- भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा और जस्ट ट्रांज़िशन की बात करता है, लेकिन बिजली उत्पादन में कोयला ही मुख्य आधार बना हुआ है। नवीकरणीय क्षमता बढ़ने के बाद भी कोयले की खपत घट नहीं रही।
- छत्तीसगढ़ में पिछले दो दशकों में कोयला उत्पादन तेज़ी से बढ़कर लगभग चार गुना हो गया है। राज्य की अर्थव्यवस्था और रोजगार बड़े पैमाने पर कोयले पर निर्भर हैं। लेकिन कोयला खनन से जंगल कटे, गांव विस्थापित हुए, प्रदूषण बढ़ा और यह सिलसिला जारी है।
- कोयला-निर्भर क्षेत्रों के भविष्य के लिए वैकल्पिक रोजगार और आर्थिक बदलाव की कोई स्पष्ट योजना नहीं है। इसलिए किसी भी विपरीत स्थिति में, सबसे बड़ा झटका कोयला खनन वाले इलाकों में रहने वाली आबादी को ही झेलना होगा।
पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय जलवायु राजनीति की भाषा तेज़ी से बदली है। फॉसिल फ्यूल फेजआउट, जस्ट एनर्जी ट्रांज़िशन और नेट-ज़ीरो जैसे शब्द केंद्रीय हो चुके हैं। इस वर्ष ब्राज़ील के बेलम आयोजित संयुक्त राष्ट्र के जलवायु अधिवेशन (COP) में अनुकूलन और न्यायपूर्ण संक्रमण जैसे विषय, जो विकासशील देशों की प्राथमिकताएं हैं, केंद्र में रहे। मुख्य मुद्दा उस वित्तीय सहयोग को लेकर था, जिसकी विकासशील देशों को सख्त आवश्यकता है। भारत भी अलग-अलग मंचों पर जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने, अक्षय ऊर्जा क्षमता बढ़ाने और जस्ट ट्रांज़िशन की ज़रूरत स्वीकार करता रहा है। लेकिन वैश्विक वादों की ज़मीनी हक़ीक़त ये है कि इस साल क्लाइमेट चेंज परफॉर्मेंस इंडेक्स में भारत, 10वें स्थान से फिसलकर 23वें स्थान पर आ गया है।
भारत सरकार का दावा है कि स्थापित बिजली क्षमता में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी साल 2030 की तय समय सीमा से पांच साल पहले ही दोगुनी से अधिक हो चुकी है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार, इस साल 30 जून तक भारत की स्थापित विद्युत क्षमता 484.82 गीगावॉट थी, जिसमें से 50 फीसदी से अधिक, 242.78 गीगावॉट क्षमता गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित थी। लेकिन भारत की कुल ऊर्जा खपत का करीब 75 फीसदी उत्पादन आज भी कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों से ही हो रहा है। अक्टूबर 2025 की केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की रिपोर्ट बताती है कि गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन, कुल बिजली उत्पादन का महज 26.83 फीसदी ही था। ऐसे में यह अनायास नहीं है कि भारत में कोयला उत्पादन भी कम होने के बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है।
आंकड़े बताते हैं कि कोयले पर निर्भरता कम करने के दावे के बीच सरकार अगले दशक में 97 गीगावॉट की नई कोयला आधारित विद्युत क्षमता जोड़ने की योजना पर काम कर रही है, जिससे मौजूदा क्षमता में लगभग 44% की वृद्धि होगी।
वादे, दावे और हकीकत की इस उलझन को समझने के लिए छत्तीसगढ़ एक आदर्श उदाहरण है। यह राज्य भारत के सबसे बड़े कोयला उत्पादक राज्यों में शुमार है और जिसकी अर्थव्यवस्था, राजस्व और रोज़गार का बड़ा हिस्सा अब भी कोयला-आधारित मॉडल पर टिका हुआ है। छत्तीसगढ़ की ज़मीन पर लगातार नई खदानें खुल रही हैं, कोयला खदानों की नीलामी हो रही है, वन-पर्यावरण मंजूरी दी जा रही है और साल दर साल उत्पादन लक्ष्य बढ़ाए जा रहे हैं।
छत्तीसगढ़ 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग होकर नया राज्य बना। जिस भूगोल के साथ नए राज्य का जन्म हुआ, वह घने वनों, खनिज संसाधनों और विस्तृत कोयला खदानों से भरा हुआ था। नई राज्य सरकारों के सामने विकास का सबसे आसान रास्ता यही दिखा- खनिज, विशेषकर कोयला को राजस्व और औद्योगिक विकास की मुख्य धुरी बना देना।

