- नागालैंड में सीमा पार वन्यजीव व्यापार और शिकार करने के बदलते तरीके वन्यजीवों को खतरे में डाल रहे हैं।
- नागालैंड के नोक्लाक और पेरेन जिलों में हाल ही में किए गए एक कैमरा ट्रैप अध्ययन में दो वन क्षेत्रों में 31 प्रजातियां दर्ज की गईं। इनमें पांच जंगली बिल्लियां भी शामिल हैं, जिन्हें लोग शिकार करके खाते हैं।
- शिकार के पारंपरिक तरीकों की जगह अब सस्ते स्थानीय रूप से निर्मित बंदूक जैसे हथियारों ने ले ली है। इससे शिकार का पैमाना और जंगली जानवरों का नुकसान दोनों बढ़ गए हैं।
- कम्युनिटी कंजर्वेशन फोरम शिकार पर निर्भरता को कम करने के लिए पारंपरिक संरक्षण मूल्यों को फिर से जिंदा करने और लोगों के लिए वैकल्पिक रोजगार के अवसर बनाने पर जोर देता है।
नागालैंड में शिकार लंबे समय से स्थानीय नागा आदिवासी जीवन और संस्कृति का एक अहम हिस्सा रहा है। ये आदिवासी जीवनयापन और रीति रिवाजों के चलते पारंपरिक रूप से जंगली जानवरों का शिकार करते आए हैं। लेकिन अब सदियों पुराने ये तरीके तेजी से बदल रहे हैं और वन्यजीवों के लिए एक बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। नागालैंड के पारिस्थितिक रूप से समृद्ध दो वन क्षेत्रों – खेलिया सामुदायिक वन और इंटांगकी राष्ट्रीय उद्यान में हाल ही में किए गए एक अध्ययन से इस क्षेत्र में वन्यजीवों के शिकार और व्यापार की चिंताजनक स्थिति का पता चला। भारत-म्यांमार जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा रहे इन दोनों जंगलों में लगे कैमरा ट्रैप ने जंगली जानवरों की 31 प्रजातियों को कैद किया। इन सभी प्रजातियों का या तो शिकार किया जा रहा है या फिर उन्हें मारकर खाया जाता है। यह इस क्षेत्र में संरक्षण, स्थानीय समुदाय की भूमिका और जैव विविधता के भविष्य को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
अध्ययन की मुख्य लेखिका और संरक्षण पारिस्थितिकी विशेषज्ञ सतेम लोंगचार अवैध वन्यजीव व्यापार के अपने सबसे पहले अनुभवों में से एक को याद करते हुए बताती हैं, “2012-13 में नागालैंड के एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान ‘इंटांगकी’ के पास फील्डवर्क करते समय, मेरी मुलाकात लगभग 20 साल के एक युवा शिकारी से हुई। मैं उसे जंगली बिल्लियों की तस्वीरें दिखा रही थी, तभी उसने उत्साह से बताया कि उसके पास एक बाघ की खाल है। जब उसने खाल दिखाई, तो पता चला कि वह क्लाउडेड लेपर्ड की थी। उसने सावधानी से वह खाल मुझे बेचने की कोशिश की… शायद इसलिए क्योंकि खरीदारों ने उसे पहले ही अस्वीकार कर दिया था क्योंकि वह बाघ की खाल जैसी बड़ी नहीं लग रही थी।” यह सतेम लोंगचार का नागालैंड में क्लाउडेड लेपर्ड और अवैध वन्यजीव व्यापार दोनों से पहला सामना था। उन्होंने बताया कि “इस घटना से साफ हो गया कि जंगली बिल्लियों के अंगों का बाजार मौजूद है, भले ही बहुत से लोग अलग-अलग प्रजातियों को पहचान नहीं पाते हों।”
