- पंजाब 1988 के बाद सबसे भीषण बाढ़ का सामना कर रहा है। इस बाढ़ में लगभग 1,900 गांव डूब गए हैं और कई लोगों की जान चली गई है।
- बचाव अभियान जारी है और स्वयंसेवक कई गांवों में कमजोर हो चुके तटबंधों को भी मज़बूत कर रहे हैं।
- हालाँकि, राज्य सरकार ने प्रभावित लोगों के लिए मुआवज़े की घोषणा की है, लेकिन जानकारों का कहना है कि बाँधों के संचालन में कुप्रबंधन और बाढ़ की तैयारियों की कमी ने बाढ़ के प्रभावों को और बदतर बना दिया है।
पिछले महीने की 26 तारीख को (26 अगस्त) को जब सतलज नदी का पानी पंजाब के फाजिल्का जिले में भारत और पाकिस्तान की सीमा पर बसे गुद्दर भैनी गांव के घरों में घुस गया, पैंतालिस साल की वीरो बाई तभी से एक राहत शिविर में रह रही हैं।
“जब हमने घर छोड़ा, तब पानी तीन फ़ीट तक था। हमने इतने सालों में दिहाड़ी मज़दूरी करके जो भी छोटी-बड़ी चीज़ें बसाई थीं, हमको वो सब छोड़कर आना पड़ा। अब पानी का स्तर बहुत ज़्यादा है, जिससे पूरा गाँव डूब गया है,” उन्होंने मोंगाबे इंडिया को बताया। “मुझे नहीं पता कि हम कभी वापस लौट पाएँगे या नहीं और यह जगह कितनी रहने लायक होगी। 2023 की बाढ़ में भी हमें घर छोड़ना पड़ा था। बेहतर होगा कि सरकार हमें किसी और जगह ज़मीन दे दे ताकि हमें हर दूसरे साल वहाँ से न जाना पड़े।”
वीरो बाई के पड़ोसी गगनदीप सिंह अपने मवेशियों को राहत शिविर में पहुँचाने में तो कामयाब रहे, लेकिन वे अपनी पाँच एकड़ ज़मीन पर खड़ी धान की फसल के नुकसान को लेकर चिंतित हैं। उन्होंने कहा, “पिछली बार (2023 में), हमें बहुत कम मुआवज़ा मिला था जिससे बुवाई का खर्च भी नहीं निकल पाया था। मुझे नहीं पता कि इस बार हालात कैसे बदलेंगे।” उन्होंने आगे बताया कि सिर्फ़ चार महीने पहले मई में, जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा, भी स्थिति बहुत तनावपूर्ण थी और उन्हें डर के साये में रहना पड़ा था।
पंजाब 1988 के बाद से अपनी सबसे भीषण बाढ़ का सामना कर रहा है। इस बाढ़ में लगभग 1,900 गाँव जलमग्न हो गए हैं। इसमें सात ज़िलों के 384,000 लोग प्रभावित हुए हैं, कम से कम 51 लोगों की जान गई है और 4,00,000 एकड़ (1600 वर्ग किलोमीटर) की फसल बर्बाद हो गई है। लुधियाना जैसे शहर अपने ही घरों और उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी में डूब रहे हैं क्योंकि सीवेज ले जाने वाली नदियाँ उफान पर हैं।

इस दौरान राज्य सरकार ने प्रति एकड़ कृषि भूमि के लिए 20,000 रुपए और मृतकों के परिवारों के लिए 4,00,000 रुपए के मुआवजे की घोषणा की है। साथ ही किसानों को अपने खेतों में आने वाली रेत बेचने की अनुमति भी दी गयी है। राज्य सरकार ने 9 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पंजाब दौरे से पहले केंद्र से ₹20,000 करोड़ की वित्तीय राहत भी मांगी है।
राज्य के ज़्यादातर बाढ़ प्रभावित इलाके रावी, व्यास और सतलुज नदियों के निचले इलाकों में स्थित हैं, जो हिमाचल प्रदेश के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में हुई भारी बारिश के कारण उफान पर हैं। हिमाचल प्रदेश में इस मानसून सीज़न में 8 सितंबर तक सामान्य से 46% ज़्यादा बारिश हुई है। इसके कारण 95 बार अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) आई और 136 बड़े भूस्खलन हुए, जिनमें कम से कम 203 लोगों की मौत हुई। इन तीनों नदियों पर बड़े बांध होने के बावजूद, पानी का स्तर ऊँचा बना रहा और पंजाब के निचले जलग्रहण क्षेत्रों में सामान्य से 55% ज़्यादा बारिश के कारण यह और भी बढ़ गया।
