- लद्दाख के ठंडे रेगिस्तान में विषम, ज्यादा ऊंचाई वाले पारिस्थितिकी तंत्रों में उगने वाले जंगली खाद्य पौधे पोषण, औषधि की जरूरत को पूरा करते हुए सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखते हैं।
- इन वनस्पतियों के संरक्षण से महंगी खेती पर निर्भरता कम होती है, जैव-विविधता मजबूत होती है और पारंपरिक ज्ञान को बनाए रखने में मदद मिलती है।
- समुदाय की अगुवाई में संरक्षण और लघु उद्यम, जंगलों से मिलने वाली खाने-पीने की चीजों से संबंधित पारंपरिक तरीकों को जीवित रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। इस तरह, आजीविका और स्थानीय पारिस्थितिकी दोनों को मदद मिलती है।
लद्दाख के ठंडे रेगिस्तान की जलवायु कम बारिश, बहुत कम हवा, तेज सौर विकिरण और गलाने वाली सर्दियों के लिए जानी जाती है। इस बंजर भूमि के बीच मोम या रोएंदार पत्तियों जैसी विशेषताओं के साथ जंगली खाद्य पौधे पानी के नुकसान को कम करते हैं और कठोर बनाते हैं। इससे समुद्र तल से 2,800-5,500 मीटर की ऊंचाई पर इन वनस्पतियों को इस क्षेत्र में जीवित रहने में मदद मिलती है।
“यहां की जलवायु परिस्थितियां ऐसी है कि बहुत छोटी अवधि के दौरान ही वनस्पतियां उग पाती हैं। इस दौरान सीबकथॉर्न (हिप्पोफे रमनोइड्स), जंगली रूबर्ब (रूम ऑस्ट्रेल) जैसे जंगली पौधे और कैरवे (कैरम कार्वी) व सोमलाटा (एफेड्रा गेरार्डियाना) जैसी ऊंचाई पर उगने वाली जड़ी-बूटियां बड़े स्तर पर विटामिन, एंटीऑक्सीडेंट और खनिज का संग्रहण करती हैं। सीमित खेती वाले क्षेत्र में ये जंगली खाद्य पौधे लोगों, पशुओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए अहम हैं,” कश्मीर विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के वरिष्ठ सहायक प्रोफेसर बिलाल मीर बताते हैं।
लद्दाख में हुए एक नए अध्ययन से पता चलता है कि लोगों और जंगली पौधों के बीच ऐतिहासिक संबंध टूटते जा रहे हैं। 2019 से 2022 के बीच पांच क्षेत्रों – चांगथांग, कारगिल, नुब्रा, लेह और ज़ांस्कर – के 12 गांवों में किए गए इस अध्ययन में 60 स्थानीय लोगों के साथ खुले और अर्ध-संरचित प्रश्नावलियों का इस्तेमाल करके साक्षात्कार किए गए।
मार्च 2025 में एथनोबॉटनी रिसर्च एंड एप्लीकेशंस में प्रकाशित इस अध्ययन में 25 पादप परिवारों और 40 वंशों से संबंधित 52 जंगली खाद्य पादप प्रजातियों की पहचान की गई। इसमें इस्तेमाल के मामलों की 288 रिपोर्टें भी शामिल हैं जो दिखाती हैं कि समुदाय इन पौधों को किस तरह उपयोग करता है। सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला हिमालयन थाइम (थाइमस लिनियरिस) है, जिसका औषधि और खाना बनाने में बहुत महत्व है। इसमें कैपरबुश (कैपारिस स्पिनोसा) भी शामिल है जिसका स्वाद बेशकीमती है।

आईयूसीएन की लाल सूची और उत्तर-पश्चिमी हिमालयन डेटाबेस के आधार पर अध्ययन में दर्ज जंगली खाद्य पौधों में एक गंभीर रूप से संकटग्रस्त, दो संकटग्रस्त और तीन जोखिम वाली प्रजातियां शामिल थीं। सबसे अधिक संकटग्रस्त प्रजातियां हिमालयन थाइम (थाइमस लिनियरिस), गुलाबी अर्नेबिया (अर्नेबिया यूक्रोमा) और लहसुन (एलियम कैरोलिनियनम) थीं।
