बाघ भी शिकारियों का निशाना बने। मध्यम आकार की शाकाहारी प्रजातियाँ, जैसे चीतल और जंगली सूअर, जो बड़े मांसाहारियों के लिए मुख्य शिकार का काम करती हैं, उनकी संख्या बुरी तरह घट गईं। इसका कारण उनके मांस की मांग में हुई बढ़ोतरी थी।
साल 2003 में संघर्ष समाप्त होने के बाद, मानस की पारिस्थितिकी को बहाल करने के लिए संरक्षण प्रयास शुरू किए। इसमें आवास की पुनर्बहाली, शिकार को रोकने की पहल और सामुदायिक सहभागिता वाले कार्यक्रम शामिल थे, जिनसे धीरे-धीरे कई प्रजातियों की पुनर्बहाली होने लगी। इन्हीं प्रयासों के अंतर्गत, 2008 में गैंडे और 2014 में दलदली हिरण को प्रदेश के अन्य हिस्सों से मानस में लाया गया, यह मानस की जैवविविधता को बहाल करने में एक महत्वपूर्ण प्रगति थी।
साल 2022 और 2023 में, शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया कि संघर्ष के बाद लुप्तप्राय शिकारी और उनकी शिकार प्रजातियाँ किस तरह से पुनर्बहाल हो रही हैं। इसके लिए उन्होंने हाथियों की पीठ पर सर्वेक्षण कर जानवरों की गिनती की और कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल कर उनकी आबादी का अनुमान लगाया।

अध्ययन के अनुसार, हाथी, जंगली भैंसा और बाघ की जनसंख्या का उच्च घनत्व दर्ज किया गया, जबकि गौर, सांभर और भौंकने वाले हिरण का घनत्व 2015 के बेसलाइन डेटा की तुलना में स्थिर रहा। गैंडे और दलदली हिरण की आबादी में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। बाघों की संख्या बढ़कर 57 वयस्कों तक पहुँच गई, जबकि तेंदुओं का घनत्व स्थिर बना रहा।
“मानस टाइगर रिज़र्व में बाघ और गैंडे जैसी प्रमुख प्रजातियों की तेज़ पुनर्बहाली का मुख्य कारण 2003 और 2022 में हुए पहले और दूसरे बोडो समझौते के बाद सुधरी हुई क़ानून-व्यवस्था है। उग्रवाद के कमज़ोर पड़ने के साथ ही वन विभाग का इस क्षेत्र पर दोबारा नियंत्रण स्थापित कर सख़्त शिकार-रोधी नियम लागू कर सका,” अध्ययन के प्रमुख लेखक और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) में वन उप महानिरीक्षक, वैभव चंद्र माथुर ने कहा।
“इसके (शांति समझौते) बाद, पार्क ने कड़े संरक्षण प्रोटोकॉल लागू किए, जैसे अतिरिक्त वनरक्षकों की तैनाती, संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त बढ़ाना और अवैध शिकार व व्यापार रोकने के लिए शिकार-रोधी अभियान मज़बूत करना। साथ ही, वन्यजीवों को पर्याप्त भोजन और आश्रय उपलब्ध कराने के लिए खरब हुई घासभूमि, वन और आर्द्रभूमियों की बहाली के प्रयास भी किए गए,” मुख्य वन संरक्षक और मानस टाइगर रिज़र्व के क्षेत्र निदेशक सी. रमेश ने मोंगाबे इंडिया को ईमेल के माध्यम से बताया।
चिंताजनक गिरावट
भले ही मानस राष्ट्रीय उद्यान में कई प्रजातियों की स्थिर पुनर्बहाली हुई है, लेकिन कुछ शाकाहारी प्रजातियों की संख्या चिंताजनक है। बाघों की प्रमुख शिकार प्रजातियों में से एक हॉग डियर का घनत्व 2015 से 2023 के बीच 82.32% घट गया, इसी अवधि में जंगली सूअर की आबादी में भी 67.36% की गिरावट दर्ज की गई।
“संघर्ष के वर्षों के दौरान, हॉग डियर और जंगली सूअर की आबादी शिकार के कारण तेज़ी से घटी, क्योंकि ये मांस के लिए निशाना बनाई जाने वाली प्रजातियों में शामिल थे। समझौते के बाद कुछ पुनर्बहाली तो हुई है, लेकिन हॉग डियर की संख्या अब भी कम बनी हुई है। इसका एक कारण यह है कि इसकी प्रजनन दर अपेक्षाकृत धीमी होती है — लगभग नौ महीने के गर्भकाल के बाद वे एक ही शावक को जन्म देते हैं। इसके विपरीत, बाघों की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है,” माथुर ने समझाया।
“यह असंतुलन संभवतः एक ‘प्रिडेटर पिट’ की स्थिति पैदा कर चुका है, जहाँ शिकारी की बढ़ती संख्या शिकार की आबादी को दोबारा उभरने से रोक रही है। घासभूमि का विशेषज्ञ होने के कारण हॉग डियर ऊँची घास वाले आवासों में घात लगाकर होने वाले शिकार के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं, जिससे उनकी पुनर्बहाली और कठिन हो जाती है,” उन्होंने आगे बताया।
