- भारत ने पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य समय से पहले हासिल कर लिया है, लेकिन उपभोक्ता माइलेज में कमी, इंजन के खराब होने तथा पंप पर पारदर्शिता की कमी के बारे में चिंता जता रहे हैं।
- दुनिया भर के अनुभव बताते हैं कि जल्दबाजी में बनाई गई या अनुचित जलवायु नीतियां किस तरह विरोध को हवा दे सकती है।
- जानकार चेतावनी देते हैं कि भरोसा जीते बिना जलवायु परिवर्तन से पार पाने की कोशिशें उलझ जाती हैं; भारत में इथेनॉल को बढ़ावा देने के लिए धीरे-धीरे बदलाव लाने, स्थानीय अध्ययन और उपभोक्ताओं के साथ स्पष्ट संवाद जरूरी है।
भारत सरकार ने इस साल जुलाई में एक लीटर पेट्रोल (E20) में 20 फीसदी इथेनॉल मिलाने का अपना लक्ष्य समय से पहले हासिल करने की घोषणा की। इसे साल 2030 की समयसीमा से पांच साल पहले प्राप्त किया गया है। इस घोषणा ने कई बहसों को जन्म दिया है। यह घोषणा होते ही ऑनलाइन विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। इथेनॉल मिलाने के अनुपात पर स्पष्टता की मांग करने वाली आरटीआई याचिकाएं लगाई गईं और यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका भी दायर की गई। कई लोगों ने इस योजना को जल्दबाजी में और बिना स्पष्टता के लागू करने की दलील दी। वाहन मालिकों ने भी इसकी आलोचना की, जिसमें ईंधन की कुशलता और वाहन अनुकूलता में कमी के साथ-साथ गैर-मिश्रित विकल्पों की कमी पर चिंता भी शामिल थी। केंद्रीय सड़क परिवहन और पेट्रोलियम मंत्री नितिन गडकरी तथा हरदीप सिंह पुरी ने इसकी आलोचना को “निहित स्वार्थ” और “भय फैलाने” वाला बताते हुए खारिज कर दिया।
जुलाई में ही दिल्ली सरकार ने 15 साल से ज्यादा पुराने पेट्रोल वाहनों और 10 साल से अधिक पुराने डीजल वाहनों को ईंधन देना बंद कर दिया। इस आदेश पर भी कई लोगों ने अपनी चिंताएं जताईं। 12 अगस्त को पुलिस को वाहन मालिकों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा।
पर्यावरण से जुड़े नियमों के खिलाफ इस प्रकार की प्रतिक्रिया दुनिया भर में फैल रहे ग्रीनलैश नामक पैटर्न को दिखाती है। यह शब्द इतालवी राजनीतिक वैज्ञानिक नथाली टोसी द्वारा पर्यावरण नीतियों को लेकर सामाजिक और राजनीतिक प्रतिरोध के बारे में बताने के लिए गढ़ा गया है।
उदाहरण के लिए, साल 2018 में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को तब बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन का सामना करना पड़ा, जब उनकी सरकार ने कार्बन टैक्स बढ़ाने की कोशिश की थी। ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण जनता में आए उबाल ने उन्हें इस योजना को रोकने पर मजबूर कर दिया। यूरोप में, 2035 तक नए इंटरनल कंबस्टन इंजन (ICE) वाली कारों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की योजना का भी विरोध हुआ। जहां यूरोपीय संसद ने इस पाबंदी को मंजूरी दे दी, वहीं जर्मनी ने सिंथेटिक ईंधन (ई-ईंधन) से चलने वाली कारों के लिए छूट हासिल कर ली। ऐसे विरोध-प्रदर्शनों के कई और उदाहरण भी हैं।
शोधकर्ता इस तरह के विरोध की सामान्य वजहों की ओर इशारा करते हैं। स्वीडन के गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ता जेन्स इवाल्ड ने कहा, “इसके पीछे लागत और फायदों के बारे में पारदर्शिता का अभाव, अन्याय होने से जुड़ी सोच जैसे कुछ सामान्य कारण हैं। उदाहरण के लिए, यह धारणा बनना कि दूसरों की तुलना में कुछ समूह ज्यादा बोझ उठाते हैं और अचानक या खराब तरीके से लागू की गई योजनाएं।” उन्होंने चेतावनी दी कि जनता को भरोसे में लिए बिना, अच्छी तरह से तैयार उपायों के खिलाफ भी प्रतिक्रिया, उलटफेर या देरी का खतरा है। उन्होंने पर्यावरण नीतियों के प्रति लोगों के विरोध को समझने के लिए कई अध्ययन किए हैं।
गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग के वरिष्ठ व्याख्याता मैग्नस बर्गक्विस्ट समझाते हैं, “हाल ही में हुए प्रायोगिक अध्ययनों की श्रृंखला में मैंने पाया है कि पर्यावरण से जुड़ी नीतियों को समर्थन देने में कथित तौर पर बेअसर होने या कथित लागत की तुलना में कथित अन्याय ज्यादा बड़ी बाधा है। इसके अलावा, जब किसी नीति को पक्षपाती तरीके से लागू किया जाता है और असमान तरीके से (अलग-अलग लागत) लोगों तक पहुंचाया जाता है, तो इससे नीति-निर्माताओं के प्रति भरोसा कम हो जाता है।” बर्गक्विस्ट ने जलवायु करों और कानूनों पर लोगों की राय को आकार देने वाले कारकों का पता लगाने के लिए एक अध्ययन भी किया है।

इथेनॉल मिश्रण का इतिहास
भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के कार्यक्रम का लंबा इतिहास रहा है। इसकी शुरुआत साल 2001 में पांच फीसदी इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल के एक पायलट प्रोजेक्ट के साथ हुई थी। फिर 2003 में इसे इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम के रूप में औपचारिक जामा पहनाया गया। 2006 में जारी एक अधिसूचना में पांच फीसदी EBP को और राज्यों तक बढ़ा दिया गया था। हालांकि, इसके बाद कार्यक्रम की प्रगति धीमी रही और 2013-14 की अवधि तक मिश्रण की औसत दर 0.1% और 1.5% के बीच रही।
साल 2014 में कई हस्तक्षेपों की मदद से इस कार्यक्रम में तेजी आई, जिनमें इथेनॉल के मूल्य तय करने वाली प्रणाली, जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति (जिसे 2018 में लागू किया गया और 2022 में संशोधित किया गया), इथेनॉल पर कम जीएसटी और स्पष्ट मिश्रण लक्ष्यों वाला 2021 का रोडमैप शामिल है। भारत ने 2022 में (तय समयसीमा से पांच महीने पहले) 10% मिश्रण का लक्ष्य हासिल कर लिया। E20 के लक्ष्य को 2030 से आगे खिसका कर कर 2025 कर दिया और जुलाई में E20 लक्ष्य हासिल करने की घोषणा की गई।
इन नीतियों के लंबे समय से बदलाव होने के बावजूद, उपभोक्ताओं का कहना है कि उन्हें अपने वाहनों में इस्तेमाल होने वाले इथेनॉल के प्रतिशत के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी। नोएडा के सेक्टर 50 में रहने वाले 48 साल के दिनेश सिंह के पास मारुति डिजायर कार है, जिसे उन्होंने 2016 में खरीदा था। सिंह ने कहा कि उन्हें लग रहा था कि पिछले एक साल में ईंधन पर उनका खर्च बढ़ गया है, लेकिन उन्होंने सोचा कि ऐसा शायद वाहन के पुराने होने के कारण हुआ है। जब उन्होंने सोशल मीडिया पर लोगों को इथेनॉल मिश्रण और इससे उनकी कारों पर पड़ने वाले असर के बारे में लिखते देखा, तो उन्हें यह बात समझ में आई। उन्होंने कहा, “अब, मुझे भी यह बात समझ आ गई है। मुझे तो पता ही नहीं था कि मैं अपनी कार में इथेनॉल इस्तेमाल कर रहा हूं।”
उनके जैसे कई लोग और हैं। मिश्रण के स्तर की अनिवार्य रूप से जानकारी नहीं देने या कीमत में होने वाले स्पष्ट फायदों का पता नहीं होने पर लोगों का ध्यान सरकार की E20 घोषणा के बाद ही गया, जिससे सोशल मीडिया पर माइलेज कम होने की व्यापक शिकायतें शुरू हो गईं।
उदाहरण के लिए, लोकप्रिय यूट्यूब चैनल चलाने वाले Ask CarGuru कार रिव्यूअर अमित खरे ने उपभोक्ताओं की चिंताओं पर पर बात करते हुए वीडियो पब्लिश किया, जिस पर हजारों टिप्पणियां आईं। इनमें से कई में E20 के इस्तेमाल के बाद माइलेज में गिरावट की जानकारी दी गई थी।
कम माइलेज की संभावना को मानते हुए मंत्री कहते हैं कि नियमित सर्विसिंग से इस समस्या का समाधान हो सकता है और वे ड्राइविंग की आदतों जैसे अन्य कारणों की ओर भी इशारा करते हैं। वे नीति आयोग की 2021 की एक रिपोर्ट का हवाला देते हैं, जिसमें ईंधन में ज्यादा इथेनॉल मिलाने से माइलेज में औसतन 6% की कमी का अनुमान लगाया गया है।
