- एलईडी लाइट के बढ़ते इस्तेमाल से चमक में हर साल 10% की वृद्धि हो रही है, जो वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा है। इससे इंसानों के साथ-साथ वन्यजीवों और अंधेरे आसमान के लिए भी खतरा पैदा हो रहा है।
- हालांकि एलईडी लाइट ऊर्जा की खपत कम करती हैं, लेकिन इनसे निकलने वाली नीली रोशनी पुराने लैंप की तुलना में आकाश में कहीं अधिक चमक (स्काई ग्लो) पैदा करती है। कम कीमत के कारण शहरों में इनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
- विशेषज्ञों द्वारा पारिस्थितिकी और मानवीय खतरों की चेतावनी दिए जाने के बावजूद, भारत में चमक और बाहरी प्रकाश व्यवस्था के मानकों पर कोई स्पष्ट सीमाएं नहीं हैं।
मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर से जंगल तक रोज़ाना गाड़ी चलाने वाली प्रकृतिवादी (नेचुरलिस्ट) निकिता खम्परिया धूल या कोहरे से नहीं, बल्कि एलईडी हेडलाइट्स की चकाचौंध से परेशान हैं। पहले यह रास्ता सुगम था, लेकिन अब खतरनाक हो गया है। गाड़ियों की तेज रोशनी (हाई बीम) उन्हें कुछ समय के लिए अंधा बना देती है। ऐसे समय में वह ब्रेक लगाकर, सामने से आने वाली गाड़ियों के गुजरने तक इंतज़ार करती हैं और फिर आगे का सफर तय करती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह सड़क पर एक संवेदी खतरा (सेंसरी हैज़र्ड) है। दुनिया भर के ड्राइवरों ने देखने की क्षमता को बाधित करने वाले अपने ऐसे कई अनुभवों का जिक्र किया है, जो कुछ मामलों में दुर्घटना का कारण बन जाते हैं।
डॉ. मारियो मोटा एक कार्डियोलॉजिस्ट और शौकिया एस्ट्रोनॉमर हैं। उन्होंने अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (AMA) के लिए रात में रोशनी से संबंधित पॉलिसी बनाने में मदद की है। वह कहते हैं, “जिस कारण से सूर्यास्त लाल दिखाई देता है, उसी कारण से छोटी तरंग दैर्ध्य (शॉर्ट वेवलेंथ) वाले रंग पहले बिखर जाते हैं, जबकि लंबी तरंग दैर्ध्य वाले रंग ज्यादा दूर तक जाते हैं। मानवीय आंख में लाल रंग की तुलना में नीली रोशनी दस गुना अधिक बिखरती है।” उन्होंने आगे कहा, “उम्र बढ़ने के साथ-साथ चकाचौंध से होने वाली परेशानी भी बढ़ती जाती है।”

विशेषज्ञों का कहना है कि कृत्रिम रोशनी के बढ़ते इस्तेमाल से इंसानों के साथ-साथ वन्यजीवों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंच रहा है।
एलईडी लाइट लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर असर डाल रही हैं। नीली रोशनी नींद लाने वाले हार्मोन ‘मेलाटोनिन’ को कम करने के लिए जानी जाती है। हार्वर्ड के एक अध्ययन में पाया गया कि यह हरे रंग की रोशनी से दोगुनी असरदार थी। एक अन्य प्रयोग में, केवल दो घंटे तक एलईडी टैबलेट के संपर्क में रहने से मेलाटोनिन का स्तर 55% तक कम हो गया और सर्कैडियन लय (शरीर की प्राकृतिक घड़ी) 1.5 घंटे आगे खिसक गई, जबकि कम रोशनी में किताब पढ़ने पर ऐसा नहीं हुआ।
डॉ. मोटा आगे कहते हैं, “नीली रोशनी की हर अतिरिक्त मात्रा मेलाटोनिन के उत्पादन को और कम कर देती है और बिगड़ी हुई सर्कैडियन लय से क्रोनिक फटीग सिंड्रोम, मोटापा, डिप्रेशन और अन्य मानसिक बीमारियां हो सकती हैं।”
जब शरीर की अंदरूनी घड़ी (इंटरनल क्लॉक) वातावरण के तालमेल से बाहर हो जाती है, तो यह डीएनए की मरम्मत, हार्मोन संतुलन, मेटाबॉलिज्म और रोग प्रतिरोधक क्षमता जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को बाधित कर सकती है। इस असंतुलन की वजह से अक्सर एंडोक्राइन से संबंधित कैंसर हो जाते हैं। एक बड़ी, मल्टी कंट्रोल स्टडी में पाया गया कि रात के समय कृत्रिम रोशनी (ALAN), खासतौर पर नीले स्पेक्ट्रम वाली रोशनी के संपर्क में आने पर स्तन कैंसर का खतरा 47% और प्रोस्टेट कैंसर का खतरा 105% तक बढ़ जाता है। डॉ. मोटा के अनुसार, कम से कम 24 अलग-अलग अध्ययनों ने इस बात की पुष्टि की है कि दोनों के बीच संबंध है।
