- कश्मीर में वैज्ञानिक जलवायु और पर्यावरण सम्बंधी मुश्किलों के बीच खाने-पीने की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए स्पीड ब्रीडिंग को आजमा रह हैं।
- इसमें पर्यावरण सम्बंधी नियंत्रित माहौल का इस्तेमाल करके फसलों के विकास चक्र को तेज किया जाता है।
- शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि स्पीड ब्रीडिंग में आनुवंशिक बदलाव शामिल नहीं है और भारत में जैव सुरक्षा संबंधी कोई चिंता या नियामक बाधाएं नहीं हैं।
बढ़ती आबादी के साथ खाद्यान्नों की मांग लगातार बढ़ रही है। लेकिन, कई फसलों को छोटे मौसम, कीटों और अनियमित मौसम जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कश्मीर स्थित शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST) के वैज्ञानिक ‘स्पीड ब्रीडिंग’ तकनीक की ओर रुख कर रहे हैं, जो घाटी में बढ़ती आबादी के लिए जलवायु-अनुकूल और ज्यादा उपज वाली फसलों के विकास को तेज करेगा।
साल 2000 के बाद जम्मू और कश्मीर में सालाना जनसंख्या वृद्धि दर 1 से 2.6% के बीच रही है, जिससे संसाधनों और खाद्यान्न की कुल मांग पर भारी दबाव पड़ा है। यह सब घटते भूमि क्षेत्र, जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितताओं, मिट्टी के खराब होने, पानी की कमी, छोटे फसल मौसम, नए कीटों के फिर से उभरने और गुणवत्तापूर्ण बीजों की लगातार कमी के कारण हुआ है।
इन चुनौतियों के बीच खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए, SKUAST के वैज्ञानिक स्पीड ब्रीडिंग को आजमा रहे हैं। स्पीड ब्रीडिंग नई तकनीक है जो पर्यावरण सम्बंधी नियंत्रित माहौल का इस्तेमाल करके फसलों के विकास चक्र को तेज करती है। जहां पारंपरिक प्रजनन प्राकृतिक जलवायु सीमाओं के कारण हर साल सिर्फ एक या दो फसल उगाने की सुविधा देता है, वहीं स्पीड ब्रीडिंग वैज्ञानिकों को हर साल चार से छह बीज-से-बीज चक्र तक में मदद करती है।
SKUAST-कश्मीर में आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन के प्रोफेसर और कश्मीर में स्पीड-ब्रीडिंग कार्यक्रम के प्रमुख अन्वेषक, आसिफ बशीर सीकरी ने बताया कि स्पीड ब्रीडिंग तकनीक का उद्देश्य प्रजनन प्रक्रिया को तेज करना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह फसल उगाने का कोई तरीका नहीं है, लेकिन जब कोई किस्म स्पीड ब्रीडिंग कार्यक्रम से निकलती है, तो उसे व्यावसायिक खेती के लिए बाजार में उतारा जा सकता है।
सीकरी ने विस्तार से बताया कि आमतौर पर फसल की नई किस्म विकसित करने में लगभग आठ साल लगते हैं। इसके बाद, किसी किस्म को किसानों तक पहुंचने से पहले नियामक अनुमोदन के लिए दो से तीन साल और लगते हैं। इसका मतलब है कि बाजार में नई उन्नत किस्म उपलब्ध होने में एक दशक तक का समय लग सकता है।
“स्पीड ब्रीडिंग इस पूरी प्रक्रिया में लगने वाले समय को काफी कम कर देती है। इसमें उन्नत पूर्ण-स्पेक्ट्रम पीपीएफडी लाइट्स (प्रकाश संश्लेषक फोटॉन फ्लक्स घनत्व), सटीक तापमान और आर्द्रता नियंत्रण और अनुकूल किए गए फोटोपीरियड्स (प्रतिदिन प्रकाश के संपर्क में रहने की अवधि) का इस्तेमाल करके पर्यावरण सम्बंधी नियंत्रित परिस्थितियों में पौधे उगाना शामिल है। इससे हर साल कई फसल उगाना संभव होता है। चावल में पांच या छह तक जबकि पारंपरिक खेत या ग्लासहाउस परिस्थितियों में सिर्फ एक या दो फसलें ही संभव होती है,” सीकरी ने कहा।
