- कई देशों की चिंताओं के बाद भारत में भेजे गए फैक्ट फाइंडिंग मिशन की रिपोर्ट में रिलायंस फाउंडेशन के वंतारा के लिए बड़ी संख्या में भेजे गए जानवरों के स्थानांतरण और उनकी वैधता पर सवाल खड़े किये हैं।
- CITES सचिवालय की नई रिपोर्ट में भारत की जांच प्रक्रिया में कमियों की ओर इशारा किया गया है। यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले से अलग निष्कर्ष देती है, जिसमें वंतारा के सभी जानवरों के आयात को भारतीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप बताया गया था।
- CITES ने भारत से कहा है कि वह अपने आयात जांच तंत्र में सुधार करे, कुछ प्रजातियों के आयात पर अस्थायी रूप से रोक लगाए, वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो को मजबूत करे और निर्यात करने वाले देशों से मिलकर पुराने व्यापार की वैधता की जांच करे।
गुजरात के जामनगर में बने अंबानी परिवार के स्वामित्व वाले निजी चिड़ियाघर और पशु पुनर्वास केंद्र, वंतारा, के खिलाफ शिकायतों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जाँच दल (एसआईटी) ने जानवरों के अधिग्रहण में कोई वैधानिक अनियमितता नहीं पाते हुए इस साल सितम्बर में इस चिड़ियाघर को क्लीन चिट दी।
एसआईटी ने निष्कर्ष निकाला कि इस चिड़ियाघर में दुसरे देशों से लाये गए जानवरों का अधिग्रहण कानूनों के अनुसार था।
हालांकि, वन्यजीवों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करने वाली संधि, CITES (Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora), की नई रिपोर्ट के निष्कर्ष एसआईटी की उस जांच रिपोर्ट से बिल्कुल अलग हैं।
CITES एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है जो लुप्तप्राय वन्यजीवों के व्यापार को नियंत्रित करता है। भारत 1976 से इसका हस्ताक्षरकर्ता देश है। कई सदस्य देशों द्वारा हाल के समय में भारत में भेजे जा रहे जानवरों की संख्या और उनके स्रोत पर चिंता जताने के बाद, CITES सचिवालय ने 15 से 20 सितंबर के बीच भारत का एक फैक्ट फाइंडिंग दौरा किया। इन जानवरों में से कई को अनंत अंबानी द्वारा स्थापित वंतारा भेजा गया था। इस मिशन का उद्देश्य भारत की CITES प्रणाली की कार्यप्रणाली की समीक्षा करना था, जो पशु आयात और निर्यात के परमिट जारी करती है।
वंतारा, जिसमें ग्रीन्स जूलॉजिकल रेस्क्यू एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर (GZRRC) और राधा कृष्ण टेंपल एलीफेंट वेलफेयर ट्रस्ट (RKTEWT) शामिल हैं, ने अब तक दुनिया भर से 40,000 से अधिक जानवर हासिल किए हैं। इनमें कई लुप्तप्राय और संकटग्रस्त प्रजातियाँ शामिल हैं।
इस रिपोर्ट में कहा गया कि बिना आवश्यक परमिट के आयात का कोई सबूत नहीं मिला, लेकिन भारत की जांच प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ पाई गईं, जिनकी वजह से ऐसा व्यापार हो सकता है जो CITES के नियमों के विपरीत हो। सचिवालय ने खासतौर पर चिंता जताई कि चिंपैंज़ी और ओरंगउटान जैसे कुछ जानवर, जिन्हें कैद में पाले गए (captive-bred) बताया गया, वे संभवतः वास्तव में जंगली स्रोतों से आए हो सकते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, “CITES अधिकारियों ने माना कि भारत की जांच प्रक्रिया सामान्यतः केवल निर्यात या पुनः-निर्यात परमिट की मौजूदगी, उसकी प्रामाणिकता और वैधता तक सीमित रहती है। दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों के आयात के मामलों में भारत को अतिरिक्त जांच करनी चाहिए थी।”