राहत और बचाव कार्यों में जमीन पर भारतीय सेना और आपदा प्रतिक्रिया बल काम कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर आपातकालीन सेवाओं के पोस्ट देखकर बड़ी संख्या में वालंटियर आकर कई जगहों पर कमजोर हो चुके तटबंधों को मज़बूत कर रहे हैं। पूरे पंजाब के गाँवों से दान की गई मिट्टी से लदे ट्रैक्टर-ट्रॉलियाँ हर रोज़ इन तटबंधों पर पहुँच रहे हैं। “हम इन लोगों को नहीं जानते और न ही यह जानते हैं कि वे कहाँ से आए हैं। वे बस हमारे गाँव में उस बांध को मज़बूत करने के लिए मिट्टी लेकर आए थे जो टूटने वाला था,” जुगराज सिंह, जिनके 10 एकड़ खेत पानी में डूब चुके हैं। जुगराज सतलुज और ब्यास के संगम पर स्थित हरिके वेटलैंड के पास के घूरम गाँव के रहने वाले हैं।
बाढ़ से प्रभावित परिवारों के लिए खाना, दवाइयाँ और जरूरत के दुसरे सामान लेकर कई ट्रक बाढ़ग्रस्त गाँवों और राहत शिविरों में पहुँच रहे हैं। कई सामाजिक और धार्मिक संगठन और लोग विस्थापित परिवारों और स्वयंसेवकों के लिए सामुदायिक रसोई भी चला रहे हैं। जुगराज सिंह ने मोंगाबे इंडिया को बताया, “ये संगठन और लोग हमें बचाए हुए हैं क्योंकि राज्य प्रशासन ज़्यादातर गायब रहा है। हालाँकि, जब पानी कम होगा तब विस्थापित लोगों को अपने घरों की मरम्मत और खेतों को फिर से स्थापित करने के लिए और अधिक सहायता की आवश्यकता होगी।”
फाजिल्का जिले के कावांवाली के पास तटबंध पर बचाव दल लगभग 20 गांवों में फंसे लोगों के लिए नावें चला रहे हैं, उन्हें पका हुआ खाना, तिरपाल और दवाइयाँ भेज रहे हैं, साथ ही चिकित्सा देखभाल की ज़रूरत वाले लोगों को भी पहुँचा रहे हैं। “कई परिवारों ने महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को राहत शिविरों में या रिश्तेदारों के पास रहने के लिए भेज दिया है। लेकिन कई पुरुष चोरी के डर से यहीं रुक गए हैं। उनके घर या तो गाँव के ऊपरी हिस्से में हैं या वे ऊपरी मंजिलों पर रह रहे हैं,” अखिल भारतीय युवा संघ के सदस्य सुखजिंदर महेसरी कहते हैं। महेसरी तटबंधों को मजबूत करने और प्रभावितों को राहत सामग्री देने के लिए स्वयंसेवा कर रहे हैं। “लेकिन नावें रात में नहीं चलती हैं। इसलिए, अगर रात में कोई चिकित्सा सम्बन्धी आपात स्थिति होती है, तो उन तक कोई सहायता नहीं पहुँच पाती है,” उन्होंने आगे बताया।

अपने मवेशिओं का ख्याल रखते हुए कई लोगों ने अपने मवेशी भी अपने साथ रखे हैं। लेकिन उनकी अलग परेशानियां हैं। महातमनगर गाँव के चीमा सिंह ने कहा, “राहत शिविरों में पर्याप्त शेड नहीं हैं और धूप बहुत तेज़ है। हमारे कई मवेशी पानी या कीचड़ में खड़े हैं, जिससे उनमें खुरपका-मुँहपका रोग लग सकता है।” उन्होंने आगे कहा, “सूखा चारा तो उपलब्ध है, लेकिन खेत पानी में डूबे होने के कारण उन्हें खिलाने के लिए हरा चारा नहीं है।”
इस बीच, कार्यकर्ता और राजनेता बड़े बांधों के संचालन, मानसून की तैयारी में कमी और प्रभावितों को राहत देने में सरकार की धीमी प्रतिक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं।
बांध प्रबंधन की समस्या
पंजाब में बांधों का प्रबंधन एक बेहद संवेदनशील मुद्दा है। प्रदेश अपनी प्रशासनिक सीमाओं से होकर बहने वाली नदियों के पानी के आवंटन और बाढ़ के समय अतिरिक्त पानी छोड़ने में अपनी भूमिका बढ़ाने की मांग करता रहा है। वर्तमान में, केंद्र द्वारा नियंत्रित भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) भाखड़ा और पौंग बांधों का संचालन करता है, जहाँ से मिलने वाले पानी का उपयोग पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे तटवर्ती राज्यों और हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे गैर-तटवर्ती क्षेत्रों द्वारा किया जाता है। पंजाब सरकार रावी नदी पर रणजीत सागर बांध का प्रबंधन करती है।
