- सरायकेला-खरसावां जिले के बड़ासेगोई सहित कई अन्य गांवों में पर्याप्त बारिश होने के बाद भी लोगों को खेतों के लिए पानी की दिक्कतों का सामना करना पड़ता था।
- पहाड़ी व पठारी इलाके में जलछाजन योजनाओं के कारण बारिश के पानी के तेज बहाव की गति को नियंत्रित करने में कामयाबी मिल रही है। इससे मिट्टी का क्षरण रुक रहा है। सरायकेला खरसावां जिले का 56 प्रतिशत भूभाग विभिन्न वजहों से मिट्टी के क्षरण से प्रभावित है।
- सरायकेला खरसावां जिले में अबतक 9699 हेक्टेयर भूमि पर जलछाजन योजनाओं को मंजूरी दी गई है और इनके विभिन्न चरणों का काम चल रहा है। जलछाजन प्रयासों के कारण ग्रामीण आजीविका व खानपान में सुधार दिख रहा है।
तीन साल पहले दक्षिणी झारखंड के सरायकेला खरसावां जिले के बड़ासेगोई गांव में किसी ने सोचा भी नहीं था कि इस गाँव में धान के आलावा और भी कुछ उगाया जा सकता है। सालाना करीब 1100 से 1300 मिमी बारिश होने के बावजूद भी इस गाँव के लोगों को पानी की कमी का सामना करना पड़ता था। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण गांव के उत्तर में स्थित कंडा बुरू नाम का पहाड़ था जिससे होते हुए बारिश के पानी का एक बड़ा हिस्सा तेज गति से नीचे की और बहकर बेकार हो जाता था। ऐसे में गाँव के ऊपरी इलाकों की मिट्टी में नमी की कमी और क्षरण तेज़ होने के कारण यहां कुछ भी उपजाना मुश्किल हो गया था।
लेकिन बड़ासेगोई गांव के 55 वर्षीय किसान गुलाब सिंह मुंडा की जिंदगी जल प्रबंधन के लिए समुदाय की भागीदारी से स्थानीय स्तर पर किये गये प्रयासों के कारण बदल गई है। मुंडा इस संवाददाता को बताते हैं कि सरकार के वित्तीय सहयोग व ग्रामीणों की भागीदारी के साथ वर्ष 2022 से बारिश के पानी के प्रबंधन का प्रयास यहाँ शुरू हुआ और और धीरे-धीरे इस गांव की सूरत बदलनी शुरू हुई।
गांव में बने छोटे चेकडैम और पहाड़ पर गिरने वाले पानी के बहाव की गति को धीमे किए जाने की कोशिशों ने मुंडा की ऊपरी जमीन के आसपास पानी के स्तर व मिट्टी में नमी को बढा दिया। इस वजह से वे उस ऊपरी जमीन पर भी खेती कर पा रहे हैं और वे नवंबर के महीने में गोभी व अन्य सब्जियों उगा पाते हैं।
इन प्रयासों के बाद इस गांव के हर छोर पर अब पानी से भरे तालाब व नाले नजर आते हैं। छोटे-छोटे चेकडैम की वजह से यहां की पठारी जमीन के नालों में पानी व उसके आसपास के खेतों की मिट्टी में नमी व सिंचाई की सुविधा स्पष्टतः दिखती है।
बड़ासेगोई गांव सरायकेला खरसावां जिले के कुचाई ब्लॉक की छोटासेगोई पंचायत में पड़ता है। 2011 की जनगणना के अनुसार, इस गांव की आबादी 749 थी। इस गांव की अधिकतर आबादी मुंडा आदिवासी की है और लोग आजीविका के लिए मुख्य रूप से खेती पर निर्भर हैं।

बड़ासेगोई गांव के प्रधान मोहन लाल मुंडा, 36, ने कहा, “पहले इस गांव के सभी जलस्रोत का पानी फरवरी के आखिरी दिनों तक सूख जाता था, लेकिन मेड़बंदी और चेकडैम के निर्माण से अब मार्च-अप्रैल तक यहां पानी रहता है।”
इस गांव में यह बदलाव झारखंड जलछाजन मिशन की परियोजना पर पद्मश्री चामी मुर्मू के नेतृत्व वाली स्वयंसेवी संस्था ‘सहयोगी महिला’ के द्वारा स्थानीय समुदाय की भागीदारी से किये गए काम की वजह से आया है।
