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जंगल की आग में शीर्ष जिलों में क्यों शामिल है छत्तीसगढ़ का बीजापुर

बैनर तस्वीर: छत्तीसगढ़ के बीजापुर के जंगल में लगी आग। आँकड़े बताते हैं कि बीजापुर के जंगलों में हर साल हजारों बार आग लगती है। तस्वीर - अलोक पुतुल।
  • भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़ दें तो पिछले दो दशकों से छत्तीसगढ़ का बीजापुर और महाराष्ट्र का गढ़चिरौली, उन शीर्ष ज़िलों में हैं, जहां के जंगलों में आगजनी की सर्वाधिक घटनाएं होती हैं।
  • विश्व बैंक की सहायता से वन मंत्रालय द्वारा किए गए एक अध्ययन से यह बात सामने आई कि जंगल की आग से प्रभावित 48 फीसदी हिस्सा, मध्य-भारत के 20 ज़िलों में था, जिनमें छत्तीसगढ़ के 7 ज़िले शामिल थे।
  • जंगल में आगजनी की अधिकांश घटनाएं मानव लापरवाही के कारण होती हैं। इसके अलावा तेंदू पत्ता के लिए या महुआ बीनने के लिए भी जंगल में आग लगाई जाती है। लेकिन माओवाद प्रभावित इलाकों में इंप्रोवाइज़्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस यानी आईईडी और बूबी-ट्रैप से निपटने के लिए भी जंगलों में आगजनी की जाती है।

छत्तीसगढ़ का बस्तर माओवादी हिंसा के लिए पूरे देश में चर्चा में रहता है लेकिन इसी बस्तर का बीजापुर इलाका, जंगल में लगने वाली आग के लिए भी कुख्यात हो चुका है। आँकड़े बताते हैं कि बीजापुर के जंगलों में हर साल हजारों बार आग लगती है, कभी पेड़ों से गिरे सूखे पत्तों में, कभी पहाड़ियों की ढलानों पर और कभी उन जंगली रास्तों में, जिनसे सुरक्षा बल माओवादियों का पीछा करते हैं। हालत ये है कि पूर्वोत्तर के राज्यों को छोड़ दें तो पूरे देश में महाराष्ट्र का गढ़चिरौली और छत्तीसगढ़ का बीजापुर, पिछले दो दशकों से उन शीर्ष ज़िलों में शुमार हैं, जहां के जंगल में सर्वाधिक आगजनी की घटनाएं होती हैं। गढ़चिरौली के दावानल के कई कारण हैं लेकिन बीजापुर के जंगलों में लगने वाली आग के कारण चौंकाने वाले हैं।

विश्व बैंक की सहायता से वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा कराए गए अध्ययन में यह बात सामने आई कि 2003 से 2016 के बीच जंगल की आग से प्रभावित कुल क्षेत्र का लगभग 48.18 फीसदी हिस्सा मध्य भारत के 20 ज़िलों में था। जिनमें अकेले छत्तीसगढ़ के 7 ज़िले शामिल थे। पूरे देश में इन 14 सालों में, आग से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रफल वाले ज़िलों की बात करें तो महाराष्ट्र का गढ़चिरौली पहले नंबर पर और छत्तीसगढ़ का बीजापुर दूसरे नंबर पर था।

इस आंकड़े से पता चलता है कि 2003 से 2016 के बीच महाराष्ट्र के गढ़चिरोली में आग से जंगल का 4,106 वर्ग किलोमीटर इलाका प्रभावित हुआ, जो देश में सर्वाधिक था। इस अवधि यानी 2003-2016 के बीच भारत में आग से नष्ट हुए क्षेत्र का यह 8.24 फीसदी था। देश के जंगलों में आगजनी के दूसरे क्रम में छत्तीसगढ़ का बीजापुर इलाका था, जहां इस दौरान 2,633 वर्ग किलोमीटर इलाके का जंगल जल गया। यह देश के जंगलों में लगे आग का 5.29 फीसदी था। इसी तरह देश में चौंथे नंबर पर छत्तीसगढ़ का नारायणपुर था, जहां आग से 1,346 वर्ग किलोमीटर का इलाका प्रभावित हुआ। यह देश की कुल आगजनी का 2.70 फीसदी था।

