- एक सर्वे में पाया गया कि प्लास्टिक का मलबा और कबाड़ हो चुके मछली पकड़ने के उपकरण अंडमान और निकोबार द्वीप में कोरल रीफ को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
- सर्वे के मुताबिक, रीफ में पाए गए मलबे का आधे से ज्यादा हिस्सा प्लास्टिक का था।
- इसी तरह की रिपोर्ट मन्नार की खाड़ी से भी सामने आई हैं।
एक नए समुद्री सर्वे से पता चला है कि प्लास्टिक का मलबा और कबाड़ हो चुके मछली पकड़ने के उपकरण अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में इतनी तादाद में जमा हो चुके हैं कि वो कोरल रीफ का “दम घोंट” रहे हैं। ये द्वीप भारत के कुछ सबसे प्राचीन कोरल रीफ (मूंगा चट्टान) और स्थानिक जीव-जंतुओं व पेड़-पौधों का घर हैं।
इस सर्वे का उद्देश्य अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में गंभीर रूप से संकटग्रस्त कोरल रीफ को समुद्री कचरे और कबाड़ हो चुके मछली पकड़ने के उपकरणों से होने वाले नुकसान पर महत्वपूर्ण आंकड़े इकट्ठा करना था। बंगाल की खाड़ी में स्थित इन द्वीपों को उच्च जैव विविधता वाला क्षेत्र माना जाता है, लेकिन दुनियाभर में समुद्री प्रदूषण पर होने वाले अध्ययनों में इन द्वीपों की बात कम ही की जाती है। यह रिपोर्ट हाल के उन अध्ययनों के निष्कर्षों को ओर पुष्ट करती नजर आती है, जो महासागरों में इस कचरे की बढ़ती मात्रा की ओर इशारा करते हैं और उसे कोरल और चट्टानों से जुड़े समुद्री जीवों के लिए बड़ा खतरा बताते हैं।
‘मरीन पॉल्यूशन बुलेटिन’ में प्रकाशित ये सर्वे अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के महात्मा गांधी गवर्नमेंट कॉलेज; पोर्ट ब्लेयर और तिरुवनंतपुरम में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) के अंतर्गत क्षेत्रीय केंद्रों; वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद -राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान, गोवा; और वैज्ञानिक और नवीकृत अनुसंधान अकादमी, गाजियाबाद ने साथ मिलकर किया था।
सर्वे की गई कोरल रीफ में प्लास्टिक सबसे अधिक मात्रा में पाया गया। यह चट्टानों पर मौजूद कुल कचरे का लगभग 60% था और इसमें प्लास्टिक से बने मछली पकड़ने के उपकरणों की कुल हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई थी।
समुद्री कचरे के पारिस्थितिक प्रभाव का आकलन करने वाले प्लास्टिक अबन्डेंस इंडेक्स (PAI), हैज़ार्डस आइटम इंडेक्स (HII), और क्लीन एनवायरनमेंट इंडेक्स (CEI) जैसे संकेतकों ने भी मूंगा चट्टानों पर समुद्री कचरे से होने वाले ‘गंभीर खतरों’ को उजागर किया है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, उनके निष्कर्ष दूरदराज के द्वीपों में समुद्री कचरे के आकलन पर पहले आईं रिपोर्ट्स को और मजबूत करते हैं और कचरा प्रबंधन में सुधार, मछली पकड़ने के उपकरणों के निपटान पर सख्त नियम बनाने और कोरल रीफ को नुकसान पहुंचाने वाले कचरे को प्रभावी ढंग से हटाने की तत्काल आवश्यकता पर जोर देते हैं। यह अध्ययन नीति निर्माताओं और हितधारकों को संवेदनशील कोरल रीफ सिस्टम की सुरक्षा के लिए समुद्री कचरे के प्रबंधन के लिए आवश्यक कदम उठाने का सुझाव देता है।
चेन्नई स्थित सुगंती देवदासन मरीन रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसडीएमआरआई) के निदेशक पैटरसन एडवर्ड कहते हैं, “हालांकि नई रिपोर्ट अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सिर्फ चुनिंदा कोरल रीफ क्षेत्रों में बढ़ते समुद्री प्रदूषण पर आंकड़े देती है। लेकिन यह अंडमान से पहली रिपोर्ट है, इस लिहाज से क्षेत्रीय रूप से महत्वपूर्ण है और एक आधारभूत मानक के रूप में काम कर सकती है।”

भारत के कोरल रीफ पर बढ़ता खतरा
महात्मा गांधी गवर्नमेंट कॉलेज, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के वैज्ञानिक और मुख्य लेखक वेंकटेशन शिव शंकर ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि भारत के लगभग 2,375 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में कोरल रीफ फैली हुई हैं। लेकिन इन चट्टानों पर फैले कचरे की मात्रा या कबाड़ हो चुके मछली पकड़ने के उपकरणों से होने वाले नुकसान पर कोई व्यापक अध्ययन नहीं है। वह कहते हैं, “इसके आकलन के लिए बहुत ज्यादा फंडिंग और काफी लोगों की जरूरत होती है। इसलिए यह एक बड़ा और मुश्किल काम है।”