अध्ययन के नतीजों के बारे में लद्दाख अध्ययन की प्रमुख लेखिका और सीएसआईआर-भारतीय एकीकृत चिकित्सा संस्थान, जम्मू की शोधार्थी जोहरा बतूल विस्तार से बताती हैं, “सबसे प्रमुख (पौधे) परिवार ब्रैसिकेसी थे, उसके बाद पॉलीगोनेसी और एस्टेरेसी थे। ज्यादातर जंगली खाद्य पौधों का इस्तेमाल सब्जियों के रूप में किया गया था, इसके बाद स्थानीय व्यंजनों, मसालों और चाय में सामग्री के रूप में उपयोग किया गया था।”
जंगली वनस्पतियों के सुरक्षित और टिकाऊ इस्तेमाल का ज्ञान पारंपरिक रूप से बुजुर्गों और आमची चिकित्सकों द्वारा मौखिक रूप से दिया जाता रहा है, जो पारंपरिक हिमालयी चिकित्सा प्रणाली का हिस्सा हैं।
जंगली खाद्य पदार्थों को खतरा
बतूल ने बताया कि लद्दाख में पौधों के बारे में घटती जानकारी, अवैज्ञानिक तरीके से दोहन, बहुत ज्यादा चराई, प्राकृतिक आपदाएं, सड़क निर्माण और ईंधन के लिए पौधों को उखाड़ना इनके खत्म होने की बड़ी वजहें हैं।
मीर कहते हैं, “संग्रहण के अवैज्ञानिक तरीकों से कुदरती संख्या कम हो रही है जबकि सड़कों, पर्यटन और सैन्य उपयोग के लिए बुनियादी ढांचे से अल्पाइन घास के मैदान और नदी घाटियां खत्म हो रही हैं।” वह इस अध्ययन से जुड़े हुए नहीं थे।
वहीं, जलवायु परिवर्तन बर्फबारी के पैटर्न को बदल रहा है और ठंड वाले आवासों को कम कर रहा है, जिससे लद्दाखी प्याज (एलियम प्रेज़वाल्स्कियानम) जैसे ऊंचाई पर उगने वाले पौधे और अधिक ऊंचाई पर उग रहे हैं। बहुत ज्यादा चराई हिमालयन नेटल (उर्टिका हाइपरबोरिया) जैसी जंगली सब्जियों के फिर से पनपने में बाधा डाल रही है।
युवा पीढ़ी में पारंपरिक ज्ञान की कमी होने से उपेक्षा और बहुत ज्यादा इस्तेमाल का खतरा बढ़ रहा है। सीबकथॉर्न जैसी प्रजातियों का व्यावसायिक दोहन पारिस्थितिकी तंत्र पर और दबाव बढ़ा रहा है। वहीं, आक्रामक प्रजातियां नाजुक अल्पाइन वनस्पतियों को खत्म कर रही हैं।
पर्यावरण वकील से हर्बलिस्ट बनी डेस्किट एंग्मो ने 2022 में मकोई एपोथेकरी की स्थापना की, जो हिमालयी पौधों और परंपराओं से प्रेरित छोटे-छोटे हर्बल फॉर्मूलेशन बनाती है, जिनका मुख्य उद्देश्य खुद की देखभाल और सेहत को बेहतर बनाना है। तस्वीर सौजन्य: डेस्किट एंग्मो।
पारंपरिक ज्ञान से पौधों का संरक्षण
जहां जंगली खाद्य पौधे स्थानीय पारिस्थितिक तंत्रों के लिए स्वाभाविक रूप से अनुकूलित होते हैं और इनके लिए नाम मात्र की बाहरी चीजों की जरूरत होती है, वहीं पारंपरिक ज्ञान टिकाऊ तरीके से इस्तेमाल पक्का करता है। अध्ययनों से पता चला है कि जंगली खाद्य पौधों का संरक्षण और उनके इस्तेमाल से संबंधित पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने से जैव-विविधता, पोषण और स्थायी आजीविका को एक साथ लाकर टिकाऊ खेती और साफ-सुथरे विकास को बढ़ावा मिलता है।
पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर राज्य में साल 2024 में 44 अध्ययनों की समीक्षा की गई थी। इसमें 93 परिवारों के 408 जंगली खाद्य पौधों की प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया गया। इनका इस्तेमाल सब्जियों, फलों या औषधीय खाद्य पदार्थों के रूप में किया जाता है। कई प्रजातियां स्थानीय बाजारों को बढ़ावा देती हैं, जैव-विविधात को आय के अवसरों से जोड़कर ग्रामीण परिवारों की आमदनी बढ़ाती है। यह इस बात पर चर्चा करता है कि पारंपरिक खाद्य प्रणालियां किस तरह समावेशी, कम प्रभाव वाली अर्थव्यवस्थाओं को आधार प्रदान कर सकती हैं।