वैज्ञानिक ने जोर देकर कहा कि एक बार जब कोई उम्मीदों से भरी किस्म कंटेनमेंट चैंबर में विकसित हो जाती है, तो उसे एक या दो साल तक प्राकृतिक परिस्थितियों में खेतों में आजमाया जाता है। लेकिन कुल मिलाकर, प्रजनन चक्र में बड़ी कमी आती है जिससे उन्नत, जलवायु-प्रतिरोधी फसल किस्में पहले से कहीं ज़्यादा तेजी से किसानों तक पहुंच पाती हैं। इस प्रकार, त्वरित प्रजनन पर्यावरण सम्बंधी बदलावों और बाजार की जरूरतों के साथ तालमेल बनाए रखने में मदद कर सकता है।

कश्मीर में स्पीड ब्रीडिंग
SKUAST में शोधकर्ताओं ने चावल, गेहूं, मक्का और दालों जैसी प्रमुख फसलों के लिए स्पीड ब्रीडिंग को आजमाना शुरू किया है। यह काम विज्ञान मंत्रालय के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा वित्त पोषित मेगा प्रोजेक्ट DST PURSE के तहत हो रहा है। यह कार्यक्रम वर्तमान में दो प्रमुख क्षेत्रों को प्राथमिकता दे रहा है: जैविक मुश्किलों को सहन करने की क्षमता बढ़ाना, खास तौर पर फसलों में होने वाले सामान्य रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता और प्रमुख फसलों की पोषण गुणवत्ता में सुधार करना। उदाहरण के लिए, चावल कश्मीर में प्रमुख खाद्य फसल है, लेकिन यह ब्लास्ट और बाकाने जैसी बीमारियों और शुरुआती विकास के दौरान ठंडे मौसम के प्रति संवेदनशील है। स्पीड ब्रीडिंग वैज्ञानिकों को चावल की ऐसी किस्में जल्दी विकसित करने में मदद करती है जो इन तनावों को बेहतर ढंग से झेल सकें और फिर भी अच्छी पैदावार दे सकें।
“स्पीड ब्रीडिंग को जीन एडिटिंग और मार्कर-सहायता प्राप्त सेलेक्शन जैसी आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़कर, अब कुछ ही सालों में कई रोग-प्रतिरोधी गुणों वाली चावल की उन्नत प्रजातियां तैयार करना संभव है। इसके अलावा, मक्के में हमने स्पीड ब्रीडिंग चैंबर में तीव्र चक्रण का इस्तेमाल करके डीएनए मार्कर-सहायता प्राप्त सेलेक्शन के जरिए विटामिन ए और उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन गुणों के लिए बायोफोर्टिफिकेशन हासिल किया है। हमारा उद्देश्य इस तकनीक को गेहूं, दालें और सब्जियों जैसी अन्य फसलों पर भी लागू करना है, ताकि अच्छे गुणों और ज्यादा उत्पादकता वाली बेहतर किस्में विकसित की जा सकें,” सीकरी ने आगे कहा।
उन्होंने कहा कि यह पहल अभी शुरुआती दौर में है और तकनीक के कई पहलुओं का मानकीकरण होना बाकी है। “अगले एक-दो सालों में, इस तरीके को और अच्छा और बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, ताकि इसे और ज्यादा प्रभावी और व्यापक रूप से लागू किया जा सके।”
शोधकर्ताओं का कहना है कि मक्के के लिए डबल हैप्लॉइड तकनीक और जीनोमिक सेलेक्शन जैसे टूल के साथ-साथ स्पीड ब्रीडिंग का इस्तमाल बेहतर उपज वाली संकर किस्मों को विकसित करने में लगने वाले समय को काफी कम कर सकता है। मक्के पर व्यापक रूप से काम करने वाले SKUAST-कश्मीर में आनुवंशिकी और पादप प्रजनन के प्रोफेसर जहूर अहमद ने कहा, “यह कश्मीर में खास तौर पर अहम है, जहां अलग-अलग ऊंचाइयों के लिए खास स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से फसलों की जरूरत होती है।”
