- उत्तर प्रदेश के बहराइच में भेड़ियों के संदिग्ध हमलों में छह लोगों की मौत और कइयों के घायल होने के बाद गांवों में भय का माहौल है।
- हालांकि, जानकार यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या इन हमलों के पीछे भेड़िये ही हैं। उनके मुताबिक सिकुड़ते आवास, मौसमी बाढ़ और जंगली कुत्तों या संकर नस्लों की बढ़ती मौजूदगी इन हमलों की वजह हो सकती है।
- वन्यजीव जीवविज्ञानी आनुवंशिक परीक्षण और शोध-आधारित जांच की मांग करते हैं। वे इस बात पर जोर देते हैं कि भय और गलत जानकारी मानव-पशु संघर्ष को बढ़ा रही है, क्योंकि भेड़िये लंबे समय से लोगों के साथ सह-अस्तित्व में रहते आए हैं।
रफी शनिवार की गुनगुनी दोपहर में अपनी बाईं थैली में कारतूस गिनने में व्यस्त हैं। वह उत्तर प्रदेश वन्यजीव विभाग में वन प्रहरी हैं। जरूरत पड़ने पर वह मान्यता प्राप्त शूटर के रूप में भी काम करते हैं। इस बार, उन्हें बलराजपुरवा और आस-पास के गांवों में मुश्किल काम सौंपा गया है। उन जानवरों का शिकार करना जिनके बारे में ऐसा माना जा रहा है कि वे भेड़िये हैं और हाल ही में बच्चों समेत इंसानों पर हुए हमलों के पीछे हैं।
ये हमले बहराइच जिले के एक दर्जन से ज्यादा गांवों और बस्तियों में हो रहे हैं। इन हमलों में 21 अक्टूबर तक कथित तौर पर एक बुज़ुर्ग दंपत्ति समेत छह लोगों की मौत हो चुकी है। यही नहीं, नौ सितंबर से अब तक 20 से ज्यादा लोगों पर हमले हो चुके हैं। कई लोगों को शक है कि ये जानवर भेड़िये हैं, लेकिन जानकार इस दावे पर सवाल उठा रहे हैं।
प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) अजीत सिंह ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “हमें भेड़ियों को देखते ही गोली मारने के आदेश हैं और अब तक छह में से तीन भेड़ियों को मार गिराया गया है।” गाजीपुर में तैनात वरिष्ठ वन्यजीव अधिकारी को अस्थायी रूप से स्थिति को संभालने के लिए तैनात किया गया है, क्योंकि उन्होंने 2024 में बहराइच जिले के दूसरे हिस्से में इसी तरह के एक अभियान की अगुवाई की थी। उन्होंने बताया कि उस दौरान दो भेड़ियों को मार गिराया गया था और पांच को पकड़ा गया था।
आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हालिया हमलों के लिए जिम्मेदार भेड़ियों को पकड़ने या फिर जनता की सुरक्षा के लिए उन्हें खत्म करने के लिए शूटर बुलाने का आदेश दिया था।
सिंह कहते हैं, “मैं इंसानों पर हमले के लिए भेड़ियों को दोषी नहीं ठहरा रहा हूं। मैंने जो देखा है, वह भेड़ियों के प्राकृतिक आवास में इंसानों के व्यापक अतिक्रमण से जुड़ा हुआ लगता है। यह पता लगाने के लिए उचित शोध की जरूरत है कि ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों हो रही हैं, क्योंकि पिछले साल भी ऐसी स्थिति बनी थी।”
वरिष्ठ वन्यजीव अधिकारी ने बार-बार होने वाली इन घटनाओं के बारे में कहा, “मेरे अवलोकन के आधार पर, ऐसा लगता है कि जिन वन्यजीव क्षेत्रों में ये भेड़िये रहते हैं, वहां बड़े पैमाने पर मानवीय अतिक्रमण इन हमलों का मुख्य कारण है। बाढ़ या यहां तक कि गर्मी भी इसकी वजह हो सकती है। फिर भी, हमें सटीक कारण जानने के लिए उचित शोध करना होगा, क्योंकि पिछले साल भी ऐसा ही हुआ था।”