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के केंद्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान केंद्र, पोर्ट ब्लेयर के वरिष्ठ वैज्ञानिक (मछली और मत्स्य विज्ञान) किरुबा शंकर कोरल रीफ और मैंग्रोव जैसे महत्वपूर्ण व संवेदनशील स्थलों पर पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित मलबे के आकलन को बेहद जरूरी मानते हैं। उनके मुताबिक, ये क्षेत्र न सिर्फ व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रदान करते हैं, बल्कि अंडमान-निकोबार जैसी जगहों में पर्यटन पर निर्भर लोगों के लिए महत्वपूर्ण भी हैं।
उन्होंने बताया कि कोरल रीफ पर कचरे के जमाव और असर पर शोध सीमित हैं। ऐसे में यह जानना काफी मुश्किल है कि प्रदूषण कितना फैला है और कौन सी चट्टानें सबसे ज्यादा खतरे में हैं। शंकर कहते हैं, “यह खासतौर पर चिंताजनक है क्योंकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में देखी गईं कोरल ब्लीचिंग जैसी चरम घटनाएं बढ़ रही हैं। यह कोरल पर प्लास्टिक कचरे के हानिकारक असर को और बढ़ा सकती हैं।”
एडवर्ड ने बताया, “ज्यादातर नुकसान स्थायी होता है। लेकिन कभी-कभी खंडित कोरल समूह अलग समूह के रूप में विकसित हो जाते हैं, जिस कारण यह नुकसान अस्थायी हो जाता है।”
किरूबा शंकर भी इससे सहमत हैं। वह समझाते हुए कहते हैं, “समुद्र तट की सफाई की तुलना में, अगर देखें, तो पानी के नीचे से मलबा हटाने का काम कम ही किया जाता और इस वजह से स्थायी नुकसान की संभावना अधिक हो जाती है।”

मन्नार की खाड़ी की रीफ भी खतरे में
एसडीएमआरआई ने मन्नार की खाड़ी में समुद्री कचरे से प्रभावित 1,152 वर्ग मीटर क्षेत्र को नुकसान पहुंचने का अनुमान लगाया है। इस खाड़ी में 21 द्वीप शामिल हैं, जहां चारों ओर रीफ फैली हुई हैं।
साल 2023 के एक अध्ययन के अनुसार, मन्नार की खाड़ी में समुद्री कचरे का लगभग 43% हिस्सा मछली पकड़ने के जालों का है। एडवर्ड ने कहा, “नया अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करता है। अंडमान और निकोबार में कबाड़ हो चुके प्लास्टिक जाल की समुद्री कचरे में हिस्सेदारी लगभग 34% है।”
मन्नार की खाड़ी में हुए अध्ययन में यह भी पाया गया कि समुद्री कचरे के संपर्क में आने वाले 47.56% कोरल खंडित हो गए थे और 34% के टिशू को नुकसान पहुंचा था। वह आगे कहते हैं, “सही तरीके से तुलना करने के लिए, सिर्फ कुछ गिने-चुने क्षेत्रों में नहीं बल्कि भारत में मौजूद सभी मूंगा चट्टानों का विस्तृत मूल्यांकन किया जाना चाहिए। सटीक निष्कर्षों के लिए एक ही प्रोटोकॉल का इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है। इसके अलावा, कोरल में मैक्रोप्लास्टिक की मात्रा का भी आकलन या अनुमान लगाया जाना चाहिए।”
शुरुआती संकेत
किरूबा शंकर और उनके सहयोगियों ने 2023 में ‘रीजनल स्टडीज इन मरीन साइंस’ में एक अध्ययन प्रकाशित किया था, जो कार निकोबार से समुद्री कचरे को व्यवस्थित तरीके से मापने और वर्गीकृत करने का पहला रिकॉर्ड है। समुद्री कचरे के बारे में बहुत कम आधारभूत जानकारी है। इसलिए वैज्ञानिकों की एक टीम ने ‘समुद्री कचरा कहां तक और कितना फैला हुआ है’ इसका अध्ययन करने के लिए कार निकोबार के 10 समुद्र तटों का सर्वे किया।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थानों ‘पोर्ट ब्लेयर स्थित केंद्रीय द्वीप कृषि अनुसंधान संस्थान और वडोदरा स्थित केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान’ के वैज्ञानिकों ने नागपट्टिनम के एम.जी.आर. फिशरीज कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर सर्वे किया। इस सर्वे में कुल 1438 अपष्टि पदार्थ पाए गए, जिनमें प्लास्टिक का मलबा सबसे ज्यादा (83.72%) था। प्लास्टिक के जाल और रस्सियों की मात्रा सबसे अधिक (38.87%) थीं, इसके बाद प्लास्टिक बैग, बोतलें, पॉलीप्रोपाइलीन के बुने हुए बैग, प्लास्टिक कैन, फ्लोटर और प्लास्टिक के कप थे।
