- दिल्ली और आस-पास के शहरों गाजियाबाद और नोएडा में नवंबर के तीसरे हफ्ते में AQI का लेवल खतरनाक स्तर पर पहुंच गया। कुछ इलाकों में तो यह 600 के पार चला गया।
- पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बेहद खराब होती हवा की गुणवत्ता ना सिर्फ लोगों की सेहत पर असर डाल रही है, बल्कि उनकी उत्पादकता भी कम हो रही है।
- जानकारों का सुझाव है कि सभी सेक्टर में पर्यावरण के अनुकूल तरीके अपनाना और मददगार बुनियादी ढांचा तैयार करने से फायदा हो सकता है।
सुबह के साढ़े आठ बज रहे हैं। महीना नवंबर का है। हवा में घनी धुंध छाई हुई है और नोएडा के बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन पर भीड़ बढ़ती जा रही है। इनमें ज्यादातर लोग ऑफिस जाने वाले और कॉलेज के छात्र हैं। मेट्रो की ट्रेन प्लेटफॉर्म से निकलकर धुंध को चीरती हुई आगे बढ़ रही है।
कोच के अंदर काम, हवा में प्रदूषण और उत्पादकता पर इसके असर के बारे में बातचीत के बीच-बीच में खांसी और छींकने की आवाजें आ रही हैं।
आईटी कंपनी में एआई सोल्यूशन डिलीवरी एसोसिएट बाइस साल की वंदिका बिंदल कहती हैं, “मेरे रोज के सफर के 10-15 मिनट के अंदर ही प्रदूषण से मेरी आंखें जलने लगती हैं। जब तक मैं ऑफिस पहुंचती हूं, मैं बहुत थक जाती हूं। काम पर मेरा फोकस कम हो जाता है और मैं अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दे पाती हूं।” वंशिका रोजाना नोएडा और दिल्ली के बीच मेट्रो से सफर करती हैं।
ओपन-सोर्स एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म AQI के अनुसार, नवंबर के तीसरे हफ्ते में दिल्ली का AQI लेवल 198-554 के बीच बना रहा। आस-पास के NCR के शहरों में AQI का लेवल और भी खराब था। गाजियाबाद में यह 220-663 और नोएडा में 213-636 रिकॉर्ड किया गया। हालांकि अलग-अलग इंडेक्स डेटा की अलग-अलग तरह से व्याख्या की जा सकती है, लेकिन आमतौर पर 300 से ऊपर का AQI खतरनाक माना जाता है जिसका दुष्प्रभाव स्वस्थ लोगों पर भी दिखाई देता है और पहले से स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे लोगों पर गंभीर असर डाल सकता है।
नोएडा की एक एजुकेशन कंसल्टेंसी में काम करने वाली पारुल जुयाल ने धुंध से भरे दिल्ली-नोएडा के आसमान की तरफ देखते हुए कहा, “जब भी शहर का AQI ‘खराब’ जोन में जाता है, तो मेरी सांस फूलने लग जाती है।” “भले ही मेरा ऑफिस मुझे घर से काम करने की सुविधा देता है, लेकिन खांसी और बार-बार होने वाले संक्रमण से काम करने की मेरी रफ्तार धीमी हो जाती है। मेरे काम की गति सामान्य नहीं रह पाती है।”

बिंदल और जुयाल प्रदूषण से उत्पादकता में होने वाले नुकसान की बस उदाहरण भर हैं और वे अकेले नहीं हैं। दिल्ली-एनसीआर में साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं और यह भारत के सबसे गतिशील आर्थिक कॉरिडोर में से एक है। यहां खराब होती हवा की गुणवत्ता का असर तेजी से काम और कार्यकुशलता पर महसूस किया जा रहा है। हर सर्दी में आसमान धुंध की धूसर परत से ढक जाता है और एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) सामान्य तौर पर 300-400 से ऊपर चला जाता है, जो सुरक्षित स्तर से कहीं ज्यादा है। प्रदूषण पर नजर रखने वाले AQI की वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट 2024 के अनुसार, दुनिया के 10 सबसे ज्यादा प्रदूषित सभी शहर भारत में हैं और इस सूची में नई दिल्ली सबसे ऊपर है।