कई साल बाद, 2020–21 में, उन्हें ऐसा ही एक अनुभव नागालैंड-म्यांमार सीमा के पास भी हुआ। वह वहां के एक सीमावर्ती गांव में अपने रिसर्च पर चर्चा कर रही थीं, तभी एक बुजुर्ग व्यक्ति ने उन्हें एक बिल्ली की खाल दिखाई, जिसे वह पहचान नहीं पा रहा था। लोंगचार ने बताया, “वह एशियाई सुनहरी बिल्ली की खाल थी। यह ‘अवसरवादी शिकार’ का एक आम उदाहरण था यानी जब जंगली बिल्लियां धान के खेतों के पास आ जाती हैं या सामान्य शिकार के दौरान दिखाई देती हैं, तो उन्हें मार दिया जाता है।”

अध्ययन के अनुसार, 2020 और 2022 के बीच, खेलिया सामुदायिक वन (नोक्लाक जिले में) और इंटांगकी राष्ट्रीय उद्यान (पेरेन जिला) में लगाए गए 156 कैमरा ट्रैप में जंगली स्तनधारियों की 31 प्रजातियां दर्ज की गईं। 45 शिकारियों और 80 ग्रामीणों से बातचीत से यह भी चला कि स्थानीय लोगों ने इन सभी दर्ज की गई हर प्रजाति का शिकार किया था।
इस क्षेत्र में आदिवासी समुदाय अपनी आर्थिक जरूरतों के साथ-साथ आजीविका, सांस्कृतिक और औषधीय तरीकों के लिए भी शिकार पर निर्भर हैं।
मोन जिले के 75 वर्षीय अनुभवी शिकारी वांगचुंग कोन्याक अपनी परंपरा के बारे में गर्व से बात करते हैं। वह कहते हैं, “हमारी संस्कृति में इस बात को लेकर कोई प्रतिबंध नहीं है कि किस जानवर का शिकार किया जा सकता है और किसका नहीं। लेकिन वन्यजीवों को प्रजनन का समय देने के लिए मार्च से सितंबर तक शिकार पर सख्त प्रतिबंध है। कोन्याक जनजाति के सभी सदस्यों को इस प्रतिबंध का पालन करना होता है। हम पीढ़ियों से मांस के लिए शिकार करते आए हैं। हम जानवर की खाल या अन्य हिस्से को व्यक्तिगत उपयोग के लिए तो रख सकते हैं, लेकिन व्यापार के लिए नहीं।”
पारंपरिक शिकार में संतुलित तरीके से भोजन इकट्ठा करने की रणनीतियों का पालन किया जाता था यानी ऐसे बड़े जानवरों का चयन किया जाता था जिनसे कम मेहनत में ज्यादा मांस मिल सके, जैसे बार्किंग डियर, (मुंटियाकस मुंटजैक), भालू (उर्सस थिबेटानस) और सिवेट (विवर्रिडे)। पर समय के साथ लोग छोटे जानवरों की ओर बढ़ने लगे और अधिक अवसरवादी हो गए। स्वाद वरीयताओं ने भी शिकार के चयन को प्रभावित किया।
शोधकर्ताओं ने अवैध वन्यजीव व्यापार के उदाहरणों का दस्तावेजीकरण किया, विशेष रूप से नागालैंड-म्यांमार सीमा से लगे क्षेत्रों में, जहां भालुओं का शिकार उनके पित्त के लिए किया जाता था। उन्होंने नोट किया कि लंबे समय से चले आ रहे सीमा पार व्यापार मार्गों ने नागालैंड को दक्षिण पूर्व एशियाई बाजारों में वन्यजीवों की अवैध तस्करी के एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित किया है, जिससे महत्वपूर्ण संरक्षण संबंधी चिंताएं पैदा हुई हैं।

बिल्लियों की अधिकांश प्रजातियों को नहीं जानते
कैमरा ट्रैप में दर्ज की गई प्रजातियों में छोटी जंगली बिल्लियां जैसे लेपर्ड कैट (प्रायोनाइलुरस बेंगालेंसिस), मार्बल कैट (पार्डोफेलिस मार्मोराटा), एशियाई गोल्डन कैट (कैटोपुमा टेम्मिन्की), जाना-माना क्लाउडेड लेपर्ड (नियोफेलिस नेबुलोसा) और कॉमन लेपर्ड (पैंथेरा पार्डस) शामिल थे।
