- छत्तीसगढ़ के सरगुजा में कोयला खनन के विस्तार से रामगढ़ पहाड़ी की चट्टानों में दरारें आ रही हैं, जिससे सीताबेंगा और जोगीमारा जैसी ऐतिहासिक गुफाओं के क्षरण का ख़तरा बढ़ गया है।
- इन गुफाओं को दुनिया की प्राचीन नाट्यशाला कहा जाता है, जहां के भित्तिचित्र केवल पुरातात्विक धरोहर नहीं, बल्कि सभ्यता की स्मृति भी माने जाते हैं।
- सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि नए कोयला खदान की अनुमति देते समय यह तथ्य छुपाया गया कि 10 किलोमीटर के दायरे में राष्ट्रीय महत्व का पुरातात्विक स्थल है। यह न केवल कानूनी उल्लंघन है बल्कि सांस्कृतिक संवेदनहीनता का प्रमाण भी है।
भारत की प्राचीनतम नाट्यशाला कही जाने वाली, छत्तीसगढ़ के सरगुजा ज़िले की रामगढ़ की पहाड़ी ख़तरे में है। यह पहाड़ी देखने में साधारण लग सकती है, पर इसके भीतर इतिहास की वो परतें दबी हैं, जो भारतीय कला, रंगमंच साहित्य और संस्कृति की जड़ों तक जाती हैं। हसदेव अरण्य के इलाके में कोयला खनन के कारण, इस पहाड़ी में पहले से ही दरार आ चुकी थी। अब 10 किलोमीटर से भी कम दूरी पर, राजस्थान सरकार को आवंटित एक नए कोयला खदान, केते एक्सटेंशन में खनन की अनुमति दिए जाने के बाद, पहाड़ी के अस्तित्व पर ही ख़तरा मंडराने लगा है।
राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इस नए कोयला खदान की अनुमति लेते समय इस तथ्य को छुपाया गया कि कोयला खदान के 10 किलोमीटर के दायरे में कोई पुरातात्विक स्थल है। इसकी शिकायत केंद्र सरकार से की गई है और केंद्र ने मामले की जांच के भी आदेश दिए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी भी मान रहे हैं कि रामगढ़ की पहाड़ी को नुकसान होने की जानकारी उनके पास है और इस मामले में साइट इंचार्ज को नोटिस जारी करते हुए एफआईआर दर्ज़ कराने के लिए कहा गया है।
राज्य के पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “रामगढ़ सिर्फ एक पहाड़ी नहीं, हमारी पहचान है। इस पहाड़ी की गुफाएं, हमारे पूर्वजों की कला और आस्था की प्रतीक हैं। हमने बार-बार सरकार से कहा है कि कोयला खनन की अंधी दौड़ में हमारी सांस्कृतिक जड़ें न उजाड़ी जाएं। अगर इस क्षेत्र की सुरक्षा नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।”
असल में सरगुजा ज़िले के रामगढ़ गाँव के पास स्थित रामगढ़ पहाड़ी में दो प्रसिद्ध गुफाएं हैं- सीताबेंगा और जोगीमारा। इन गुफाओं को दूसरी-तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व का माना जाता है। इनकी दीवारों पर अंकित ब्राह्मी लिपि के शिलालेख और भित्तिचित्रों से पता चलता है कि प्राचीन काल में यह स्थान सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। इसे कालिदास की सबसे प्रसिद्ध रचना ‘मेघदूतम’ की रचनास्थली भी कहा जाता है।
किंवदंती है कि भगवान राम ने अपने वनवास के दौरान सीता और लक्ष्मण के साथ इसी पहाड़ी क्षेत्र में कुछ समय बिताया था। इसी कारण एक गुफा का नाम सीताबेंगा यानी सीता का निवास पड़ा। यह गुफा लगभग 45 फीट लंबी, आगे की ओर 12 फीट चौड़ी और पीछे की ओर 17 फीट चौड़ी है, जबकि ऊंचाई 5.5 से 6 फीट के बीच है। इसके अंदर एक लंबा हॉल जैसा भाग है, जिसमें पत्थर काटकर बनाई गई सीढ़ीनुमा बेंचें हैं।