रिपोर्ट ने सिफारिश की है कि भारत लुप्तप्राय प्रजातियों के आयात को अस्थायी रूप से रोके, अपनी जांच प्रक्रिया की समीक्षा करे, और आयात परमिट जारी करने से पहले उचित सतर्कता (due diligence) अपनाए। साथ ही, भारत को अपने वन्यजीव अपराध नियंत्रण तंत्र को मजबूत करने की सलाह दी गई है ताकि भविष्य में किसी तरह का उल्लंघन न हो।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि “यदि भारत आवश्यक सतर्कता नहीं बरतता, तो उसे ऐसे जानवरों के आयात का खतरा रहेगा जो वास्तव में जंगली स्रोतों से आए हों और जिन्हें झूठे तरीके से कैद में पाले गए बताया गया हो।”
CITES सचिवालय द्वारा उठाए गए ये मुद्दे सुप्रीम कोर्ट के 15 सितंबर को दिए गए आदेश से भिन्न हैं। अदालत ने कहा था कि जब जानवर वैध परमिट के साथ आयात किए गए हैं, तो “किसी को भी उन परमिटों की वैधता या संबंधित सरकारी कार्रवाई पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं है।” यह आदेश विशेष जांच दल (एसआईटी ) की रिपोर्ट पर आधारित था, जिसे वंतारा में वन्यजीव तस्करी और कुप्रबंधन के आरोपों की जांच के लिए बनाया गया था।
CITES ने वंतारा पर केंद्रित किया ध्यान
CITES के अनुसार, उसका यह मिशन इस बात को समझने के लिए किया गया था कि भारत की CITES प्राधिकरण यह कैसे सुनिश्चित करती हैं कि जीवित जानवरों के नमूने कानूनी रूप से प्राप्त और आयात किए जा रहे हैं, खासतौर पर वंतारा पर ध्यान केंद्रित करते हुए।
रिपोर्ट के मुताबिक, वंतारा ने अब तक दुनिया भर से 41,839 पक्षी, स्तनधारी, उभयचर और सरीसृप आयात किए हैं। सेंट्रल ज़ू अथॉरिटी (CZA) ने उसे अधिकतम 84,822 जानवरों को रखने की अनुमति दी है।

रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया है कि वंतारा में लाए गए जानवरों के लिए “बेहद उच्च मानक और उन्नत सुविधाएं” मौजूद हैं, और कहा गया है कि “इन सुविधाओं की क्षमता या उपयुक्तता पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है।”
हालाँकि, सचिवालय ने जानवरों के आयात के तौर-तरीकों पर चिंता जताई, खासकर उन प्रजातियों के संदर्भ में जो विलुप्ति के कगार पर हैं या जिनकी स्थिति व्यापार के कारण कमजोर हुई है (जो संधि के एपेंडिक्स I और II में सूचीबद्ध हैं)। उदाहरण के तौर पर, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से वंतारा भेजा गया एक “कैद में पाला गया” (captive-bred) बोनोबो परमिट में मूल रूप से इराक से आया बताया गया था। लेकिन सचिवालय ने पाया कि इराक ने कभी बोनोबो आयात नहीं किया, जिससे उसके “कैद में पाले गए” होने पर संदेह पैदा हुआ।
वन्यजीव अपराध पर कानूनी सलाहकार मेगैन नाताली ने मोंगाबे इंडिया से कहा, “CITES एक परमिट-आधारित प्रणाली है, और दस्तावेज़ीकरण बेहद जरूरी है, लेकिन परमिट उतने ही मजबूत होते हैं जितनी मजबूत जांच उनके पीछे होती है। अगर आयात करने वाले प्राधिकारी केवल कागजात देखकर उन्हें अंतिम मान लेते हैं और अपनी जांच नहीं करते, तो व्यापार ऊपर से वैध दिखता है लेकिन उसके पीछे अवैध आपूर्ति श्रृंखला छिपी रह जाती है। असली खामी कागजों में नहीं, बल्कि निगरानी की कमी में है।”
