- उत्तर प्रदेश (यूपी) ने प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली (पीएमएसजी) योजना के तहत रूफटॉप सोलर के लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है।
- हालाँकि, उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में, रूफटॉप सोलर प्लांट लगवाने वाले लोगों की सबसे बड़ी शिकायत बढ़े हुए या गलत बिल आना है। उपभोक्ता कम बिजली उत्पादन से भी परेशान हैं।
- राज्य सब्सिडी और नेट मीटर कॉन्फ़िगरेशन में देरी, घटिया उपकरण, वित्तपोषण और अनियमित बिजली आपूर्ति जैसी प्रमुख चुनौतियों से निपटना होगा।
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के जानीपुर गांव के रमेश सिंह ने पिछले साल जब अपने दो मंज़िला घर की छत पर तीन किलोवाट का सोलर रूफटॉप प्लांट लगवाया, तो उन्हें उम्मीद थी कि इस प्लांट से उनके घर की बिजली की जरूरतें पूरी होंगी और उनका बिजली का बिल कम होगा सकेगा। शुरुआत में ऐसा हुआ भी, और उनका बिल बहुत कम आया। लेकिन, उनकी उम्मीदों के उलट जुलाई में उन्हें तीन महीने का ₹12,269 का बिल देखकर झटका लगा। उन्होंने कहा, “पहले मुझे हर महीने लगभग ₹700-800 का बिल आता था। अब, लोड उतना ही होने के बावजूद, मुझे समझ नहीं आ रहा कि मेरा बिल कैसे बढ़ गया।”
सिंह ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं हैं जिनके बिजली के बिल इस तरह से बढ़ गए हों। गोरखपुर ज़िले के खजनी कस्बे में, बृजेश मोदनवाल ने अप्रैल 2025 में पाँच किलोवाट का सोलर प्लांट लगवाया था, इस उम्मीद में कि बिल कम से कम आएगा। 7 जुलाई तक, उन्हें तीन महीने का ₹22,295 का बिल मिला, जिससे वे हैरान रह गए। पूरे राज्य से बढ़े हुए बिलों की ऐसी ही शिकायतें आ रही हैं।
इन बिजली उपभोक्ताओं के ऐसे अनुभव, देश में रूफटॉप सोलर को बढ़ावा देने के उद्देश्य से फरवरी 2024 में शुरू की गई प्रधानमंत्री सूर्य घर: मुफ़्त बिजली योजना (पीएमएसजी: एमबीवाई) के तहत उम्मीदों और हकीकत के बीच के अंतर को उजागर करते हैं। उत्तर प्रदेश ने इस परियोजना के महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए हैं और प्रदेश इसके क्रियान्वयन में राष्ट्रीय स्तर पर पहले तीन राज्यों में से एक है। इसके बावजूद भी राज्य के कई जिले अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उपभोक्ता बढ़े हुए बिलों और अन्य चुनौतियों से जूझ रहे हैं।

बड़ा प्रयास, असमान परिणाम
उत्तर प्रदेश नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी (यूपीएनईडीए) के आंकड़ों के अनुसार, राज्य ने मार्च 2026 तक 2,65,211 आवासीय रूफटॉप सोलर प्लांट स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। राज्य के 75 जिलों में से प्रत्येक का बुनियादी ढांचे और क्षमता के आधार पर अपना लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
हालांकि, 15 जुलाई तक, केवल कुछ ही ज़िले इस लक्ष्य तक पहुँच पाए हैं, जबकि दुसरे जिले इन लक्ष्यों में पिछड़ रहे हैं। पहले 15 जिलों में 10 नगर निगम शामिल हैं जिन्हें ‘सोलर शहरों’ के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। राज्य ने उत्तर प्रदेश के सभी 17 नगर निगमों को ‘सोलर शहरों’ के रूप में विकसित करने के लिए एक नीति का ड्राफ्ट तैयार किया है। हालाँकि, इन 17 नगर निगमों में से केवल 10 ही PMSG: MBY को लागू करने में शीर्ष 15 जिलों में शामिल हैं।
