- भारत और दुनिया भर में पर्यावरण से जु़ड़े जोखिम बच्चों को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं, खासकर वे बच्चे जो हाशिए पर रहने वाले समुदायों से आते हैं।
- भारत में लाखों बच्चे ऐसे माहौल में जन्म लेते हैं और बड़े होते हैं जो उनके शारीरिक और मानसिक विकास को रोक रहा है और उन्हें बीमार बना रहा है।
- एक नई रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया में पांच साल से कम उम्र के लगभग 26% बच्चों की मौत पर्यावरणीय कारणों से होती है।
- प्रदूषण और पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति भारत के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी 3) को कमजोर कर सकती है और युवा आबादी वाले देश के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है।
तीन साल की अदित्री राठौर अभी प्ले स्कूल जाती है और हमेशा स्कूल जाने के लिए उत्सुक रहती है। अपने साथ के बच्चों के साथ कविताएं गुनगुनाने, पीले रॉकिंग हॉर्स पर खेलने और अपनी छोटी उंगलियों से रेत के महल बनाने में उसे बड़ा मजा आता है।
लेकिन पिछले कई दिनों से वह स्कूल नहीं जा पा रही हैं। अपने घर के सोफे पर सिमटकर लेटी अदित्री की हर सांस थोड़ी गहरी और लंबी है, मानो उसका छोटा सा शरीर ठीक होने की लय समझने की कोशिश कर रहा है। अदित्री की मां रितु राठौर ने नेबुलाइजर मास्क उनके चेहरे पर लगाया और हल्के हाथों से थामकर रखा। जैसे ही इस छोटी सी मशीन ने काम करना शुरू किया, एक अजीब सी सीटी जैसी आवाज आने लगी।
“इस महीने में इसे दूसरी बार चेस्ट इन्फेक्शन हुआ है,” रितु ने बड़ी ही मायूसी के साथ बताया। वह उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक कंपनी में सेल्स और ऑपरेशन्स डिप्टी मैनेजर हैं।
वह कहती हैं, “बच्चे पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रहे हैं। हवा में बढ़ते प्रदूषण के चलते संक्रमण और एलर्जी कई दिनों तक बनी रहती है। सर्दी-खांसी, चेस्ट इन्फेक्शन और सांस लेने की समस्या धीरे-धीरे एक आम समस्या बन गई है।” वह और उनका परिवार जब भी मौका मिलता है प्रदूषण से दूर, स्वच्छ आबोहवा वाली जगहों पर छुट्टियां मनाने के चले जाते हैं।
पूर्वी दिल्ली की एक सामाजिक कार्यकर्ता प्रगति वार्ष्णेय गुप्ता भी ऐसी ही मुश्किलों का सामना कर रही हैं। उनके दो साल के बेटे दिग्विजय को खांसी-जुकाम है जो ठीक होने का नाम ही नहीं ले रहा।
गुप्ता ने बताया, “जब मेरी बेटी छोटी थी, तब घरेलू नुस्खों से काम चल जाया करता था। लेकिन बढ़ते प्रदूषण के साथ, बच्चे अब दवा के बिना ठीक नहीं हो पाते हैं।” कुछ दिनों पहले तक, उनके घर के आसपास निर्माण कार्य चल रहा था। उन्होंने कहा, “निर्माण कार्य तो पूरा हो गया हो, मगर धूल अभी तक नहीं गई। बदलता मौसम इसे और बदतर बना रहा है। हालांकि ज्यादातर समय हम खिड़कियां और दरवाजे बंद रखते हैं, लेकिन इससे ज्यादा फायदा नहीं होता।” उनके दो बच्चे हैं- छोटा बेटा दिग्विजय और नौ साल की लावण्या।
गुप्ता ने आगे कहा, “प्रदूषण बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर रहा है। यहां तक कि आइसक्रीम जैसी कभी न नुकसान पहुंचाने वाली चीजें भी अब कई दिनों तक बीमारी का कारण बन जाती हैं। बच्चे जिस प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं, वह उनके बचपन की खुशियां चुरा रही है। यह मेरे और मेरे परिवार के लिए एक भावनात्मक और [शारीरिक] स्वास्थ्य चुनौती है।”