भारतीय वन सर्वेक्षण का 2004-05 से 2016-17 तक किया गया एक अध्ययन बताता है कि पूर्वोत्तर के राज्यों को छोड़ दें तो पूरे भारत में अत्यधिक अग्नि संवेदनशील वन क्षेत्र छत्तीसगढ़ में है, जिसका दायरा 2140 वर्ग किलोमीटर है। 1677 वर्ग किलोमीटर के साथ महाराष्ट्र दूसरे क्रम में और 1449 वर्ग किलोमीटर के साथ ओडिशा तीसरे क्रम में है। छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में अत्यधिक अग्नि संवेदनशील वन क्षेत्र का दायरा महज 109 वर्ग किलोमीटर है।

छत्तीसगढ़ के जंगल में लगने वाली आग की भयावहता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि पूर्वोत्तर के राज्यों को छोड़ दिया जाए तो पूरे देश के जंगलों में ‘आग लगने की अत्यंत आशंका वाले’ वन आवरण का सर्वाधिक क्षेत्र छत्तीसगढ़ में है, जो लगभग 1935.04 वर्ग किलोमीटर है।

छत्तीसगढ़ का 3,655.58 वर्ग किलोमीटर वन आवरण, ‘अत्यधिक आग लगने की आशंका वाला’ इलाका है। वहीं ‘अधिक आग लगने की आशंका’ और ‘मध्यम रुप से आग लगने की आशंका’ वाले क्षेत्र की बात करें तो छत्तीसगढ़ का क्रमशः 8,159.70 और 11,275.57 वर्ग किलोमीटर इस दायरे में आता है। छत्तीसगढ़ का कम से कम 30,691.11 वर्ग किलोमीटर वन आवरण ऐसा है, जो आग लगने की ‘कम आशंका’ वाला क्षेत्र है।

आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि 59,772 वर्ग किलोमीटर कुल वन आवरण वाले छत्तीसगढ़ का 55,717 वर्ग किलोमीटर का वन आवरण, किसी न किसी तरह आगजनी की आशंका वाला इलाका बना हुआ है।

इसलिए लगती है आग

भारत के विशाल भूभाग में फैले जंगल केवल हरियाली का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका, जैव विविधता और जलवायु संतुलन की आधारशिला हैं। लेकिन इन जंगलों को हर साल एक मौन आपदा निगलती है – दावानल यानी जंगल की आग। भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार, देश का लगभग 55% वन क्षेत्र हर साल किसी न किसी रूप में आग की चपेट में आता है। यह संख्या केवल आकस्मिक या प्राकृतिक घटनाओं का परिणाम नहीं है, बल्कि 90% से अधिक आग मानव गतिविधियों से जुड़ी हुई मानी जाती हैं।

वनाग्नि सिर्फ़ पेड़ों को नहीं जलाती, बल्कि यह मिट्टी की उर्वरता घटाती है, भूजल स्तर को प्रभावित करती है और जैव विविधता को स्थायी क्षति पहुँचाती है। यह परिघटना जलवायु परिवर्तन से भी गहराई से जुड़ी है, क्योंकि आग से निकलने वाला धुआँ और कार्बन वातावरण को और गर्म करता है।

बस्तर का भूभाग मुख्यतः शुष्क पर्णपाती वनों से ढका हुआ है। बीजापुर के इलाके में मिश्रित वन पाए जाते हैं। कुछ इलाकों में सागौन के जंगल हैं। गर्मी आने से पहले ये पेड़ अपने पत्ते गिरा देते हैं। ज़मीन पर सूखे पत्तों की मोटी परत बिछ जाती है, जो आग के लिए तैयार ईंधन बन जाती है। बस्तर की भौगोलिक स्थिति यानी पहाड़ी, घने जंगल और दुर्गम इलाके आग बुझाने को बेहद कठिन बना देती है।