छोटासेगोई पंचायत की मुखिया और इस गांव की ग्रामीण लुदरी हेंब्रम ने कहा, “पहले यहां सिर्फ धान होता था, अब हमलोग यहां गेहूं, चना आदि की भी खेती कर रहे हैं। तालाब के आसपास के क्षेत्र में सब्जी की खेती भी लोग कर रहे हैं। वे कहती हैं कि पानी को बचाने से लोगों के खानपान व आय में भी सुधार आया है। ग्रामीणों की थाली में अब हरी सब्जी भी प्रमुखता से शामिल हो गई है। लोगों को पानी बर्बाद नहीं करने के बारे में हमलोग बैठक में बताते हैं।”
कैसे आया बदलाव, क्या है प्रारूप
‘सहयोगी महिला’ के हेमंत महतो ने बताया कि इस इलाके में पर्याप्त बारिश होने के बाद भी इस गांव के लोगों को खेतों के लिए पानी की दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। “पहले लोग बारिश के मौसम में निचली जमीन में धान की खेती कर लेते थे, लेकिन बाकी दिनों में उन्हें पानी की दिक्कत होती थी और सामान्यतः वे ऊपरी जमीन पर कोई फसल नहीं ले पाते थे, ऐसे में हमलोगों ने झारखंड जलछाजन मिशन के तहत 2022-23 से यहां स्थानीय ग्रामीणों की मदद से काम शुरू किया और गांव के उत्तर दिशा में स्थित पहाड़ पर गिरने वाले पानी की गति को नियंत्रित किया, ताकि वह बह कर चला न जाए बल्कि वे यहां की स्थलाकृतियों में संचित हों और मिट्टी की पानी स्टोरेज क्षमता बढ़े,” उन्होंने मोंगाबे हिंदी को बताया।
काम की शुरुआत गांव के उत्तर दिशा की ओर स्थित कंडा बुरू नाम के पहाड़ पर बारिश के महीने में गिरने वाले पानी की गति को कम करने की सोच के साथ हुई, ताकि वहां की मिट्टी पर पानी थोड़ा ठहरे अवशोषित हो पाए।
हेमंत महतो ने बताया कि पानी के वेग को कम करने के लिए पहाड़ पर कई स्ट्रक्चर बनाए गए और इन्हे बनाने में जिग-जैग मॉडल का इस्तेमाल किया गया। पहाड़ पर कई हिस्सों में गड्ढे या ट्रेंच भी खोदे गए जिससे पानी का अवशोषण ज़मीन में बढ़ सके। महतो ने इस बात पर जोर दिया कि इस प्रक्रिया में पहाड़ पर स्थित पेड़ों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता है और वन विभाग की जमीन पर वन विभाग से अनुमति लेकर काम किया जाता है।
चामी मुर्मू ने मोंगाबे हिंदी से बातचीत में कहा, “पहले हम लोगों ने इस गांव का सर्वे किया और ग्रामीणों से पूछा कि आप लोग धान के अलावा अन्य फसलों की खेती क्यों नहीं करते हैं तो उन्होंने पानी की दिक्कत को इसकी वजह बताया। फिर जलछाजन योजनाओं को लेकर ग्रामसभा हुई, लेकिन फिर भी लोग तुरंत तैयार नहीं हो गए, उनके साथ दो-तीन बार ग्रामसभा करने से वे इसके लिए राजी हुए। अब पानी के संचय से यहां के किसान कई तरह की फसलों की खेती कर रहे हैं।”
पानी के संरक्षण के लिए बनायी जाने वाली संरचनाएं
पानी के अवशोषण के लिए गांव में जगह-जगह दो अलग-अलग तरह के ट्रेंच बनाए गए हैं। यह ट्रेंच छह मीटर लंबा, एक मीटर गहरा और एक मीटर चौड़ा होता है, जिसमें 6000 क्यूबिक मीटर (छह हजार लीटर) पानी जमा होता है। इसे डब्ल्यूएटी (Water Absorption Trench-जल अवशोषण खाई) कहते हैं। जबकि एक दूसरा ट्रीटमेंट मॉडल है, जिसे टीसीबी यानी ट्रेंच कम बंड (खाई सह बांध)कहते हैं। इसमें छह मीटर लंबा, 0.91 मीटर चौड़ा और 0.6 मीटर गहरा गड्ढा बनाया जाता है। इसकी स्टोरेज क्षमता तीन क्यूबिक मीटर (तीन हजार लीटर) होती है। संरचनाओं के निर्माण में यह ध्यान रखा जाता है कि खेती वाली जमीन के बजाय इसे उसके बगल की बंजर या खाली जमीन पर किया जाए।
