- बांबे हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान वाली जनहित याचिका के आधार पर जनवरी, 2025 में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए मुंबई की सभी बेकरी को कोयले और लकड़ी वाले ओवन की जगह स्वच्छ ईंधन इस्तेमाल करने का आदेश दिया था।
- इस काम के लिए बेकरी मालिकों को छह महीने का समय दिया गया था और फिर कुछ दिनों के लिए समयसीमा बढ़ाई गई। कई बेकरी स्वच्छ ईंधन को अपना रही हैं, लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि इस काम के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया है और बदलाव महंगा है।
- बेकरी संघों की दलील है कि उन्हें अनुचित रूप से निशाना बनाया जा रहा है, जबकि ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले बड़े स्त्रोतों पर कम पाबंदियां लगाई गई हैं।
मुंबईकर भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेनों में सफर करते हैं, लेकिन यहां की सुबह ज्यादातर पाव जैसी नरम ब्रेड से शुरू होती है।
सोलहवीं सदी में पुर्तगाली पाओ से बना पाव, सिर्फ खान-पान का हिस्सा नहीं है। यह रोज निभाई जेन वाली रस्म है जो शहर के मजदूरों, विक्रेताओं और परिवारों को एक साथ लाती है। पाव को पारंपरिक रूप से लकड़ी के ओवन में पकाया जाता है। पहले आटा गूंथा जाता है, फिर बेलकर और एक साथ रखकर फूलने के लिए रखा जाता है। मुंबई की हवा में खमीर और लकड़ी के धुएं की महक भरी रहती है। जब ट्रे ओवन से बाहर निकलती हैं, तो सुनहरे लड़ी पाव अपने साथ गर्माहट और स्वाद लेकर आते हैं। यह ऐसा स्वाद है जो शहर के स्ट्रीट फूड पर हावी है।
यह जानी-पहचानी महक अब मुंबई में साफ हवा की लड़ाई में विवाद का मुद्दा बन गई है। मुंबई में बढ़ते वायु प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (पीआईएल) के बाद, बांबे हाईकोर्ट ने जनवरी 2025 में सभी बेकरी को आदेश दिया कि वे छह महीने के अंदर कोयले और लकड़ी के ओवन की जगह (28 जुलाई तक) कम प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन जैसे लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी), पाइप नेचुरल गैस (पीएनजी) या बिजली का इस्तेमाल करें।
बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन (बीएमसी) के मीडिया में दिए गए बयान के अनुसार 28 नवंबर, 2025 तक शहर में 209 बेकरी पहले से ही स्वच्छ ईंधन पर चल रही थीं और 57 ने हाल ही में इसे अपना लिया है। मुंबई के शासकीय नगर निकाय बीएमसी ने बताया, “पिछले छह महीनों में 75 बेकरी ने इस बदलाव की पहल की है और 88 अन्य बेकरी ने महानगर गैस के लिए अप्लाई किया है।” महानगर गैस लिमिटेड (MGL) सार्वजनिक कंपनी है जो पाइप से गैस की आपूर्ति करती है।
कुछ बेकरी अभी भी नियमों का पालन नहीं कर पाई हैं। वे अपनी विरासत, खुद को बचाए रखने और बदलाव की ऊंची लागत के बीच फंसी हुई हैं। मुंबई में बढ़ते वायु प्रदूषण और शहर में साफ हवा के लिए हो रही कोशिशों के बीच, छोटी आस-पड़ोस की बेकरी पर भारी बोझ पड़ रहा है और वे देरी और लागू करने के असमान तरीकों से जूझ रही हैं।

स्वच्छ ईंधन अपनाने का आदेश