साल 1988 में भारी बारिश और उसके बाद भाखड़ा तथा पौंग बांधों के द्वार खोल दिए जाने से पंजाब में 2,500 गाँव जलमग्न हो गए थे और करीब 600 लोगों की मौत हुई थी। बोर्ड के खिलाफ अदालती याचिकाओं और पुलिस में मामले दर्ज होने से बीबीएमबी की कार्यकुशलता पर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं।
साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल (SANDRP) के समन्वयक हिमांशु ठक्कर ने कहा, “बांध अधिकारियों द्वारा स्पष्ट रूप से कुप्रबंधन किया गया है। भाखड़ा और पौंग, दोनों बांध 20 अगस्त तक आवश्यक भंडारण सीमा से बाहर थे, लेकिन जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश और हिमाचल प्रदेश व पंजाब में और भी भारी बारिश के पूर्वानुमान के बावजूद पानी का निकास बहुत कम रखा गया।”
ठक्कर ने आगे कहा, “उन्हें अंततः 26 अगस्त से भारी मात्रा में पानी छोड़ना पड़ा, जबकि पंजाब पहले से ही स्थानीय वर्षा के कारण बाढ़ का सामना कर रहा था। रणजीत सागर बांध ने भी 27 अगस्त के बाद से आने वाले पानी से ज़्यादा पानी छोड़ा, जिसका तकनीकी रूप से मतलब है कि इसने बाढ़ को कम करने के बजाय और बढ़ा दिया।”
रणजीत सागर बांध से पानी छोड़े जाने से माधोपुर बैराज के दो गेट क्षतिग्रस्त हो गए, जिसके कारण गुरदासपुर और पठानकोट जिलों का बड़ा भूभाग जलमग्न हो गया।

5 सितंबर को की गई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, बीबीएमबी के अध्यक्ष ने दावा किया कि सदस्य राज्यों के मुख्य अभियंताओं, केंद्रीय जल आयोग, भारतीय मौसम विभाग और कृषि विभाग के प्रतिनिधियों वाली एक तकनीकी समिति ने रूल कर्व्स (जलाशय भंडारण के लिए दिशानिर्देश) और नदियों की वहन क्षमता के आधार पर पानी छोड़ने के फैसले लिए। हालाँकि, वैज्ञानिक आँकड़े और निर्णय लेने की प्रक्रिया अभी भी अस्पष्ट है।
ठक्कर ने कहा, “अधिकारी कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि बांध संचालन से जुड़ी सारी जानकारी, जिसमें रूल कर्व, दैनिक अंतर्वाह, बहिर्वाह, भंडारण, बारिश और बाढ़ के बहाव की अनुप्रवाह वहन क्षमता का संतुलन शामिल है, सार्वजनिक कर दें।” उन्होंने आगे कहा, “तकनीकी समिति के सभी सदस्य इस आपदा के लिए स्पष्ट रूप से ज़िम्मेदार हैं और केवल एक स्वतंत्र न्यायिक जाँच ही सच्चाई को उजागर कर सकती है।”
हिमाचल प्रदेश सरकार ने बीबीएमबी के खिलाफ पहले ही एफआईआर दर्ज करा दी है, जिसमें उस पर बिना किसी चेतावनी के अतिरिक्त पानी छोड़ने का आरोप लगाया गया है, जिससे कांगड़ा जिले के दो क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई थी।
पंजाब के कार्यकर्ताओं के एक समूह, पब्लिक एक्शन कमेटी (पीएसी) मत्तेवाड़ा ने भी राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) में एक याचिका दायर की है। इस याचिका में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति के माध्यम से बाढ़ प्रबंधन और रोकथाम पर बीबीएमबी और पंजाब सरकार के कामकाज के ऑडिट की मांग की गई है। पीएसी मत्तेवाड़ा के सदस्य जसकीरत सिंह ने मोंगाबे इंडिया को बताया, “हमारे बांधों ने जोखिम कम करने के बजाय बाढ़ की स्थिति और बिगाड़ दी है। यह केवल प्रकृति का प्रकोप नहीं है, बल्कि मानवीय लापरवाही भी है। पारदर्शिता और जवाबदेही ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है।”
जल निकासी, गाद और तटबंध