हालांकि, वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव पर होने वाली सार्वजनिक चर्चाओं में अक्सर दृश्यता, फ्लाइट और ट्रेनों का लेट से चलना छाया रहता है, लेकिन उत्पादकता में कमी का गहराता संकट धीरे-धीरे सामने आ रहा है। भारत का जनसांख्यिकीय लाभ (डेमोग्राफिक डिविडेंड) उसकी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है, लेकिन पर्यावरण से जुड़े दुष्प्रभावों के कारण यह कमजोर हो रहा है जिससे स्वास्थ्य खराब हो रहा है और कार्यकुशलता कम हो रही है।
कारोबार में नुकसान
उत्पादकता पर वायु प्रदूषण के असर का अच्छी तरह दर्ज किया जा चुका है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के अनुसार, वायु प्रदूषण से भारतीय अर्थव्यवस्था को हर वित्तीय वर्ष में लगभग 95 अरब डॉलर का नुकसान होता है। कॉर्पोरेट और रिटेल से लेकर ट्रांसपोर्ट और कंस्ट्रक्शन सेक्टर तक, यह कंपनियों की उत्पादकता और प्रदर्शन को अलग-अलग तरीकों से नुकसान पहुंचाता है। जहां श्रमिकों की उत्पादकता में गिरावट, ग्राहकों की आवाजाही में कमी और कर्मचारियों की समय से पहले मौत का सीधा असर होता है, वहीं कर्मचारियों की घटती उत्पादकता और स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च बिजनेस पर परोक्ष रूप से बोझ बढ़ाते हैं।
साल 2021 में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि ज्यादा प्रदूषण वाले दिनों में कर्मचारियों की उत्पादकता में 8-10% की कमी आ जाती है। यह अध्ययन डलबर्ग एडवाइजर्स, क्लीन एयर फंड और भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) ने मिलकर किया है। इसमें पाया गया कि गैर-हाजिरी की वजह से हर साल लगभग 1.3 अरब काम के दिन बर्बाद हो जाते हैं। जिन कामकाजी लोगों पर बच्चों जैसे आश्रितों की जिम्मेदारी होती है, उनके लिए गैर-हाजिरी (कर्मचारियों का काम पर न आना) का असर और भी ज्यादा गंभीर हो जाता है।
इसी तरह, उपस्थित होना (जब कर्मचारी काम पर तो होता है, लेकिन बीमारी, तनाव या दूसरी समस्याओं की वजह से पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाता) छिपा हुआ खर्च है जो सीधे कंपनियों के मुनाफे पर असर डाल सकता है। रिपोर्ट का अनुमान है कि उपस्थिति और गैर-हाजिरी दोनों ही वजह से सालाना 30 अरब से 41 अरब डॉलर का बोझ बढ़ जाता है। इसमें यह भी बताया गया है कि दोनों ही उत्पादकता पर बुरा असर डालते हैं, लेकिन उपस्थित होने का वित्तीय नुकसान ज्यादा हो सकता है।

अध्ययन कहता है कि जैसे-जैसे कर्मचारी खोई हुई उत्पादकता की भरपाई के लिए ज्यादा समय तक काम करते हैं, वैसे-वैसे इसकी कीमत बर्नआउट, कर्मचारियों के इस्तीफे और HR मैनेजर को प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित करने में बढ़ती मुश्किलों के रूप में चुकानी पड़ती है।