CITES के एपेंडिक्स I और II में सूचीबद्ध प्रजातियों के लिए, निर्यात करने वाले देश को यह सुनिश्चित करना होता है कि उस प्रजाति का निर्यात उसके जंगली अस्तित्व को नुकसान नहीं पहुंचाएगा, वह कानूनी रूप से प्राप्त की गई है, और परिवहन इस तरह किया जाएगा कि जानवर को चोट, बीमारी या अमानवीय व्यवहार का जोखिम न हो।
आयात करने वाले देश की जिम्मेदारी है कि व्यापार गैर-व्यावसायिक हो, प्रजाति के जंगली जीवन पर उसका कोई प्रतिकूल असर न पड़े, और जहां जानवर रखा जाएगा वह केंद्र उस प्रजाति के लिए उपयुक्त और अधिकृत हो।
भारत में CITES परमिटों का प्रबंधन पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा किया जाता है, जबकि सेंट्रल ज़ू अथॉरिटी (CZA) और अन्य संस्थान वैज्ञानिक रूप से उनका परीक्षण करते हैं।
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया के लिए भेजे गए सवालों का अब तक जवाब नहीं दिया है। मंत्रालय का जवाब मिलने पर कहानी को अपडेट किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित टीम के निष्कर्ष
CITES की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी ) की रिपोर्ट के लगभग दो महीने बाद आई है। इस टीम को भी वंतारा के लिए किए गए जानवरों के आयात की जांच का जिम्मा दिया गया था, लेकिन इसके निष्कर्ष पूरी तरह अलग रहे। एसआईटी रिपोर्ट का केवल सारांश ही अब तक सार्वजनिक किया गया है।
जानवरों के आयात के अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को हाथियों के घरेलू स्थानांतरण, जानवरों की मृत्यु दर, वंतारा द्वारा प्रदान की जा रही पशु चिकित्सा सेवाओं के मानक, और अदालत में दायर दो याचिकाओं में उठाए गए अन्य कई मुद्दों की भी जांच करने का निर्देश दिया था।
पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्ती चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली इस टीम ने निष्कर्ष निकाला कि जब CITES के तहत किसी व्यापार के लिए परमिट जारी किया जाता है, तो उसे भारतीय कानून के तहत वैध माना जाता है, और न तो वंतारा और न ही भारतीय अधिकारी यह जांच करने के लिए बाध्य हैं कि किसी दाता चिड़ियाघर ने निर्यात से पहले वह जानवर कानूनी रूप से प्राप्त किया था या नहीं।

विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के क्लाइमेट और इकोसिस्टम्स टीम के प्रमुख देबादित्य सिन्हा ने कहा, “यह एक पूरी तरह कानूनी दृष्टिकोण है जो ऐसे परमिटों की वास्तविकता और CITES में निहित संरक्षण उद्देश्यों को नज़रअंदाज़ करता है। इन चिंताओं को नज़रअंदाज़ करके एसआईटी उन अहम सवालों को टाल देती है, जैसे कि ऐसे दुरुपयोग से लाभ किसे होता है और जंगली जानवरों की मांग उनके प्राकृतिक आवासों में संरक्षण प्रयासों को कैसे नुकसान पहुंचाती है।”
अपनी रिपोर्ट में CITES सचिवालय ने स्पष्ट किया कि “CITES सूची में शामिल प्रजातियों के व्यापार को कानूनी और टिकाऊ बनाए रखना आयात करने वाले, निर्यात करने वाले और पारगमन देशों की संयुक्त जिम्मेदारी है।”