पिछले कई सालों के आंकड़े देखें तो एक बात बहुत साफ समझ में आती है कि मध्य-भारतमें जनवरी-फरवरी में इस इलाके में आग की घटनाएं कम रहती हैं। लेकिन मार्च और अप्रैल तक आगजनी के मामले अपने चरम पर पहुंच जाते हैं। मई में भी इसकी भयावहता बनी रहती है। जून के पहले सप्ताह तक छत्तीसगढ़ में मानसून का प्रवेश, बस्तर के इलाके से ही होता है और फिर मानसून की पहली बारिश आग को स्वतः शांत कर देती है।

मार्च-अप्रैल में महुआ के फूल गिरते हैं। ये फूल आदिवासी जीवन की धुरी हैं। इनसे शराब, मिठाइयाँ और तेल बनता है। बाज़ार में इनकी बिक्री से नक़द आमदनी होती है। लेकिन फूल इकट्ठा करने के लिए ग्रामीण ज़मीन पर गिरे पत्तों को हटाते हैं। और इन पत्तों को हटाने का सबसे आसान तरीका है- उनमें आग लगा देना।

इसी तरह हरा सोना कहे जाने वाला तेंदू पत्ता, जंगल में रहने वाले लोगों की आजीविका का सबसे बड़ा साधन है। अप्रैल-मई में तेंदू के कोमल पत्ते निकलते हैं। ये पत्ते बीड़ी उद्योग की रीढ़ हैं। आदिवासी इन्हें तोड़कर सरकार को बेचते हैं। यह सालाना नक़द आमदनी का सबसे बड़ा स्रोत है। बाज़ार में सबसे अधिक क़ीमत कोमल पत्तों की होती है। लेकिन नया, कोमल पत्ता तभी निकलता है जब पुरानी झाड़ियाँ साफ़ हों। इसके लिए भी जंगल में आग लगाई जाती है।

कहा जा सकता है कि जंगल की आग, सीधे तौर पर यहां की अर्थव्यवस्था और रोजगार से जुड़ी हुई है। हालांकि पिछले कुछ सालों में लोगों के भीतर जागरुकता आई है और महुआ, तेंदू पत्ता जैसे वनोपज के लिए जंगल में आग लगाने की घटनाओं पर रोक भी लगी है। लेकिन इसके बाद भी आगजनी की घटनाओं में कमी नहीं आई है।

इसके पीछे एक बड़ा कारण है पुलिस-माओवादी संघर्ष।

आईईडी से बचने आगजनी

छत्तीसगढ़ के इलाके में माओवादी किसी भी स्थिति में सुरक्षाबलों से सीधे संघर्ष से बचते हैं। यही कारण है कि वे सुरक्षाबलों को नुकसान पहुंचाने के लिए आईईडी यानी इम्प्रोवाइज़्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस या बूबी-ट्रैप का उपयोग करते हैं।

आईईडी असल में ऐसा विस्फोटक उपकरण होता है, जिसे किसी फ़ैक्ट्री में नहीं बल्कि उपलब्ध संसाधनों को जोड़कर बनाया जाता है। इनका आकार-प्रकार हमेशा एक जैसा नहीं होता। कभी ये डिब्बे, कभी टिफ़िन बॉक्स, कभी बैग या प्रेशर कुकर के रूप में मिलते हैं। दिखने में साधारण लगने वाले ये उपकरण वास्तव में बेहद ख़तरनाक होते हैं। सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि एक छोटा-सा आईईडी भी भारी वाहन को नुकसान पहुँचा सकता है और पैदल जवानों की जान ले सकता है। माओवादी हिंसा के इतिहास की पड़ताल करने से पता चलता है कि बस्तर में सुरक्षाबलों को अब तक सर्वाधिक नुकसान इन्हीं आईईडी की वजह से हुआ है।

