- हिमाचल प्रदेश में इस्तेमाल किए गए सैनेटरी पैड के निपटान की उचित व्यवस्था नहीं होने से कई महिलाएं अपने घर के अहाते में इन्हें जलाने को मजबूर हैं।
- कचरा उठाने की खराब व्यवस्था, सामाजिक वर्जनाएं और पाबंदियां के कारण सैनिटरी पैड को जलाने से विषैला धुआं निकलता है, जिससे पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा होता है।
- सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता योजनाओं के तहत डिस्पोजेबल पैड बांटे जाने के बावजूद, सुरक्षित निपटान में नीतिगत खामियां हैं। इससे महिलाओं को असुरक्षित और पर्यावरण के लिए नुकसानदायक तरीकों से कचरा निपटाना पड़ता है।
हिमाचल प्रदेश के सभी कस्बों में पर्यावरण और जन स्वास्थ्य को लेकर बड़ी चिंता उभर रही है। यहां इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड (माहवारी के दौरान इस्तेमाल की जाने वाली चीजें) को खुले में जलाना नियमित तरीका बन गया है। फिर भी, इस मसले पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड के सुरक्षित निपटान की व्यवस्था नहीं होने और सामाजिक वर्जनाओं से कई महिलाओं के लिए समस्या बढ़ती जा रही है। यह समस्या खासकर उन प्रवासी महिलाओं के लिए और बड़ी है जो किराए के घरों में रहती हैं। उनके पास किराए के घरों के अहाते में इन्हें जलाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
मिसाल के तौर पर धर्मशाला का योल इलाका राज्य में सबसे ज्यादा सैलानियों की आवभगत करने वाले पर्यटन स्थलों में से एक है। दिल्ली से यहां आई 25 साल की रुचिका बताती हैं कि मकान मालकिन ने उन्हें सबसे पहले यही हिदायत दी थी कि इस्तेमाल किए हुए सैनिटरी पैड कूड़ेदान में ना डालें, बल्कि उन्हें अहाते में एक गड्ढे में जला दें। इससे उठने वाला धुआं अक्सर उन्हें बेचैन कर देता है। मासिक धर्म के दौरान रुचिका एक दिन में औसतन तीन से चार सैनिटरी पैड इस्तेमाल करती हैं।
रुचिका की मकान मालकिन ममता ( 40 साल) बताती हैं कि इलाके के सभी घरों में इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड जलाने के लिए गड्ढा बना हुआ है। लेकिन, उपयोग में लाए गए सैनिटरी पैड जलाने से जहरीला धुआं निकलता है और हवा में लंबे समय तक रहने वाली अप्रिय बदबू फैल जाती है। हालांकि, उनके पास कोई विकल्प नहीं है। वे कहती हैं, “कचरा उठाने वाले सैनिटरी पैड लेने से इनकार कर देते हैं।”
हिमाचल के गांवों खासकर पंचायत के तहत आने वाले इलाकों में कचरा उठाने वाले सरकारी मुलाजिम पुरुष ही होते हैं। महिलाएं उन्हें इस्तेमाल किए गए सैनेटरी पैड देने में असहज महसूस करती हैं। कचरा उठाने वालों का यह भी कहना है कि निपटान व्यवस्था में खामियों के कारण वे यह कचरा नहीं उठाते। इनमें से कई इलाकों में स्वयंसेवक गैर-लाभकारी संस्थाओं के साथ मिलकर कचरा प्रबंधन पर काम कर रहे हैं। उनका भी कहना है कि सैनिटरी पैड का निपटान चुनौती बना हुआ है।

मैनुस्ट्रल हाइजीन अलायंस ऑफ इंडिया के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 12 अरब डिस्पोजेबल सैनिटरी नैपकिन का उत्पादन होता है, जिनमें से अधिकतर नॉन-बायोडिग्रेडेबल होते हैं। ये आमतौर पर पॉलीप्रोपाइलीन और सुपरअब्जॉर्बेंट पॉलीमर पाउडर (सोडियम पॉलीएक्रिलेट) से बने होते हैं। कचरेवाले फाउंडेशन की संस्थापक और इस विषय की विशेषज्ञ गरिमा पूनिया ने कहा, “सैनिटरी पैड में इस्तेमाल होने वाले पॉलीप्रोपाइलीन और सोडियम पॉलीएक्रिलेट जैसे पदार्थ स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं।” उन्होंने कहा कि ये प्लास्टिक पेट्रोरसायनों का इस्तेमाल करके बनाए जाते हैं। हालांकि, निर्माता इस्तेमाल किए गए रसायनों की सटीक जानकारी नहीं देते हैं, लेकिन शोध से पता चलता है कि उनमें से कई विषैले होते हैं।