वंतारा में आयात किए जा रहे जानवरों की बड़ी संख्या को देखते हुए, सचिवालय ने सिफारिश की कि “भारत को तुरंत अपनी आयात प्रक्रियाओं की समीक्षा करनी चाहिए और अधिक सख्त जांच तंत्र लागू करना चाहिए, जो जोखिम मूल्यांकन पर आधारित हो, ताकि किसी भी अनियमितता का पता आयात परमिट जारी होने और जानवरों की शिपमेंट से पहले ही लगाया जा सके,” रिपोर्ट में कहा गया है।
मोंगाबे इंडिया ने एसआईटी से इस बारे में टिप्पणी मांगी कि CITES ने आयात करने वाले देशों से ड्यू डिलिजेंस यानी आवश्यक जांच प्रक्रिया अपनाने की सिफारिश क्यों की है, लेकिन प्रकाशन के समय तक एसआईटी की ओर से कोई जवाब नहीं मिला।
दो रिपोर्टों ने उठाए अलग-अलग सवाल
कम से कम 20 पत्रकारों, वन्यजीव विशेषज्ञों और संरक्षण कार्यकर्ताओं ने ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से एसआईटी को अपने बयान दिए। कुल 17 दिनों की जांच में एसआईटी ने वंतारा में आयात किए गए हर जानवर से संबंधित 13 फाइलों के दस्तावेजों की समीक्षा की और निष्कर्ष निकाला कि प्रक्रिया के स्तर पर वंतारा ने किसी भी भारतीय या अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन नहीं किया।
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने वंतारा या किसी सरकारी संस्था के खिलाफ उन सभी आरोपों के आधार पर भविष्य में कोई कानूनी कार्रवाई करने पर रोक लगा दी है, जिनकी जांच एसआईटी पहले ही कर चुकी है।
हालाँकि, CITES रिपोर्ट में उन मामलों में भी समस्याएँ पाई गईं जहाँ एसआईटी को कोई गड़बड़ी नहीं मिली थी।
उदाहरण के लिए, एसआईटी ने यह संभावना खारिज कर दी थी कि वंतारा ने जानवर खरीदे हैं। उसने कहा कि ऐसे सभी आरोप “काल्पनिक” हैं और “कानूनी आधार से रहित” हैं। एसआईटी के अनुसार, जानवरों के स्थानांतरण के लिए जारी किसी भी बिल का संबंध केवल बीमा और परिवहन खर्चों से था।
लेकिन CITES सचिवालय को चेकिया (Czechia) से आए जानवरों के मामले में अलग तथ्य मिले। रिपोर्ट में कहा गया कि चेकिया सरकार ने पुष्टि की कि वंतारा (GZRRC) को भेजे गए जानवर बेचे गए थे, न कि “बचाव (रेस्क्यू)” के उद्देश्य से निर्यात किए गए थे। चेक प्राधिकरणों ने चालान की प्रतियाँ भी साझा कीं जिनमें जानवरों की सूची, प्रति यूनिट कीमत, टैक्स और अन्य विवरण दर्ज थे।
रिपोर्ट में कहा गया, “भारत और चेकिया, दोनों ही, किए गए लेनदेन और तैयार चालानों को लेकर अलग-अलग व्याख्या रखते हैं।”
हालाँकि जानवरों की खरीद-बिक्री पर CITES प्रतिबंध नहीं लगाता, लेकिन ऐसा करने के लिए सख्त शर्तों का पालन जरूरी है ताकि वंतारा जैसी परियोजनाएँ अवैध वन्यजीव व्यापार को बढ़ावा न दें, जहाँ जंगली जानवरों को झूठा “कैद में पाला गया” बताया जाता है।
वन्यजीव कानून विशेषज्ञ मेगैन नाताली ने बताया, “CITES उल्लंघनों के लिए अभी कोई अंतरराष्ट्रीय न्यायालय नहीं है, और न ही इस संधि में आपराधिक सज़ा का प्रावधान है। लेकिन CITES स्टैंडिंग कमेटी के पास यह अधिकार है कि वह स्पष्टीकरण मांगे, सुधारात्मक कदम सुझाए और गंभीर मामलों में गैर-अनुपालक देशों के खिलाफ व्यापार प्रतिबंध की सिफारिश करे।”
उन्होंने आगे कहा, “भारत का सुप्रीम कोर्ट भले घरेलू स्तर पर मामला बंद कर चुका हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संधि अब भी सदस्य देशों पर दबाव, पारदर्शिता और राजनीतिक जिम्मेदारी के जरिए जवाबदेही तय करती है।”