प्रदूषण की कीमत चुका रहे बच्चे
अदित्री और दिग्विजय जैसे कई बच्चे हैं जिनकी जिंदगी की रफ्तार को प्रदूषण ने थाम दिया है। पर्यावरण से जुड़े खतरे बच्चों को ज्यादा प्रभावित कर रहे हैं। देश में लाखों बच्चे ऐसे वातावरण में जन्म लेते और बड़े होते हैं जो उनके विकास को रोक रहा है और उन्हें बीमार कर रहा है।
भारत में पर्यावरण प्रदूषण- वायु, जल, स्वच्छता, आदि – अब एक मूक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल बन चुका है और इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ा है। जहरीली हवा, गंदा पानी और खतरनाक कचरा न सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट पैदा कर रहा है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक बड़ी समस्या बन जाएगा। इसमें भारत के सतत विकास लक्ष्यों को पटरी से उतारने और विशाल युवा आबादी वाले देश के लिए प्रतिस्पर्धात्मक आर्थिक नुकसान पैदा करने की क्षमता है।
सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) में बच्चों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी गई हैं, खासतौर पर एसडीजी 3 के तहत, जिसका उद्देश्य स्वस्थ जीवन सुनिश्चित करना और सभी के कल्याण को बढ़ावा देना है। प्रिवेंटिव मेडिसिन पत्रिका में प्रकाशित “एन्श्योरिंग हेल्दी एनवायरमेंट फॉर चिल्ड्रन एंड द रोल ऑफ प्राइमरी हेल्थकेयर सिस्टम” नामक एक हालिया अध्ययन के अनुसार, इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पर्यावरणीय खतरों से निपटना बेहद जरूरी है।
साल 2016 में, पांच साल से कम उम्र के बच्चों की दुनियाभर में हुई मौतों में से 28% से अधिक (लगभग 1.6 मिलियन) पर्यावरणीय खतरों के कारण हुईं। अध्ययन में कहा गया है कि 2019 में, सिर्फ वायु प्रदूषण के कारण दुनिया भर में लगभग 4,76,000 नवजात शिशुओं की मृत्यु हुई। इनमें से करीब 1,16,000 मौतें भारत में हुईं। और ये बच्चे अपने जन्म के पहले महीने के भीतर ही मौत के आगोश में समा गए थे।
अध्ययन में कहा गया, “पांच साल से कम उम्र के बच्चों की होने वाली लगभग 26% मौतें (विश्व स्तर पर) पर्यावरणीय जोखिमों के कारण होती हैं। जहरीले रसायनों और वायु प्रदूषण के कारण कैंसर, अस्थमा, डायबिटीज जैसी कई अन्य बीमारियां बच्चों में तेजी से बढ़ रही हैं।”
सांस संबंधी बीमारियों काफी अधिक
संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय बाल आपातकालीन कोष (यूनिसेफ) और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चों पर प्रदूषण के दुष्प्रभावों का खतरा वयस्कों की तुलना में अधिक होता है, क्योंकि उनके अंग और प्रतिरक्षा प्रणाली अभी भी विकसित हो रही होती है। इसके अलावा बच्चे ज्यादा समय बाहर खेलने में बिताते हैं, जिससे वे हवा में मौजूद हानिकारक तत्वों के संपर्क में ज्यादा आते हैं।
यूनिसेफ के अनुसार, “वायु प्रदूषण प्रदूषण एक बहुआयामी समस्या है जिसकी वजह से 2019 में दुनिया को 8.1 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ… बच्चों के फेफड़े विकास की प्रक्रिया में होते हैं, जिससे वे प्रदूषित हवा के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हो जाते हैं। बच्चे वयस्कों की तुलना में दोगुनी तेजी से सांस लेते हैं और अपने शरीर के वजन के मुकाबले ज्यादा हवा अंदर लेते हैं। कई छोटे बच्चे अक्सर मुंह से सांस लेते हैं, जिससे अधिक प्रदूषक शरीर में जाते हैं। साथ ही वे जमीन के भी करीब होते हैं, जहां हवा में प्रदूषण का स्तर ज्यादा होता है।”