पेट्रोलियम मंत्रालय ने 4 अगस्त को सोशल मीडिया पर स्पष्टीकरण देने की कोशिश की, लेकिन यूजर्स ने उनके बयान का विरोध किया। बाद में, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 12 अगस्त को विस्तृत बयान में इस नीति का बचाव करते हुए इसे ब्रिज फ्यूल बताया जो प्रदूषण कम करता है, ग्रामीणों की आमदनी बढ़ाता है, गन्ने के बकाया भुगतान में मदद करता है और मक्के की खेती में सुधार लाता है। उन्होंने खेती से आमदनी में बढ़ोतरी को किसान आत्महत्याओं में कमी से भी जोड़ा।
इन सबके बीच उपभोक्ताओं का विरोध जारी है। पुरानी कार के एक निजी डीलर ने हाल ही में 10 साल पुरानी मारुति सुज़ुकी डिजायर (जो E20 के लिए रेटेड नहीं है) का परीक्षण किया और बताया कि E20 पेट्रोल के माइलेज में सामान्य पेट्रोल की तुलना में 35% की गिरावट आई है। उपभोक्ताओं ने वारंटी, बीमा और टूट-फूट के लिए मुआवजे को लेकर भी सवाल उठाए हैं, क्योंकि उन्हें कभी भी यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया कि उन्हें किस प्रकार का ईंधन मिल रहा है। इसके अलावा, कार के साथ दिया गया उनका यूजर मैनुअल भी E20 पेट्रोल इस्तेमाल करने का सुझाव नहीं देता है।

मोंगाबे इंडिया द्वारा ओनर्स मैनुअल की समीक्षा में पाया गया कि कई मैनुअल 10% से ज्यादा इथेनॉल के मिश्रण के खिलाफ स्पष्ट रूप से चेतावनी देते हैं। उदाहरण के लिए, 2015 के मारुति सेलेरियो के यूजर मैनुअल और 2018 के विटारा ब्रेजा के मैनुअल में सिर्फ E10 तक की अनुमति है, जबकि 2018 हुंडई क्रेटा के मैनुअल में 10% से ज्यादा इथेनॉल मिश्रण के खिलाफ चेतावनी दी गई है और मेथनॉल के इस्तेमाल को प्रतिबंधित किया गया है। कुछ नए मॉडल (2020 के बाद) E20 के लिए रेट किए गए हैं। मोंगाबे इंडिया ने मारुति सुज़ुकी, हुंडई, महिंद्रा एंड महिंद्रा और कुछ अन्य कंपनियों से उनकी प्रतिक्रिया जानने के लिए संपर्क किया, लेकिन खबर छपने तक उनकी तरफ से जवाब नहीं मिल पाए थे।
उपभोक्ता के बीच बढ़ती चिंताओं के कारणों की व्याख्या करते हुए सलाहकार संस्था इंटेलकैप में सर्कुलर इकोनॉमी के पार्टनर अश्विन काक ने बताया कि अमेरिका और ब्राजील जैसे देशों में उपभोक्ताओं को विकल्प और वाहन के बुनियादी ढांचे को धीरे-धीरे अपग्रेड करने यानी दोनों ही विकल्प दिए गए थे। उन्होंने कहा, “अब भारत में भी इन दोनों ही बातों को अपनाने की जरूरत है।”
इवाल्ड ने इन चिंताओं को दूर करने के तरीकों पर भी चर्चा की। ” स्वीडन में कार्बन टैक्स लागू करने जैसे धीरे-धीरे उठाए जाने वाले कदम स्वीकार्यता बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। सीधे होने वाले लाभों को सामने रखने या वितरण संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए राजस्व की सीमया तय करने से भी भरोसा बढ़ सकता है और गलतफहमियां दूर हो सकती हैं।”
मुनाफा या धरती को बचाना
भारत में इथेनॉल को पर्यावरण और आर्थिक दोनों ही लक्ष्यों को पूरा करने वाले ईंधन के रूप में बढ़ावा दिया जाता है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि 2014-15 से जुलाई 2025 तक तेल विपणन कंपनियों द्वारा पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से ₹1.44 ट्रिलियन से ज्यादा विदेशी मुद्रा की बचत हुई, लगभग 24.5 मिलियन मीट्रिक टन कच्चे तेल को बचाया जा सका और कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 73.6 मिलियन मीट्रिक टन की कमी आई, जो 30 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर है।
कई ऑनलाइन यूजर ने कम माइलेज की तुलना करके इन दावों पर सवाल उठाए हैं, जिससे पता चलता है कि वे ज्यादा ईंधन खरीद रहे हैं। इस बीच, भारत ने 2014 से कच्चे तेल के आयात और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात दोनों में बढ़ोतरी दर्ज की है।

