- इसरो-नासा का एक साझा मिशन अपने अगले चरण की शुरुआत करने जा रहा है, जिसमें वैज्ञानिक इस्तेमाल के लिए डेटा एकत्र किया जाएगा। इससे भारत के जंगलों, पहाड़ों और आपदा की आशंका वाले इलाकों के बारे में व्यापक जानकारी मिल सकेगी।
- अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट का रडार बादलों और वनस्पतियों में भीतर तक जाकर जमीन में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों, भूस्खलन, तटीय कटाव और जंगल में होने वाले बदलावों की मैपिंग कर सकता है।
- पांच सालों तक मिलने वाली सेवाओं के दौरान वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि NISAR धरती के बदलते परिदृश्यों के बारे में विस्तार से डेटा देगा।
आपदा के खतरे को कम करने में शामिल वैज्ञानिक और अधिकारी बेसब्री से भारत के जंगलों और पहाड़ों की पहली तस्वीरों का इंतजार कर रहे हैं, जिन्हें NISAR (नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार) से लिया गया है। यह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और नासा का संयुक्त मिशन है। मिशन को लॉन्च करने के बाद अब नवंबर से इसका ऑपरेशनल यानी वैज्ञानिक चरण शुरू हो चुका है।
NISAR के प्रोजेक्ट डायरेक्टर और इसरो के वैज्ञानिक चैत्रा राव ने बेंगलुरु में मोंगाबे-इंडिया को बताया, “अभी हमारे वैज्ञानिक कैलिब्रेशन का काम पूरा कर रहे हैं।”
कैलिब्रेशन से यह पक्का होता है कि मापने वाला इंस्ट्रूमेंट या प्रणाली सही वैल्यू रिकॉर्ड करे जो मानकों से मिलती हो। सैटेलाइट मिशन में इंस्ट्रूमेंट के हार्डवेयर को चेक और बेहतर करना और जमीनी लक्ष्यों के हिसाब से उसके डेटा का मिलान करना शामिल है। रडार इमेज के लिए, जमीन पर सामान्य कैलिब्रेशन कॉम्पोनेंट एक ट्राइहेड्रल कॉर्नर रिफ्लेक्टर होता है जो सैटेलाइट से अलग-अलग दिशाओं में भेजे गए सिग्नल को बाउंस करता है।
राव ने कहा कि रिफ्लेक्टर खास जगहों पर लगाए जाते हैं और उन्हें अक्सर एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है। उन्होंने बताया कि भारतीय हिमालय और जंगल के इलाके NISAR डेटा को इकट्ठा करने और उसका विश्लेषण करने वाले वैज्ञानिक के लिए खास दिलचस्पी के हैं।
नासा ने 25 सितंबर को अमेरिका में NISAR की ओर से रिकॉर्ड की गईं दो जगहों की पहली रडार इमेज प्रकाशित की। नासा के साइंस मिशन निदेशालय में एसोसिएट एडमिनिस्ट्रेटर निकी फॉक्स ने कहा, “ये शुरुआती तस्वीरें NISAR द्वारा बनाए जाने वाले जबरदस्त विज्ञान की महज झलक हैं। यह ऐसा डेटा और जानकारी देगा जो वैज्ञानिकों को पृथ्वी की बदलती जमीन और बर्फ की सतहों का विस्तृत अध्ययन करने में मदद करेगा और ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है। साथ ही, निर्णय लेने वालों को प्राकृतिक आपदाओं और दूसरी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करेगा।”
श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से 30 जुलाई, 2025 को NISAR को बड़े GSLV-F16 लॉन्च व्हीकल से प्रक्षेपित किया गया था। सितंबर के मध्य तक NISAR अपने ऑपरेशनल ऑर्बिट में पहुंच गया और NASA ने एक महीने पहले ली गई पहली तस्वीरें साझा की।