लोंगचर ने बताया, “जंगली बिल्लियां मांस के लिए पसंद नहीं की जाती हैं। लेकिन नागालैंड में संरक्षण के लिए सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक दबाव, वन्यजीवों के बारे में सीमित जागरूकता और वन संरक्षण की समझ की कमी है।” वह आगे कहती हैं कि अधिकांश बिल्ली प्रजातियों को शायद ही कभी लोगों ने देखा हो, इसलिए लोग उनसे अपरिचित हैं। उन्होंने बताया, “जनजाति समुदाय के लोग सभी जंगली बिल्लियों को बिना किसी अंतर के तेंदुआ या बाघ मान लेते हैं। नतीजतन, उनके संरक्षण का ख्याल शायद ही कभी लोगों के दिमाग में आता हो। दूसरी ओर, जब व्यापारी अस्पष्ट विवरणों के आधार पर विशिष्ट मांगें रखते हैं, तो शिकारी अक्सर किसी भी ऐसे जानवर को मार देते हैं जो जंगली बिल्ली से मिलता-जुलता हो।”
2015 में, लोंगचर ने नागालैंड में एशियाई सुनहरी बिल्ली का एक फोटोग्राफिक रिकॉर्ड बनाया। यह प्रजाति अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में ‘निकट संकटग्रस्त’ श्रेणी में सूचीबद्ध है। आगे के उनके शोध में इस बिल्ली की तीन अलग-अलग रंगों की किस्में दर्ज की गईं, सुनहरी, लाल-भूरी और हल्की भूरी। इस शोध ने भारत व म्यांमार सीमा क्षेत्र में इस बिल्ली की सुंदर खाल के रंगों की विविधता और इसके दिन और रात दोनों समय सक्रिय रहने वाले व्यवहार पर रोशनी डाली।
लोंगचार बताती हैं, “पूर्वोत्तर भारत में छोटी जंगली बिल्लियों की आबादी और उनके जीवनचक्र पर बहुत कम अध्ययन किए गए हैं। ऐसे लंबे समय के शोध के लिए पर्याप्त संसाधन और व्यक्तियों की जरूरत होती है और यहां का मुश्किल पहाड़ी इलाका इस काम में बड़ी बाधा है।”
ईस्टर्न हिमालयाज़ मार्बल्ड कैट प्रोजेक्ट-इंडिया के संस्थापक गिरिधर मल्ला ने बताया कि वे पिछले एक साल से नागालैंड में क्लाउडेड लेपर्ड वर्किंग ग्रुप के साथ मिलकर मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए काम कर रहे हैं। उनका अध्ययन खासतौर पर छोटी जंगली बिल्लियों पर आधारित है।
मल्ला बताते हैं, “पूर्वोत्तर क्षेत्र में, हमने दो प्रकार के शिकारियों को देखा है, एक वे जो कभी-कभार पारंपरिक या औपचारिक कारणों से शिकार करते हैं और दूसरे वे जो नियमित रूप से बुशमीट के लिए शिकार करते हैं। हमारे प्रयास दूसरे समूह पर केंद्रित हैं। हम उन्हें वैकल्पिक आजीविका के अवसर देते हैं और उन्हें अपनी शोध गतिविधियों में शामिल करते हैं, जैसे जंगली बिल्लियों पर नजर रखने के लिए कैमरा ट्रैप लगाना।”