CITES सचिवालय ने एक और गंभीर मामला भी चिह्नित किया, माउंटेन गोरिल्ला (Gorilla beringei beringei) के आयात का।
मार्च 2025 में जर्मन समाचार वेबसाइट Süddeutsche Zeitung (SZ) ने रिपोर्ट किया था कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) स्थित कैपिटल ज़ू ने एक माउंटेन गोरिल्ला वंतारा को निर्यात किया, जबकि यह प्रजाति दुनिया में कहीं भी कैद में नहीं रखी जाती या पाली जाती।
UAE ने CITES सचिवालय को बताया कि यह गोरिल्ला, जो मूल रूप से मध्य-पूर्वी अफ्रीका में पाया जाता है, हैती से आयात किया गया था और फिर भारत को पुनः-निर्यात किया गया।
रिपोर्ट में कहा गया, “CITES ट्रेड डेटाबेस में गोरिल्ला (किसी भी प्रजाति) के हैती को निर्यात का कोई रिकॉर्ड नहीं है।”
सचिवालय ने जोड़ा, “इस मामले में भी अधिक उच्च स्तर की जांच और सतर्कता की आवश्यकता थी।”

एसआईटी की जांच और उठते सवाल
एसआईटी की जांच में कैपिटल ज़ू सहित दाता चिड़ियाघरों के हलफ़नामों, बयानों और साक्षात्कारों पर भरोसा किया गया।
एसआईटी की सार्वजनिक रिपोर्ट में कहा गया है कि गोरिल्ला की उप-प्रजाति को गलत दर्ज किया गया था, लेकिन रिपोर्ट में न तो मूल उप-प्रजाति का नाम दिया गया है और न ही सही वाला।
मोंगाबे इंडिया ने एसआईटी से यह स्पष्ट करने के लिए सवाल भेजे थे कि गोरिल्ला की असली प्रजाति क्या थी और यह गलती कैसे हुई, लेकिन प्रकाशन के समय तक कोई जवाब नहीं मिला।
कंगारू एनिमल शेल्टर, जो एक और यूएई-आधारित संस्था है और जिसके प्रबंधक के बारे में Süddeutsche Zeitung (SZ) ने व्यावसायिक वन्यजीव व्यापार से संबंध होने की बात कही थी, ने एसआईटी को बताया कि “वे इस्लाम के अनुयायी होने के नाते जानवरों की सेवा को अपना धार्मिक कर्तव्य मानते हैं, जिसमें उन्हें बचाना और शरण देना शामिल है।”
जर्मनी स्थित संरक्षण संगठन प्रोवाइल्डलाइफ की सह-संस्थापक और वंतारा में जानवरों के अधिग्रहण की आलोचक डेनिएला फ्रेयर ने कहा, “सवाल यह है कि एसआईटी उन संस्थाओं और अधिकारियों के बयानों पर क्यों निर्भर दिखती है जिन्होंने परमिट जारी किए या जानवर सौंपे, बजाय इसके कि वह स्वतंत्र विशेषज्ञों या कानून प्रवर्तन एजेंसियों से जानकारी लेती।”
ग्लोबल ह्यूमेन सोसाइटी का ऑडिट
आलोचकों ने यह भी कहा कि एसआईटी ने स्वतंत्र वन्यजीव संरक्षण विशेषज्ञों से कोई परामर्श नहीं लिया।
विधि लीगल के देबादित्य सिन्हा ने कहा, “एसआईटी में किसी स्वतंत्र वन्यजीव वैज्ञानिक या संरक्षण विशेषज्ञ का न होना चिंताजनक है, खासकर जब जांच का मूल मुद्दा वन्यजीवों और उनके संरक्षण पर प्रभाव से जुड़ा है।”
एसआईटी ने अपनी जांच में तीन अधिकारियों की मदद ली, अभिषेक कुमार, भारतीय वन सेवा के अधिकारी और पूर्व चिड़ियाघर निदेशक; मोहित जांगीड़, प्रवर्तन निदेशालय में कार्यरत भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी; और महीप कुमार, महाराष्ट्र के पूर्व प्रधान मुख्य वन्यजीव संरक्षक।
इन अधिकारियों के अलावा एसआईटी ने ग्लोबल ह्यूमेन सोसाइटी (जीएचएस ) की एक ऑडिट रिपोर्ट को भी वंतारा के कल्याण और संरक्षण मानकों की “स्वतंत्र पुष्टि” के रूप में लिखा।