जियोसिंक्रोनस स्पेसक्राफ्ट के लिए बना लॉन्च व्हीकल GSLV (जीएसएलवी) ने पहली बार किसी उपग्रह को सूर्य के सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट (सूर्य-समकालिक कक्षा) पर लॉन्च किया। सूर्य का सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट पृथ्वी के एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक जाता है और हर जगह को लगभग एक ही स्थानीय सौर समय (सोलर टाइम) पर पार करता है, ताकि तस्वीरों के लिए एक जैसी रोशनी मिले। दूसरी तरफ, जियोस्टेशनरी ऑर्बिट किसी उपग्रह को भूमध्य रेखा पर एक पॉइंट के ऊपर ही फिक्स रखता है, जिससे उस इलाके की लगातार मॉनिटरिंग हो सके।
NISAR सबसे भारी अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट में से एक है, जिसका वजन 2,382 किलोग्राम है। वैज्ञानिकों ने कहा कि इसी वजह से पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) के बजाय इसरो के हेवी-लिफ्टर जीएसएलवी का इस्तेमाल किया गया।
इसके लॉन्च के समय, अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि NISAR के डेटा के लिए ओपन-ऐक्सेस पॉलिसी भारत और दूसरे विकासशील देशों के वैज्ञानिकों, आपदा प्रबंधन एजेंसियो और दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए बहुत मददगार होगी।

NISAR की खासियतें
इसरो के तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (वीएसएससी) के एक सीनियर साइंटिस्ट ने बताया कि NISAR सबसे अलग मिशन है। डेढ़ बिलियन डॉलर की लागत वाला यह दुनिया का सबसे महंगा अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है और डुअल-बैंड सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) वाला पहला सैटेलाइट है। इसमें नासा का L-बैंड और ISRO का S-बैंड है। इस वैज्ञानिक ने नाम नहीं बताने की शर्त पर यह जानकारी दी, क्योंकि वह मीडिया से बातचीत के लिए अधिकृत नहीं थे।
रडार से ली गई तस्वीरों से धरती की उन खासियतों का पता चल सकता है जो नंगी आंखों या ऑप्टिकल इमेज में सामने नहीं आती हैं। बेंगलुरु की क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में सैटेलाइट डेटा पर काम करने वाले जीव विज्ञानी चेतन कुमार गंडला ने कहा, “इंसानों की वजह से आवास का नुकसान, जैव-विविधता में कमी और प्रजातियों के खत्म होने के बीच, अलग-अलग जगहों पर लगातार मापना मुश्किल बना हुआ है।”
वह विस्तार से बताते हैं, “ऑप्टिकल सेंसर इंसान की आंखों की तरह ही सूरज की परावर्तित किरणों को कैप्चर करते हैं, जिससे वे वनस्पति, पानी वाली जगहों और शहरी इलाकों जैसी दिखने वाली सतह की विशेषताओं को दिखाने के लिए बहुत अच्छे होते हैं। इसके उलट, रडार सेंसर अपने खुद के माइक्रोवेव पल्स भेजते हैं और वापस आने वाले सिग्नल को रिकॉर्ड करते हैं, जिससे वे बादलों, घनी वनस्पतियों या अंधेरे में भी धरती की सतह को मैप करने में मदद करते हैं।”
गंडला ने आगे कहा, “रडार सेंसर धरती के नीचे की बनावट और नमी से जुड़ी जानकारी के साथ-साथ आवास संरचना के बारे में बड़े पैमाने पर स्थान और समय से सम्बंधित जानकारी भी देते हैं जो जैव-विविधता को बचाने के लिए जरूरी है।” “हालांकि दोनों तरीके अलग हैं, लेकिन इन रिमोट सेंसिंग टेक्नोलॉजी का जैव-विविधता से सम्बंधित शोध में तेजी से इस्तेमाल बढ़ रहा है।”
NISAR पर लगे दो SAR सिस्टम अंतरिक्ष से ऊर्जा के पल्स भेजते हैं और पृथ्वी की सतह से टकराकर लौटने वाले संकेतों को मापते हैं। L-बैंड रडार अपने 25 सेंटीमीटर के वेवलेंथ सिग्नल के साथ जंगल और मिट्टी के भीतर तक जा सकता है, जिससे वैज्ञानिकों को सतह की नमी, हरियाली, बर्फ की मोटाई और स्थिरता को सेंटीमीटर के अंश तक मापने में मदद मिलती है। वहीं 10 सेमी तक वेवलैंथ वाले S-बैंड रडार छोटे पेड़-पौधों और ढांचागत बदलावों के लिए और भी ज्यादा बेहतर है।