बेकरी और वायु प्रदूषण के बीच का संबंध सिर्फ किस्सों पर आधारित नहीं है। महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीसीबी) के एक सर्वे में पता चला है कि मुंबई की आधी से ज्यादा बेकरी ओवन में लकड़ी का इस्तेमाल करती हैं। बांबे एनवायरनमेंट ऐक्शन ग्रुप (बीईएजी) की 2023-2024 की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि मुंबई की बेकरी हर दिन पार्टिकुलेट मैटर लोड में लगभग 3.5% का योगदान देती हैं।
मुंबई में अक्टूबर 2023 में हवा की गुणवत्ता कुछ समय के लिए दिल्ली से भी खराब हो गई थी, जो अपनी खराब AQI के लिए बदनाम है। इसके लिए धूल और यातायात को जिम्मेदार ठहराया गया, लेकिन बांबे उच्च न्यायालय ने दिवाली के बाद छाई धुंध का खुद से संज्ञान लेते हुए घरों, होटलों और बेकरी में लकड़ी जलाने को भी इसकी वजह माना।
साल 2023 की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बांबे हाईकोर्ट ने जनवरी 2025 में सभी बेकरी को आठ जुलाई तक स्वच्छ ईंधन अपनाने का आदेश दिया, जिसे बाद में बढ़ाकर 28 जुलाई कर दिया गया। जब बेकरी मालिकों ने एक साल के विस्तार की मांग की, तो न्यायालय ने 22 अगस्त को यह अपील खारिज कर दी और कहा कि “कुछ लोगों को होने वाली परेशानी समाज के बड़े हिस्से को साफ-सुथरे और हरे-भरे माहौल से वंचित करने का आधार नहीं हो सकती”।
कई छोटे बेकरी मालिकों को छह महीने (जनवरी-जुलाई 2025) की यह समयसीमा असंभव सी लगी। बेकरी मालिकों का कहना है कि एलपीजी, पीएनजी या इलेक्ट्रिक ओवन पर शिफ्ट होने का मतलब है लकड़ी से जलने वाली पुरानी भट्टियों को हटाना, नए उपकरणों में लाखों रुपये निवेश करना और रोजाना का प्रोडक्शन रोके बिना बेकरी के आकार और उत्पादन के हिसाब से कई तरह की परमिट लेना। मुंबई सेंट्रल के मदनपुरा में सेंट्रल बेकरी चलाने वाले शेख साजिद अली खुर्शीद अली कहते हैं, “मुंबई की इतनी सारी बेकरी में बदलाव करने के लिए छह महीने का समय बहुत कम है।” “यह बहुत मुश्किल प्रक्रिया है।” समयसीमा खत्म हो जाने के तीन महीने बाद भी बेकरी मालिक समयसीमा बढ़ाने की मांग रहे हैं, क्योंकि उन्हें कारण बताओ या बंद करने के नोटिस का डर सता रहा है।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज (एनआईएएस), आईआईएससी में चेयर प्रोफेसर और सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च (SAFAR) के फाउंडर गुफरान बेग कहते हैं, “भले ही बेकरी का उत्सर्जन में योगदान बहुत कम है, लेकिन बेकरी बढ़ता हुआ उद्योग है।” “आज उनका असर शायद बहुत बड़ा नहीं दिखे, लेकिन तेज शहरीकरण के साथ भविष्य में इसकी संभावना काफी बढ़ जाती है। बेकरी पॉइंट सोर्स हैं और ट्रांसपोर्ट सेक्टर जैसे गतिशील स्त्रोत की तुलना में पॉइंट सोर्स के लिए नियंत्रण लागू करना बहुत आसान है। हालांकि, कम हिस्सेदारी के बावजूद पॉइंट सोर्स अक्सर हॉट स्पॉट होते हैं जहां खतरा ज्यादा होता है,” बेग आगे कहते हैं।
SAFAR प्रोजेक्ट के 2021 के डेटा के आधार पर, उत्सर्जन की हिस्सेदारी इस प्रकार थी: ऊर्जा क्षेत्र से 5%, इंडस्ट्री से 13%, बायोफ्यूल से 15%, हवा से उड़ने वाली धूल से 15% और परिवहन से 31%। बाकी 21% दूसरे सोर्स से आया, जिसमें बेकरी भी शामिल हैं।

महंगा बदलाव