छत्तीसगढ़ के जंगलों में आईईडी का पता लगाते सुरक्षा बल। तस्वीर - आलोक प्रकाश पुतुल।
छत्तीसगढ़ के जंगलों में आईईडी का पता लगाते सुरक्षा बल। तस्वीर – आलोक प्रकाश पुतुल।

इसी तरह बूबी-ट्रैप एक तरह का छिपा हुआ जाल होता है। ज़रूरी नहीं कि इसमें विस्फोटक का उपयोग किया गया हो। कई बार इन्हें इस तरह लगाया जाता है कि कोई राहगीर या जवान अनजाने में इनके संपर्क में आ जाए और घायल हो जाए। कभी ज़मीन में गड्ढा खोदकर उसमें लोहे के नुकीले काँटे लगा दिए जाते हैं तो कभी रास्ते पर ऐसी चीज़ें रख दी जाती हैं जिन्हें छूते ही गंभीर चोट लग जाए।

आईईडी और बूबी-ट्रैप अक्सर उस जगह लगाए जाते हैं, जहाँ सुरक्षाबलों के जवान कम सावधानी बरतते हैं। जैसे कच्ची सड़कें, पगडंडियाँ या घने जंगलों के रास्ते और इन्हें पत्तियों से ढक दिया जाता है।

कई बार ये आईईडी कमांड-डिटोनेटेड होते हैं और इन्हें दूर से किसी तार, सिग्नल या आदेश से सक्रिय किया जाता है। इसी तरह प्रेशर-प्लेट आईईडी, किसी के कदम रखने या वाहन के दबाव से फट जाते हैं। लिंक्ड या सीरीज़ आईईडी में कई विस्फोटक एक साथ लगाए जाते हैं ताकि ज़्यादा से ज़्यादा नुकसान हो।

आरोप है कि इन्हीं आईईडी और बूबी ट्रैप से बचने के लिए सुरक्षाबलों के जवान, माओवादियों के ख़िलाफ़ ऑपरेशन के दौरान, जंगल में आग लगा देते हैं।

बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार मनीष गुप्ता कहते हैं, “पिछले कुछ सालों में माओवादियों के ख़िलाफ़ बस्तर में सुरक्षाबलों का अभियान तेज़ हुआ है। बीजापुर हो या नारायणपुर, जब स्पेशल पुलिस फोर्स या डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड के जवान माओवादियों के ख़िलाफ़ ऑपरेशन के लिए निकलते हैं तो आईईडी और बूबी-ट्रैप से बचने के लिए, जंगल में आग लगा देते हैं, जिससे रास्ता साफ हो जाए, आईईडी के तार जल जाएं और अगर कोई विस्फोटक सतह के आसपास हो तो वह भी नष्ट हो जाए।”

हालांकि पुलिस अधिकारी इस मुद्दे पर बात नहीं करना चाहते। कुछ समय पहले मीडिया से बातचीत में बस्तर के आईजी पुलिस सुंदरराज ने स्वीकार किया कि जंगल में फोर्स द्वारा आगजनी की घटनाएं पहले हुई होंगी। सुंदरराज पी के अनुसार, “अब ऐसी घटनाएं न के बराबर होती हैं। विजिबिलिटी के लिए अब सड़कों की चौड़ाई बढ़ाई जा रही है।”

वन विभाग के अधिकारी भी इस मुद्दे पर बात करने से बचते हैं।

राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्रीनिवास राव ने मोंगाबे हिंदी से कहा, “इस तरह का कोई अध्ययन सामने नहीं आया है कि सुरक्षाबलों के कारण जंगल में अधिक आग लगती है। आग लगने के पीछे एक बड़ा कारण तो ये है कि इलाका बहुत सघन है और माओवाद संवेदनशील होने के कारण आगजनी होने पर उसे रोकना मुश्किल होता है।”