जीएचएस, अमेरिकन ह्यूमेन एसोसिएशन की अंतरराष्ट्रीय शाखा है, जो हॉलीवुड फिल्मों में दिया जाने वाला प्रसिद्ध टैग “No animals were harmed in the making of this film” जारी करती है।
10 सितंबर को, यानी एसआईटी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट सौंपने से एक दिन पहले, जीएचएस ने वंतारा को अपना विशेष “Certified Humane” प्रमाणपत्र दिया।
इस प्रमाणपत्र में कहा गया है कि वंतारा ने “पशु कल्याण, बचाव, पुनर्वास और संरक्षण के क्षेत्र में सर्वोच्च मानक स्थापित किए हैं।”
एसआईटी की रिपोर्ट के अनुसार, जीएचएस की सात सदस्यीय टीम ने किसी अज्ञात माह में नौ दिन वंतारा में बिताए और “पशु चिकित्सा देखभाल, पोषण, आवास डिजाइन, संरक्षण प्रजनन, आपातकालीन तैयारी और कर्मचारियों की कार्यसंस्कृति” की व्यापक समीक्षा की।
यह प्रमाणपत्र पाँच वर्ष की अवधि के लिए मान्य बताया गया।
हालाँकि, जीएचएस ऑडिट की शर्तें और दायरा स्पष्ट नहीं हैं।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाए गए प्रमाणपत्र पर लिखा है कि यह केवल एक वर्ष के लिए मान्य है और “उन स्थानों पर लागू होता है जो ग्लोबल ह्यूमेन सोसाइटी और वंतारा के बीच हुए प्रमाणन समझौते में परिभाषित हैं।”
लेकिन न तो यह ऑडिट रिपोर्ट और न ही सर्टिफिकेशन प्रोग्राम एग्रीमेंट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।
जीएचएस की वेबसाइट के अनुसार, यह संस्था बाहरी ऑडिटरों को अनुबंधित करता है ताकि हितों का टकराव न हो। जीएचएस की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि मूल्यांकन प्रजाति-विशिष्ट मानकों पर आधारित था, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि वंतारा में मौजूद 2,000 प्रजातियों का आकलन किया गया या नहीं।
और पढ़ेंः क्या कारण है कि भारत वन्यजीवों की तस्करी का एक प्रमुख अड्डा है?
मोंगाबे इंडिया ने जीएचएस और वंतारा दोनों को ऑडिट की शर्तों, भुगतान, और निष्कर्षों पर प्रश्न भेजे, लेकिन प्रकाशन के समय तक कोई जवाब नहीं मिला।
एप एलायंस के अध्यक्ष और प्रसिद्ध जीवविज्ञानी आयन रेडमंड ने कहा, “जीएचएस द्वारा किए गए चिड़ियाघरों या पशु शरणस्थलों के प्रमाणन का फोकस केवल देखभाल पर है, न कि जानवरों की प्राप्ति के तरीकों या उनके जीवनकाल की जांच पर।”
उन्होंने आगे कहा, “यदि कोई जानवर झूठे दस्तावेजों पर आयात किया गया पाया जाता है, तो उसे उसके मूल देश (न कि पारगमन देश) वापस भेजा जाना चाहिए, CITES के नियमों और संबंधित देशों की सहमति के अनुरूप।”
CITES सचिवालय ने भारत से कहा है कि वह 90 दिनों के भीतर उसकी सिफारिशों के क्रियान्वयन पर रिपोर्ट प्रस्तुत करे। सिफारिशों में एपेंडिक्स I प्रजातियों के आयात पर रोक, वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) को पर्याप्त कर्मियों और अधिकारों से सशक्त बनाना, और संदिग्ध परमिट वाले देशों से समन्वय कर आयात की वैधता की पुष्टि करना शामिल है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 5 नवंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: माउंटेन गोरिल्ला (Gorilla beringei beringei) की प्रतीकात्मक तस्वीर। तस्वीर – शार्प फोटोग्राफी, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0)