पूनिया कहती हैं कि सैनिटरी पैड बनाने में इस्तेमाल होने वाले पदार्थ प्रकृति में आसानी से नष्ट नहीं होते। उन्होंने आगे कहा, “जब इन्हें फेंका जाता है, तो ये मिट्टी और पानी दोनों को गंदा करते हैं और समय के साथ सूक्ष्म प्लास्टिक में बदल जाते हैं जो पौधों, जानवरों और आखिरकार इंसानों में प्रवेश कर सकते हैं।” ये सूक्ष्म प्लास्टिक विषैले पदार्थों को सोखने के लिए स्पंज की तरह काम करते हैं, जिससे भोजन या पानी के जरिए इनका सेवन कहीं ज्यादा खतरनाक हो जाता है। पर्यावरण संबंधी पहलू पर उन्होंने बताया कि इन सामग्रियों को जलाने (ग्रामीण क्षेत्रों में निपटान का सामान्य तरीका) से डाइऑक्सिन और फॉर्मलाडेहाइड जैसे कार्सिनोजेन्स (कैंसर होने की वजह) निकलते हैं, जो वायु प्रदूषण और दूषित राख से पूरे समुदाय के लिए गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा करते हैं।
इस परिपाटी पर चिंता जताते हुए, SKUAST कश्मीर में पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर फारूक अहमद लोन कहते हैं कि सैनिटरी पैड जलाने से सूक्ष्म कण निकलते हैं जो पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं। “इन पैड में खतरनाक वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) और PM2.5 कण होते हैं और इनसे श्वसन कैंसर सहित गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।”
दक्षिण दिल्ली में अपना क्लिनिक चलाने वाली जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. प्राची हुड्डा ने कहा, “चिकित्सक होने के नाते मैं सैनिटरी पैड को खुले में जलाने से होने वाले गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों के प्रति सख्त चेतावनी देती हूं।” उन्होंने बताया कि ज्यादातर व्यावसायिक पैड्स में कृत्रिम सामग्री होती है, जिसमें प्लास्टिक और सुपरअब्जॉर्बेंट पॉलिमर शामिल हैं। ये जलने पर हानिकारक रसायन छोड़ते हैं। उन्होंने कहा, “इन सामग्रियों को कम तापमान पर जलाने से डाइऑक्सिन, बेंजीन और फॉर्मलाडेहाइड जैसे कार्सिनोजेनिक यौगिक निकल सकते हैं।” उन्होंने आगे कहा, “इन विषैले पदार्थों के लगातार संपर्क में रहने से कैंसर और प्रजनन से जुड़ी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।” उन्होंने इस तरह जलाने से जुड़े श्वसन संबंधी खतरों की ओर भी इशारा किया और कहा, “इसका धुआं आंखों, गले और फेफड़ों में तुरंत जलन पैदा कर सकता है। समय के साथ, इससे क्रोनिक ब्रोंकाइटिस हो सकता है या अस्थमा और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) जैसी श्वसन संबंधी बीमारियां और बिगड़ सकती हैं।” उन्होंने आगे कहा, “यह ग्रामीण इलाकों में खास तौर पर चिंताजनक है जहां महिलाएं पहले से ही खाना पकाने की आग से होने वाले घर के अंदर के वायु प्रदूषण के संपर्क में आती हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि अगर पैड को ठीक से जलाया नहीं जाता, तो बचा हुआ खून और ऊतक कीड़ों को आकर्षित कर सकते हैं या निपटान के दौरान सतहों और हाथों को दूषित कर सकते हैं। “इससे हेपेटाइटिस बी और सी, एचआईवी या जीवाणु जनित बीमारियों जैसे संक्रमणों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसा तब हो सकता है जब कचरे को सुरक्षित तरीके से नहीं संभाला जाता है।”

सुरक्षित निपटान के विकल्पों की कमी
कुछ साल पहले हरियाणा से हिमाचल के रक्कड़ इलाके में आई 23 साल की एक और महिला आरुषि मेहता कहती हैं कि कभी-कभी इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड को पूरी तरह जलने में घंटों लग जाते हैं। “कभी-कभी हम रात में बहुत अंधेरे में ऐसा करते हैं, अपने साथ ढेर सारे अखबार और केरोसिन ले जाते हैं, क्योंकि इन्हें जलाना आसान नहीं होता।”