छत्तीसगढ़ के जंगल की आग, सीधे तौर पर यहां की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सुरक्षा से जुड़ी हुई है। तस्वीर - आलोक प्रकाश पुतुल।
छत्तीसगढ़ के जंगल की आग, सीधे तौर पर यहां की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सुरक्षा से जुड़ी हुई है। तस्वीर – आलोक प्रकाश पुतुल।

उन्होंने स्वीकार किया कि बीजापुर समेत बस्तर के दूसरे इलाकों में सुरक्षाबलों और पुलिस कर्मचारियों के बीच आगजनी को लेकर जागरुकता और संवेदनशीलता के लिए वन विभाग समय-समय पर अभियान चलाता है। लेकिन राज्य के दूसरे इलाकों में पुलिस और सुरक्षाबलों के बीच इस तरह का अभियान क्यों नहीं चलाया जाता? इस बात का कोई ठीक-ठीक जवाब उनके पास नहीं है।

हालांकि नीति आयोग के कुछ विस्तृत दस्तावेज़ों का अध्ययन मोंगाबे हिंदी ने किया और पाया कि बस्तर के इलाके में आगजनी को लेकर वन विभाग ने खुद स्वीकार किया है कि सुरक्षाबलों के जवान आईईडी को तलाशने के लिए जंगल में आग लगा रहे हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञ और राज्य सरकार की वाइल्ड लाइफ बोर्ड की सदस्य मीतू गुप्ता कहती हैं, “2023-24 के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में पेड़ों को हुए नुकसान का 44 फीसदी कारण आगजनी है। माओवाद प्रभावित इलाकों में पेड़ों का भी नुकसान बढ़ा है और वन्यजीवों का भी। इसके कारणों की पड़ताल ज़रूरी है। किसी संकट को लेकर अगर स्वीकार भाव होगा तभी उससे निपटने के लिए व्यापक नीतियां भी बनाई जा सकती हैं।”

लेकिन आंकड़े बताते हैं कि जंगल की आग से निपटने के लिए न तो राज्य के पास तैयारी है और ना ही बजट। आज भी छत्तीसगढ़ के अधिकांश इलाकों में जंगल की आग को बुझाने के लिए पारंपरिक तरीके पर ही निर्भरता बनी हुई है, जिसमें पेड़ की झाड़ियों से आग बुझाई जाती है। रही बात बजट की तो छत्तीसगढ़ में 2021-22 से 2024-25 तक के पांच सालों में आगजनी की 1,27,629 घटनाएं हुईं। लोकसभा के आंकड़े बताते हैं कि इन पांच सालों में केंद्र सरकार ने वन अग्नि निवारण एवं प्रबंधन योजना यानी एफपीएम के अंतर्गत छत्तीसगढ़ राज्य को 292.45 लाख रुपये आवंटित किए। यानी आगजनी प्रबंधन और उससे बचाने के लिए केंद्र सरकार से प्रति आगजनी महज 229 रुपये का योगदान छत्तीसगढ़ को मिला है।

बहरहाल एक बात तो साफ़ है कि बीजापुर के जंगलों की आग केवल प्राकृतिक या दुर्घटनावश नहीं है। यह आग महुआ और तेंदू की रोज़ी, बंदूक और बारूद की लड़ाई और जलवायु परिवर्तन की गर्मी का संगम है। आग यहां महज अपराध नहीं, मजबूरी और रणनीति दोनों है। जब तक नीति-निर्माता, सुरक्षा बल और स्थानीय समाज मिलकर साझा रणनीति नहीं बनाते, तब तक हर साल बीजापुर के जंगल धधकते रहेंगे।

 

बैनर तस्वीर: छत्तीसगढ़ के बीजापुर के जंगल में लगी आग। आँकड़े बताते हैं कि बीजापुर के जंगलों में हर साल हजारों बार आग लगती है। तस्वीर – आलोक प्रकाश पुतुल।

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