- कंस्ट्रक्शन और डिमोलिशन वेस्ट नियमों के तहत अब कचरा फैलाने वालों को जिम्मेदारी लेनी होगी, नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना देना होगा और अपनी गतिविधियों की जानकारी एक केंद्रीय ऑनलाइन सिस्टम के जरिए देनी होगी।
- निर्माण कार्य और उससे जुड़ा कचरा काफी तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन पिछले नियम इस समस्या का समाधान करने में विफल रहे थे।
- विशेषज्ञों को नए नियमों से उम्मीद तो है, लेकिन वे इनमें सुधार की गुंजाइश की ओर भी इशारा करते हैं।
भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने कंस्ट्रक्शन एंड डेमोलिशन (सीएंडडी) क्षेत्र में कचरे की रीसाइकलिंग और टिकाऊ प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए “विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व” (ईपीआर), अनिवार्य रीसाइक्लिंग लक्ष्य और अन्य प्रावधान लागू किए हैं।
इन नए अधिसूचित पर्यावरण (सीएंडडी) अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2025 के तहत, अब स्थानीय निकायों या विकास प्राधिकरणों को हर निर्माण परियोजना की मंजूरी में कचरा रीसाइक्लिंग से जुड़ी व्यवस्थाओं को शामिल करना होगा। साथ ही निर्माण, पुनर्निर्माण और विध्वंस परियोजनाओं में ईपीआर लक्ष्यों को एक ठोस कचरा प्रबंधन योजना के जरिए लागू करना होगा।
इन नियमों के मुताबिक, “उत्पादक (कचरा फैलाने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति या संस्था) को अपने हर प्रोजेक्ट के लिए एक कचरा प्रबंधन योजना तैयार करनी होगी, जिसमें निर्माण, पुनर्निर्माण और विध्वंस कार्य से निकलने वाले सभी प्रकार के कचरे की मात्रा का अनुमान लगाया जाएगा और फिर योजना को मंजूरी के लिए स्थानीय प्राधिकरण को सौंपा जाएगा।”
नियमों में कचरा उत्पादकों की जिम्मेदारियों को स्पष्ट किया गया है। इसके तहत उन्हें कचरे को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर इकट्ठा करना होगा, उसे सुरक्षित रखना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि उसे रीसायकल किया जाए या अधिकृत एजेंसियों या रीसाइक्लरों को सही तरीके से सौंपा जाए। उन्हें कचरा इकट्ठा करने, अलग करने और स्टोर करने के दौरान वायु प्रदूषण को रोकने, गंदगी फैलाने से बचने और जनता को होने वाली परेशानी को कम करने के लिए आवश्यक उपाय भी करने होंगे।
वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (डब्ल्यूआरआई) इंडिया के क्लीन एयर एक्शन कार्यक्रम के निदेशक श्री कुमारास्वामी के अनुसार, नए नियमों के जरिए एक अहम बदलाव किया गया है। अब कचरा उत्पन्न करने वालों पर ज्यादा जिम्मेदारी डाली गई है और निजी क्षेत्र को भी इसमें भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। वह आगे कहते हैं, “इससे सीएंडडी कचरा प्रबंधन में नए व्यावसायिक मॉडल के अवसर मिलेंगे और ऑनलाइन पोर्टल जैसे डिजिटल उपकरणों के जरिए डेटा-आधारित योजना बनाना आसान होगा।”
ईपीआर लक्ष्य की गणना करते समय सीमेंट कंक्रीट, ईंट, प्लास्टर, पत्थर, मलबा और सिरेमिक जैसे अवशेषों को भी शामिल किया जाएगा। लेकिन ऐसे पदार्थ जो दोबारा इस्तेमाल या बेचने योग्य हैं – जैसे लोहा, लकड़ी, प्लास्टिक, धातु और कांच – उन्हें ईपीआर लक्ष्य में नहीं गिना जाएगा। इनका निपटान पहले से मौजूद नियमों के अनुसार किया जाएगा।