राजधानी लखनऊ 37,383 संयंत्रों के साथ सबसे आगे है, जो इस वर्ष के 18,962 के लक्ष्य से लगभग दोगुना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी ने भी अपने वार्षिक लक्ष्य को पार कर लिया है, जहाँ 14,657 के लक्ष्य के मुकाबले 15,548 संयंत्र स्थापित किए गए हैं। कानपुर नगर ने भी अच्छा प्रदर्शन किया है, जहाँ 4,000 के लक्ष्य के मुकाबले 10,368 संयंत्र स्थापित किए गए हैं।
इसके विपरीत, आगरा, बरेली, प्रयागराज, मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर, गोरखपुर, ग़ाज़ियाबाद और उन्नाव जैसे कई प्रमुख जिले लक्ष्य से पीछे चल रहे हैं, वहीं कुछ जिले 2026 तक अपने समग्र लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाएंगे। PMSG: MBY के संदर्भ में प्रमुख 15 ज़िलों की ये हालिया स्थिति है।
योजना के प्रगति में इस असमान के बावजूद, यूपीनेडा के निदेशक इंद्रजीत सिंह लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आश्वस्त दिखाई देते हैं।”हमारे पास 31 मार्च, 2026 तक का समय है, और सभी जिले तब तक अपने लक्ष्य हासिल कर लेंगे,” उन्होंने कहा।
उपभोक्ताओं की चिंता
रमेश सिंह और बृजेश मोदनवाल जैसे उपभोक्ता अपने बढ़े हुए बिलों को दोष देते हैं, लेकिन अधिकारी अलग-अलग कारण बताते हैं। गोरखपुर के कौड़ीराम में बिलिंग का काम संभालने वाली एक निजी बिजली मीटरिंग कंपनी के प्रतिनिधि ने बताया कि सिंह का नेट मीटर अभी तक कॉन्फ़िगर नहीं किया गया है। पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (पीवीवीएनएल) के कार्यालय में कार्यरत प्रतिनिधि ने कहा, “उनका (सिंह का) नेट मीटर पहले से ही लगा हुआ है। इसे अभी तक सही बिल बनाने के लिए कॉन्फ़िगर नहीं किया गया है। इसके अलावा, स्मार्ट मीटर उपलब्ध नेटवर्क के आधार पर काम करता है। अगर नेटवर्क नहीं है, तो मीटर केवल निश्चित शुल्क दिखाएगा, और बिल में वही दिखाई देगा, यही वजह है कि शुरुआत में कुछ ग्राहकों को बहुत कम बिल मिलते हैं।” प्रतिनिधि ने नाम न छापने का अनुरोध किया क्योंकि वे मीडिया से बात करने के लिए अधिकृत नहीं हैं।
मोदनवाल के बारे में बात करते हुए पीवीवीएनएल के उप-मंडल अधिकारी, भोलानाथ ने कहा कि उनके रूफटॉप सिस्टम से उत्पन्न अतिरिक्त बिजली का लाभ वित्तीय वर्ष के अंत में ही समायोजित किया जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि मोदनवाल का सोलर रूफटॉप प्लांट भी “खराब गुणवत्ता का प्रतीत होता है।”
सभी जिलों में, बढ़े हुए या गलत बिल की शिकायतें आम हैं। उपभोक्ता भी अपने प्लांट से निकलने वाले बिजली के खराब उत्पादन से निराश हैं।
खजनी में, दवा विक्रेता राजकुमार कसौधन ने बताया कि उनका दो किलोवाट का सिस्टम उनके विक्रेता द्वारा दिए गए 13 यूनिट के वादे के विपरीत, मुश्किल से पाँच से छह यूनिट प्रतिदिन का उत्पादन कर पाता है। उन्होंने बताया, “अगर दिन में सात से आठ घंटे बिजली गुल रहती है, तो प्लांट उम्मीद के मुताबिक उत्पादन नहीं कर पाता।”