आईटी फर्म न्यूजेन के ग्लोबल टैलेंट हेड एल्विन डेविड भी इस बात से सहमत हैं। उन्होंने कहा, “ज्यादा प्रदूषण के कारण कंपनियों के सामने कई चुनौतियां आती हैं। भर्ती करने वालों को सबसे अच्छी प्रतिभा को आकर्षित करने में मुश्किल आ रही है। इसका असर इस्तीफे पर भी देखा जा रहा है।”
वह आगे कहते हैं, “सभी सेक्टर में हम सुन रहे हैं कि नए लोग दिल्ली-एनसीआर में ऑफिस जॉइन करने से कतरा रहे हैं। दूसरे इलाकों में रहने वाले लोग सर्दियों में ज्यादा वायु प्रदूषण से प्रोजेक्ट के लिए यात्रा करने या एनसीआर के शहरों में शिफ्ट होने से हिचकिचा रहे हैं। असल में, कुछ कर्मचारी ऐसी जगहों पर स्थानांतरण का अनुरोध कर रहे हैं जहां हवा की गुणवत्ता बेहतर है।”
डेविड बताते हैं कि जो कर्मचारी अपने परिवारों के साथ रहते हैं, वे प्रदूषण के कारण अपने बुजुर्ग माता-पिता या बच्चों को बार-बार स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझते हुए देखते हैं। लगातार मेडिकल जिम्मेदारियों को संभालने से उनका फोकस और उत्पादकता घटती है। साथ ही, कंपनियों के हेल्थ कवर पर उनकी निर्भरता भी बढ़ जाती है।
यात्रा और परिवहन जैसे सेक्टर बढ़ते हुए असर से दो-चार हो रहे हैं। परिवहन और हॉस्पिटैलिटी कंपनी कुरुमा ट्रैवल्स के मैनेजिंग डायरेक्टर बिजेंद्र सिंह बताते हैं, “हमारे बेड़े में करीब 40% यां BS-IV गाड़ियों हैं, लेकिन ज्यादा प्रदूषण के कारण नियामक पाबंदियां से हम और हमारे साझेदार इनका इस्तेमाल नहीं कर सकते। इससे नुकसान होता है।”
युवाओं पर बढ़ता बोझ
सक्सेस पैक्ट नाम की स्टाफिंग फर्म में HR की सीनियर मैनेजर नेहा शर्मा के अनुसार, सिर्फ ऑफिस जाने वाले लोग ही इससे प्रभावित नहीं हो रहे हैं। “अब वायु प्रदूषण सिर्फ बाहर की समस्या नहीं रही; यह हर किसी को, हर जगह प्रभावित कर रहा है। हम देख रहे हैं कि जो लोग घर से काम कर रहे हैं, वे भी बीमार पड़ रहे हैं और अपना काम ठीक से नहीं कर पा रहे हैं,” वह कहती हैं।
युवा, कुशल और भारत के बढ़ते तकनीकी श्रमबल का हिस्सा सॉफ्टवेयर इंजीनियर स्मृति गिरधर और उनकी टीम की उत्पादकता आमतौर पर कोड की लाइनों और आउटपुट की गति से मापी जाती है। लेकिन, हाल के दिनों में हवा में प्रदूषण बढ़ने से आउटपुट में उतार-चढ़ाव दिखने लगा है।

गेमिंग कंपनी में प्रोग्राम मैनेजर के तौर पर काम करने वाली गिरधर बताती हैं, “जब कोई बीमार होता है, तो टीम के दूसरे सदस्यों को ज्यादा काम करना पड़ता है। इससे सिर्फ एक व्यक्ति के काम पर ही असर नहीं पड़ता, बल्कि पूरी टीम प्रभावित होती है।” वह कहती हैं कि प्रदूषण बढ़ने पर हर हफ्ते उनकी टीम के कम से कम 10-12% सदस्य बीमारी की वजह से छुट्टी पर होते हैं।
“आप हर दूसरे दिन छुट्टी नहीं ले सकते; आप इसका ठीकरा प्रदूषण पर नहीं फोड़ सकते, काम तो करना ही है। यह मेरे साथियों के बीच आम भावना है। इसलिए, यह स्पष्ट है कि आप काम पर खुद को जबरदस्ती धकेल रहे हैं, लेकिन आप अपना सौ फीसदी नहीं दे पा रहे हैं,” गुरुग्राम के रहने वाले कुणाल जी कहते हैं, जो सरकारी विभाग में अनुबंध पर मैनेजर के तौर पर काम करते हैं।