इसी तरह का अध्ययन 2021 में अचानकमार-अमरकंटक बायोस्फीयर रिजर्व में हुआ था। इसमें पाया गया कि स्थानीय समुदाय जंगली खाद्य पौधों की 172 प्रजातियों पर निर्भर थे। इसमें पत्तेदार साग, कंद, फल और मशरूम शामिल थे और समुदाय बड़ी मात्रा में इनका इस्तेमाल करते थे। अतिरिक्त फसल घरेलू आय बढ़ाने में मदद करती है। यह ऐसा मॉडल है जहां संरक्षण और आजीविका एक-दूसरे को मजबूत करते हैं।
मीर विस्तार से बताते हैं कि लद्दाख के जंगली खाद्य पौधों के संरक्षण के लिए समुदाय-आधारित संरक्षण, टिकाऊ खेती, आवास का संरक्षण और नीतिगत समर्थन के मिले-जुले नजरिये की जरूरत है। “स्थानीय ग्रामीणों, महिला समूहों और आमची चिकित्सकों को फैसला लेने की प्रक्रिया में शामिल करने से यह पक्का होता है कि मौसमी संग्रह और फसल क्षेत्रों को बदलने जैसी इस्तेमाल की पारंपरिक पद्धतियों को बरकरार रखा जाए।”
वे अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि अल्पाइन घास के मैदानों और नदी घाटियों जैसे अहम आवासों को सामुदायिक आरक्षित क्षेत्रों के तौर पर मान्यता दी जानी चाहिए, जहां विकास और चराई पर पाबंदी हो। बीज बैंक और हर्बल उद्यान जैसे बाहरी उपाय आनुवंशिक संसाधनों की सुरक्षा कर सकते हैं। जीआई टैग, फसल काटने का परमिट और व्यापार नियमन जैसी मजबूत नीतियां टिकाऊ व्यावसायीकरण के लिए जरूरी हैं। मीर आगे कहते हैं, “जलवायु-रोधी रणनीतियां, जिनमें प्रजातियों के प्रवास पर नजर रखना और पाला व सूखे को झेलने वाली खेती विकसित करना शामिल है, बढ़ते तापमान के मद्देनजर संरक्षण की कोशिशों को अनुकूलित करने के लिए अहम हैं।”

इन तरीकों से संरक्षण
जंगली खाद्य पौधों की टिकाऊ खेती की ऐसी ही एक कोशिश डेस्किट एंग्मो की है, जो पूर्व पर्यावरण वकील और अब हर्बलिस्ट हैं। उन्होंने 2022 में मकोई एपोथेकरी की स्थापना की। उनका छोटा-सा ब्रांड हिमालयी पौधों और परंपराओं से प्रेरित हर्बल फ़ॉर्मूले तैयार करता है, जो खुद की देखभाल और पूरे स्वास्थ्य पर केंद्रित है। वह कहती हैं, “हमारे स्थानीय पौधों का अधिकांश ज्ञान विलुप्त हो रहा है। हालांकि इन उपचारों ने सदियों से समुदायों का साथ दिया है। मकोई एपोथेकरी के जरिए, मेरा लक्ष्य पारिस्थितिकी और संस्कृति का सम्मान करते हुए पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक स्वास्थ्य से जोड़ना है।”
एंग्मो ने पश्चिम के हर्बल और लद्दाखी रसोई दोनों में प्रचलित पौधों से शुरुआत की। इसमें पुदीना, रोजमेरी, एलोवेरा, कैमोमाइल, कैलेंडुला और खुबानी शामिल थे। धीरे-धीरे, वह जंगली गुलाब, रोजहिप, सीबकथॉर्न, यारो, बर्डॉक, अल्कानेट, कैटमिंट और इफेड्रा जैसी हिमालयी प्रजातियों की ओर आगे बढ़ीं। वह बताती हैं, “ज्यादा ऊंचाई पर उगने वाले वाले पौधे खास तौर पर शक्तिशाली होते हैं, क्योंकि वे तीव्र यूवी विकिरण, बहुत कम हवा और खराब मिट्टी जैसी चरम परिस्थितियों में उगते हैं। ये पौधे जीवित रहने के लिए उच्च स्तर के एंटीऑक्सीडेंट, टेरपेनॉइड, फ्लेवोनॉइड और वाष्पशील तेल उत्पन्न करते हैं। यही गुण उन्हें त्वचा की देखभाल और उपचार में खासा मददगार बनाता है।”