अधिकारी इस समस्या को स्वीकार करते हैं, लेकिन कम बिजली उत्पादन के लिए खराब उपकरणों और स्थानीय मौसम को ज़िम्मेदार बताते हैं। पीवीवीएनएल के मुख्य अभियंता आशुतोष श्रीवास्तव ने भी बताया कि कुछ विक्रेता घटिया सौर ऊर्जा सिस्टम बेच रहे हैं।
भोलानाथ ने आगे कहा, “बुंदेलखंड क्षेत्र में, जहाँ गर्मियों में मौसम बेहद गर्म होता है, सोलर प्लांट बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। यहाँ (गोरखपुर) प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं है।”
सोलर प्लांट से जुडी अन्य चुनौतियाँ बिलिंग और बिजली उत्पादन से कहीं आगे तक जाती हैं। विक्रेता और उपभोक्ता राज्य द्वारा सब्सिडी के भुगतान में देरी की ओर इशारा करते हैं। महाराजगंज जिले के आनंदनगर कस्बे के निवासी विक्रेता वीरेंद्र जायसवाल ने बताया कि उनके ग्राहकों को केंद्रीय सब्सिडी मिल गई है, लेकिन वे अभी भी राज्य के योगदान का इंतज़ार कर रहे हैं। उनमें से एक, विद्या मौर्या ने पुष्टि की, “मेरा तीन किलोवाट का प्लांट फरवरी में लगा था और मुझे केंद्र से तीन महीने में 78,000 रुपए मिले, लेकिन राज्य से मुझे 30,000 रुपए नहीं मिले।”
आईआईटी बॉम्बे के ऊर्जा विज्ञान एवं इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर चेतन सिंह सोलंकी कहते हैं कि PMSG: MBY को लागू करने में सबसे बड़ी चुनौती सरकारी निकायों, विभागों, अधिकारियों, विक्रेताओं और उपभोक्ताओं सहित विभिन्न हितधारकों में ऊर्जा के बारे में अज्ञानता है। “जिस तरह से इस योजना को लागू किया जा रहा है, वह अपने आप में समस्याजनक है। ज़्यादातर लोग सरकारी सब्सिडी पाने और अपने बिजली के बिल कम करने के लिए सौर ऊर्जा संयंत्र लगवाते हैं, लेकिन एक बार संयंत्र लग जाने के बाद, वे अक्सर अपनी खपत बढ़ा देते हैं। अपनी बिजली की खपत कम करने के बजाय, ज़्यादातर लाभार्थी सौर ऊर्जा संयंत्र लगवाने के बाद एयर कंडीशनर जैसे अतिरिक्त उपकरण लगवा लेते हैं। PMSGY का डिज़ाइन अच्छा नहीं है क्योंकि यह सिर्फ़ सब्सिडी देने के पुराने मॉडल पर आधारित है।”
उन्होंने बताया कि विक्रेता अक्सर, खासकर ग्रामीण इलाकों में, मुनाफ़ा कमाने के चक्कर में सस्ते उपकरण लगाते हैं। वे इस बात की जांच नहीं करते कि जिस छत पर वे सौर ऊर्जा संयंत्र लगा रहे हैं, वहाँ पर्याप्त धूप उपलब्ध है या नहीं।

गोरखपुर जैसे जिलों में सोलर रूफटॉप संयंत्रों के कमज़ोर प्रदर्शन पर टिप्पणी करते हुए, सोलंकी ने कहा कि विक्रेता अक्सर ग्रामीण इलाकों में उपभोक्ताओं को सिर्फ़ अपना उत्पाद बेचने और मुनाफ़ा कमाने के लिए सस्ते और बिना जाँचे-परखे उपकरण उपलब्ध कराते हैं।
वसुधा फाउंडेशन में क्लीन पावर, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज के एसोसिएट डायरेक्टर जयदीप सारस्वत उत्तर प्रदेश सरकार के साथ मिलकर स्वच्छ ऊर्जा अनुप्रयोगों को बढ़ावा देते हैं और राज्य में सौर ऊर्जा संयंत्र विक्रेताओं को प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को सौर ऊर्जा संयंत्रों के उपयोग के बारे में जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा, “उपभोक्ता आमतौर पर सौर ऊर्जा संयंत्र चलाने के तरीके से अनजान होते हैं। वे कई दिनों तक पैनल की सफाई नहीं करते। पैनल को नियमित रूप से कपड़े से साफ करना पड़ता है। इसके अलावा, यह धारणा कि बारिश के बाद पैनल साफ हो जाएगा, पूरी तरह सच नहीं है। कई बार, हमें और अधिक गंदगी दिखाई देती है और इसलिए तुरंत सफाई की आवश्यकता होती है।”