कांगड़ा जिले के एक अन्य हिस्से में 35 साल की स्थानीय निवासी बंदना देवी सैनिटरी पेड के निपटान में आने वाली चुनौतियों के बारे में बताती हैं। एक स्थानीय एनजीओ में काम करने वाली बंदना बताती हैं कि अपने सैनिटरी कचरे को जलाने से पहले, वह इस्तेमाल किए गए पैड को फाड़ती हैं, खून के धब्बे धोती हैं, उसे सूखने देती हैं और उसके बाद ही उसे जलाने के लिए तैयार करती हैं। अखबारों का एक बंडल और केरोसिन की बोतलें ले जाने के बावजूद, इस्तेमाल किए गए पैड के कुछ हिस्से बिना जले रह जाते हैं।
एक और निवासी मनीषा दो साल पहले हिमाचल आ गई थीं। वह मूल रूप से उत्तराखंड की रहने वाली हैं। जब वह यहां आईं, तो उन्हें भी यही समस्या झेलनी पड़ी, क्योंकि उन्हें भी सैनिटरी पैड को जलाने के लिए कहा गया था। मनीषा अब यहां आकर बसने वाली कई अन्य महिलाओं की तरह मेंस्ट्रुअल कप का इस्तेमाल करने लगी हैं। उनका मानना है कि ऐसे उत्पादों का इस्तेमाल करना पैड जलाने या उन्हें गलत तरीके से फेंकने से बेहतर है।
हालांकि, कई स्थानीय महिलाएं अभी भी सैनिटरी पैड की जगह मासिक धर्म के लिए वैकल्पिक उत्पादों को अपनाने को लेकर पसोपेश में हैं। कप जैसे स्थायी विकल्पों पर बातचीत जारी है, जिसकी पहल अक्सर गैर-सरकारी संगठनों की ओर से की जाती है। जहां कुछ महिलाएं इस बदलाव को स्वीकार कर रही हैं, वहीं ज्यादातर महिलाएं पैड जलाना ही पसंद करती हैं, क्योंकि उन्हें इसकी आदत हो गई है।

स्वास्थ्य, पर्यावरण पर सैनिटरी कचरे का दुष्प्रभाव
मासिक धर्म उत्पादों के निपटान पर एक शोध पत्र में वैज्ञानिक नजरिए के अनुसार, सैनिटरी पैड के गलत प्रबंधन से स्वास्थ्य और पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ते हैं। व्यावसायिक सैनिटरी पैड नॉन-बायोडिग्रेडेबल होते हैं और इन्हें सूक्ष्म प्लास्टिक में विघटित होने में 800 साल तक का समय लग सकता है। हालांकि, भारत की मासिक धर्म वाली साढ़े पैंतीस करोड़ महिलाओं में से करीब एक-तिहाई ही सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं, फिर भी उनके लिए निपटान की सही सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियों के लिए बुरे नतीजे सामने आते हैं। इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड को जमान करना, उनके निपटान और परिवहन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त समन्वय नहीं है। इससे मासिक धर्म से जुड़ी वर्जनाएं और भी जटिल हो जाती हैं।
लोन का कहना है कि जब इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड जलाए जाते हैं, तो वे कई जहरीली गैसें छोड़ते हैं। “डिस्पोजेबल पैड में क्लोरीन और प्लास्टिक होता है। कम तापमान पर जलाने पर ये डाइऑक्सिन फ्यूरान सहित बेहद खतरनाक कैंसरकारी गैसें छोड़ते हैं।”
कांगड़ा जिले के एक छोटे से कस्बे की एक केस स्टडी के अनुसार, 56% महिलाएं अपने मासिक धर्म से जुड़ी सामग्री को सामान्य कचरे के साथ कूड़ेदान में डालकर फेंक देती हैं। हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि साक्षात्कार में शामिल 124 महिलाओं में से 15 प्रतिशत सैनिटरी पैड या दूसरे उत्पादों को सामग्री जला रही थीं; नौ प्रतिशत महिलाएं नदियों में फेंक रही थीं, 4 प्रतिशत महिलाएं खुले में फेंक रही थीं और 3 प्रतिशत महिलाएं सामुदायिक कचरा संग्रहण केंद्र में ले जा रही थी।
भारत में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन पर राष्ट्रीय दिशानिर्देश (2015), इस्तेमाल किए गए पैड जैसी चीजों को निपटाने से पहले कागज या मूल पैड कवर से ढकने की सलाह देते हैं। ये दिशानिर्देश सुरक्षित निपटान तरीकों को बढ़ावा देते हैं और अनुचित अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को कम करते हैं।