भारत में बदलते मौसम और जलवायु पैटर्न से मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ रहा हैं। वाइल्डलाइफ एसओएस की एक रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ते तापमान और अप्रत्याशित बारिश जानवरों के प्रजनन और प्रवास को बाधित कर रही है। हालांकि, भेड़ियों पर इसके दुष्प्रभाव पर चर्चा करने के लिए भारत-आधारित कोई खास साहित्य या शोध उपलब्ध नहीं है।

गांवों में भय का माहौल
इन हमलों का सिलसिला नौ सितंबर के बाद शुरू हुआ और तब से 40 से ज्यादा गांवों के लोग अपने घरों और परिवार के सदस्यों की रक्षा करने के लिए रतजगा कर रहे हैं। ऐसा वे अपने जीवन में पहली बार देख रहे हैं। कुछ परिवारों ने अस्थायी मचान बना लिया है, जबकि सभी पुरुष सदस्य लाठी या बरछा (लाठी के एक सिरे पर लगी एक मोटी कील) रखते हैं। परिवार अपने बच्चों को स्कूल भेजने से डरते हैं और कई माता-पिता तो स्कूल के बाहर बैठकर हर समय बच्चों की रखवाली करते हैं।
बलराजपुरवा के निवासी और 28 साल के इंदल चौहान गुजरात के सूरत में दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करते हैं। वह वन्यजीवों के हमलों की आशंका के बीच अपने गांव लौट आए हैं। उन्होंने बताया, “10 सितंबर को मेरी पत्नी का फोन आया और उसने मुझे भेड़ियों के हमले के बारे में बताया। इसके बाद मैंने घर लौटने का फैसला किया, क्योंकि मेरे परिवार के सदस्यों की जान ज्यादा कीमती है।” लौटने के तुरंत बाद, इंदल ने एक साइकिल के स्पोक व्हील को चार फुट लंबी लोहे की छड़ में वेल्ड करवाया और उसी के सहारे चल पड़े। उन्होंने कहा, “कुछ दिन पहले मैंने एक भेड़िये को चारपाई के नीचे शिकार पकड़ने की कोशिश करते देखा था, लेकिन मैंने उसे देख लिया और मैं उसकी ओर दौड़ पड़ा। वह भाग्यशाली था कि मेरे हमले से बच गया।”
उन्होंने आगे कहा, “मेरा खर्च बढ़ गया है, क्योंकि अब मुझे अपने दोनों बच्चों के लिए सिर्फ दो किलोमीटर दूर स्थित स्कूल भेजने के लिए वैन लगानी पड़ी है। मैं उन्हें पैदल या साइकिल से स्कूल भेजने का जोखिम नहीं उठा सकता, लेकिन यही हकीकत है। हमारा मानसिक स्वास्थ्य भी बिगड़ गया है, क्योंकि हम ठीक से सो नहीं पाते और हर समय भेड़ियों के हमले का डर बना रहता है।”
डीएफओ सिंह ने बताया कि 9-10 सितंबर की रात को जंगली जानवरों ने एक बुजुर्ग दंपति को मार दिया और इसके बाद वन्यजीव विभाग ने ग्रामीणों को पटाखे दिए हैं। वे नियमित रूप से गन्ने के खेतों की छानबीन कर रहे हैं और थर्मल स्क्रीनिंग आधारित ड्रोन के जरिए दिन-रात निगरानी कर रहे हैं। जानवरों द्वारा बुजुर्ग दंपति को मारे जाने से नाराज ग्रामीणों ने वन्यजीव विभाग के कर्मचारियों पर भी हमला किया।

डीएफओ सिंह ने कहा, “ग्रामीणों से हमारी अपील है कि वे बच्चों को बाहर नहीं सोने दें और उन्हें रात होने के बाद बाहर जाने से रोकें।” उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में घरों में दरवाजे कम हैं, जिससे जंगली जानवरों का अंदर घुसना आसान हो जाता है।
उन्होंने बताया, “आमतौर पर भेड़िये इंसानों पर हमला नहीं करते। यह कहना मुश्किल है कि ऐसा क्यों हो रहा है…” उनके मुताबिक दशकों से ऐसा कोई हमला नहीं हुआ था। पिछली बार ऐसी स्थिति लगभग दो दशक पहले आई थी, जब भेड़िये ने कथित तौर पर गोंडा, बहराइच और बलरामपुर जिलों में 32 बच्चों को मार डाला था।
बहराइच के रेंज अधिकारी मोहम्मद साकिब ने कहा कि हमले घाघरा के बाढ़ क्षेत्र में केंद्रित हैं, जहां प्रचुर मात्रा में पानी, गन्ने के ऊंचे खेत और घास के मैदानों के साथ-साथ तेज गर्मी और बारिश के कारण बचाव से जुड़े कामों में देरी हो रही है।