मल्ला बताते हैं कि उनकी टीम ने राज्य के सभी सामुदायिक संरक्षित क्षेत्रों (सीसीए) के सदस्यों के साथ मिलकर छोटी जंगली बिल्लियों के संरक्षण की स्थिति का अध्ययन किया है। उन्होंने कहा, “हमने पाया कि कुछ सीसीए ने बहुत सख्त संरक्षण नियम बनाए हैं, जैसे अगर कोई व्यक्ति अधिक बार शिकार करता पकड़ा जाए, तो उसके घर की बिजली काट दी जाती है। कई दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों ने बताया कि उन्हें जंगली बिल्लियों के संरक्षण के बारे में पहले कभी जानकारी नहीं दी गई थी। लेकिन जब उन्हें समझाया गया, तो उन्होंने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। इससे मुझे उम्मीद है कि आने वाले सालों में लोगों का नजरिया बदलेगा।”
उन्होंने यह भी कहा कि नागालैंड में जंगली बिल्लियों के बारे में मूलभूत आंकड़ों (डाटा) की भारी कमी है। “हमने इस साल से तीन साल का क्लाउडेड लेपर्ड आबादी निगरानी कार्यक्रम शुरू किया है, जिसमें सभी सीसीए शामिल हैं। हम सीधे शिकारी समुदायों से बात करेंगे ताकि उनकी सोच को समझ सकें और उन्हें संरक्षण कार्यों में सक्रिय रूप से जोड़ सकें।”

स्थानीय रूप से बनाई जाने वाली बंदूकों ने शिकार के तरीके बदले
पारंपरिक रूप से नागालैंड में शिकार कई तरह के औजारों से किया जाता रहा है, जैसे माचे, भाले, धनुष-बाण, गोफन, गुलेल और अलग-अलग तरह के जाल जैसे पिटफॉल, बॉक्स ट्रैप, त्रिकोणीय फंदे और गन-नेट।
शिकारी आमतौर पर समूह में पीछा करते हैं और शिकार का पता लगाने के लिए कुत्तों की मदद लेते हैं। अध्ययन में जिन शिकारियों से बात की गई, उनमें से कई ने बताया कि अब वे बंदूकों का भी इस्तेमाल करने लगे हैं, जिनमें से ज्यादातर स्थानीय तौर पर हाथ से बनाई गई होती हैं।
मोन जिले के मंशिएह वांगनाओ बताते हैं, “लगभग हर कोन्यक घर में दो या तीन स्थानीय रूप से बनी बंदूकें होती हैं, जिनकी कीमत आमतौर पर 10,000 से 30,000 रुपये के बीच है। इनमें से कई बंदूकें पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवार के पुरुष सदस्यों को दी जाती रही हैं। हर गांव में कम से कम एक बंदूक बनाने वाला कारीगर होता है। लेकिन इन हथियारों की बिक्री राज्य के भीतर ही सीमित है और केवल 17 नागा जनजातियों को ही इसे खरीदने या रखने की अनुमति है।”
अध्ययन में यह पाया गया कि बिना लाइसेंस वाली बंदूकें अब आम हो गई हैं और इन्हें संस्कृति का हिस्सा मान लिया गया है। भले ही ये बंदूकें सस्ती और आसानी से मिलने वाली हो, लेकिन बाजार में बनी बंदूकों जितनी भरोसेमंद नहीं होतीं।
नागालैंड कम्युनिटी कंजर्व्ड एरियाज फोरम (एनसीसीएएफ) के संयुक्त सचिव केनेविटो क्रिस्टोफर बताते हैं, “पहले बंदूकें बनाना केवल कोन्यक जनजाति तक ही सीमित था, क्योंकि वे नागालैंड में सबसे पहले थे जिन्होंने बंदूकों का इस्तेमाल शुरू किया था। लेकिन अब राज्य में बढ़ती शिक्षित बेरोजगारी के कारण कई युवा लोग व्यापार या शौक के लिए शिकार करने लगे हैं और बाजार से आसानी से बंदूकें खरीद लेते हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “पहले पारंपरिक शिकारी कई दिन जंगल में बिताते और एक जानवर का शिकार कर लौट आते थे। लेकिन अब बंदूकों के इस्तेमाल से वे एक साथ कई शिकार करके लाते हैं और अधिकांश शिकार अमीरों को बेच दिए जाते हैं। समय के साथ, इस प्रथा ने एक फलते-फूलते बाजार को बढ़ावा दिया है।”