चार गुना हो गया उत्पादन
राज्य के गठन के ठीक पहले, यानी 1998-99 में छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश का संयुक्त कोयला उत्पादन 84.89 मिलियन टन के दायरे में था। भारत सरकार की एक रिपोर्ट बताती है कि 2001-02 में छत्तीसगढ़ में कोयला उत्पादन 53.621 मिलियन टन था, उस समय कोरबा, चिरमिरी, सोनहत, विश्रामपुर जैसी कुछ बड़ी खदानें उत्पादन की रीढ़ थीं। अगले कुछ सालों में जैसे-जैसे नई खदानें मंज़ूर होती गईं और पुरानी खदानों का विस्तार होता गया, उत्पादन की रफ़्तार तेज़ होती चली गई। साल 2010-11 के उपलब्ध आधिकारिक आँकड़े दिखाते हैं कि छत्तीसगढ़ में सालाना कोयला उत्पादन 113.825 मिलियन टन पहुंच गया। यानी राज्य बनने के पहले दशक में ही कोयला उत्पादन लगभग दोगुना हो गया।
इसके बाद दूसरा उछाल 2014 के बाद की नीतिगत दिशा से जुड़ता है, जब कोयला खदान नीलामी और निजी भागीदारी को आक्रामक रूप से बढ़ावा मिला। इस दौर में न सिर्फ़ कोयला खदानों की नीलामी बढ़ी, बल्कि जिन क्षेत्रों को 2010 तक ‘नो-गो’ या संवेदनशील माना गया था, वहाँ तक खनन दबाव पहुँचा। हसदेव अरण्य जैसे क्षेत्र में कोल ब्लॉक आवंटन और ग्राम सभाओं के विरोध की समानांतर कहानियां इसी समय तेज़ हुईं।
साल 2024 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ का वार्षिक कोयला उत्पादन 207.26 मिलियन टन के बीच पहुंच चुका है। इसका मतलब यह है कि पिछले 24 सालों में, छत्तीसगढ़ में कोयला उत्पादन लगभग चार गुना हो चुका है। इसी दौरान यानी 2000-2001 में देश का कोयला उत्पादन 313.70 मिलियन टन था, जो 2024-25 में 1047.69 मिलियन टन तक जा पहुंचा।
कोयला आयात की बात करें तो 2013-14 में देश में कुल 166.857 मिलियन टन कोयला आयात किया गया था। अगले साल यानी 2014-15 में यह आंकड़ा 212.103 मिलियन टन पहुंच गया। साल 2018 तक यह आंकड़ा ऊपर-नीचे होता रहा लेकिन 2019-20 में भारत ने 248.537 मिलियन टन कोयला आयात कर एक नया रिकॉर्ड बना लिया। 2020-21 में कुल 215.25 मिलियन टन, 2021-22 में 208.93, 2022-23 में 237.67, 2023-24 में 264.53 और 2024-25 में 243.63 मिलियन टन कोयला आयात किया गया। यानी पिछले पांच सालों में कोयला आयात की मात्रा कम होने के बजाय और बढ़ गई है। इस दौरान कोयले के निर्यात की बात करें तो 2013-14 में यह 2.18 मिलियन टन था, जो 2022-23 में घट कर 1.16 मिलियन टन रह गया।
इसी तरह नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी की बात करें तो छत्तीसगढ़ के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। भारत सरकार की रिपोर्ट के अनुसार इस साल अक्टूबर में छत्तीसगढ़ में 366.85 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन गैर-जीवाश्म ईंधन से हुआ। जबकि पिछले साल यानी अक्टूबर 2024 में यह उत्पादन 367.52 मिलियन यूनिट था। जिस सौर ऊर्जा से बिजली उत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन का दावा किया जा रहा है, अक्टूबर 2024 में उससे 127.78 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ था, जो अक्टूबर 2025 में थोड़ा घट कर 127.55 मिलियन यूनिट हो गया।

फेज आउट बनाम बढ़ता उत्पादन
दुनिया भर में जब फॉसिल फ्यूल फेज आउट या फेज डाउन की बात होती है, तो उसका मतलब यह होता है कि समय के साथ कोयला उत्पादन पहले स्थिर होगा और फिर घटता जाएगा। लेकिन छत्तीसगढ़ का अनुभव इस धारणा के उलट है। छत्तीसगढ़ के आंकड़े बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जैसे-जैसे घोषणाएँ कड़ी होती गईं, लगभग उसी दौर में राज्य में कोयला उत्पादन भी बढ़ता चला गया। (देखें-बॉक्स)