डार ने आगे कहा कि इससे सब्जियों को भी काफी फायदा होगा। स्थानीय किसानों के लिए पोषण और आय दोनों के अहम स्रोत के रूप में टमाटर और खीरा जैसी सब्जियों की फसलें अक्सर बीमारियों (जैसे लेट ब्लाइट और डाउनी मिल्ड्यू), कम समय तक टिकने और सीमित पोषक तत्वों जैसी चुनौतियों का सामना करती हैं। उन्होंने कहा, “स्पीड ब्रीडिंग से रोग-प्रतिरोधी, पोषक तत्वों से भरपूर किस्मों का विकास तेजी से हो सकता है और तैयार करने के बाद उनकी गुणवत्ता बेहतर हो सकती है।”
वाराणसी स्थित अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान – दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (IRRI-SARC) के वरिष्ठ वैज्ञानिक और स्पीड ब्रीडिंग कार्यक्रम के प्रमुख विकास कुमार सिंह ने कहा कि स्पीड ब्रीडिंग का सबसे आशाजनक प्रयोग कश्मीर जैसे समशीतोष्ण और ज्यादा-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में है, जहां किसान अक्सर छोटे मौसम के कारण साल में चावल की एक ही फसल उगा पाते हैं। उन्होंने कहा, “स्पीड ब्रीडिंग सुविधाओं के साथ, सबसे अच्छी परिस्थितियों का अनुकरण करना और सालाना चार-पांच फसलें उगाना संभव हो जाता है। इससे इन चुनौतीपूर्ण कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए ज्यादा उपज देने वाली, तनाव को सहने वाली सही किस्मों के विकास में तेजी आती है।”

भारत में स्पीड ब्रीडिंग के लिए चुनौतियां
आईआरआरआई-एसएआरसी ने 2023-24 में चावल के लिए पहला स्पीड ब्रीडिंग प्रोटोकॉल विकसित किया है। यह प्रोटोकॉल खास तौर पर इंडिका और जैपोनिका चावल के लिए विकसित किया गया है। प्रकाश की गुणवत्ता, आर्द्रता और तापमान को नियंत्रित करके, यह प्रोटोकॉल सिर्फ 52-60 दिनों में फूल आने और हर साल पांच से छह बार चावल उगाने की सुविधा देता है, जबकि ज्यादातर इलाकों में सिर्फ एक बार ऐसा होता है।
हालांकि, भारत में इस तरह की तकनीक को लागू करने में कई चुनौतियां हैं।
आईआरआरआई-एसएआरसी के प्रोग्राम लीड विकास कुमार सिंह ने मोंगाबे इंडिया को बताया, “सबसे बड़ी बाधाओं में बिजली की खपत भी शामिल है। उत्तर भारत के कई हिस्सों में, जहां गर्मी बहुत ज्यादा और सर्दी बहुत अधिक होती है, स्पीड ब्रीडिंग चैंबर के अंदर स्थिर पर्यावरण सम्बंधी परिस्थितियां बनाए रखने के लिए एयर कंडीशनर, हीटर, ह्यूमिडिफायर और एलईडी लाइटिंग का लगातार इस्तेमाल जरूरी होता है, जिससे बिजली की खपत ज्यादा होती है। ये सुविधाएं साल भर 24 घंटे चलती हैं, इसलिए नियमित रखरखाव और रुकावटों से बचने के लिए मजबूत बैकअप सिस्टम जरूरी होता है।”
सिंह ने आगे कहा, बिजली की खपत चिंता का विषय तो है, लेकिन पानी का इस्तेमाल आश्चर्यजनक रूप से कम है। तीव्र प्रजनन सुविधाओं के तहत, ईब-एंड-फ्लो हाइड्रोपोनिक प्रणालियों के इस्तेमाल से सिर्फ हफ्ते में एक बार पानी बदलने की जरूरत होती है। उन्होंने कहा, “दूसरी ओर, मिट्टी का प्रबंधन अहम बना हुआ है। अंकुरण और पौधे के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले फफूंद और जीवाणु संक्रमणों से बचने के लिए, मिट्टी को ऑटोक्लेव किया जाना चाहिए और हर तीन-चार उपज के बाद मिट्टी को बदलना चाहिए, क्योंकि पौधे पोषक तत्वों को खो देते हैं।”