लोंगचर के मुताबिक, गांव के कई बुजुर्गों ने दीमापुर और कोहिमा से शिकारियों की ग्रामीण इलाकों में बढ़ती घुसपैठ पर चिंता जताई थी। ये लोग व्यापार के लिए शिकार करते हैं और अक्सर पारंपरिक शिकार नियमों और आदिवासी भूमि अधिकारों की अवहेलना करते हैं।

अधिकारों और वन्यजीवों में संतुलन
नागा समाज में शिकार और वन्यजीव संरक्षण को लेकर लोगों की सोच उनके पुरखों की मान्यताओं, पारंपरिक रीति-रिवाजों और भूमि स्वामित्व व शासन की पारंपरिक प्रणालियों में गहराई से जुड़ी हुई है। लोंगचार बताती हैं कि राज्य की आर्थिक स्थिति (खासकर ग्रामीण इलाकों में, जहां खेती ही मुख्य आजीविका है) शिकार के लिए एक प्रमुख कारण है। संरक्षण से जुड़ी योजनाएं जब सामुदायिक जंगल क्षेत्रों पर प्रतिबंध लगाती हैं, तो वहां के लोग उन्हें ज्यादा नहीं अपनाते, क्योंकि अक्सर उन्हें इसके बदले कोई प्रोत्साहन या लाभ नहीं मिलता है।
केनेविटो कहते हैं, “परंपरागत रूप से समाज में बेहतर शिकारियों की तारीफ की जाती रही है और उन्हें सम्मान की नजर से देखा जाता रहा है। यह भावना आज भी कायम है, खासकर म्यांमार की सीमा से लगे दूरदराज के इलाकों में। यह अपने आप में एक बड़ी चुनौती है।” वह आगे बताते हैं, “समस्या की जड़ें नागालैंड की अनोखी भू-स्वामित्व व्यवस्था में है। देश के बाकी राज्यों से अलग, इसके 88% जंगल सामुदायिक स्वामित्व वाले हैं, जहां प्रत्येक जनजाति अपने क्षेत्र पर पारंपरिक अधिकारों का प्रयोग करती है। इस वजह से सरकार के लिए विभिन्न समुदायों के बीच संरक्षण कानूनों और नीतियों को समान रूप से लागू करना मुश्किल हो जाता है।”
नागालैंड की जनजातियां भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371A के तहत संरक्षित हैं, जो उन्हें अपनी भाषा, परंपराएं, रीति-रिवाज और जमीन व जंगलों पर नियंत्रण बनाए रखने का अधिकार देता है। इसी कारण, भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972, जो शिकार पर प्रतिबंध लगाता है, राज्य में ज्यादा प्रभावी नहीं है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए नागालैंड कम्युनिटी कंजर्वेशन एरिया फोरम (एनसीसीएएफ) ने यह जिम्मेदारी ली है। एनसीसीएएफ के संयुक्त सचिव केनेविटो बताते हैं, “हमने 2014 में संगठन की स्थापना की थी। फिलहाल नागालैंड के 120 गांव इससे जुड़े हैं। कई और सामुदायिक संरक्षित क्षेत्र (सीसीए) अभी जुड़ना बाकी हैं। हमारा लक्ष्य लोगों को जागरूक करना और वन्यजीवों के लिए सुरक्षित गलियारे बनाना है। लेकिन अगर लोगों को वैकल्पिक आजीविका या आर्थिक प्रोत्साहन नहीं दिए गए, तो लंबे समय तक सफलता मुश्किल होगी। फिलहाल हम कोशिश कर रहे हैं कि इन समुदायों को ऐसी संस्थाओं या एनजीओ से जोड़ें, जो उन्हें कुछ आर्थिक सहायता दे सकें।”