जब हाईकोर्ट का आदेश लागू हुआ, तो पूरे शहर की कई बेकरी ने इसका पालन करने में जल्दबादी दिखाई। सेंट्रल बेकरी के साजिद अली कहते हैं, “इस साल 27 जून को हमने अपनी बेकरी बंद कर दी और 5 सितंबर को हमने दो नए इलेक्ट्रिक ओवन के साथ इसे फिर से शुरू किया।” “हमें बिक्री के लिए उत्पाद बाहर से मंगवाने पड़े। कुछ मजदूरों ने कुछ समय के लिए आसपास की बेकरियों में काम किया, जबकि कुछ घर चले गए। हमारे लिए यह देखना मुश्किल था कि दादाजी के जमाने में बने लकड़ी वाले ओवन को तोड़ा जा रहा है और वह मेहनत भी जो हमारे पिता ने सालों तक उसकी मरम्मत में लगाई थी।”
सेंट्रल बेकरी से कुछ मीटर आगे ऐतिहासिक इंडियन बेकरी है जो 1939 से चल रही है। इसे मिर्जा तफज्जुल बेग ने शुरू किया था और अब इसे उनके पोते मिर्जा गयासुद्दीन बेग चलाते हैं। उनका अनुमान है कि ईंधन बदलने में लगभग ₹20 लाख का खर्च आएगा। जल्द ही गैस ओवन पर शिफ्ट होने वाले बेग कहते हैं, “पुराने ओवन को हटाने, जगह की मरम्मत और जरूरी ढांचे के हिसाब से उसे ठीक करने के लिए मेरे पास ₹6 लाख का कोटेशन है।” “हर ओवन की कीमत ₹5 लाख से शुरू होती है।”
उस इलाके में पीएनजी (पाइप गैस) सप्लाई का कनेक्शन नही होने से, बेग को 12 LPG सिलेंडर स्टोर करने पड़ते हैं, जो तंग जगहों में लॉजिस्टिक्स के हिसाब से मुश्किल है और इस जोखिम से निपटना भी महंगा है। हर एलपीजी सिलेंडर का वजन 19 किलो होता है और इसकी कीमत लगभग ₹1,700 है। इसमें समय-समय पर गैस भरवानी पड़ती है। मालिकों का कहना है कि सिलेंडर पर बार-बार होने वाले खर्च के बारे में अभी पता नहीं है, क्योंकि उन्होंने अभी उत्पादन शुरू नहीं किया है।
साजिद अली की तरफ से साझा किए गए अनुमानों से पता चलता है कि इलेक्ट्रिक ओवन इस्तेमाल करने से पहले, सेंट्रल बेकरी का बिजली का बिल लगभग ₹15,000 आता था और लकड़ी का अतिरिक्त खर्च ₹40,000 प्रति महीना होता था। जब से उन्होंने इलेक्ट्रिक ओवन इस्तेमाल करना शुरू किया है, ईंधन पर कुल खर्च दोगुना हो गया है और अब हर महीने बिजली का बिल ₹1,03,000 आता है।
इन चुनौतियों के बावजूद बेकरी मालिक हवा में प्रदूषण कम करने के लिए इस बदलाव का समर्थन करते हैं। बांबे बेकर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एम. याकूब याद करते हैं कि स्वच्छ ईंधन के लिए कोशिश साल 2009 में ही शुरू हो गई थी। “जब से सरकार ने पेड़ काटने पर रोक लगाई है, तब से बेकरी मालिकों को लकड़ी मिलने में मुश्किल आ रही है।”
याकूब आगे बताते हैं, “इसके लिए एमजीएल से संपर्क किया गया था, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला। जब उस समय लकड़ी की कमी बढ़ गई, तो बेकरी मालिकों को तोड़फोड़ वाली जगह से इकट्ठा किए गए प्लाईवुड का इस्तेमाल करना पड़ा। हालांकि, पर्यावरण संगठनों और अधिकारियों का कहना है कि प्लाईवुड जलाना सेहत के लिए खतरनाक होता है।” स्वच्छ ईंधन की तरफ पहला कदम उठाने के सोलह साल बाद, न्यायालय के आदेश ने इस बदलाव को आगे बढ़ा दिया है।

छोटी बेकरी के लिए मुश्किल
जहां बड़ी और मध्यम आकार की बेकरी हालात के हिसाब से ढलने के तरीके ढूंढ रही हैं, वहीं अनौपचारिक बस्तियों में चलने वाली कई छोटी बेकरी को स्वच्छ ईंधन अपनाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि इलेक्ट्रिक ओवन साफ और सुरक्षित विकल्प हैं, लेकिन वे अभी भी बहुत महंगे हैं। ज्यादातर यूनिट को या तो एलपीजी सिलेंडर या पीएनजी पर निर्भर रहना पड़ता है।