लेकिन, कृत्रिम रोशनी सिर्फ इंसानों को ही परेशान नहीं करती
समुद्री कछुए के लगभग 88% नवजात बच्चे (हैचलिंग), जो दिशा जानने के लिए चंद्रमा की रोशनी वाले क्षितिज पर निर्भर करते हैं, कृत्रिम रोशनी मिलने पर जमीन की ओर रेंगने लग जाते हैं और मर जाते हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि एलईडी स्ट्रीट लैंप के नीचे पतंगों के लार्वा की संख्या बिना रोशनी वाले इलाकों की तुलना में 52% तक कम हो गई है। सफेद एलईडी लाइटों के पास चमगादड़ों द्वारा भोजन की तलाश करने वाली गतिविधि में भारी कमी आई है, नतीजतन प्रति पौधा फलों की संख्या कम हो गई। जबकि 70% से ज्यादा पतंगे फूलों वाले पौधों की तरफ जाने के बजाय स्ट्रीट लैंप की ओर खिंचे चले गए। इससे मधुमक्खियों के सोने के पैटर्न भी बाधित हुए हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो कृत्रिम नीली रोशनी पोलिनेटर्स के लिए भी खतरा है। इनकी संख्या कम हो जाने से वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
यूके के लाइटिंग डिजाइन विशेषज्ञ और सलाहकार इयान मैक्रे कहते हैं, “गर्म (पीली) रोशनी अपने साथ कई परेशानियां लेकर आती है, जैसे बगीचे में घोंघे और स्लग का आना। हालांकि नीली रोशनी का कम इस्तेमाल करना एक बेहतरीन शुरुआत है। लेकिन भविष्य में रोशनी का इस्तेमाल तभी किया जाए, जब उसकी जरूरत हो।”
चेतावनियों के बावजूद कानूनी कार्रवाई न के बराबर
खगोलविदों ने 20वीं सदी की शुरुआत में ही प्रकाश प्रदूषण पर ध्यान देना शुरू कर दिया था। वेटिकन ऑब्जर्वेटरी को रोम से हटाकर कैसल गैंडोल्फो में पोप के निवास स्थान पर ले जाया गया, क्योंकि स्काईग्लो (वायुमंडल में कृत्रिम रोशनी के कारण बनने वाली चौंध या धुंधलापन) उनके अवलोकन में बाधा डाल रही थी। बाद में इसी वजह से उसे अमेरिका के एरिजोना में स्थानांतरित कर दिया गया था।
95 सालों से अधिक समय बीत जाने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस समस्या को पहचाने जाने के बावजूद ज्यादातर देशों में “प्रकाश प्रदूषण” को कानूनी तौर पर परिभाषित नहीं किया गया है। इसमें भारत भी शामिल है, जहां ज्यादातर आबादी रोशनी से प्रदूषित आसमान के नीचे रहती है।
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इतिहास में झांकने पर पता चलेगा कि रात के आकाश का अधिक चमकीला होना कृत्रिम प्रकाश के शुरुआती रूप गैस लैंप से शुरू हुआ था। बिजली के आने से यह समस्या और ज्यादा हो गई और जैसे-जैसे प्रकाश नीला होता गया, यह एक अनियंत्रित समस्या बन गई।
मैक्रे समझाते हैं, “प्रकाश के लिए मानक तय होने में, शोध होने के बाद भी बहुत समय लग जाता है और ये मानक अक्सर निर्माता कंपनियों के हितों से बहुत प्रभावित होते हैं। भले ही फोटोमेट्री (जो प्रकाश को मापने का विज्ञान है) अभी तक यह नहीं बता पाई हो कि मनुष्य वास्तव में चमक का अनुभव कैसे करते हैं या चमक के प्रभाव को पूरी तरह से माप न पा रहे हो, फिर भी इस बारे में जो चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
बहुत ज्यादा रोशनी वाले शहरों की कीमत