हवा का प्रदूषण अगली पीढ़ी के पेशेवर, खासकर यूनिवर्सिटी और कॉलेज के छात्रों पर भी बोझ बन रहा है। इस आर्टिकल के लिए किए गए एक अनौपचारिक ओपिनियन पोल में, दिल्ली यूनिवर्सिटी के 100 से ज्यादा छात्रों से पूछा गया कि हवा का प्रदूषण उनकी सेहत, काम करने की क्षमता और मानसिक सेहत पर किस तरह असर डाल रहा है। जवाब देने वाले 65% से ज्यादा छात्रों ने कहा कि हवा की खराब गुणवत्ता से उनकी उत्पादकता यानी फोकस, एनर्जी, आउटपुट में कमी आती है, लेकिन काम करना उनकी मजबूरी है। जवाब देने वाले 27% छात्रों ने अपने परफॉर्मेंस में भारी गिरावट की जानकारी दी। शारीरिक सेहत के अलावा, हवा में प्रदूषण मानसिक सेहत पर भी असर डाल रहा है, जैसे तनाव का स्तर, मूड, चिड़चिड़ापन और मोटिवेशन। एक और सवाल के जवाब में, उसी ग्रुप के 57% छात्रों ने कहा कि ज्यादा प्रदूषण से उन्हें अधिक तनाव, निराशा और कम ऊर्जा महसूस होती है। वहीं, 32.7% छात्रों ने बताया कि तनाव बढ़ने के साथ-साथ उत्पादकता में भी कमी आई है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में पर्यावरण अध्ययन विभाग की प्रोफेसर चिराश्री घोष कहती हैं कि छात्र पहले से ही ऊर्जा, फोकस और परफॉर्मेंस में कमी देख रहे हैं। “अगर वे उत्पादकता में इन दिक्कतों के साथ श्रमबल में शामिल होते हैं, तो भारत का भविष्य का टैलेंट पूल कमजोर हो जाएगा। कम कुशल ग्रेजुएट का मतलब है धीमी इनोवेशन की धीमी गति, रिसर्च आउटपुट में कमी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर असर। अस्वस्थ युवा वर्ग से आखिरकार स्वास्थ्य सेवाओं की लागत बढ़ाती है और जैसे ही वे श्रम बाजार में कदम रखते हैं, उत्पादकता को भी कम कर दते हैं,” वह कहती हैं।
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वह इस बात पर जोर देती हैं कि किसी भी देश का आर्थिक विकास सिर्फ अनुभवी श्रमिकों पर ही नहीं, बल्कि उनकी सेहत और भविष्य की पीढ़ियों पर इसके असर पर भी निर्भर करती है। वह आगे कहती हैं, “यह [सेहत] बहुत जरूरी है क्योंकि यह भविष्य में मजदूरों की स्थिर आपूर्ति पक्का करती है और लंबे समय तक आर्थिक विकास में मदद करती है। वायु प्रदूषण इसे नुकसान पहुंचाता है।”
घोष कहती हैं कि दिल्ली-एनसीआर और उत्तर भारत की पहचान ज्यादा आबादी, बेशुमार वाहन, मौसम के हिसाब से पराली जलाने, धूल और औद्योगिक प्रदूषण से है। यह चारों तरफ जमीन से घिरा, कटोरे के आकार का इलाका है जिसमें प्रदूषक तत्व फंस जाते हैं। यहां प्रदूषण को साफ करने में मददगार तटीय हवाओं या ज्यादा बारिश (देश के दूसरे हिस्सों की तरह) जैसी चीजें नहीं हैं।
वह समझाती हैं, “इसलिए, सभी हितधारकों को सभी सेक्टर में पर्यावरण के अनुकूल तरीके अपनाकर स्थिति को ठीक करने की जरूरत है, हम सभी इस मुहिम में हितधारक हैं।”
कुरुमा ट्रैवल्स के सिंह इस बात से सहमत हैं, “हम सभी की इसमें भूमिका है। हमने अपना कार्बन फुटप्रिंट कम करने के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ियों का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, लेकिन इस बदलाव में मदद करने के लिए हमें बुनियादी ढांचे की भी जरूरत है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 8 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर- घनी धुंध के बीच ऑफिस जाते हुए लोग। (तस्वीर -AP)