- केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में किए गए एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि सुनहरे सियार मादा बटागुर कछुगों (क्राउन्ड रिवर टर्टल) का शिकार कर रहे हैं जिससे इस लुप्तप्राय प्रजाति के लिए खतरा बढ़ रहा है।
- बटागुर अंडा देने वाले मौसम में केवलादेव की दलदली भूमि में प्रवास करने आती हैं जिससे वे सियारों का आसान शिकार बन जाती हैं।
- जानकारों का कहना है कि अंडा देने वाली जगहों के आसपास बाड़ लगाने और प्रजनन वाले मौसम में निगरानी बढ़ाने से कछुए भोजन वाली जगहों तक सुरक्षित रूप से आवाजाही कर सकेंगे तथा शिकार की संभावना कम हो जाएगी।
राजस्थान के भरतपुर में केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (केएनपी) में लुप्तप्राय बटागुर कछुगा (हार्डेला थुरजी) सुनहरे सियारों से बढ़ते और अप्रत्याशित खतरे का सामना कर रहे हैं। सलीम अली पक्षीविज्ञान एवं प्राकृतिक इतिहास केंद्र (एसएसीओएन) के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में शिकार की 48 घटनाओं को दर्ज किया गया। सियारों ने 2023 में अगस्त से दिसंबर तक सिर्फ पांच महीनों में ही इन कछुओं को मार डाला, जिससे लंबे समय में बटागुर के अस्तित्व को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। नतीजे संरक्षित क्षेत्रों में शिकारी-शिकार की गतिशीलता के बारे में लंबे समय से चली आ रही सोच को चुनौती देते हैं, क्योंकि सियार जैसे देशी शिकारियों को आमतौर पर संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा माना जाता है। लेकिन मादाओं को निशाना बनाने वाली ऐसी घटनाएं पहले से ही संकटग्रस्त प्रजातियों के स्थानीय विलुप्तीकरण को गंभीर कर सकती है।
वैज्ञानिक और अध्ययन की लेखिका अदिति मुखर्जी कहती हैं कि बटागुर का क्षेत्र मुख्य तौर पर ऊपरी गंगा बेसिन तक ही सीमित है और भरतपुर इसके ज्ञात इलाकों की पश्चिमी सीमा है। वह बताती हैं, “इस क्षेत्र में इस प्रजाति के प्राकृतिक इतिहास, आवास के इस्तेमाल और अंडा देने वाली जगहों के पैटर्न के बारे में हमारी समझ अभी भी बहुत कम है।”
बटागुर को आवास खत्म होने, अवैध शिकार और अवैध व्यापार के चलते आईयूसीएन की लाल सूची में लुप्तप्राय के रूप में रखा गया है। वन्यजीव संरक्षण ट्रस्ट की शोधकर्ता राम्या रूपा कहती हैं, ” ऐतिहासिक रूप से बटागुर का बड़े आकार के कारण मांस के लिए शिकार किया जाता रहा है और बांध बन जाने से इसके आवास में भी कमी आई है, जिससे इसका फैलाव और कम होता जा रहा है।” रूपा इस अध्ययन से जुड़ी हुई नहीं थी।
वैसे पहले आई रिपोर्टें बताती हैं कि भारत के संरक्षित क्षेत्रों में केएनपी में सियारों की संख्या सबसे ज्यादा है। हालांकि, उनके खान-पान और सरीसृपों के साथ उनके व्यवहार के बारे में जानकारी बहुत कम है। भारतीय अजगरों और सियारों सहित शिकार के साथ उनके व्यवहार का अध्ययन करते समय, शोधकर्ताओं ने अप्रत्याशित रूप से बटागुर की मृत्यु दर में अचानक बढ़ोतरी देखी। महज तीन दिनों में छह मौतें देखने के बाद, उन्होंने उन क्षेत्रों की व्यवस्थित निगरानी शुरू कर दी जहां सियार बटागुर का शिकार कर रहे थे।

स्थानीय शिकारी से लुप्तप्राय प्रजाति को खतरा