इन बेंचों के बीच चलने के रास्ते छोड़े गए हैं, और फर्श में लकड़ी के खंभे लगाने के लिए छेद बने हैं। प्रारंभिक खोजकर्ताओं ने इसे आवासीय गुफा माना था। पर जब विद्वानों ने इसके शिलालेखों का अध्ययन किया, तो अनुमान लगाया कि यह शायद भारत का सबसे प्राचीन रंगमंच हो सकता है।

प्राचीनतम भित्तिचित्र
सीताबेंगा और जोगीमारा की गुफाओं में ब्राह्मी लिपि में लिखे गए अभिलेखों में प्रेम, भक्ति और कला की झलक मिलती है। इनका अध्ययन करने वाले पुरातत्ववेत्ता डॉ. थियोडोर ब्लोच ने 1904 में कहा कि सीताबेंगा वास्तव में नाटक, गीत और काव्य-पाठ के प्रदर्शन के लिए बनी जगह थी। उन्होंने इसकी बनावट की तुलना यूनानी रंगमंच से करते हुए कहा कि सामने मंच रहा होगा और पीछे दर्शकों के बैठने की व्यवस्था। इस दृष्टि से यह भारतीय नाट्य परंपरा का सबसे प्रारंभिक उदाहरण हो सकता है। ब्लोच की राय थी कि पास में स्थित जोगीमारा गुफा उन कलाकारों का विश्राम स्थल रही होगी, जो सीताबेंगा में प्रदर्शन करते थे।
जोगीमारा गुफा अपने प्राचीन भित्तिचित्रों के लिए भी प्रसिद्ध है। ये भारत के अब तक ज्ञात सबसे पुराने चित्र माने जाते हैं। भले ही आज ये चित्र समय और नमी से क्षीण हो चुके हों, पर अब भी इनमें पेड़, हाथी, रथ, और नृत्य करती स्त्रियों के चित्र पहचाने जा सकते हैं। चित्रों में लाल, पीले और धूसर रंगों का प्रयोग हुआ है, जो मौर्यकालीन कला की परंपरा का संकेत देते हैं।
1917 में प्रकाशित द हैरिटेज ऑफ इंडिया-इंडियन पेंटिंग में पेर्सी ब्राउन ने दावा किया कि पुरापाषाण काल की कला मुख्य रूप से एक दूरस्थ और अलग-थलग पाई जाने वाली विशेषता है, और यह बात विशेष रूप से भारतीय चित्रकला पर लागू होती है। इन प्राचीन और तारीख़-रहित प्रतीत होने वाले भारतीय संस्कृति के नमूनों और कला के पहले ऐतिहासिक प्रमाण के बीच शायद हजारों साल का अंतर है। पेर्सी के अनुसार-सबसे पुरानी तिथि-योग्य चित्रकला का उदाहरण रामगढ़ पहाड़ी की जोगीमारा गुफा की दीवारों पर मिलता है, जो मध्य प्रांत की छोटी और दूरस्थ रियासत सरगुजा का हिस्सा है। माना जाता है कि ये भित्तिचित्र ईसा से लगभग एक शताब्दी पहले बनाए गए थे।
1914 में असित कुमार हलधर ने इन चित्रों की प्रतिलिपियाँ तैयार कीं। उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि ये चित्र दो अलग-अलग कालखंडों के हैं- पहला, तीसरी-दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का अत्यंत परिष्कृत कार्य, और दूसरा, कई सदियों बाद का अपेक्षाकृत साधारण चित्रण। हलधर ने यह भी माना कि जोगीमारा की दीवार पर लिखा ‘सुतनुका नाचघर’ यानी सुतनुका का नृत्यगृह शब्द इस बात का प्रमाण है कि यहां किसी कलाकार या नर्तकियों का समूह सक्रिय था।
शिलालेख में उल्लेख है कि ‘सुतनुका नामक एक देवदासी’ ने यह स्थल ‘लड़कियों के विश्राम स्थल’ के रूप में बनवाया था। इससे यह अनुमान लगाया गया कि जोगीमारा, सीताबेंगा में प्रदर्शन करने वाली स्त्रियों का विश्राम स्थल रही होगी।
असित कुमार हलधर ने ‘आर्ट एंड ट्रेडिशन ’ में लिखा कि हमारे प्राचीन अवशेष, जो अशोक के समय से अब तक मध्य प्रांत की जोगीमारा गुफा में सुरक्षित हैं, इन सुंदर और लहरदार रेखाओं को दर्शाते हैं। वहां हाथियों का एक झुंड और नर्तकों का एक समूह बनाया गया है, जिन्हें रंग या उजाले-अंधेरे के बजाय केवल कोमल रेखाओं के ज़रिए दिखाया गया है। कलाकार ने ऐसी रेखाएँ बनाई हैं जो वास्तव में प्रकृति में मौजूद नहीं होतीं।