नए नियमों में कुछ निर्माण कार्यों में साफ़ किये गए या छांटे गए सीएंडडी कचरे का उपयोग करना अनिवार्य किया गया है। सड़क निर्माण परियोजनाओं और जिन परियोजनाओं का निर्माण क्षेत्र 20,000 वर्ग मीटर या उससे अधिक है, उनमें इस कचरे का इस्तेमाल करना जरूरी होगा। इन नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी स्थानीय निकायों की होगी।

नियमों में कचरा भंडारण सुविधाओं (वेस्ट स्टोरेज फैसिलिटी) का भी उल्लेख किया गया है। शहरी स्थानीय निकायों को एक साल के भीतर अपने क्षेत्र या समूह स्तर पर कचरा भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाएं चिन्हित कर स्थापित करनी होंगी। इन निकायों कचरा इकट्ठा करने की जगह तय करने और उसे रजिस्ट्रेशन प्राप्त रीसाइक्लिंग करने वालों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी होगी।
अगर कोई इन नियमों का पालन नहीं करता, तो ऐसे मामलों को राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास भेजा जाएगा।
नियमों में पर्यावरणीय मुआवजे के प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। अगर कचरा उत्पन्न करने वाले, रीसाइक्लर, भंडारण संचालक या डेवलपर उचित कचरा निपटान और रीसाइक्लिंग नियमों का पालन नहीं करते हैं, तो उन्हें पर्यावरण या सार्वजनिक स्वास्थ्य को हुए नुकसान के आधार पर मुआवजा देना होगा।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड मुआवजे की इस राशि को एक अलग अकाउंट में मैनेज करेगा। इस राशि को इधर-उधर बिखरे, पुराने या लावारिस कचरे को इकट्ठा करने, रीसायकल करने, अनुसंधान और विकास का समर्थन करने, रीसाइक्लरों को प्रोत्साहन देने और स्थानीय निकायों को कचरे का प्रभावी ढंग से प्रबंधन करने में सहायता करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।
नियमों में एक केंद्रीय संचालन समिति की भी बात की गई है जो नियमों के कार्यान्वयन की निगरानी करेगी। सीपीसीबी अध्यक्ष इसकी अध्यक्षता करेंगे और इसमें कई मंत्रालयों (पर्यावरण, आवास, सड़क, ग्रामीण विकास, आदि), नीति आयोग, भारतीय मानक ब्यूरो, इंडियन रोड कांग्रेस, रीसाइक्लिंग, रियल एस्टेट सेक्टर और अन्य विशेषज्ञ निकायों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
नियमों में रीकंस्ट्रक्शन और डेमोलिशन प्रोजेक्ट में कचरे के रीसाइक्लिंग के लिए स्पष्ट ईपीआर लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं—2025-26 के लिए 25%, जो 2028-29 में बढ़कर 100% हो जाएगा। निर्माण कार्यों में साफ़ किये गए कचरे के इस्तेमाल के लिए भी लक्ष्य तय किए गए हैं- 2026-27 में 5% से शुरू होकर 2030-31 और उसके बाद इसे 25% तक बढ़ा दिया जाएगा। इसी तरह के लक्ष्य सड़क निर्माण परियोजनाओं के लिए भी निर्धारित किए गए हैं।
कुमारस्वामी ने कहा, “निर्माण और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में रीसाइकिल किए गए सीएंडडी कचरे के इस्तेमाल के लिए अनिवार्य न्यूनतम लक्ष्य बहुत आशाजनक हैं। वे एक विश्वसनीय बाजार बनाने में मदद कर सकते हैं, जिससे समय के साथ लागत घटेगी और सामग्री के रीसाइक्लिंग व फिर से इस्तेमाल में नवाचार को प्रोत्साहन मिल सकता है।”
नए नियम केंद्रीकृत इंटरफेस-आधारित ऑनलाइन निगरानी और अनुपालन मूल्यांकन के बारे में भी बात करते हैं। इसकी सराहना करते हुए, कुमारस्वामी ने कहा कि यह प्रणाली पूरे सीएंडडी कचरा प्रबंधन चक्र में पारदर्शिता लाने की बड़ी क्षमता रखती है, यानी कचरा उत्पन्न होने से लेकर रीसाइकल करने तक।