इथेनॉल की कहानी में नया अध्याय 24 सितंबर को तब जुड़ा, जब गडकरी ने भारत की बढ़ती उत्पादन क्षमता का हवाला देते हुए इथेनॉल निर्यात की वकालत की। इथेनॉल का उत्पादन जून 2025 तक लगभग 18.22 अरब लीटर सालाना तक पहुंच गया है। नीति आयोग की रिपोर्ट में पहले अनुमान लगाया गया था कि E20 मिश्रण को बनाए रखने के लिए भारत को 2025-26 तक 15 अरब लीटर क्षमता की जरूरत होगी। मौजूदा उत्पादन पहले ही उस लक्ष्य को पार कर चुका है, इसलिए ऐसा लगता है कि अब देश के पास अतिरिक्त क्षमता है।
लेकिन क्षमता में यह बढ़ोतरी पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं को जन्म देती है। गैर-लाभकारी थिंक टैंक सेंटर फॉर स्टडी ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड पॉलिसी (सीएसटीईपी) की ओर से दिसंबर 2024 में जारी एक पॉलिसी ब्रीफ में बड़े पैमाने पर इथेनॉल उत्पादन से जुड़े समझौतों पर प्रकाश डाला गया है। इस शोध में अमेरिका का हवाला दिया गया है जहां मक्का इथेनॉल का मुख्य स्रोत है। इसमें कहा गया है कि इथेनॉल के इस्तेमाल में बढ़ोतरी से मक्के की कीमतों में उछाल आया है। उर्वरकों के उपयोग में बढ़ोतरी हुई है। भूमि उपयोग में बदलाव से उत्सर्जन बढ़ा है और मक्का-आधारित इथेनॉल से कार्बन उत्सर्जन में कुल बढ़ोतरी हुई है।
सीएसटीईपी ने भारत के लिए भी इसी तरह के जोखिमों का अनुमान लगाया है। अगर E20 की आधी मांग मक्के से पूरी की जाती है, तो इसके लिए लगभग 80 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि की जरूरत होगी और मक्के की पैदावार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं होने तक परती और वन भूमि को इसकी खेती के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। अगर सिर्फ गन्ने से ही मांग पूरी की जाए, तो अतिरिक्त 35 लाख हेक्टेयर भूमि चाहिए होगी, जिससे सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पानी के इस्तेमाल में सालाना 60 अरब घन मीटर तक की बढ़ोतरी होगी। पॉलिसी ब्रीफ में कहा गया है, “इसके बजाय, E10 मिश्रण को बनाए रखने से कम नुकसान होता है और साथ ही इथेनॉल मिश्रण के लाभ भी बरकरार रहते हैं।”
जानकार चेतावनी देते हैं कि इथेनॉल मिश्रण का मूल उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा और उत्सर्जन में कमी लाना था। क्षमता विस्तार की होड़ में इन लक्ष्यों को नजरअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी है कि स्थानीय उपभोक्ताओं की चिंताओं और पर्यावरण से जुड़े प्रभावों की अनदेखी लंबी अवधि के नुकसान का कारण बन सकती है। उन्होंने स्थानीय अध्ययनों को जरूरी बताया।
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काक ने समझाया कि भारत की परिस्थितियां अन्य देशों से बहुत अलग हैं। उन्होंने बताया, “हमारे फीडस्टॉक में सिंचित गन्ने से लेकर मक्का तक शामिल हैं, जबकि ब्राज़ील में बारिश आधारित गन्ना या अमेरिका में स्टार्च-आधारित मक्का होता है। इन जटिलताओं के कारण, इथेनॉल मिश्रण के लिए लागत-लाभ विश्लेषण और उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध विकल्पों के लिए स्थानीय अध्ययन की जरूरत होती है।”
इसी बात को दोहराते हुए, इवाल्ड ने भी स्पष्ट संवाद की अहमियत पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “भारत को लाभों को स्पष्ट रूप से समझाने की अहमियत को ध्यान में रखना चाहिए,पर्यावरणीय (कम उत्सर्जन, बेहतर वायु गुणवत्ता) और आर्थिक (जलवायु से होने वाले नुकसान से बचाव, बेहतर ऊर्जा सुरक्षा) दोनों। इसे धीरे-धीरे लागू करना भी समझदारी भरा कदम हो सकता है, क्योंकि इससे लोगों को इस हिसाब से ढलने का समय मिलेगा और लंबी अवधि की सफलता के लिए जरूरी भरोसा बनाने में मदद मिलेगी।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 26 सितंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: नई दिल्ली में एक पेट्रोल पंप। भारत में E20 के जल्द लॉन्च होने से उपभोक्ताओं की चिंताएं बढ़ गई हैं। तस्वीर- कुंदन पांडे