पहले ऐसा माना जाता था कि शुरुआती एलईडी लाइट, जो ज्यादा नीली या “ठंडी” रोशनी देती हैं (जिन्हें केल्विन में मापा जाता है) बिजली की खपत कम करती हैं। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। वैसे देखा जाए, तो एलईडी अपने आप में खराब नहीं हैं, बल्कि वे दक्षता के मामले में पुरानी तकनीकों से कहीं बेहतर हैं क्योंकि इनमें बहुत कम बिजली ऊष्मा में परिवर्तित होती है और ज्यादा रोशनी देती हैं। पुरानी लाइटों की तुलना में लंबी चलती हैं, बेहतर रोशनी देती हैं और उन्हें रीसायकल करना भी आसान है।
लेकिन एलईडी का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल चिंता का विषय है। भले ही ज्यादा रोशनी देने की वजह से कम लाइटों से भी किसी क्षेत्र को रोशन किया जा सकता है, लेकिन एलईडी के किफायती होने के कारण वे ज्यादा सुलभ हो गईं और इसी वजह से उनका व्यापक रूप से इस्तेमाल होने लगा है। सिर्फ पारंपरिक बल्बों से एलईडी पर स्विच करने से ही, बिना एक भी नई लाइट लगाए स्काईग्लो बढ़ जाता है। एक 2014 के अध्ययन में पाया गया कि 5100K (जिसे आम भाषा में “दिन का प्रकाश” या न्यूट्रल व्हाइट कहा जाता है) पर एक एलईडी लैंप, पुरानी लो-प्रेशर सोडियम लाइट की तुलना में लगभग आठ गुना ज़्यादा आकाश में चमक पैदा करता है।
भारत के शहरी क्षेत्रों में एलईडी लाइटों का बोलबाला है। प्रकाश प्रदूषण बिखरी हुई रोशनी का एक गुंबद बनाता है जो हमें खगोलीय पिंडों को देखने से रोकता है। यह गुंबद बड़े आबादी वाले इलाकों के ऊपर स्थित होता है। शहर जितना बड़ा होता है, यह गुंबद उतना ही ज्यादा चमकीला और घना होता जाता है।

श्वेता कुलकर्णी डार्क-स्काई की जानी-मानी एडवोकेट और रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी (FRAS) की फेलो हैं। उन्होंने जुलाई में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें महाराष्ट्र के रात के आसमान की चमक में हुई बढ़ोतरी का मात्रात्मक विश्लेषण किया गया था।
कुलकर्णी ने कहा, “पुणे में, अब मुझे रोशनी में डूबे हर फ्लाईओवर का नकारात्मक पहलू दिखाई देता है।” सैटेलाइट डेटा से पता चलता है कि शहर का रात का आसमान महज एक दशक में लगभग 50% अधिक चमकीला हो गया है, जबकि मुंबई पहले से ही देश के सबसे चमकीले शहरों में से एक है। वह आगे कहती हैं, “पुणे के आसमान की चमक 2012 में 31.6 nW cm⁻² sr से बढ़कर 2024 में 47.4 nW cm⁻² sr हो गई, जबकि मुंबई पहले ही 51 nW cm⁻² sr को पार कर चुका है।”
कुलकर्णी के मुताबिक, भारत में रात के आसमान की चमक हर साल 10% की दर से बढ़ रही है यानी ग्लोबल औसत से लगभग 2% ज्यादा तेजी से। यह अंधेरे को ही मिटा रही है, जो धरती की कम से कम 60% प्रजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन है।
उनके शोध से पता चलता है कि एलईडी के बढ़ते उपयोग, शहरों का तेजी से विकास और बढ़ते टूरिज्म इन्फ्रास्ट्रक्चर की वजह से पूरे महाराष्ट्र में स्काईग्लो यानी रात के आकाश में फैली कृत्रिम रोशनी का फैलाव बढ़ रहा है। विद्युत आपूर्ति और परिवहन उपक्रम (BEST) के डिप्टी चीफ इंजिनियर (स्ट्रीट लाइटिंग) श्री एस.एन. इंचनालकर कहते हैं, “मुंबई की स्ट्रीट लाइट्स में अब लगभग 99.80% एलईडी लगी हैं।” क्षेत्र की विशेष प्रकाश आवश्यकता के आधार पर ये लैंप या तो वार्म व्हाइट (2700–3300K) या कूल व्हाइट (4500–5700K) होते हैं।
बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के चीफ इंजीनियर (मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल) के.एच. पेरेकर ने बताया कि एलईडी के प्रभाव को कम करने के लिए, अब स्मार्ट, सेंसर वाली लाइटें लगाईं गई हैं जो देर रात और सुबह के शुरुआती घंटों में कम तीव्रता पर मंद हो जाती हैं। उन्होंने आगे कहा, ” हालांकि, कानून-व्यवस्था संबंधी चिंताओं के कारण, इसका प्रयोग कुछ आंतरिक क्षेत्रों और प्रशासनिक कार्यालयों तक ही सीमित है।”