“मैं इसमें दो कारण देखता हूँ: पहला, लंबी और आर्द्र घासभूमियों का सिकुड़ना या उन पर दबाव बढ़ना, जो इस प्रजाति का विशेष आवास है और जिसकी वजह से इसकी संख्या घटी है; दूसरा, बड़े मांसाहारी जीवों की आबादी में वृद्धि से इस प्रजाति, जो आमतौर पर छोटे झुंडों में रहती है, पर शिकार का दबाव बढ़ सकता है,” वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया में संरक्षण प्रमुख, समीर कुमार सिन्हा ने कहा। सिन्हा इस अध्ययन का हिस्सा नहीं थे।

अध्ययन ने जंगली सूअर की आबादी में आई गिरावट का कारण अवैध बुशमीट शिकार, यानि मांस के लिए शिकार को बताया है, क्योंकि यह प्रजाति बुशमीट के लिए अक्सर बड़े पैमाने पर निशाना बनाई जाती है।
माथुर ने इस बात की भी चेतावनी दी कि इन शिकार प्रजातियों में लगातार गिरावट शिकार की कमी पैदा कर सकती है, जिससे बाघों को मवेशी या घरेलू सूअर खोजने के लिए मानव बस्तियों के करीब आने का खतरा बढ़ सकता है, और मानव-वन्यजीव संघर्ष का जोखिम बढ़ सकता है।
“हॉग डियर और जंगली सूअर बड़े मांसाहारी जैसे बाघों के लिए महत्वपूर्ण शिकार प्रजातियाँ हैं। उनकी आबादी में लगातार गिरावट शिकार की कमी पैदा कर सकती है, जिससे बाघ वैकल्पिक भोजन स्रोत, जैसे मवेशी या घरेलू सूअर, खोजने के लिए मानव बस्तियों के करीब आ सकते हैं। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष का जोखिम बढ़ सकता है,” उन्होंने कहा।
हालाँकि, उन्होंने यह भी बताया कि अब तक शिकारी प्रजातियों की घनत्व पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं देखा गया है, संभवतः इसके पीछे विविध शिकार प्रजातियों की उपलब्धता है।
जहाँ हॉग डियर और जंगली सूअर की गिरावट पार्क के पारिस्थितिक संतुलन के लिए लगातार एक चुनौती पेश करती है, वहीं संरक्षणकर्ता कहते हैं कि मानस की स्थिर पुनर्बहाली स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के बिना संभव नहीं हो पाती।
स्थानीय समुदायों का योगदान
शांति समझौते के बाद, स्थानीय समुदाय — जिनमें से कई पहले उग्र संघर्षों में शामिल थे — संरक्षण में साझेदार बन गए। कई पूर्व शिकारी अपने हाथ से बनाए हथियार सरकार को सौंपने लगे। युवा लोगों ने मानस को बहाल करने में मदद की, वनरक्षकों के साथ गश्त की और एनजीओ के साथ मिलकर आवास पुनर्बहाली पर काम किया।
“स्थानीय समुदायों ने सक्रिय रूप से संरक्षण प्रयासों में भाग लिया, साझा जिम्मेदारी को बढ़ावा दिया और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम किया। शांति समझौते के बाद, स्थानीय लोग संघर्ष-संबंधित गतिविधियों से स्थायी आजीविका की ओर बढ़े, जैसे इको-टूरिज़्म और संरक्षण कार्य। बड़ी संख्या में लोगों को वनरक्षक, इको-टूरिज़्म गाइड और शिकार-रोधी टीमों के सदस्य के रूप में रोजगार मिला। सामुदायिक गर्व और स्वामित्व की भावना ने वन संसाधनों के दोहन को कम किया और वन्य क्षेत्रों की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित की,” रमेश ने कहा।
“सामान्य स्थिति लौटने के प्रारंभिक वर्षों में, स्थानीय युवाओं ने पार्क प्रबंधन और स्थानीय सरकार के सहयोग से क्षेत्र की सक्रिय सुरक्षा करके मानस को पुनर्निर्मित करने में मदद की। बाद में, उन्होंने सरकारी एजेंसियों और गैर-सरकारी संगठनों के संरक्षण प्रयासों में भाग लिया, जो उनकी निरंतर रुचि को दर्शाता है,” सिन्हा ने कहा।
“उनकी संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता उन पहलों में भी स्पष्ट है, जिनमें स्थानीय शिकारी अपने हाथ से बने हथियार अधिकारियों के पास सौंपते हैं। इसके अलावा, स्थानीय शासन निकाय और सामुदायिक समूह इस क्षेत्र में संरक्षित क्षेत्रों की अधिसूचना को समर्थन दे रहे हैं, जिसका उद्देश्य मानवजनित विस्तार से वन्यजीव आवासों की सुरक्षा करना है,” सिन्हा ने आगे बताया।
“स्थानीय सरकार, विशेषकर बोडोलैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (BTAD) के तहत, ने भी महत्वपूर्ण समर्थन प्रदान किया, जिससे इन बदलावों को संस्थागत रूप से लागू करने में मदद मिली। वन विभाग और स्थानीय समुदायों के बीच यह साझा जिम्मेदारी मानस की पारिस्थितिक पुनर्बहाली की कुंजी रही है,” माथुर ने बताया।
बैनर तस्वीर: मानस राष्ट्रीय उद्यान में एक स्वाम्प डियर। तस्वीर: फील्ड डायरेक्टर कार्यालय, मानस टाइगर रिज़र्व।