बदलता आवास
भारतीय ग्रे वुल्फ यानी भेड़िया की सबसे बड़ी खासियत मनुष्यों के साथ सह-अस्तित्व में रहने की उसकी क्षमता है। इसकी 70% से ज्यादा आबादी भारत के संरक्षित क्षेत्रों से बाहर, मानव-प्रधान भू-भागों में रहती है। हालांकि, इस सह-अस्तित्व की कीमत चुकानी पड़ती है। घास के मैदानों के तेजी से घटने से चिंकारा और काले हिरण जैसी शिकार वाली देसी प्रजातियों की आबादी में कमी आई है, जिससे भेड़ियों को बकरियों और भेड़ों सहित मवेशियों पर बहुत अधिक निर्भर रहना पड़ रहा है।
भारत में भेड़ियों पर आंकड़े अभी भी अपर्याप्त हैं। लेकिन 2022 के एक अध्ययन में पाया गया है कि देश में भेड़ियों की आबादी 2,568 से 3,847 तक कम हो सकती है, जिससे भेड़िये बाघों से ज्यादा संकट में हो सकते हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञ और लखनऊ विश्वविद्यालय में प्राणी विज्ञान विभाग की प्रोफेसर अमिता कनौजिया ने भेड़ियों के इस आक्रामक व्यवहार को बाढ़ के कारण आवास के नुकसान से जोड़ा है, जिस वजह से उन्हें मानव बस्तियों के पास भोजन की तलाश में आना पड़ता है। कनौजिया कहती हैं, “भेड़िये तराई क्षेत्र में बहुतायत में पाए जाते हैं। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, बहराइच के पड़ोसी लखीमपुर और पीलीभीत में इनकी संख्या सौ से ज्यादा है।”
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) संजय श्रीवास्तव ने एक और नजरिया पेश किया। श्रीवास्तव कहते हैं, “बारिश के मौसम में जंगलों में पानी भर गया है, जिससे जंगली जानवर भोजन की तलाश में बाहर निकल रहे हैं। वे जंगल के किनारे जो कुछ भी पा रहे हैं, उसका शिकार कर रहे हैं।”

संरक्षणवादी इंसानों से शर्माने वाले भेड़ियों के इस अप्रत्याशित व्यवहार के कारणों पर बहस कर रहे हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के पूर्व डीन वाई.वी. झाला ने सुझाव दिया कि हमलों में बढ़ोतरी संकर प्रजाति की वजह से है और यह कुत्ता-भेड़िया की संकर प्रजाति है।
डब्ल्यूआईआई में परियोजना वैज्ञानिक के रूप काम करने वाले और वन्यजीव जीवविज्ञानी सहीर खान बहराइच में हुए हमलों के बाद पैदा हुई अनिश्चितता और भ्रम की स्थिति को याद करते हैं। खान कहते हैं, “पिछले साल, जब ये घटनाएं हो रही थीं, मैंने लगभग एक महीना जमीन पर बिताया था, इसलिए मैं घटनाओं के पैटर्न से वाकिफ था।” हालांकि, इस साल स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण वे जमीनी स्तर पर काम नहीं कर पाए, लेकिन स्थानीय वन विभाग ने फिर भी उनकी मदद ली। “उन्होंने मुझे चोटों की तस्वीरें भेजीं और अपराधी की पहचान करने में मदद मांगी। मुझे लगभग 45 तस्वीरें मिलीं, लेकिन किसी में भी भेड़िये के हमले के सामान्य लक्षण नहीं थे,” उन्होंने बताया। खान बताते हैं कि भेड़िये आमतौर पर बच्चों को निशाना बनाते हैं और अपने शिकार को घसीटने के लिए उनकी गर्दन पर काटते हैं। लेकिन, ये चोटें, अधिकतर छाती और हाथों पर गहरे घाव के रूप में थी जो उस पैटर्न में फिट नहीं बैठतीं।
वैज्ञानिक सबूत का अभाव
खान जांच में एक गंभीर कमी की तरफ इशारा करते हैं। “मैंने उनसे हमले के शिकार लोगों के लार के नमूने आनुवंशिक विश्लेषण के लिए एकत्र करने को कहा था, जो यह पुष्टि करने का एकमात्र तरीका है कि क्या भेड़िये जिम्मेदार (इन हमलों के लिए) थे। लेकिन वे नमूने भारतीय वन्यजीव संस्थान जैसी अनुसंधान प्रयोगशालाओं तक नहीं पहुंच पाए हैं।”