NISAR 747 किमी ऊपर से एक दिन में 14 बार धरती का चक्कर लगाता है और हर 12 दिन में दो बार इसकी लगभग पूरी भूमि और बर्फ की सतहों की जांच करता है। SAR बादलों, कोहरे और अंधेरे के पार भी देख सकता है और हाई-रिजॉल्यूशन वाली तस्वीरों में परिदृश्यों, नदियों, ग्लेशियर और समुद्र तट दिखाता है और ऐसी बारीक जानकारी रिकॉर्ड करता है जो नंगी आंखों से नहीं दिखतीं हैं। इसकी हर मौसम में, दिन-रात काम करने की क्षमता इसे कुदरती खतरों पर नजर रखने से लेकर जैव-विविधता से जुड़े सर्वे तक हर चीज के लिए जरूरी बनाती है।
यह इंटरफेरोमेट्री नामक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करता है। यह जमीन पर चीजों के बीच की दूरी में होने वाले बारीक बदलावों को मापने के लिए लगभग एक जैसी जगहों से रडार से तस्वीरें उतारता है। फिर इसके उपकरण यह विश्लेषण कर सकते हैं कि रेडियो वेव कैसे मिलती हैं और एक-दूसरे में किस तरह हस्तक्षेप करती हैं। इन पैटर्न की तुलना करके, NISAR इंटरफेरोग्राम नामक व्यापक तस्वीर से जमीन पर होने वाले बारीक बदलावों का पता लगा सकता है।

रडार बनाम ऑप्टिकल तस्वीरें
नासा और इसरो यह डेटा वैज्ञानिक समुदाय के साथ शेयर करते है, लेकिन अलग-अलग सेक्टर के वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि ये तस्वीरें जलवायु परिवर्तन के असर को बेहतर ढंग से समझने और आपदा के खतरे को बेहतर तरीके से कम करने में मदद करेंगी। सरकार की एक प्रेस रिलीज में कहा गया है कि अपने पांच साल के जीवनकाल में, “NISAR दुनिया के जलवायु विज्ञान, भूकंप और ज्वालामुखी की निगरानी, जंगल की मैपिंग और संसाधनों के प्रबंधन के लिए बहुमूल्य डेटा देगा।”
केरल के मुख्य रेजिलिएंस अधिकारी और केरल राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य सचिव शेखर लुकोस कुरियाकोस ने कहा, “हमने वायनाड (2024 में) में हुए भूस्खलन के दौरान सैटेलाइट SAR डेटा का इस्तेमाल किया था। उस दिन बादल छाए हुए थे।” उन्होंने कहा कि NISAR का डेटा भूकंप और भूस्खलन को समझने में बहुत मदद कर सकता है।
जैकब्स, बेंगलुरु में सैटेलाइट डेटा का इस्तेमाल करके आपदा जोखिम कम करने के जानकार हामिद वरिक्कोडन ने मोंगाबे-इंडिया को बताया, “NISAR की L-बैंड और S-बैंड SAR प्रणाली इंटरफेरोमेट्रिक SAR विश्लेषण को मुमकिन बनाती हैं- भूकंप से पहले, उसके दौरान और उसके बाद मिलीमीटर-स्केल क्रस्टल डिफॉर्मेशन को कैप्चर करती हैं। इसका 12-दिन का रीविजिट सायकल लगातार टाइम-सीरीज डिफॉर्मेशन निगरानी की सुविधा देता है, जो सक्रिय फॉल्ट के साथ दबाव बनने की मैपिंग के लिए जरूरी है।”
उन्होंने बताया, “यह भूकंप के अनुमान वाले मॉडल के लिए टेक्टोनिक रूप से सक्रिय जोन और दबाव के जमा होने की पहचान कर सकता है। आपदा के दौरान और बाद में, यह आपातकालीन रिस्पॉन्स और रीबिल्डिंग में मदद के लिए जमीन धंसने और बाद में आने वाले झटकों से होने वाली विकृतियों को मैप कर सकता है। लंबे समय में, यह फॉल्ट की गतिविधि डेटा को भूकंप से जुड़े खतरों के मॉडल में जोड़ कर सकता है, जिससे भूकंप के जोन और बिल्डिंग कोड के अपडेट बेहतर हो सकते हैं।”