इस साल जुलाई में, पंजाब सरकार ने दावा किया था कि उसने बाढ़ की तैयारियों पर ₹276 करोड़ खर्च किए हैं और राज्य किसी भी बाढ़ जैसी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है। जल संसाधन मंत्री बरिंदर कुमार गोयल ने कहा था कि नालों की गाद निकालने, तटबंधों को मज़बूत करने और चेकडैम के निर्माण के लिए कई परियोजनाएँ पूरी हो चुकी हैं। हालाँकि, हालिया बाढ़ के बाद कई लोग इन दावों पर सवाल उठा रहे हैं।

“नदियों में और उनके किनारे अवैध रेत खनन, नदी के बाढ़ के मैदानों और अन्य प्राकृतिक जल निकायों पर अतिक्रमण और 2023 की बाढ़ के बाद बांधों को मजबूत करने में विफलता के कारण स्थिति और खराब हो गई है,” जसकीरत सिंह ने कहा।
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने पहले भी राज्य सरकार को अवैध रेत खनन पर रोक लगाने और रावी नदी में खनन पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने इस खनन से होने वाली पर्यावरणीय और सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर भी प्रकाश डाला है। सतलुज नदी के डूब क्षेत्र में अतिक्रमण का मुद्दा एनजीटी तक भी पहुँचा है, जिसने उल्लंघनकर्ताओं के बारे में जानकारी देने से बचने के लिए सरकारी अधिकारियों पर जुर्माना लगाया है।
हिमाचल प्रदेश के ऊपरी इलाकों में निर्माण गतिविधियों, जलविद्युत परियोजनाओं और राजमार्ग विस्तार में तेजी के कारण नदियों में मलबा डालने के अलावा भूस्खलन की घटनाओं में भी वृद्धि हुई है। बीबीएमबी अध्यक्ष ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दावा किया कि इन सभी गतिविधियों के कारण भाखड़ा बांध के जलाशय, गोबिंद सागर झील में गाद जमाव बढ़ गया है, जिससे इसकी क्षमता 25% कम हो गई है। बोर्ड अब जलाशय से गाद निकालने पर विचार कर रहा है, लेकिन कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि परिवहन की उच्च लागत और मलबा डालने के लिए जगह की कमी के कारण यह व्यावहारिक समाधान नहीं है।
“इसके बजाय, हमें विकास परियोजनाओं के लिए कड़े पर्यावरणीय मानदंडों और वन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बेहतर नीतियों की आवश्यकता है, जिससे पहाड़ों की जल अवशोषण क्षमता बढ़ेगी और बाढ़, भूस्खलन और बांधों में गाद जमाव में कमी आएगी,” अमेरिका के आयोवा स्टेट यूनिवर्सिटी में कृषि एवं जल संसाधन इंजीनियरिंग के प्रोफेसर और पंजाब के एक निजी विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके रमेश कंवर ने कहा। “जलग्रहण क्षेत्र में छोटे जलाशय बनाए जा सकते हैं, जो न केवल बाढ़ से सुरक्षा प्रदान करेंगे, बल्कि शुष्क मौसम में जल सुरक्षा भी सुनिश्चित करेंगे।”
जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल के अनुमानों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय उपमहाद्वीप में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में 20% की वृद्धि की चेतावनी दी गई है, इसलिए जलग्रहण क्षेत्रों, बाढ़ के मैदानों और नदी पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस बीच, जो लोग इस बाढ़ से बच गए हैं, उनके लिए तत्काल समाधान अत्यंत आवश्यक है। “मुझे लगता है कि हमें घर वापस जाने में अभी एक महीना और लगेगा। जब तक गाँव के पास एक मज़बूत तटबंध नहीं बनता, हम एक उज्जवल भविष्य की उम्मीद नहीं कर सकते,” वीरो बाई ने कहा।
बैनर तस्वीर: फाज़िल्का जिले के कवांवाली में डूबा एक पुल। राज्य सरकार ने किसानों और मृतकों के परिवारों के लिए मुआवज़े की घोषणा की है। साथ ही, केंद्र से ₹20,000 करोड़ की आर्थिक सहायता की भी माँग की है। तस्वीर -मनु मौदगिल।