क्लाउडनाइन ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स के कंसल्टेंट पीडियाट्रिशियन और नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. अभिषेक चोपड़ा भी इससे सहमत हैं। वह बताते हैं, “जहां एक वयस्क प्रति मिनट 18-20 सांसें लेता है, वहीं बच्चे प्रति मिनट 40 सांसें तक लेते हैं, जिसका अर्थ है कि वे अधिक प्रदूषित हवा अंदर ले रहे हैं।”

बच्चों में फेफड़ों की दो सबसे आम बीमारियां निमोनिया और अस्थमा हैं। चोपड़ा बताते हैं कि निमोनिया से होने वाली लगभग 50% मौतों में वायु प्रदूषण किसी न किसी रूप में जिम्मेदार होता है।
दुनिया भर में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में, संक्रामक बीमारियों से होने वाली मौतों में सबसे ज्यादा मौतें निमोनिया के कारण होती हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि हर साल औसतन 1,00,000 बच्चों में से लगभग 1,400 बच्चों को निमोनिया होता है। यानी लगभग हर 71वें बच्चे को यह बीमारी लगती है। दक्षिण एशिया में ये दर सबसे अधिक है —प्रति 1,00,000 बच्चों पर 2,500 मामले। इसके बाद पश्चिम और मध्य अफ्रीका में प्रति 1,00,000 बच्चों पर 1,620 मामले में पाए जाते हैं।
पिछले पांच वर्षों में डॉ. चोपड़ा ने पाया कि वायु प्रदूषण से जुड़ी सांस की बीमारियों और निमोनिया के मरीजों की संख्या में करीब 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पिछले दस सालों में समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों (प्रीमेच्योर बेबी) की संख्या भी काफी बढ़ी है और इसका एक बड़ा कारण पर्यावरण प्रदूषण है।
बच्चों के लिए एक बड़ा खतरा
अध्ययन बताते हैं कि निम्न मध्यम आय वाले देशों में, पांच साल से कम उम्र के 98% बच्चे डब्ल्यूएचओ द्वारा अनुशंसित सीमा से कहीं अधिक पीएम 2.5 के संपर्क में आते हैं।
वायु प्रदूषण के अलावा, पानी की खराब गुणवत्ता, साफ-सफाई और स्वच्छता संबंधी समस्याएं बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले अन्य महत्वपूर्ण पर्यावरणीय कारक हैं।
दक्षिण दिल्ली के फोर्टिस ला फेम अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ और नवजात रोग विशेषज्ञ डॉ. अवधेश आहूजा का मानना है कि इनकी वजह से पेट से जुड़ी बीमारियां और डायरिया का खतरा काफी हद तक बढ़ गया है, खासकर बरसात के मौसम में। उन्होंने बताया, ‘मेरे पास आने वाले मामलों में, मुझे गंदे पानी, गंदगी या सफाई की कमी के कारण पांच साल से कम उम्र के बच्चों और शिशुओं में पेट के संक्रमण के मामलों में 50 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी नजर आई है।”
पांच साल की मुस्कान नोएडा के घनी आबादी वाले सर्फाबाद गांव में रहती है। वहां चारों ओर लोगों की भीड़ और शोर तो है, लेकिन साफ पानी और सफाई व्यवस्था नहीं है। मुस्कान अपनी धूल भरी सैंडल के साथ पानी के गड्ढों में उछल कूद करते हुए अक्सर खुले नाले के पास खेलती है। लेकिन उनका लापरवाह बचपन पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं—पेट दर्द, उल्टियां और जी मिचलाने से रुक सा गया है।
मुस्कान की मां खालिदा खातून, जो पास के अपार्टमेंट में घरेलू सहायिका का काम करती हैं, बताती हैं, “मेरी बेटी जब भी नल का पानी पीती है तो उसके पेट में इन्फेक्शन हो जाता है। मुझे पड़ोस के एक बोतल बंद पानी सप्लायर से पीने का पानी खरीदना पड़ता है।”