“इसके अलावा, NISAR की कोहेरेंट बैकस्कैटर क्षमता (यानी परावर्तित रडार सिग्नल का पता लगाने और उसे मापने की क्षमता) वनस्पति से ढके और दुर्गम इलाकों में भूमिगत विकृति को मैप करना संभव बनाती है, जहां ऑप्टिकल सेंसर अक्सर असफल हो जाते हैं। L-बैंड रडार वनस्पति के आर-पार जा सकता है, जिससे यह वनों या पर्वतीय क्षेत्रों में धीमी गति से खिसकते भूस्खलनों का पता लगाने के लिए आदर्श है।” उन्होंने आगे कहा कि यह तकनीक ढलान में शुरुआती गतिविधियों का पता लगा सकती है, धीरे-धीरे खिसक रहे क्षेत्रों की पहचान कर सकती है; राहत से जुड़े कामों की प्राथमिकता तय करने के लिए भूस्खलन के क्षेत्र और आयतन को तेजी से मैप कर सकती है और यह परिवहन गलियारों, जलविद्युत परियोजनाओं और शहरी विस्तार क्षेत्रों में ढलान की स्थिरता की निगरानी में भी मदद कर सकती है।
वारिककोडन ने कहा कि चक्रवात और तटीय खतरों के मामले में, NISAR का रडार हाई टेम्पोरल रिजॉल्यूशन के साथ तटों में होने वाले बदलाव, तटीय कटाव और तूफानी ज्वार का पता लगा सकता है। “यह कटाव प्रभावित हिस्सों की पहचान कर सकता है और मैंग्रोव और बालू के टीलों जैसे प्राकृतिक सुरक्षा कवचों के स्वास्थ्य की निगरानी कर सकता है। यह लगभग रियल टाइम में (हाइड्रोडायनामिक मॉडल के साथ कोऑर्डिनेशन में) तूफानी ज्वार के कारण आई बाढ़ को मैप कर सकता है। यह तटीय स्थलाकृति में बदलाव, बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान और पारिस्थितिकी के ठीक होने पर भी नजर रख सकता है।”

जमीन पर मदद की जरूरत
कुरियाकोस ने माना कि केरल जैसे राज्य में जहां तटीय कटाव, भूस्खलन और मॉनसून में भारी बारिश का खतरा रहता है, NISAR की हर मौसम में, दिन-रात रडार क्षमता नया आयाम जोड़ती है: बादल छाए रहने पर भी लगातार निगरानी होती है। हालांकि, उन्होंने इस पर जोर दिया कि देश को उपग्रह डेटा के विश्लेषण से जुड़ी महारत में “बहुत ज्यादा सुधार” करने की जरूरत है, ताकि डेटा आसानी से उपलब्ध हो सके। “इन बड़े डेटासेट का विश्लेषण कौन करेगा? हर लॉन्च किए गए सैटेलाइट के लिए इसरो को इन डेटासेट को प्रोसेस करने और शेयर करने के लिए लोगों को प्रशिक्षित करने और तैनात करने के लिए उतनी ही रकम निवेश करनी चाहिए।”
कुरियाकोस ने तेजी से आकलन करने और प्रतिक्रिया के लिए पर्याप्त जमीनी सहायता की जरूरत पर भी जोर दिया। “किसी आपदा के तीन घंटे बाद, शुरुआती झटके और भ्रम के बाद, हमें स्थिति का आकलन करना होता है। मेरे प्रशिक्षित कर्मचारी उस समयावधि में मौके पर पहुंच सकते हैं और शुरुआती आकलन करके भेज सकते हैं। हम ड्रोन भी उड़ा सकते हैं।”
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हालांकि राव ने बताया कि रडार की तस्वीरों को प्रोसेस होने में 24–48 घंटे लग सकते हैं। “वे ऑप्टिकल तस्वीरों की तरह नहीं हैं। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि ये तस्वीरें कहां से डाउनलोड की जाती हैं। अगर यह मेनलैंड स्टेशन पर है तो यह काम और तेज हो सकता है। अगर यह अंटार्कटिका जैसे स्टेशन पर है, तो इसमें ज्यादा समय लगेगा।”
NISAR के ग्राउंड स्टेशन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फैले हुए हैं। इनमें अलास्का, स्वालबार्ड और पुंटा एरेनास में नासा के स्टेशन; अंटार्कटिका, शादनगर, बैंगलोर, लखनऊ और मॉरिशस में इसरो के स्टेशन और बियाक में एक स्टेशन शामिल हैं। राव ने यह भी बताया कि आपदा प्रबधन से जुड़े डेटा को संभालने में इसरो के वैज्ञानिकों की समर्पित टीम काम कर रही है।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 5 नवंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: पूरी तरह एकीकृत और तैनात ऑब्जर्वेटरी सिस्टम के साथ NISAR। इसकी प्रमुख विशेषताओं में से एक इसका रडार एंटीना रिफ्लेक्टर है, जिसका व्यास 12 मीटर है। प्रतिनिधि तस्वीर: NASA/JPL-Caltech.