आंकड़े बताते हैं कि कोल इंडिया लिमिटेड की 7 सहायक कंपनियों ने अकेले 2024 में 2,61,019.644 हेक्टेयर ज़मीन का अधिग्रहण किया। इसमें पूरे देश में सर्वाधिक 57,571.70 हेक्टेयर ज़मीन साऊथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड ने किया, जो छत्तीसगढ़ में काम करती है।
लेकिन तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। पहला तो यही कि भारत की बिजली व्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब भी कोयला आधारित है और बिजली उत्पादन में छत्तीसगढ़ की खदानों की भूमिका केंद्रीय है। कोल इंडिया और उसकी सहायक कंपनियां, साथ ही निजी खनन कंपनियां, इस उत्पादन संरचना को चलाती हैं। दूसरा, राज्य सरकारों के लिए कोयला रॉयल्टी, जिला खनिज फाउंडेशन फंड और खनन से जुड़ी अन्य वसूली राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। तीसरा, स्थानीय स्तर पर कोयला खदान इलाके की पूरी अर्थव्यवस्था यानी परिवहन, ठेकेदारी, खान मजदूरी, कोयला धुलाई, छोटे-मोटे व्यापार सब इसी छोर पर टिका है।
हालांकि कोयला-उत्पादक जिलों के सामाजिक-आर्थिक संकेतक बिजली उपभोग करने वाले विकसित राज्यों की तुलना में काफी पीछे हैं। इसके बाद भी जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह कहा जाता है कि अब कोयले का उपयोग कम करना होगा तो छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के सामने यह सवाल सामने आ खड़ा होता है कि अगर कोयला कम होगा, तो हमारी अर्थव्यवस्था और रोज़गार कैसे चलेंगे?
सच तो यही है कि इस सवाल का कोई ठोस, योजनाबद्ध जवाब अभी तक दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि अल्पकालिक आर्थिक तर्क, लगातार दीर्घकालिक जलवायु और सामाजिक न्याय के तर्कों पर भारी पड़ते जा रहे हैं।
यह सब तब है, जब कोयला उत्पादन में वृद्धि केवल उत्पादन के आंकड़ों या जीडीपी में योगदान की कहानी भर नहीं है, यह समानांतर रूप से विस्थापन, पर्यावरणीय क्षति और सामाजिक असुरक्षा की कहानी भी है। नई खदानों और विस्तार योजनाओं के लिए गरीब किसानों और आदिवासी समुदायों की ज़मीन अधिग्रहित हुई, जंगल काटे गए और सैकड़ों गांव पूरी तरह से विस्थापित कर दिए गए। जो गांव विस्थापित नहीं हुए, उनके चारों तरफ़ खदानों की घेराबंदी हो गई।
इन कोयला खदानों से विस्थापित ग्रामीणों को बेहतर ज़िंदगी के लिए मुआवजा, नौकरियां, घर, बुनियादी सुविधाओं के वादों से भरी पुनर्वास नीतियां काग़ज़ पर आकर्षक नज़र आती हैं लेकिन अधिकांश मामलों में अस्थाई रोजगार, अधूरा मुआवज़ा और सामाजिक सुरक्षा के अभाव एक स्थाई मुद्दा बना रहा है। इसके बाद भी जो लोग खनन, परिवहन और संबद्ध सेवाओं में काम करने लगे, उनकी आजीविका अब सीधी-सीधी कोयला अर्थव्यवस्था पर निर्भर है। इसका अर्थ यह है कि यदि भविष्य में कभी सचमुच कोयला उत्पादन घटाने की प्रक्रिया शुरू हुई, तो सबसे पहले झटका उसी आबादी को लगेगा, जो पहले ही अपनी ज़मीन और जंगल खो चुके हैं।
दूसरी तरफ़, कोरबा जैसी पावर हब कहलाने वाली जगहों पर प्रदूषण और स्वास्थ्य संकट, रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुका है। फ्लाई ऐश की परतें, धुएँ से भरा आसमान, भूजल पर दबाव और कई-कई किलोमीटर तक खेतों को अनुपजाऊ बनाती फैलती जाती राख, यह सब उस कथित विकास की वास्तविक क़ीमत है, जो कोयले के सहारे खड़ा किया गया है। स्थानीय निवासियों के लिए यह एक स्थायी द्वंद्व है, कोयला ने उन्हें रोजगार तो दिया है लेकिन उन्हें स्वस्थ और सुरक्षित जीवन नहीं दे पा रहा।
नीतिगत सन्नाटा
जस्ट एनर्जी ट्रांज़िशन का मूल विचार यह था कि भविष्य में उत्पादन घटेगा, तो किन वैकल्पिक रास्तों से रोज़गार, आय और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी, उसे ध्यान में रखते हुए कोयला-आधारित क्षेत्रों के लिए पहले से योजनाएं तैयार की जाएं। इसका मतलब कोयले की जगह सोलर प्लांट लगा देना नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, नई इंडस्ट्री, कौशल विकास और सामाजिक सुरक्षा के साथ एक समग्र आर्थिक पुनर्संरचना करना था।

भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तो इस विचार की भाषा को स्वीकार कर लिया लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे राज्य की वास्तविकता अलग कहानी कहती है। राज्य में सरकार चाहे जिस किसी की भी हो, नीति-निर्माण का केंद्रीय भाव यही बना रहा है कि कोयला अनिवार्य है और निकट भविष्य में इसकी जगह लेने वाला, कोई ठोस विकल्प दिखाई नहीं देता।
यही वजह है कि न तो 2030, 2040 या 2050 के लिए कोई स्पष्ट रोडमैप दिखता है कि छत्तीसगढ़ जैसे कोयला पर निर्भर राज्य की अर्थव्यवस्था तब कैसी होगी, और न ही कोयला राजस्व का कोई महत्वपूर्ण हिस्सा व्यवस्थित रूप से ‘कोयला शून्य भविष्य’ की योजना बनाने में निवेश किया जा रहा है। यही कारण है कि दुनिया भर के मंचों पर बार-बार दुहराया जाने वाले जस्ट ट्रांज़िशन, अब भी एक राजनीतिक वाक्य बना हुआ है, जो भारत को जलवायु न्याय की वैधता तो देता है लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की ज़मीन पर यह अब भी महज़ शाब्दिक आडंबर ही बना हुआ है।
छत्तीसगढ़ के कोयला विस्तार का एक महत्वपूर्ण आयाम यह है कि कई खदानें उन क्षेत्रों में प्रस्तावित या संचालित हैं, जो वन और जैव विविधता की दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं। हसदेव अरण्य इसका सबसे चर्चित उदाहरण है, जहां घने जंगल, हाथी कॉरिडोर, नदी तंत्र और समृद्ध पारिस्थितिकी के बीच कोयला खदानों का जाल बिछाने का सिलसिला जारी है।
पिछले दशक में इन क्षेत्रों में ग्राम सभाओं के ठोस विरोध, स्थानीय आंदोलनों, अदालतों की दखल और राजनीतिक दबाव की जटिल कहानियां सामने आयीं। कई बार परियोजनाएँ रोकी गईं, कई बार शर्तों के साथ आगे बढ़ीं, लेकिन अंततः बात इसी पर जा कर रुक गई कि कोयला ज़रूरी है और खनन करना ही होगा। यह वही तर्क है जो जलवायु न्याय की भाषा के ठीक विपरीत खड़ा दिखाई देता है।
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इन तमाम संरचनात्मक विरोधाभासों के बीच छत्तीसगढ़ की जनता, ख़ासकर कोयला खदान इलाके के लोग, एक गहरे द्वंद में जी रहे हैं। एक ओर अर्थव्यवस्था है और दूसरी ओर यही अर्थव्यवस्था उनके स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक ताने-बाने को लगातार कमजोर कर रही है। जस्ट ट्रांज़िशन की असली चुनौती यही है कि आर्थिक और पारिस्थितिक न्याय को एक साथ कैसे तय किया जाए, जब पूरी संरचना अल्पकालिक राजस्व और ऊर्जा सुरक्षा के तर्क पर बनी हो। इस बदलाव को नियोजित, न्यायपूर्ण और भागीदारीपूर्ण तरीके से संभाला जाए यानी अग्रिम योजना, वैकल्पिक उद्योग, कौशल विकास, सामाजिक सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी; तो छत्तीसगढ़ अपने कोयला-समृद्ध भूगोल से निकलकर एक नए, अपेक्षाकृत सतत विकास मॉडल की ओर बढ़ सकता है।
इनके अभाव में वैश्विक जलवायु दबाव, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की शर्तों या घरेलू नीति बदलाव के कारण अगर कोयला अर्थव्यवस्था पर अचानक रोक लगाने की स्थिति बनी तो सबसे ज़्यादा झटका इन्हीं कोयला खदान वाले इलाकों को लगेगा। ऐसे में छत्तीसगढ़ के पिछले 25 साल केवल कोयला वृद्धि के आंकड़ो के रूप में नहीं, बल्कि उस विकास मॉडल की चेतावनी-कथा के रूप में याद किए जाएंगे, जिसने तत्कालीन लाभ के लिए अपने ही भविष्य की ज़मीन खोद डाली।
बैनर तस्वीरः नई खदानों और विस्तार योजनाओं के लिए गरीब किसानों और आदिवासी समुदायों की ज़मीन अधिग्रहित हुई, जंगल काटे गए और सैकड़ों गांव पूरी तरह से विस्थापित कर दिए गए। तस्वीर- आलोक प्रकाश पुतुल/मोंगाबे