उन्होंने यह भी कहा, “अगर इसे सही तरीके से लागू किया गया, तो यह नियमों के पालन और डेटा-आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया को मजबूत बनाकर एक अधिक जिम्मेदार और प्रभावी प्रणाली तैयार कर सकता है।”

एक बढ़ती चुनौती और अब तक सीमित प्रगति
निर्माण क्षेत्र भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 8% का योगदान देता है और कृषि के बाद दूसरे सबसे बड़े कार्यबल को रोजगार भी मुहैया कराता है। लगातार शहरीकरण और बढ़ती आकांक्षाओं के साथ, इस क्षेत्र में और बढ़ोतरी की उम्मीद है। दिसंबर 2024 में जी20 सचिवालय के लिए थिंक टैंक ‘काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर’, डब्ल्यूआरआई इंडिया और आरएमआई द्वारा प्रस्तुत एक संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत पहले से ही सालाना 700-900 मिलियन वर्ग मीटर फ्लोर स्पेस जोड़ रहा है यानी नया निर्माण कर रहा है। वहीं 2014 और 2023 के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क में 60% से अधिक की वृद्धि हुई है। भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को साल 2050 तक हर दिन लगभग 15 वर्ग किलोमीटर नई जमीन विकसित करनी होगी, साथ ही पुरानी ढांचागत संरचनाओं का पुनर्विकास भी करना होगा।
सीएंडडी कचरे की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में बिल्डिंग मैटेरियल्स एंड टेक्नोलॉजी प्रमोशन काउंसिल ने वार्षिक सीएंडडी कचरे का अनुमान 100 मिलियन टन लगाया था, जबकि आवास और शहरी मामले मंत्रालय ने 2024 में इसे 150 से 500 मिलियन टन तक आंका था। वहीं केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का अनुमान है कि 2030 तक कुल ठोस कचरा लगभग 165 मिलियन टन प्रतिवर्ष तक पहुंच जाएगा।
नीति निर्माता लंबे समय से इस चुनौती की भयावहता को पहचानते आ रहे हैं। आवास और शहरी मामले मंत्रालय की 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मटेरियल की वार्षिक खपत साल 1970 से 2015 के बीच छह गुना बढ़ी है(1.18 बिलियन टन से बढ़कर 7 बिलियन टन हो गई) और 2030 तक इसके 14.2 बिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है।
इस बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए भारत सरकार ने कई नियम पेश किए। साल 2000 में म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट (मैनेजमेंट और हैंडलिंग) नियमअधिसूचित किए गए और मार्च 2016 में पर्यावरण मंत्रालय ने विशेष ‘कंस्ट्रक्शन और डेमोलिशन वेस्ट मैनेजमेंट’ नियम जारी किए। हालांकि, पिछले दो दशकों में निर्माण गतिविधियों में भारी वृद्धि हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस कारण सीएंडडी कचरे की समस्या बढ़ी है।
नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ की 2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2016 के नियमों को सही ढंग से लागू नहीं किया गया था और उनमें कई खामियां पाईं गईं थीं, मसलन शहरों द्वारा उपनियमों की घोषणा न करना, कचरा इकट्ठा करने के लिए जगहों की अपर्याप्त पहचान, रीसाइकल किए गए उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए कोई ठोस व्यवस्था का न होना, रीसाइकल्ड मटेरियल के लिए कमजोर बाजार और शहरी स्थानीय निकायों के भीतर खराब संस्थागत क्षमता।