अध्ययन और खोज का इतिहास
रामगढ़ गुफाओं का पहला आधुनिक उल्लेख 1848 में लेफ्टिनेंट कर्नल जे.आर. ओसले ने किया था। उन्होंने पहाड़ी की चोटी पर स्थित मंदिर और एक बड़ी सुरंग का वर्णन किया। बाद में 1863-64 में लेफ्टिनेंट कर्नल टी. डाल्टन ने इस क्षेत्र का सर्वेक्षण किया और लिखा कि सुरंग के अंत में दो गुफाएं हैं, जिनमें से बड़ी गुफा आवासीय लगती है। इसके बाद 1872 में वी. बॉल ने इन गुफाओं के माप और स्वरूप का विस्तृत विवरण दिया।
1874-75 में जे.डी. बेगलर ने इन्हें रामायण के चित्रकूट से जोड़ा। 1871 में अलेक्जेंडर कनिंघम ने इन गुफाओं के शिलालेख प्रकाशित किए। कनिंघम ने बताया कि एक मूर्तिकार ‘देवदीना’ ने किसी ‘देवदर्शिन’ नामक व्यक्ति के लिए ये लेख उकेरे थे।
1904 में डॉ. थियोडोर ब्लोच ने बंगाल सर्कल के पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत इन गुफाओं का गहन अध्ययन किया। उन्होंने सीताबेंगा को ‘कविता और नाट्य की जननी’ कहा और जोगीमारा को उसकी ‘कलात्मक छाया’। बाद के वर्षों में जे.एफ. ब्लैकिस्टन और अन्य पुरातत्ववेत्ताओं ने इन चित्रों की वैज्ञानिक प्रतिलिपियाँ तैयार कीं।
हालाँकि, सभी विद्वान ब्लोच के मत से सहमत नहीं थे। असित कुमार हलधर जैसे कलाकारों ने तर्क दिया कि गुफा की बनावट ऐसी है कि भीतर बैठा व्यक्ति किसी मंच को देख ही नहीं सकता, इसलिए रंगमंच की अवधारणा व्यवहारिक रूप से असंभव लगती है। कुछ और विद्वानों ने इसे महज विश्रामस्थल की संज्ञा दी।
पुरातत्व सर्वेक्षण की पूर्वी सर्किल की वार्षिक रिपोर्ट से पता चलता है कि पुरातत्व महानिदेशक के आदेश पर 1913-14 में जेएफ ब्लैकिस्टन को गुफा के भित्ति चित्रों की प्रतिलिपि बनाने का काम सौंपा गया, जिसमें अजंता की गुफाओं के भित्ति चित्र की प्रतिलिपि बनाने में मदद करने वाले, कलकता स्कूल ऑफ आर्ट के पूर्व छात्र असित कुमार हलधर और समरेंद्र नाथ गुप्ता ने मदद की। जोगीमारा गुफा की पेंटिंग की सतह लगभग 9 फीट लंबी और लगभग 7 फीट चौड़ी थी। चित्रों को लाल या बैंगनी रंग की पट्टियों द्वारा विभिन्न पैनलों में विभाजित किया गया था। जॉन मार्शल, जिन्हें ये प्रतिलिपियां दी गईं, उन्होंने टिप्पणी की कि भित्तिचित्र दो अलग-अलग हाथों द्वारा बनाए गए थे, पहला लगभग पहली शताब्दी ईसा पूर्व में और दूसरा कई सौ साल बाद।
इन दावों के बीच भारत सरकार ने दिसंबर 1964 में इन गुफाओं को राष्ट्रीय महत्व का मानते हुए, इन्हें संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया।

स्थानीय संस्कृति और जनजीवन में रामगढ़
रामगढ़ की पहाड़ी सिर्फ पुरातत्व का केंद्र नहीं, बल्कि स्थानीय जनजातीय समाज की आस्था का प्रतीक भी है। यहां के आदिवासी समुदाय इसे देव पहाड़ कहते हैं। उनके लिए यह कोई निर्जीव पत्थर नहीं, बल्कि एक जीवंत देवता है। यहां से जुड़ी अनेक लोककथाएं, गीत और कथाएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती रही हैं। पहाड़ी पर रामजानकी मंदिर भी है।
मान्यता है कि महाकवि कालिदास ने जब राजा भोज की उज्जयिनी को छोड़ा था, तो उन्होंने इसी रामगढ़ या रामगिरी को अपना निवास बनाया था। यहीं पर उन्होंने अपने महाकाव्य ‘मेघदूतम‘ की रचना की थी। यही कारण है कि आषाढ़ के पहले दिन यहां बादलों की पूजा-अर्चना की जाती है। यहां राज्य सरकार ने, हाथ में ‘मेघदूतम’ लिए हुए महाकवि कालिदास की एक प्रतिमा भी स्थापित की है।