मुंबई में एक केंद्रीकृत नियंत्रण प्रणाली भी है जो दूर से लाइटों को चालू या बंद करने और तकनीकी खराबी की निगरानी करने की अनुमति देती है। लेकिन इसके बावजूद, अभी तक कोई कानूनी स्पेक्ट्रल या ल्यूमिनेंस सीमा निर्धारित नहीं है।
गुजरात में किए गए एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि पिछले एक दशक में, 2013 से 2024 तक, अहमदाबाद में रात की रोशनी की तीव्रता में 60%, सूरत में 45% और वडोदरा में 41% की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट कहती है, “2014 से 2023 तक, तीनों शहरों में कृत्रिम रोशनी से होने वाली चमक की प्रवृति में लगातार ऊपर की ओर रुझान दिखा, जिसमें मानसूनी बादलों के कारण जुलाई से सितंबर तक के मौसमी उतार-चढ़ाव भी देखे गए।” रिपोर्ट आगे कहती है, “ये नतीजे मौसमी बदलाव और लंबे समय से वृद्धि के बीच परस्पर संबंधों को दिखाते हैं, जो शहरी क्षेत्रों में रोशनी प्रदूषण की गंभीरता को उजागर करता है और शहरी नियोजन व संसाधन प्रबंधन रणनीतियों को बताने के लिए डेटा-आधारित हस्तक्षेपों की आवश्यकता पर जोर देता है।”
तेज रोशनी वाली एलईडी चकाचौंध पैदा कर सकती हैं और आंखो में ब्लाइंड स्पॉट बना सकती हैं। कुलकर्णी ने समझाते हुए कहा, आधुनिक एलईडी कार लैंप पुराने हैलोजन लैंप की तुलना में 10 गुना तक ज्यादा चमकदार हो सकती हैं, लेकिन भारत में संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित चकाचौंध सीमा जैसे कोई मानक नहीं हैं। इसी तरह, एक एलईडी बिलबोर्ड भी अत्यधिक चमक (50m2 बिलबोर्ड के लिए 90,000 लुमेन) उत्सर्जित कर सकता है, उसके बावजूद अधिकांश नगरपालिका कानूनों में इसके लिए कोई मानक निर्धारित नहीं किए गए हैं।

यूसीएलए इंस्टीट्यूट ऑफ द एनवायरनमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी में सहायक प्रोफेसर और पारिस्थितिकीविद ट्रैविस लॉन्गकोर ने बताया, “बाहरी प्रकाश 2200K से ज्यादा नहीं होना चाहिए, जब तक कि कोई विशेष कलर रेंडरिंग (प्राकृतिक सूर्य के प्रकाश की तुलना में किसी प्रकाश स्रोत द्वारा रंगों को कितनी सटीकता से दिखाया जाता है) जरूरी न हो। लॉन्गकोर ने ही “पारिस्थितिक प्रकाश प्रदूषण” शब्द गढ़ा था। वह कहते हैं, “पेशेवर खेल स्टेडियमों में खेल के दौरान जैसी असाधरण रूप से सीमित परिस्थितियों को छोड़ दें, तो 5000K की बाहरी लाइटों का उपयोग करने का कोई औचित्य नहीं है।” इसके अलावा, बेहद अनियंत्रित प्रकाश को कम करने के कई जाने-माने तरीके भी हैं, जो सभी मौजूदा उपकरणों के साथ काम कर सकते हैं।
न्यूकैसल यूनिवर्सिटी में इकोलॉजी और कंजर्वेशन के प्रोफेसर और पतंगे के लार्वा पर किए गए अध्ययन के सह-लेखक डैरेन इवांस ने कहा, “हमें यकीन है कि एलईडी के नुकसानदायक असर को खास तौर पर स्पेक्ट्रल ट्यूनिंग के ज़रिए ठीक किया जा सकता है, इसके अलावा शील्डिंग, डिमिंग और मोशन सेंसर एक्टिवेशन जैसे उपाय भी कारगर साबित हो सकते हैं। ये रातभर अनावश्यक प्रकाश उत्सर्जित करने के बजाय, सिर्फ जरूरत पड़ने पर ही रोशनी या प्रकाश देने का एक आसान तरीका है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 8 सितंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: प्रकाश के लिए मानक तय होने में, शोध होने के बाद भी बहुत समय लग जाता है और ये मानक अक्सर निर्माता कंपनियों के हितों से बहुत प्रभावित होते हैं। तस्वीर-श्रीनिवास शंकरन