मकोई एपोथेकरी में पौधों के उपचार वाले यौगिकों को संरक्षित करने के लिए मैसेरेशन (किसी द्रव्य में भिगोना), कोल्ड प्रेसिंग, काढ़ा बनाने और हल्का सुखाने जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। एंग्मो इस बात पर जोर देती हैं कि पर्यावरण हितैषी होना सर्वोपरि है। “कई जंगली प्रजातियां धीमी गति से बढ़ती हैं और नाजुक होती हैं। जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल संतुलन बिगाड़ सकता है। इसलिए हम चारा संग्रह की कठोर नीति का पालन करते हैं और मौसम के हिसाब से छोटे-छोटे हिस्सों में उत्पादन पर ध्यान देते हैं।” उनके लिए संरक्षण ना सिर्फ पारिस्थितिकी बल्कि सांस्कृतिक भी है। “एक समय समुदायों को ठीक-ठीक पता होता था कि कब, कैसे और कितनी मात्रा में कटाई करनी है, लेकिन बाजार की मांग बढ़ने के साथ-साथ यह ज्ञान विलुप्त होता जा रहा है। रोजमर्रा के नुस्खे, उपाय और तरीके जो इस ज्ञान को जीवित रखते थे, अब व्यापक रूप से प्रचलित नहीं हैं।”
लोकल और ग्लोबल के बीच सेतु
पौधों, आजीविका और सांस्कृतिक स्मृति के बीच का संबंध लद्दाख बास्केट के केंद्र में भी है, जो थिनलेस नोरबू द्वारा सह-स्थापित ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म है। चांगथांग के ऊंचाई वाले गांवों में पले-बढ़े नोरबू ने लद्दाख की उपज और परंपराओं की समृद्धि और किसानों व कारीगरों के लिए उचित बाजार खोजने के संघर्ष दोनों को देखा है। वे कहते हैं, “कई परिवार खेती और हस्तशिल्प पर निर्भर थे, फिर भी दूर होने (बाजार से) और बिचौलियों के कारण उनकी मेहनत को कम आंका जाता था। ग्रामीण समुदायों और व्यापक दुनिया के बीच कड़ी बनकर, लद्दाख बास्केट ने इसे बदलने का बीड़ा उठाया, जहां हर उत्पाद लद्दाख के लचीलेपन, स्थिरता और विरासत की कहानी समेटे हुए है।”
फिलहाल यह स्टार्टअप सौ से ज्यादा किसानों और कारीगरों के साथ काम करता है, जिनमें से अधिकतर रोंग और चांगथांग के दूरदराज के गांवों से हैं। इसने उचित मूल्य पक्का करके जैविक खेती, हस्तशिल्प और जंगली चारागाहों को नया जीवन दिया है। यह ऐसी प्रथाएं हैं जो धीरे-धीरे खत्म हो रही थीं। इसने युवाओं और महिलाओं के लिए अवसर भी पैदा किए हैं, पलायन के दबाव को कम किया है और सांस्कृतिक परंपराओं में गौरव को बहाल किया है। जंगली खाद्य पौधे इसका आधार हैं, जिनमें जंगली जीरा, चाइव्स, कैटमिंट और बिछुआ जैसे स्वाद उत्पादों में शामिल होते हैं। नोरबू कहते हैं, “इन्हें टिकाऊ तरीके से इकट्ठा करने के लिए टीम पारंपरिक ज्ञान, चुनिंदा चारागाहों और स्थानीय संग्रहकर्ताओं को उचित मुआवजे पर निर्भर रहती है, जिससे यह पक्का होता है कि पारिस्थितिकी तंत्र और सांस्कृतिक ज्ञान दोनों सुरक्षित रहें।”

फिर भी, बाजार की मांग और पारिस्थितिकी सीमाओं के बीच संतुलन बनाना चुनौती बना हुआ है। लद्दाख बास्केट जलवायु का सामान कर सकने वाली फसलों को बढ़ावा देकर, जंगली खाद्य पदार्थों को नया जीवन देकर और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए जैविक खेती को बढ़ावा देकर इस चुनौती का सामना करता है। नोरबू आगे कहते हैं, “साथ ही हम खेती, चारा इकट्ठा करने और भोजन तैयार करने के पारंपरिक ज्ञान को जीवित रखते हैं, यह पक्का करते हुए कि यह ज्ञान आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचता रहे।”