शिकारी जानवरों की शिकार किए जाने वाले जीवों की आबादी को नियंत्रित करने और पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका होती है। हालांकि, शिकार की संख्या में कमी से शिकार करने का दबाव बढ़ता है, जिससे संवेदनशील प्रजातियों के स्थानीय स्तर पर विलुप्त होने का खतरा बढ़ जाता है। मामूली प्राकृतिक खतरे और अनुकूल वातावरण होने से, केएनपी में सियारों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे संवेदनशील शिकार प्रजातियों पर उनका असर बढ़ता जा रहा है।
केवलादेव के अन्य कछुओं के विपरीत, बटागुर एक किलोमीटर तक की यात्रा कर सकते हैं, अक्सर दलदली जगहों पर अंडा देने का स्थान खोजने के लिए पगडंडियों और सड़क के किनारे चलते हैं। यह ऐसा गुण है जो प्रजनन काल के दौरान उनके शिकार बन जाने का जोखिम बढ़ाता है। मुखर्जी के अनुसार, मादाएं आमतौर पर पानी के अंदर रहती हैं और सिर्फ अंडे देने के मौसम में ही बाहर निकलती हैं, भोजन वाली जगहों से रेत के टीलों पर अंडे देने जाती हैं। हर मादा अक्सर समूहों में सौ अंडे तक दे सकती है।
आईयूसीएन एसएससी कछुआ और मीठे पानी के कछुए की जानकार अस्मिता राणापहेली बताती हैं कि जहां मीठे पानी के कई कछुए सिर्फ एक बार में अंडे देते हैं, वहीं बटागुर रोजाना अंडे देती हैं। वह कहती हैं, “केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के खुले रेतीले मैदानों में उनका बड़ा आकार और खास अंडों के साथ, हर रोज अंडे देने का उनका व्यवहार बटागुर को सियारों और शवों पर जीवित रहने वाले दूसरे जीवों द्वारा शिकार के लिए बेहद संवेदनशील बनाता है।”
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के उप वन संरक्षक और आईएफएस मानस सिंह के अनुसार, वन विभाग के अधिकारियों ने देर रात और सुबह के समय मादा कछुओं की गतिविधियों में बढ़ोतरी देखी। वह कहते हैं, “कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल करके और कछुओं के निशानों पर नजर रखकर, हमने उन जगहों की पहचान की जहां शिकार की घटनाएं हो रही थीं।”
पीएचडी छात्र और अध्ययन के प्रमुख लेखक गौरव सोनवणे याद करते हैं कि अंडा देने का सबसे अच्छा समय सितंबर और जनवरी के बीच होता है और इस दौरान कई कछुओं की मौत हुई थी। कैमरा ट्रैप की तस्वीरों, शवों के विश्लेषण और केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के वन विभाग के कर्मचारियों और स्थानीय गाइडों के से मिली जानकारी से पता चला कि इसी अवधि के दौरान कछुओं के अंडा देने वाली जगहों के आसपास सियारों की गतिविधियों में बढ़ोतरी देखी गई थी।
इन जानकारियों का इस्तेमाल करते हुए, शोधकर्ताओं ने शिकार वाली मुख्य जगहों का मानचित्र तैयार किया, जो पार्क की दलदली क्षेत्रों से होकर गुजरने वाली सड़कों के किनारे थे। सोनवणे आगे कहते हैं, “हमने केवलादेव मंदिर के पास एक तालाब तक जाने वाले रास्तों पर कछुओं की सबसे ज़्यादा मौतें देखीं, जहां साल भर पानी रहता है और यह कछुओं के लिए अंडा देने की मुख्य जगह हो सकती है।”

सियार-कछुओं का आमना-सामना
केएनपी में सियारों की बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त शिकार तो है, लेकिन प्रवासी कछुए आसान शिकार साबित होते हैं। मुखर्जी बताती हैं कि सियारों को कछुओं का पीछा या उनसे संघर्ष नहीं करना पड़ता, जिससे वे कम मेहनत वाले और आसानी से उपलब्ध होने वाले शिकार बन जाते हैं। सोनवणे आगे कहते हैं, “बटागुर कठोर कवच वाला कछुआ है, जो सड़क जैसी कठोर सतह पर एक बार पलट जाने पर ठीक से सीधा नहीं हो पाता।”