भारत के पहले हरित गांव के रूप में जाना जाने वाला ‘खोनोमा’ नागालैंड में संरक्षण के मामले में सबसे आगे रहा है। यहां 1998 में खोनोमा नेचर कंजर्वेशन एंड ट्रगोपन सैंक्चुअरी (केएनसीटीएस) की स्थापना के साथ ही शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। हालांकि, पिछले कुछ सालों में पूरी तरह प्रतिबंध के चलते कुछ जानवरों की आबादी में खासी बढ़ोतरी हुई है। लेकिन इस वजह से इंसानों और जानवरों के बीच टकराव बढ़ने लगा, खासतौर पर जूम खेती वाले इलाकों में जंगली सूअर (सस स्क्रोफा), भालू और बार्किंग डियर का फसलों पर हमला बढ़ गया। इस समस्या को देखते हुए अब समुदाय ने सख्त निगरानी और नियमों के तहत सीमित संख्या में शिकार की अनुमति देना शुरू किया है।
केनेविटो कहते हैं, “ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए एनसीसीएएफ ने ‘टैग-हंटिंग’ नामक एक मॉडल का सुझाव दिया है। खोनोमा में, तीनों खेल (कुल या कबीले) को अपने क्षेत्र में शिकार करने की अनुमति होगी, लेकिन केवल कुछ निश्चित दिनों के लिए और जानवरों की एक पहले से निर्धारित संख्या के लिए।” वह आगे बताते हैं, “सर्दियों में जब भालू शीतनिद्रा (हाइबरनेशन) में होते हैं, तब उनके शिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा। साथ ही, जिन क्षेत्रों को आधिकारिक रूप से संरक्षित घोषित किया गया है, वहां किसी भी तरह का शिकार नहीं किया जा सकेगा। यह मॉडल अभी विचाराधीन है, लेकिन इसका उद्देश्य वन्यजीव संरक्षण और समुदाय की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना है।”
परंपरागत रूप से, प्रत्येक नागा जनजाति अपने शिकार संबंधी नियमों और प्रतिबंधों का पालन करती आई है, जिनकी वजह से कुछ प्रजातियों की रक्षा भी होती है। उदाहरण के लिए, जेलियांग जनजाति पैंगोलिन (मैनिस क्रैसिकौडाटा) और हूलॉक गिब्बन का शिकार करने से बचती रही है, क्योंकि उनका मानना है कि पैंगोलिन की बगल के नीचे मानव जैसी चमड़ी होती है और गिब्बन मनुष्यों के बहुत करीबी रिश्तेदार होते हैं। अंगामी और अन्य नागा जनजातियां मानती हैं कि बाघ, इंसान और आत्माएं आपस में भाई हैं। इसलिए बाघों को केवल तभी मारा जाता है जब वे सीधे तौर पर खतरा पैदा करते थे। शिकार के बाद विशेष पूजा या अनुष्ठान करके उनसे क्षमा याचना भी की जाती है।
केनेविटो कहते हैं, “नागालैंड में एक कहावत है, ‘बुजुर्ग रास्ता जानते हैं, लेकिन युवा तेजी से चलते हैं।’ यह हमारे समाज की सोच को दिखाती है कि बुजुर्गों के पास अनुभव और समझ है, जबकि युवाओं में बदलाव लाने की ऊर्जा और क्षमता है। अब जरूरत है कि हम पारंपरिक ज्ञान से फिर जुड़ें, और युवाओं को इस दिशा में शिक्षित करें ताकि वे संरक्षण और स्थायी विकास का काम आगे बढ़ा सकें।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 25 अगस्त 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: नागालैंड के खेलिया में कैमरा ट्रैप से ली गई ब्लिथ ट्रैगोपैन की तस्वीर। तस्वीर: सतेम लोंगचार।