तीन दिनों के लिए पच्चीस एलपीजी सिलेंडर को स्टॉक करना तंग जगहों पर सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करता है। पीएनजी ज्यादा सुरक्षित और सस्ती है जिसमें गैस पाइप से पहुंचाई जाती है, लेकिन सीमित पाइपलाइन होने की वजह से इसकी आपूर्ति कम है।
इस बीच, मुंबई में पीएनजी की अकेली वितरक एमजीएल को भी अपना दायरा बढ़ाने के लिए अनुमित मिलने में देरी हो रही है, जिससे बेग जैसे बेकर एलपीजी सिलेंडर पर निर्भर हैं और उन्हें समयसीमा बढ़ाने का अनुरोध करना पड़ा है।
एमजीएल के एक पूर्व कर्मचारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि 311 बेकरी के लिए पीएनजी पाइपलाइन कनेक्शन अगले एक या दो साल में संभव नहीं है। इसके पीछे अनुमति लेने की जटिल प्रक्रिया, जहां पाइप बिछाने हैं वहां सड़कों की दयनीय स्थिति और बुनियादी ढांचे से जुड़ी बाधाएं जिम्मेदार हैं। पीएनजी कनेक्शन के लिए योग्य 213 बेकरियों में से 1 अक्टूबर तक सिर्फ 82 ने ही इसके लिए पंजीकरण कराया था।
एमजीएल के इस सूत्र ने बताया कि नगर निगम और बेकरी एसोसिएशन द्वारा सूचीबद्ध 732 बेकरी पर किए गए एमजीएल सर्वे में पाया गया कि सिर्फ 52 बेकरी ही PNG का इस्तेमाल कर रही थीं। 91 बेकरी इस्तेमाल के लायक नहीं थीं (जिन्हें गिराया जाना था, बंद थीं या पाव नहीं बना रही थी) और 65 बेकरी का पता नहीं चल पाया। हालांकि, आवेदन करने वाली बेकरी मालिकों का कहना है कि मुंबई शहर में लगभग 750 बेकरी हैं और मुंबई मेट्रोपॉलिटन एरिया में इनकी संख्या दो हजार से अधिक है।
शहर की बिना पंजीकृत बेकरी के बारे में याकूब ने कहा, “दुर्भाग्य से ऐसी बेकरी को बंद करना पड़ेगा या कम से कम इस योजना के तहत कर्ज लेना मुश्किल होगा। लगभग 90-95% बेकरी किराए की जगह से चलती हैं और ज्यादातर बिना लाइसेंस वाली बेकरियां झुग्गी-झोपड़ियों में हैं। अब, कर्ज लेने के लिए ये बेकरी मालिक अपनी जगह के दस्तावेज कैसे देंगे?”
बीएमसी ने वित्तीय दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए 18 सितंबर को एक बैठक की जिसमें प्लानिंग, स्वास्थ्य, पर्यावरण, दमकल, बैंक जैसे कई विभाग, वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (डब्ल्यूआरआई) और बेकरी एसोसिएशन के प्रतिनिधि शामिल हुए। बेकरी मालिकों को बताया गया कि वे केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री फॉर्मलाइजेशन ऑफ माइक्रो फूड प्रोसेसिंग एंटरप्राइजेज (पीएमएफएमई) योजना के तहत ₹1 करोड़ का कर्ज ले सकते हैं। साथ ही, प्रोजेक्ट लागत का 35% सब्सिडी का लाभ भी उठा सकते हैं, जिसकी अधिकतम सीमा ₹10 लाख है। बीएमसी के योजना विभाग में कंसल्टेंट गजानन जगाते कहते हैं, “ब्याज दर 10% से 12% के बीच है। अब तक, मुझे पांच प्रस्ताव मिले हैं, जिनमें से एक में बैंक द्वारा जल्द ही कर्ज दिया जाने वाला है।”
एमजीएल के एक सूत्र ने इसकी पुष्टि की कि बेकरी के अंदर पाइपलाइन का खर्च अब एमजीएल खुद उठाएगी या इस पर सब्सिडी दी जाएगी। पहले यह खर्च पूरी तरह मालिक उठाते थे जो ₹1-2 लाख था। यह फैसला बैठक के दौरान बेकरी मालिकों को बताया गया। उन्होंने आगे कहा, “100 मीटर से ज्यादा लंबी किसी भी पाइपलाइन के लिए अब डिपॉजिट भी माफ कर दिया गया है। पहले इसके लिए डिपॉजिट लिया जाता था।”