आखिरकार, खान-पान यादों के सबसे शक्तिशाली स्रोतों में से एक है। स्थानीय शेफ कुनजेस एंग्मो के लिए, यह अपनी जड़ों से जुड़ने का जरिया बन गया। वह कहती हैं, “मुझे यह बात हैरान करती है कि लद्दाखी व्यंजनों को कितना गलत समझा जाता है। हमारी पहचान अक्सर मोमोज और थुकपा तक सीमित कर दी जाती है। लेकिन मोमोज तिब्बती हैं और थुकपा दाल की तरह ही एक सामान्य शब्द है। पारंपरिक लद्दाखी भोजन कहीं ज्यादा समृद्ध है, जो इतिहास, भूगोल और संस्कृति से प्रभावित है।”
इन संकीर्ण सोच से पार पाने के लिए, उन्होंने 2017 में आर्टिसनल अल्केमी की शुरुआत की, जो लेह के जेड हाउस और स्टोक पैलेस में आयोजित होने वाले चुनिंदा भोजन अनुभवों की श्रृंखला है, जिसमें भोजन और कहानी कहने का मिला-जुला रूप है। महीने में 10 दिन आयोजित होने वाले ये कार्यक्रम लद्दाख की पाक विरासत को सामने लाते हैं और तिब्बत, मध्य एशिया और भारत के साथ व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के इतिहास को बुनते हैं।
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एंग्मो विस्तार से बताती हैं, “भोजन हमें बताता है कि विषम जलवायु में समाज कैसे जीवित रहे, उन्होंने किसी चीज को अहमियत दी और किस तरह खुद को ढाला।” ठंडे रेगिस्तान में, संरक्षण और किण्वन अत्यंत अहम थे: डेयरी और मांस को धूप में सुखाया जाता था, जबकि सब्जियों और फलों को लंबी सर्दियों के लिए भूमिगत तहखानों में संग्रहित किया जाता था। उनके मेन्यू में अनूठी सामग्री शामिल होती है: स्कोत्से (जंगली प्याज के पत्ते) को सुखाकर केक बनाए जाते हैं जो दही से बने व्यंजन तांगथुर को स्वादिष्ट बनाते हैं; तुम्बुरुक (ग्रीष्मकालीन नमकीन), त्सामिक और कोरोरो (मोल्दावियन ड्रैगनहेड) जैसी जड़ी-बूटियां जो बाल्टी और शाम से जुड़े व्यंजनों को उनकी खास पहचान देते हैं; तीखी लद्दाखी अजवाइन चिन-त्से और पीली हिमालयी मिर्च थांगन्येर जिसका इस्तेमाल कभी लाल मिर्च पाउडर की जगह किया जाता था।
इन भोजन के जरिए, एंग्मो खान-पान को सांस्कृतिक सेतु के रूप में देखने की चुनौती देती हैं। “हर व्यंजन एक समुदाय का होता है और उसका अपना इतिहास होता है। हमें अपनी विरासत को अपनाते हुए दूसरों का सम्मान करना चाहिए और उनसे सीखना भी चाहिए। भोजन संस्कृति का द्वार है; इसे इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए।”
ये सभी पहल मिलकर लद्दाख के पौधों और परंपराओं को जीवित रख रही हैं। ये दिखाती हैं कि संरक्षण का मतलब सिर्फ पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करना ही नहीं है, बल्कि इस नाजुक, ऊंचाई पर बसे इस संसार में आजीविका, पहचान और स्मृति को बनाए रखना भी है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 3 अक्टूबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: लद्दाखी व्यंजनों के बारे में संकीरण सोच का मुकाबला करने के लिए, शेफ कुनजेस आंगमो ने 2017 में आर्टिसनल अल्केमी की शुरुआत की, जो लेह में आयोजित क्यूरेट किए गए खान-पान से जुड़े अनुभवों की श्रृंखला है, जिसमें भोजन और कहानी कहने का मिला-जुला रूप दिखता है है। तस्वीर सौजन्य: कुनजेस आंगमो।