खालिदा ने कहा, “मेरी आमदनी ज्यादा नहीं है। इसलिए साफ पानी खरीदने पर खर्च किया गया हर एक रुपया मेरे लिए बोझ बन जाता है, लेकिन मेरे पास और कोई चारा नहीं है। गंदा पानी पीने से मेरी बेटी बीमार हो जाती है। उसकी बीमारी का मतलब है इलाज पर खर्च और मेरी कमाई का नुकसान।” खालिदा महीने में महज ₹7,000 ही कमा पाती हैं।

अंगुल जिले में एक गैर सरकारी संगठन ‘ग्रीन ओडिशा’ के एक कार्यकर्ता ए.के. स्वैन के अनुसार, “पर्यावरणीय प्रदूषण न सिर्फ शहरों में, बल्कि औद्योगिक इलाकों में भी बच्चों की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है। ओडिशा के अंगुल जिले में प्रदूषण की वजह से कई बच्चों को सांस लेने में तकलीफ और दूसरी बीमारियां हो रही हैं। यह इलाका एल्यूमीनियम और स्टील की फैक्ट्रियों के लिए जाना जाता है।”
दिल्ली एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग के सदस्य और सदस्य सचिव सुजीत बाजपेयी बताते हैं, “बच्चे हमारे भविष्य हैं और विज्ञान ने यह साबित किया है कि वायु प्रदूषण का उनके स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है। सरकार वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए मेहनत कर रही है, लेकिन यह हम सबकी जिम्मेदारी है। हर नागरिक को इसमें अपनी भूमिका निभानी चाहिए” यह आयोग पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन एक संस्था है।
प्रिवेंटिव मेडिसिन में प्रकाशित हालिया अध्ययन ने भी इसी तरह के दृष्टिकोण को दोहराया और पर्यावरणीय प्रदूषण को रोकने के लिए किए गए उपायों पर जोर दिया।
अध्ययन में लिखा था, ” केंद्र सरकार ने देशभर में वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए एक व्यापक और समयबद्ध राष्ट्रीय रणनीति के तौर पर “राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम” (एनएसीपी) की शुरुआत की थी। घर के अंदर का वायु प्रदूषण, खासकर पारंपरिक खाना पकाने के ईंधन (जैसे लकड़ी, कोयला) से निकलने वाला धुआं, अजन्मे बच्चे के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर डालता है। इससे बच्चे को जन्म से पहले ही कई तरह के स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाते हैं। इस समस्या को दूर करने के लिए, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना लागू की गई। इस योजना का मकसद घरों को खाना पकाने का साफ ईंधन (एलपीजी) उपलब्ध कराना है, ताकि हानिकारक ठोस ईंधनों पर निर्भरता कम की जा सके।”
सुजीत बाजपेयी कहते हैं, “प्रदूषण को रोकने और स्थिति सुधारने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि समाज के हर व्यक्ति की है। सार्वजनिक यातायात का इस्तेमाल करने से लेकर, कचरा इधर-उधर न फैलाने तक, हर कदम हमारे बच्चों, हमारे देश और हमारी धरती के भविष्य के लिए मायने रखता है। हमारे सामूहिक प्रयास हमारे उन बच्चों के लिए एक उपहार होगा, जो हमारे देश का भविष्य हैं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 21 अगस्त 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: 2017 की सर्दियों में दिल्ली के बाहरी इलाके में फैला धुआं और धुंध। सांस और सेहत पर असर डालने वाले हवा में मौजूद सूक्ष्म कण की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा सुरक्षित माने गए स्तर से 75 गुना ज्यादा हो गई थी। (एपी फोटो/आर एस अय्यर)