वहीं, पहाड़ पर बनायी जाने वाली जलछाजन आकृति एससीटी (staggered contour trenches) कहलाती है। यह तीन मीटर लंबा, 0.6 मीटर चौड़ा और 0.6 मीटर गहरा होता है। यह पूरी क्षमता में 1000 लीटर पानी संग्रह करता है। बड़ासेगोई में यह कार्य 17 हेक्टेयर जमीन पर किया गया है।

हेमंत महतो कहते हैं कि बारिश के दिनों में 15 से 20 बार ऐसे मौके होते हैं, जब ये जलछाजन संरचनाएं पूरी क्षमता में भर जाती हैं। मोंगाबे हिंदी के पास उपलब्ध दस्तावेज में यह जिक्र है कि बड़ासोगोई गांव में 389.44 हेक्टेयर (962.3268 एकड़) जमीन पर जलछाजन योजना को लागू किया गया है। गांव में जलछाजन के लिए 45 अलग-अलग तरह के छोटे-बड़े ढांचे बनाए गए हैं, जिसकी कुल 50,595 क्यूबिक मीटर (पांच करोड़ पांच लाख 95 हजार लीटर) जलसंग्रहण क्षमता है।
आदिवासी परंपराओं का ख्याल
बड़ासेगोई गांव के प्रधान मोहन लाल मुंडा ने कहा, “इस गांव में आदिवासी स्वशासन की परंपरागत प्रधानी या मुंडा व्यवस्था है और उस नाते मैं यहां का प्रधान या मुंडा हूँ। हमलोग परंपरागत आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के तहत ग्रामसभा की बैठक में आपसी सहमति से गांव के बारे में निर्णय लेते हैं।”
गांव में पानी को सहेजने की कोशिशों के दौरान किसी आधुनिक शब्दावली का प्रयोग करने के बजाय आदिवासी मान्यताओं, परंपराओं का ख्याल रखते हुए कदम आगे बढाए गए। जैसा कि गुलाब सिंह मुंडा बताते हैं, “कुंडा बुरू पहाड़ के अलग-अलग हिस्सों को हम अलग-अलग आदिवासी या स्थानीय नामों से पुकारते हैं, जैसे – रगुन मरचा, गुआलोर, पौटसरजम, मडलौर और पहाड़ के बॉर्डर को जिलिंग गुट्टू के नाम से जानते हैं। ऐसे में जब संरचनाएं बनाने का काम शुरू हुआ तो स्थानीय लोगों की सुविधा के लिए इन नामों में कोई बदलाव नहीं करने का निर्णय लिया गया।”
वे कहते हैं कि अगर हम इस विशाल पहाड़ के विभिन्न हिस्से को उनके परंपरागत नाम से संबोधित करते हैं तो गांव के बच्चे से बुजुर्ग तक के लिए उसकी पहचान सुनिश्चित कर पाना आसान होता है।
जल संरचनाओं का प्रबंधन
बड़ासेगोई गांव में जल छाजन मिशन की योजनाओं से 100 फीट गुना 100 फीट व 10 फीट गहराई के चार तालाब बनाए गए हैं, जबकि एक अमृत सरोवर है जो 200 गुना 200 फीट एवं 10 फीट की गहराई वाला है। ये तालाब गांव के अलग-अलग छोर पर हैं।
गांव में मिट्टी के दो चेकडैम बनाए गए हैं – जिनका नाम बादू बांध व लेदिया बांध है। गांव के सार्वजनिक उपयोग के उद्देश्य ये चेकडैम बनाने के लिए जिन किसानों ने अपनी जमीन इसके लिए दान दी, उनके नाम पर इनका नाम रखा गया है। जैसे बादू बांध बादू नामक किसान की जमीन पर बना है।
इसके साथ ही गांव में 10 ब्रशवुड चेकडैम बनाए गए हैं। ऐसी आकृति पानी के उन बहाव मार्ग में बनायी जाती है, जहां पानी का वेग अधिक होता है, ताकि न सिर्फ पानी के बहाव के वेग को कम किया जा सके बल्कि ये उसकी तीव्रता को भी झेल सकें। बारिश के महीनों में पानी का वेग अत्यधिक होने पर अगर ऐसे चेकडैम क्षतिग्रस्त होते हैं तो बाद में उन्हें ग्रामीण उन्हें दुरुस्त करते हैं।