जिन 48 उदाहरणों को दर्ज किया गया, उनमें शोधकर्ताओं ने पाया कि सियार कछुए को पलट देते थे और उनके पिछले पैरों को पकड़कर उनका शिकार करने के लिए उपयुक्त जगह पर खींच कर जाते थे, जिससे शिकार की खास रणनीति का पता चलता है। वे आमतौर पर नरम ऊतकों तक पहुंचने के लिए पिछले पैरों से खाना शुरू करते थे, लेकिन अक्सर शव को आधा ही खा पाते थे। कई मौकों पर, शोधकर्ताओं ने देखा कि नेवले, गोह (बंगाल मॉनिटर लिजर्ड) और यहां तक कि सफेद कछुआ (भारतीय फ्लैपशेल कछुआ) भी बटागुर के अवशेषों और आंतरिक अंगों को खा रहे थे, जिन्हें सियार नहीं खा पाते थे। गौर करने वाली बात यह है कि एक को छोड़कर बाकी सभी शव मादा कछुओं के थे। कई में 15 तक अंडे थे, जबकि अन्य बिखरे हुए अंडों के छिलकों के बीच पाए गए, जिससे साफ पता चलता है कि गर्भवती मादाओं को खास तौर पर निशाना बनाया जाता था।

संरक्षण का तरीका
केएनपी में अंडा देने वाली बटागुर मादाओं का शिकार गंभीर खतरा है। अति संवेदनशील प्रजाति होने से, कछुओं की संख्या में इतनी बड़ी कमी से उबरने में लंबा समय लग सकता है।
मुखर्जी कहती हैं कि कछुओं के प्रवास के समय के दौरान हॉटस्पॉट या अंडा देने वाली जगहों के आस-पास सतर्कता बढ़ाने से शिकारियों की संख्या कम हो सकती है और कछुओं की सुरक्षित आवाजाही संभव हो सकती है। अंडा देने वाली जगहों के आसपास अस्थायी बैरिकेड लगाने और घायल कछुओं को तुरंत चिकित्सा सुविधा देने मृत्यु दर में और कमी आ सकती है और प्रजनन में सफलता मिल सकती है।
सिंह कहते हैं, “बटागुर जिन जगहों का इस्तेमाल करते है और आवाजाही के लिए जिन रास्तों को चुनते हैं, वहां सियारों की आवाजाही रोकने के लिए बाड़ लगाने और उचित निगरानी के बाद, हम कछुओं की मृत्यु दर में कमी देख रहे हैं।”
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फ्रेशवाटर टर्टल्स एंड टॉर्टोइज ऑफ इंडिया की सह-संस्थापक स्नेहा धारवाड़कर अंडा दने वाली जगहों की निगरानी बढ़ाने और अंडों को स्थानांतरित व नुकसान पहुंचाए बिना उनकी सुरक्षा के लिए संसाधन आवंटित करने का सुझाव देती हैं। वह आगे कहती हैं, “कछुओं में तापमान के आधार पर लिंग तय होता है, इसलिए अंडों का अनुचित स्थानांतरण प्रजातियों की आबादी को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। इसलिए, जब तक प्रजातियों की पारिस्थितिकी को अच्छी तरह से समझा नहीं जाता, तब तक स्थानांतरण से बचना या बाहरी संरक्षण उपायों पर विचार करना बेहतर है।”
धारवाड़कर बताती हैं कि बटागुर की पारिस्थितिकी और आबादी पर विश्वसनीय और व्यापक अध्ययन फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं। वह कहती हैं कि लंबी अवधि का अध्ययन इस प्रजाति के बारे में हमारी समझ को बढ़ाएगा और आगे की प्रबंधन रणनीतियों को बेहतर करेगा।
राणापहेली ने कहा, “लंबे समय में, अंडा देने वाली जगहों के शिकार पारिस्थितिकी, कैप्टिव कार्यक्रम और आबादी पर निगरानी पर शोध इस लुप्तप्राय प्रजाति की संख्या बढ़ाने के लिए अहम होगा।”
संपादक द्वारा दी गई जानकारी: उप वन संरक्षक के उद्धरणों को शामिल करने के लिए इस स्टोरी को 13 नवंबर, 2025 को अपडेट किया गया था।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 6 नवंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: कैमरा ट्रैप से ली गई तस्वीर में बटागुर कछुगा को खाता हुआ सुनहरे सियारों का झुंड। तस्वीर: गौरव सोनवणे।