हर साल आसपास के गांवों के लोग यहां पूजा करने आते हैं। जब हसदेव अरण्य में कोयला खदानों का विस्तार शुरू हुआ, तो सबसे पहले इन्हीं आदिवासियों ने विरोध किया। उनके लिए यह संघर्ष केवल पर्यावरण या विरासत का नहीं, बल्कि आस्था और पहचान का था। यही कारण है कि बड़ी संख्या में, इलाके के आदिवासी कोयला खदानों के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए। लेकिन पहले से जारी परसा ईस्ट केते बासन कोयला खदान तो बंद नहीं हुई, सरकार ने एक और कोयला खदान केते एक्सटेंशन को अंतिम मंजूरी दे दी। यही कारण है कि रामगढ़ की यह चट्टानी विरासत अब असल में खतरे में है।
हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन के लिए लगातार विस्फोट किए जा रहे हैं। भारी मशीनों की गड़गड़ाहट और बारूद के धमाकों से पहाड़ी की चट्टानें हिल रही हैं। सीताबेंगा और जोगीमारा गुफाओं की सतह पर महीन दरारें उभर आई हैं, और स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में ये दरारें चौड़ी होती जा रही हैं।
छत्तीसगढ़ के पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव कहते हैं, “कोयला खदान के लिए अपनी आस्था और इतिहास को नहीं मिटाया जा सकता। सरकार को फौरन नये कोयला खदान की अनुमति को रद्द करना चाहिए।”
लेकिन इलाके के विधायक और राज्य के पर्यटन, संस्कृति, धर्मस्व एवं धार्मिक न्यास मंत्री राजेश अग्रवाल पिछली सरकार का हिस्सा रहे टीएस सिंहदेव पर ही सवाल उठा रहे हैं.
वे कहते हैं, “किसी भी गतिविधि से रामगढ़ पर्वत को कोई नुकसान नहीं हो रहा है। लेकिन फिर भी मैं एकदम स्पष्ट करना चाहूंगा कि किसी भी गतिविधि या उत्खनन से रामगढ़ पर्वत पर किसी भी प्रकार का नुकसान होगा तो उसका हम विरोध करेंगे। वैसे जिस समय टीएस सिंहदेव राज्य के उप मुख्यमंत्री थे, उस समय 2020 में खनन अनुमति दी गई थी। ऐसे में 2025 में विरोध क्यों हो रहा है?”
हालांकि स्थानीय आदिवासी चाहते हैं कि इस मसले को राजनीति से दूर रखा जाए और किसी भी स्थिति में रामगढ़ की पहाड़ी को बचा लिया जाए।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्टों में पहले ही उल्लेख है कि गुफाओं की दीवारों पर रंगीन चित्रों के कुछ हिस्से उखड़ने लगे हैं। यह केवल एक भौतिक क्षति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति का मिटना है। रामगढ़ की गुफाएं केवल पत्थर नहीं हैं, ये वह मंच हैं जहां मानवता ने पहली बार अपने अनुभवों को अभिव्यक्ति दी थी। रामगढ़ पहाड़ी की दरारों के बीच से जब हवा गुजरती है, तो लगता है मानो कोई पुराना संवाद गूँज रहा हो, शायद वही जो कभी इन गुफाओं की दीवारों पर लिखा गया था। यह गूंज हमें याद दिलाती है कि सभ्यता का इतिहास केवल किताबों में नहीं, धरती की परतों में भी लिखा गया है। लेकिन अब इस इतिहास पर कोयला खनन का खतरा मंडरा रहा है।
बैनर तस्वीर: सरगुजा ज़िले के रामगढ़ गाँव के पास स्थित रामगढ़ पहाड़ी में दो प्रसिद्ध गुफाएँ हैं- सीताबेंगा और जोगीमारा। इन गुफाओं को दूसरी-तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व का माना जाता है। तस्वीर – आलोक प्रकाश पुतुल