आधे से ज्यादा कचरा भूमि-आधारित था, जो तटीय और मनोरंजन के लिए की जाने वाली गतिविधियों से आया था। समुद्री स्रोत यानी जहाज, मछली पकड़ना और कचरा फेंकने जैसी गतिविधियों से होने वाले कचरे का हिस्सा 45% था।
समुद्र तट पर जमा कचरे के अलावा, कार निकोबार में समुद्र तटों के आस-पास और अन्य जगहों का कचरा भी काफी मात्रा में पाया गया है। अध्ययन बताता है कि चक्रवात, भारी बारिश और हवा के पैटर्न जैसी वार्षिक प्रतिकूल घटनाओं के कारण प्लास्टिक मलबे का जमीन से समुद्र की ओर बहकर आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।
सर्वे में इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया, म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों से संबंधित प्लास्टिक कचरा पाया गया था। वैज्ञानिकों का मानना है कि निकोबार द्वीप समूह मलक्का जलडमरूमध्य (जो दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग मार्गों में से एक है) के काफी करीब है और इस कारण जहाजों से आने वाला मलबा विदेशी कचरे का संभावित स्रोत हो सकता है।

कचरा कम करने के उपाय
किरूबा शंकर कहते हैं कि कोरल रीफ के आस-पास कचरा कम करने की रणनीतियों में जिम्मेदार पर्यटन, जागरूकता अभियान और प्रशिक्षित गोताखोरों के जरिए पानी के नीचे सफाई कार्यक्रमों को लागू करने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
एक द्वीप समूह होने के नाते, समुद्री पर्यटन अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की अर्थव्यवस्था का एक मुख्य आधार है, जिसमें कोरल रीफ और मैंग्रोव मुख्य आकर्षण हैं। “इसलिए, यह सुनिश्चित करना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए कि इन पारिस्थितिकी तंत्रों को इंसानी गतिविधियों के कारण होने वाले नुकसान से बचाते हुए स्थायी रूप से प्रबंधित किया जाए।”
कचरे को कम करने और रीफ की सुरक्षा के लिए शिव शंकर मछुआरों और तटीय समुदायों को इस बारे में जागरूक करने की सलाह देते हैं।
वहीं, एडवर्ड समझाते हुए कहते हैं, कोरल रीफ क्षेत्रों से मलबा हटाने का काम हमेशा वैज्ञानिक गोताखोरों से ही करवाया जाना चाहिए, न कि किसी नौसिखिए शौकिया गोताखोर से।” वैज्ञानिक गोताखोर चट्टानों को नुकसान पहुंचाए बिना सावधानी से कचरा हटा सकते हैं।
वह मछुआरों को समुद्र में फेंके गए जालों को इकट्ठा करने के लिए प्रशिक्षण और आर्थिक लाभ देने का भी सुझाव देते हैं।
किरुबा शंकर की टीम की रिपोर्ट में कहा गया है कि इंसानी गतिविधियों की वजह से प्लास्टिक कचरे की अनदेखी एक अहम मसला है जिस पर नीतिगत स्तर पर चर्चा की जानी चाहिए। समुद्र से घिरा द्वीप होने और लॉजिस्टिक्स संबंधी (सामग्री पहुंचाने) बाधाओं के कारण यहां कचरा प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो सकता है। टीम का सुझाव है कि जहाजों से आए मलबे के अलावा, कार निकोबार द्वीप से निकलने वाले स्थानीय कचरे की पहचान करके, उपयुक्त अपशिष्ट प्रबंधन तरीकों के जरिए उसका सही ढंग से निपटान किया जाना जरूरी है।
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वैज्ञानिकों का कहना है कि सबसे अच्छा तरीका स्थानीय हितधारकों को कचरा प्रबंधन प्रक्रिया में शामिल करना है, जिसमें प्लास्टिक कचरे को व्यवस्थित तरीके से इकट्ठा करना और उसे रीसायकल करना शामिल हो।
वह प्लास्टिक से बनी चीज़ों का इस्तेमाल कम से कम कम करने और पर्यावरण के अनुकूल सामग्री में पैक किए गए उत्पादों को बढ़ावा देने की भी बात करते हैं। उन्होंने कहा, “कार निकोबार में प्लास्टिक के मलबे की समस्या से निपटने के लिए सबसे जरूरी उपाय संबंधित हितधारकों को साथ लाना और समुद्र पर प्लास्टिक के मलबे के बुरे असर के बारे में जनता और समुद्र से जुड़े हितधारकों के बीच जागरूकता और जानकारी फैलाना है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 19 सितंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: एक वैज्ञानिक पर्ल और हर्मेस एटोल में कोरल रीफ में फंसे हुए ‘घोस्ट नेट’ को इकट्ठा कर रहे हैं। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सर्वे किए गए समुद्री कचरे का एक-तिहाई हिस्सा कबाड़ हो चुके मछली पकड़ने के उपकरणों का था। (प्रतीकात्मक तस्वीर: NOAA, विकिमीडिया कॉमन्स (पब्लिक डोमेन)