वैज्ञानिक ने जोर देकर कहा कि एक और अहम सीख प्रकाश की गुणवत्ता के वैज्ञानिक सत्यापन की जरूरत है। चूंकि प्रोटोकॉल की सफलता प्रकाश स्पेक्ट्रम के सटीक नियंत्रण पर निर्भर करती है, इसलिए वैज्ञानिकों को सलाह दी जाती है कि वे एलईडी के प्रदर्शन के बारे में विक्रेता के दावों पर आंख मूंदकर भरोसा ना करें। सिंह ने कहा, “इसके बजाय, सटीक स्पेक्ट्रम अनुपात पक्का करने के लिए टूल का विश्वसनीय प्रकाश माप उपकरणों से सत्यापन किया जाना चाहिए, खासकर जब गेहूं, चना या मक्का जैसी सभी अहम कृषि फसलों के लिए इस प्रणाली को अपनाया जा रहा हो। इन फसलों के लिए कस्टमाइज किए गए प्रकाश और तापमान सेटिंग्स की जरूरत हो सकती है।”
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सुरक्षा नियमों के बारे में सिंह ने कहा कि स्पीड ब्रीडिंग में आनुवंशिक बदलाव शामिल नहीं है, इसलिए भारत में वर्तमान में जैव सुरक्षा संबंधी कोई चिंता या नियामक बाधाएं नहीं हैं। उन्होंने कहा, “यह पौधों के डीएनए में बदलाव किए बिना पर्यावरण प्रबंधन द्वारा पौधों को आगे बढ़ाने का कुशल तरीका है। यह अंतर विशेष रूप से आनुवंशिक रूप से बदली गई फसलों और जैव सुरक्षा पर सार्वजनिक चर्चाओं के बीच अहम है।”
सिंह ने बताया कि आगे की ओर देखते हुए, भारत में स्पीड ब्रीडिंग का भविष्य उज्ज्वल, लेकिन जटिल प्रतीत होता है। अगले पांच से दस सालों में, यह तकनीक प्रजनन कार्यक्रमों में खास तौर पर चावल, गेहूं और दालों जैसी फसलों के लिए, पारंपरिक ग्लासहाउस की जगह ले लेगी। उन्होंने कहा, “हालांकि, एलईडी लाइटों की ऊंची लागत, बिजली के बिल और रखरखाव के लिए जरूरी तकनीकी ममहारत लगातार चुनौतियां बनी रहेंगी। इन सीमाओं को कम करने के लिए सौर ऊर्जा, ऊर्जा-कुशल प्रकाश व्यवस्था और स्वचालित जलवायु नियंत्रण प्रणालियों में इनोवेशन की खोज की जा रही है।”

फसलों की किस्मों के विकास में तेजी लाने के अलावा, स्पीड ब्रीडिंग, प्रजनन से पहले की कोशिशों में भी उपयोगी साबित हो रही है, खासकर चावल की जंगली प्रजातियों के गुणों को बेहतर किस्मों में शामिल करने में यह मददगार है। सिंह ने कहा, “इससे वैज्ञानिकों को व्यापक आनुवंशिक आधार का पता लगाने और बहुत कम समय में रोग प्रतिरोधक क्षमता, तनाव को सहने की ताकत और उपज बढ़ाने में मदद मिलती है। जीनोमिक चयन, CRISPR जीन एडिटिंग और AI-संचालित मॉडलिंग के साथ स्पीड ब्रीडिंग को मिलाकर, इस तरीके में आधुनिक पादप प्रजनन को नया रूप देने और जलवायु संबंधी खतरों और खाद्य सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करने की अपार क्षमता है।”
इसकी क्षमता को पहचानते हुए आईआरआरआई ने पूरे भारत में जबलपुर, मोहाली, कोयंबटूर, लुधियाना आदि जगहों पर स्पीड ब्रीडिंग सुविधाओं की स्थापना में प्रशिक्षण और मार्गदर्शन के साथ-साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भविष्य की सुविधाओं पर काम चल रहा है और जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) आईआरआरआई मॉडल को (मामूली बदलावों के साथ) राष्ट्रीय मानक के रूप में अनुशंसित कर रहा है। आईआरआरआई भारत सरकार की स्पीड ब्रीडिंग समिति का एक सक्रिय सदस्य भी है, जो नीति और तकनीकी मार्गदर्शन में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 2 सितंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: स्पीड ब्रीडिंग चैंबर्स के अंदर स्थिर पर्यावरणीय परिस्थितियां बनाए रखने के लिए एयर कंडीशनर, हीटर, ह्यूमिडिफायर और एलईडी लाइटिंग का निरंतर संचालन आवश्यक है, जिससे बिजली की ज्यादा खपत होती है। तस्वीर: विकास कुमार सिंह।