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लोन कहते हैं कि सैनिटरी कचरे का खुली जमीन पर निपटान अपने आप में समस्या है। वे आगे कहते हैं, “प्लास्टिक आसानी से विघटित नहीं होता और सैकड़ों सालों तक मिट्टी में बना रह सकता है, जिससे जमीन में हानिकारक रसायन निकलते हैं और मिट्टी की उर्वरता और संरचना प्रभावित होती है।” “सैनिटरी पैड में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक माइट्स, लार्वा जैसी सतह के नीचे रहने वाली प्रजातियों और जमीन की उर्वरता बनाए रखने वाले अन्य जीवों की संख्या में कमी ला सकते हैं।”
महिलाओं को बेहतर तरीकों के बारे में बताना
हिमाचल प्रदेश में नगर निगम अपने अधीन आने वाले क्षेत्रों से कचरा एकत्र करता है। लेकिन पंचायत के तहत आने वाले ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर गैर-लाभकारी संगठन हफ्ते में एक बार कचरा जमा करते हैं।
वेस्ट वॉरियर्स एक गैर-सरकारी संगठन है जो ठोस कचरे के प्रबंधन के मुद्दे पर काम कर रहा है और धर्मशाला के पंचायत क्षेत्रों में ठोस कचरे का एकमात्र संग्रहकर्ता है।
उनका कहना है कि सैनिटरी कचरा समेत गीले कचरे का निपटान बड़ी चुनौती बना हुआ है। टीम की एक सदस्य खुशबू कहती हैं, “हम हिमाचल प्रदेश और धर्मशाला में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन पर कई कार्यशालाएं आयोजित कर रहे हैं, जो ना सिर्फ सैनिटरी कचरे के उचित निपटान पर केंद्रित हैं, बल्कि सैनिटरी उत्पादों के टिकाऊ उपयोग पर भी जोर देती हैं।”

वेस्ट वॉरियर्स का कहना है कि पैड जलाने का संबंध सदियों पुरानी आदतों से है। वह कहती हैं, “जो महिला जीवन भर पैड जलाती रही है, वह निपटान के वैकल्पिक तरीकों को कभी नहीं समझ पाएगी।” “यहां के लोग सैनिटरी कचरे को जलाने के दुष्प्रभावों को नहीं समझते।” बत्रा आगे कहती हैं कि महिलाएं अपने पैड कूड़ेदान में भी नहीं फेंकतीं, क्योंकि ज्यादातर कचरा इकट्ठा करने वाले पुरुष ही होते हैं और मासिक धर्म से जुड़ी सामाजिक वर्जनाओं के कारण उन्हें शर्मिंदगी महसूस होती है। वह कहती हैं कि जागरूकता और कपड़े के पैड, टैम्पोन और टिकाऊ पैड जैसे वैकल्पिक तरीकों को अपनाने से इस खामोश आपदा को कम करने में मदद मिल सकती है।
उद्धरण:
विलियम्स, एस. (2023, 8 अगस्त)। मासिक धर्म के दौरान एक दिन में कितने पैड का इस्तेमाल सामान्य है? कॉस्मोपॉलिटन। https://www.cosmopolitan.com/uk/body/a44456321/heavy-flow/
Saahas.org. (2025, 13 जून)। बदलाव का चक्र – Saahas.org।
बीजू, ए. (2023)। भारत में मासिक धर्म उत्पादों का निपटान: निर्णायक बिंदु। द लैंसेट रीजनल हेल्थ – दक्षिण पूर्व एशिया, 15, 100214। https://doi.org/10.1016/j.lansea.2023.100214
बबीता, पाराशर, ए., और पूनम, एस. (2024)। मासिक धर्म अपशिष्ट प्रबंधन पद्धतियां: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा स्थित एक छोटे से कस्बे देहरा की केस स्टडी। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ क्रिएटिव रिसर्च थॉट्स (आईजेसीआरटी), 12(12), e548–e549. https://ijcrt.org/papers/IJCRT2412494.pdf
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 6 अगस्त, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीरः बैग खाली करती हुई रुचिका और उनके सामने जलते हए कुछ पैड। ग्रामीण इलाकों में मासिक धर्म के अपशिष्ट प्रबंधन की व्यवस्था न होने से कई महिलाओं के लिए कचरे को जलाना ही एकमात्र विकल्प है। तस्वीर: आमिर बिन रफ़ी।