फिर भी, अनिश्चितता बरकरार है। याकूब कहते हैं कि समयसीमा बढ़ाने के लिए कोई औपचारिक प्रावधान नहीं होने से, “अगर अधिकारी चाहें, तो वे कभी भी किसी भी बेकरी के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं।”

छोटी बेकरी के लिए बढ़ती लागत
मुंबई के अंधेरी (ईस्ट) स्थित चकाला में मशहूर गुप्ता वड़ा पाव सुबह 8:30 बजे खुलता है और यहां बच्चे, बड़े, ऑटो ड्राइवर और नौकरीपेशा लोग सभी आते हैं। लालमणि गुप्ता सुबह 5 बजे से पाव के कॉम्बिनेशन बनाना शुरू कर देते हैं। समोसा पाव ₹20 और वड़ा पाव ₹18 में मिलता है। वह कहते हैं, “मुंबई का बड़ा हिस्सा पाव पर ही जिंदा है।”
हालांकि, ईंधन में बदलाव से इन कीमतों में बढ़ोतरी होने की संभावना है। पारंपरिक लकड़ी के ओवन में 35 मिनट में हर बार 120-150 लड़ी पाव तैयार होते हैं। इलेक्ट्रिक या गैस ओवन से, वे लगभग 25-30 मिनट में 80-90 पाव बनाते हैं।
बैग बताते हैं कि जहां लकड़ी वाले ओवन में लगातार तापमान बनाए रखना पड़ता है, वहीं इलेक्ट्रिक/गैस ओवन में सिर्फ एक बार सेटिंग करनी होती है, जिससे ज्यादा बैच बन पाते हैं। फिर भी, ज्यादा ईंधन और उत्पादन लागत के कारण छह पाव वाली लड़ी की कीमत ₹15 से बढ़कर ₹18 हो सकती है, बैग कहते हैं। अब जब 25 या 50 पैसे के सिक्के चलन से बाहर हो गए हैं, तो संघों को कीमतें राउंड ऑफ करनी पड़ेंगी, जिससे लोगों की खरीदने की क्षमता पर असर पड़ेगा।
बेकरी संघों की दलील है कि उन्हें गलत तरीके से निशाना बनाया जा रहा है, जबकि उद्योग, यातायात और निर्माण जैसे ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले सेक्टर पर कम पाबंदियां हैं। याकूब कहते हैं, “निर्माण उद्योग पर भी एक बार प्रदूषण कम करने के लिए पाबंदी लगाई गई थी, लेकिन जल्द ही बिना किसी पाबंदी के वह फिर से काम करने लगी।”
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बीईएजी की रिपोर्ट के अनुसार, “हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि निर्माण वाली जगहें प्रदूषण का मुख्य स्त्रोत बनकर उभरी हैं, इसके बाद गाड़ियों और उद्योगों से होने वाला प्रदूषण है। मुंबई में हवा की गुणवत्ता लगातार खराब हुई है। पिछले पांच सालों (2019-2023) में प्रदूषण दोगुना हो गया है, जहां 2019 और 2020 के बीच PM2.5 का लेवल 54.2% बढ़ गया, 2021 और 2022 में थोड़ी गिरावट आई, लेकिन 2023 में इसमें 42.1% की बड़ी बढ़ोतरी हुई।”
हालांकि, बदलाव के बाद पाव के स्वाद और बनावट में बदलाव पर बहस जारी है। लेकिन, समय के साथ उपभोक्ता और कारीगर इसे अपना रहे हैं। “जब हम बच्चे थे, तो यीस्ट नहीं होता था; लोग सिर्फ खमीर से पाव बनाते थे। फिर यीस्ट आया। अब, उसका इस्तेमाल पाव बनाने में होता है। तो, ये बदलाव होते रहते हैं। लोगों ने इन्हें अपना लिया है। भले ही पाव लकड़ी के ओवन में ना पके, फिर भी वह पक जाएगा। दशकभर में यह पीढ़ी पुराने स्वाद को पूरी तरह भूल सकती है,” बेग आखिर में कहते हैं।
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 5 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: कई छोटे बेकरी मालिकों के लिए इस बदलाव के लिए कम समय एक चुनौती है, क्योंकि लकड़ी से चलने वाली पुरानी भट्टियों को हटाना होगा। साथ ही, उत्पादन रोके बिना नए उपकरण खरीदने और परमिट लेने का काम भी करना होगा। तस्वीर: मेघा आचार्य/मोंगाबे।