ऐसे प्रयोग से पानी के रुकने व जमीन में अवशोषित हो जाने में इजाफा हुआ है। नमी होने से जमीन पर घास उगने लगा जिससे भूमि का क्षरण रुका है। सरायकेला जिला मिट्टी के क्षरण से प्रभावित है।
राज्य सरकार के नियंत्रण वाले झारखंड स्पेस अल्पीकेशन सेंटर की ओर से सरायकेला-खरसावां जिले के मृदा संसाधन पर तैयार की गई एक रिपोर्ट में यह उल्लेख है कि पानी के कारण होने वाला क्षरण या कटाव इस जिले में मिट्टी की गुणवत्ता खराब होने की सबसे बड़ी वजह है। इस रिपोर्ट में जिक्र है कि इस जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 56 प्रतिशत हिस्सा किसी न किसी वजह से मिट्टी के खराब होने की समस्या से ग्रस्त है।

प्रबंधन व सुरक्षा की जिम्मेवारी समुदाय पर
ऐसी जलछाजन संरचनाओं का प्रबंधन व सुरक्षा गांव के लोगों की जिम्मेदारी होती है। गांव की कृषि संबंधी स्थायी समिति इसके वित्तीय प्रबंधन को देखती है। इस समिति के अध्यक्ष प्रधान मोहन लाल मुंडा हैं, जबकि गुलाब सिंह मुंडा सचिव हैं। इस समिति में तीन महिला सदस्य भी हैं, जिनके नाम पूजा मुंडा, सावित्री मुंडा और सीता मणि हैं। समिति का एक बैंक खाता खोला गया है। इसमें सरकार की ओर से अंशदान आता है।
हेमंत महतो बताते हैं कि ग्रामीणों को अगर खुद किसी संरचना की मरम्मत करनी होती है या कोई और काम करना होता है तो वे इस खाते से राशि निकाल कर उससे भोजन सामग्री व अन्य जरूरी चीजें खरीद लेते हैं और फिर श्रमदान के जरिये संरचना की मरम्मत कर लेते हैं।
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हाल में राज्य के लोहरदगा जिले में आयोजित जलछाजन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राज्य की ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि जलछाजन योजनाओं की बदौलत राज्य में 40 हजार हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि पर खेती का काम शुरू हो सका। इससे भूगर्भ जलस्तर में चार से 10 फीट का सुधार हुआ है और किसान साल में तीन फसलों की खेती कर पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये काम प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2.0 और झारखंड जलछाजन मिशन के तहत किए गए हैं।
वाटरशेड डेवलपमेंट कंपोनेंट-प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2.0 के एमआइएस डेटा से पता चलता है कि वर्ष 2021-22 से अबतक सरायकेला जिले में 9699 हेक्टेयर (23966.743047 एकड़) भूमि पर जलछाजन योजनाओं को मंजूरी दी गई है, जबकि झारखंड में एक लाख 48 हेक्टेयर (365715.641263 एकड़) भूमि पर जलछाजन योजनाओं को स्वीकृत दिया गया है, जिसमें आने वाले व्यय में केंद्र व राज्य दोनों का अंशदान है।
इस स्टोरी की रिपोर्टिंग ‘प्रॉमिस ऑफ कॉमन्स’ फेलोशिप के सहयोग से की गई है। यह संस्था साझा संसाधनों और उन्हें संभालने वाले समुदायों की भूमिका पर ध्यान देती है।
बैनर तस्वीरः पानी बचाने से ऊपरी जमीन में भी खेती संभव हो पाया है। ऊपरी जमीन पर स्थित सब्जी के खेत में खड़े गुलाब सिंह मुंडा। तस्वीर- राहुल सिंह/मोंगाबे