सीईईडब्ल्यू, डब्ल्यूआरआई इंडिया और आरएमआई की रिपोर्ट में कहा गया है, “…दरअसल, सीएंडडी कचरे की एक बड़ी मात्रा को अनौपचारिक तरीके से निपटाया जाता है, या तो बैकफिलिंग के जरिए या संवेदनशील क्षेत्रों में अवैध रूप से डंपिंग के जरिए। इससे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं, जैसे वायु प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि, मिट्टी में बढ़ता प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती बाढ़ की समस्या।”
चिंतन एनवायरनमेंटल रिसर्च एंड एक्शन ग्रुप की भारती चतुर्वेदी कहती हैं, “इन नियमों को लागू करने में ज्यादा सफलता नहीं मिली है।” उनका मानना है कि इस तरह के कचरे का प्रबंधन इसलिए सही से नहीं हो पाता क्योंकि यह व्यवसाय के लिए लाभकारी नहीं है। भारती चतुर्वेदी के मुताबिक, “हमें इसे लाभकारी और उपयोगी व्यवसाय बनाना है, लेकिन हमने अभी तक ऐसा नहीं किया है।”

नए नियम और प्रभावशीलता
अप्रैल 2025 में अधिसूचित सीएंडडी कचरे के प्रबंधन के लिए संशोधित ढांचा, कचरा उत्पादकों द्वारा अनुपालन सुनिश्चित करने पर जोर देता है। साल 2016 के नियमों में कुल 10 प्रावधान थे, जबकि नए नियमों में 21 प्रावधान शामिल हैं।
मुंबई के एनजीओ ‘वनशक्ति’ के डायरेक्टर स्टालिन डी. ने कहा, “नए नियम निश्चित रूप से सार्वजनिक और प्राकृतिक क्षेत्रों में अवैध कचरा फेंकने की समस्या को कम करने में मदद करेंगे। खासकर संवेदनशील इलाकों जैसे कि वेटलैंड्स को इस अवैध कचरे से काफी नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि 2016 के नियमों में कचरा उत्पन्न करने की निगरानी के लिए कोई केंद्रीय पोर्टल नहीं था और रिपोर्टिंग प्रणाली भी कमजोर थी।”
साल 2025 के नियमों में ईपीआर सर्टिफिकेट का प्रावधान किया गया है, जो कचरा उत्पादकों को उनके लक्ष्य पूरे करने के लिए रजिस्टर्ड रीसाइक्लर से पहले से सर्टिफिकेट खरीदने की अनुमति देता है। स्टालिन के मुताबिक यह एक अच्छा कदम है क्योंकि इसमें उचित निपटान की लागत पहले ही चुकानी पड़ती है, जो जिम्मेदारी सुनिश्चित करता है।
हालांकि, विशेषज्ञों ने कई चिंताएं भी जताई हैं। कुमारस्वामी कहते हैं, “नए नियमों में छोटे कचरा उत्पादकों को जोड़ने और उन्हें समर्थन देने के लिए स्पष्ट और मजबूत व्यवस्था की कमी है, जबकि बिना प्रबंधन वाले कचरे के लिए काफी हद तक जिम्मेदार होते हैं। ऐसे छोटे उत्पादकों को आधिकारिक रीसाइक्लिंग सिस्टम में शामिल करने के लिए बेहतर उपाय लागू करने की जरूरत है।
स्टालिन डी. ने इशारा किया कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में कर्मचारियों की कमी के कारण नियमों का सही क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
चिंतन फाउंडेशन की भारती चतुर्वेदी के अनुसार, नियमों में ईपीआर जिम्मेदारियों को लेकर स्पष्टता का अभाव है। वह सवाल करती हैं, “ई-कचरे और प्लास्टिक के मामले में ब्रांड मालिक स्पष्ट रूप से जवाबदेह होते हैं। लेकिन इस मामले में कौन जिम्मेदार होगा – मकान मालिक, ठेकेदार, या पीडब्ल्यूडी जैसी सरकारी संस्था?” उन्होंने आगे कहा, “हमारे पास अभी भी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है, और यह एक चिंता का विषय है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 2 मई, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: चेन्नई में निर्माणाधीन इमारत। नए नियमों के अनुसार, हर निर्माण परियोजना के लिए एक कचरा प्रबंधन योजना तैयार करनी होगी और उसे मंजूरी के लिए स्थानीय प्राधिकरण को सौंपना होगा। तस्वीर: मैके सैवेज, विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY 2.0).