ग्रामीण उपभोक्ताओं का विरोध
उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में रात के समय बिजली कटौती होती है और दिन के समय में बिजली की उपलब्धता होती है।ऐसे में बिजली की इसी अनियमित उपलब्धता के कारण लोगों को इसमें पैसा लगाने में कोई फायदा नहीं दिखता। विक्रेताओं का कहना है कि ग्रामीण इलाकों में इसे अपनाने की रफ़्तार धीमी है। इन इलाकों में लोगों को रूफटॉप सिस्टम लगाने के लिए राजी करना मुश्किल है। वाराणसी स्थित सौर ऊर्जा संयंत्र विक्रेता अजीत मिश्रा ने बताया कि चूँकि ये संयंत्र केवल बिजली उपलब्ध होने के समय (दिन में) पर ही बिजली उत्पन्न करते हैं और कई ग्रामीण इलाकों में अभी भी निरंतर बिजली आपूर्ति का अभाव है, इसलिए ग्रामीण ग्राहकों को इन्हें लगाने के लिए राजी करना एक बड़ी समस्या है।
इस योजना में वित्तपोषण एक और बड़ी बाधा है। मिश्रा ने कहा कि बिजली विभाग के रिकॉर्ड और आधार कार्ड में नामों के बीच बेमेल होने के कारण कई ऋण आवेदन अटक जाते हैं। “ऐसे कई मामले हैं जहां बिजली विभाग के पास उपलब्ध उपभोक्ताओं के नाम उनके वास्तविक नामों से अलग हैं। बैंक ऋण आवेदनों को तभी आगे बढ़ाते हैं जब उपभोक्ताओं के नाम उनके आधार कार्ड में विवरण से मेल खाते हैं, और बिजली विभाग को नाम सुधार की प्रक्रिया में लंबा समय लगता है। कई मामलों में, ग्राहक की मृत्यु के बाद उपभोक्ताओं का विवरण बिजली विभाग के डेटाबेस में अपडेट नहीं किया गया है। इन सुधारों में भी समय लगता है,” मिश्रा ने कहा। नतीजतन, कई आवेदन लंबित हैं। उदाहरण के लिए, हमारी कंपनी द्वारा बैंकों को दिए गए 192 ऋण आवेदन वाराणसी में लंबित हैं – भदोही में 70, मिर्जापुर में 23 और जौनपुर में 92।
विक्रेताओं को उन उपभोक्ताओं के प्रतिरोध का भी सामना करना पड़ता है जो ज़्यादा बिल आने की आशंका से परेशान हैं। मिश्रा ने कहा, “ग्रामीण इलाकों में, कई ग्राहक नियमित रूप से बिल भरने के आदी भी नहीं हैं। साथ ही, जहाँ एयर कंडीशनर (एसी) की ज़रूरत नहीं होती, वहाँ उपभोक्ता सोलर प्लांट लगवाने की ज़रूरत महसूस नहीं करते। दरअसल, अगर स्मार्ट मीटरों को उत्पादित और खपत की गई बिजली यूनिटों की गणना करने के लिए कॉन्फ़िगर नहीं किया गया है, तो सोलर रूफटॉप लगाने से बिजली का बिल ज़्यादा आ सकता है।”
हालांकि, सारस्वत अभी भी आशान्वित हैं। उन्होंने कहा, “इस स्तर की किसी भी योजना के क्रियान्वयन में समय लगेगा। कुछ प्रमुख मुद्दे हैं जिनका समाधान किया जाना ज़रूरी है। इन सभी मुद्दों से हितधारकों को अवगत करा दिया गया है और इनके समाधान के लिए ज़िला-स्तरीय समितियाँ गठित की गई हैं। एक बार जब हम संतुलन पर पहुँच जाएँगे, तो इनका समाधान हो जाएगा, लेकिन हमें उपभोक्ताओं में जागरूकता पैदा करने की ज़रूरत है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 25 अगस्त, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: गोरखपुर के भिलोरा गांव में दिलीप जायसवाल के घर पर सोलर रूफटॉप प्लांट। तस्वीर -शिखा सलारिया/मोंगाबे द्वारा।