वे आगे कहते हैं कि गलत जानकारियां बहुत ज्यादा हैं। “लोग कभी-कभी लाठी से, यहां तक कि कुत्तों से भी खरोंच लगने को भेड़ियों का हमला बता देते हैं। बताए गए मामलों की संख्या जितनी ज्यादा है, उसकी तुलना में भेड़ियों के हमले के असल मामले कम ही होते हैं।”
खान के अनुसार, इस इलाके में भेड़ियों की तुलना में जंगली कुत्तों और सियारों की संख्या काफी ज़्यादा है, जिससे गलत पहचान की संभावना बढ़ जाती है। वे कहते हैं, “लोग चिंतित हैं – लगभग हर दिखाई देने वाले जानवर को भेड़िया मान लिया जाता है। ड्रोन की तस्वीरों से इलाके में भेड़ियों की मौजूदगी की पुष्टि होती है, लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि ये सभी घटनाएं भेड़ियों के कारण होती हैं।” वे बताते हैं कि भेड़िये आमतौर पर छोटे बच्चों का शिकार करते हैं, अक्सर उन्हें घसीटकर ले जाते हैं और जब भी संभव हो वयस्कों से बचते हैं।

उन्होंने मौजूदा मामलों में संकर प्रजाति के जानवरों की सही पहचान करने की चुनौती का भी जिक्र किया। “हाल के सालों में देखे गए कुछ जानवर संकर जानवरों जैसे नहीं दिखते, लेकिन ऐसी संभावना हमेशा बनी रहती है। अक्सर, दोष भेड़ियों पर मढ़ दिया जाता है, जबकि असलियत ज्यादा जटिल होती है।”
खान ने भेड़ियों की आबादी खतरे में होने के बावजूद, उत्तर प्रदेश और पूरे भारत में ऐसी घटनाओं के बहुत कम होने पर जोर दिया। “हाल ही में हुए सरकारी आकलनों से पता चलता है कि लगभग 3,300 भेड़िये बचे हैं। इंसानों पर हमले कम ही होते हैं और पागल भेड़िये कभी-कभी बीमारी का शिकार होने से पहले थोड़े समय के लिए आक्रामक हो जाते हैं, बिल्कुल पागल कुत्तों की तरह।”
खान का निष्कर्ष है, “आगे बढ़ने का रास्ता वैज्ञानिक है: घायल व्यक्तियों के स्वाबों का आनुवंशिक परीक्षण करके यह पता लगाया जा सकता है कि क्या भेड़िया, सियार, तेंदुआ या कोई अन्य प्रजाति इसके लिए जिम्मेदार थी। इसके बिना, भय और अटकलें गलतफहमी और संघर्ष को बढ़ावा देती रहेंगी।”
उन्होंने बताया कि उन्होंने पिछले साल और इस साल भी भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) या किसी अन्य संस्थान में परीक्षण के लिए स्वाब एकत्र करने और भेजने की सिफारिश की थी।
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मोंगाबे-इंडिया ने बरेली स्थित आईवीआरआई से संपर्क किया और एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है और अभी तक किसी भी संबंधित विभाग ने उनसे संपर्क नहीं किया है। अधिकारी ने किसी भी विवाद से बचने के लिए नाम न छापने का अनुरोध किया।
बहराइच में गन्ने के खेतों में सूरज ढलते ही ग्रामीण अपने घरों के पास अलाव जलाते हैं, ताकि भेड़ियों या अंधेरे में छिपे किसी भी शिकारी को भगाया जा सके। लेकिन वन्यजीव जीवविज्ञानियों के लिए, असली खतरा कहीं और है: राज्य की प्रतिक्रिया को दिशा देने वाले विज्ञान के अभाव में।
जीवविज्ञानी सहीर खान कहते हैं, “भारत के साझा भूभाग में भेड़िये सदियों से जीवित हैं। जो बदला है वह जानवर नहीं, बल्कि जमीन पर बदला है और उससे हमारा डर बढ़ा है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 7 नवंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: दिन में जंगली जानवरों से अपने गांव की रखवाली करते ग्रामीणों के साथ खड़े हुए इंदल चौहान (हरी टीशर्ट)। तस्वीर: सौरभ शर्मा।