- राजस्थान में फोग या फोगला जैसी खान-पान की पांरपरिक चीजों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। मशीनी खेती और पानी की अधिकता से इनकी खेती कुछ खास इलाकों तक सिमट कर रह गई है।
- थार रेगिस्तान की अहम प्रजातियों में से एक फोगला का ईंट-भट्ठों में जलावन के तौर पर इस्तेमाल होने से भी यह लुप्तप्राय प्रजाति की श्रेणी में आ गई है।
- हालांकि, धोरों को बांध कर रखने में इसकी अहमियत जगजाहिर है। इसलिए, अब कई जगहों पर इसे अन्य पारंपरिक प्रजातियों के साथ बढ़ावा दिया जा रहा है।
सत्तर साल की सजना देवी चुरू जिले के ताल छापर में रहती हैं। उन्हें इस बात का मलाल है कि अब उनके इलाके में खान-पान की पारंपरिक चीजें धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं। वह फोगला (Calligonum polygonoides) का उदाहरण देती हैं जिसे कभी इस इलाके के किसान चैत्र में तैयार करते थे और गर्मी से बचाव का सबसे अच्छा विकल्प मानते थे।
उन्होंने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “मेरे परिवार के पास तीन-अलग-अलग जगहों पर 15 बीघा खेत हैं। जब मैं छोटी थी, तो इन तीनों खेतों के आसपास फोगला की खूब सारी झाड़ियां थीं। लेकिन, अब सिर्फ ताल छापर वाले खेत पर इसकी झाड़ी है और वह भी एक। इसलिए फोगला भी अब खरीदकर खाना पड़ता है।”
सजना देवी के मुताबिक ट्रैक्टर से खेत की जुताई करने से फोगला की जड़ें कट जाती हैं और उसकी झाड़ी सूख जाती है। इसके अलावा, फोगला की तैयारी में लगने वाली मेहनत भी इसके खत्म होने की एक वजह है।
जानकार भी सजना देवी की बातों पर मुहर लगाते हैं। जोधपुर स्थित शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (AFRI) में वन पारिस्थितिकी और जलवायु परिवर्तन के पूर्व प्रमुख जी सिंह मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “मैं 1992 के नवंबर में AFRI आया था और 2021 में रिटायर हुआ। इन 30 सालों में फोगला की झाड़ियों की संख्या और उसके क्षेत्रफल में काफी कमी आई।”
बढ़ती खेती और खत्म होता फोगला
पिछले कुछ सालों में पानी की उपलब्धता बढ़ने पर राजस्थान, खासकर थार रेगिस्तान में खेती के तौर-तरीकों में व्यापक बदलाव आया है। एक अध्ययन के मुताबिक झाड़ियों वाली कई जमीनों का अब कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने लगा है। इन्हीं में एक फोग की झाड़ी है जो कभी थार में बहुतायत में पाई जाती थी, लेकिन बहुत ज्यादा दोहन के कारण इसे आईयूसीएन के रेड डाटा बुक में लुप्तप्राय प्रजाति के तौर पर दर्ज किया गया है।
दरअसल, फोग की झाड़ी पर मार्च में मंजर आते हैं और तब किसान दूसरी फसल तैयार करने में व्यस्त रहते हैं। इसलिए, वे फोगला पर उतना ध्यान नहीं देते हैं। जहां खेती सिर्फ चौमासे (बारिश के चार महीने) में होती है, वहीं किसान फोगला तैयार करते हैं।

सजना देवी की बातों का कई किसान भी समर्थन करते हैं। मसलन, बीकानेर जिले में सिंजगुरु के किसान बंसीलाल गोदारा मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “फोगला खेतों के किनारे पर होता है। अब लोग आवारा पशुओं से फसलों को बचाने के लिए तारबंदी करने लगे हैं, इसलिए फोगला कम होने लगा है।”
थार में एक वक्त पानी की भारी किल्लत थी, तब फोगला बहुत काम की चीज थी। 60 बीघे में खेती करने वाले सिंजगुरु के ही किसान मंगला राम कहते हैं, “आज की तरह पहले पानी के उतने साधन नहीं थे। तब खेत में काम करने के दौरान प्यास लगने पर फोगला ही खाया जाता था। इससे शरीर में ग्लूकोस बनता है जो पानी की कमी नहीं होने देता।” शिव लाल भी कहते हैं कि फोगला की तासीर ठंडी होती है। यह शरीर के अंदर की गर्मी को खत्म कर उसे ठंडा रखता है। इसे खाने से प्यास भी कम लगती है।
थार में तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन से फोगला भी अछूता नहीं है। केर और सांगरी की तरह फोगला को भी पानी की बहुत कम जरूरत होती है। इस साल अप्रैल में कई दिनों तक जोरदार बारिश के चलते फोगला की पैदावार पर असर पड़ा।
आऊ तहसील में सूखा साग के कारोबारी अरिहंत डागा कहते हैं कि इसकी अच्छी फसल के लिए अप्रैल में बारिश नहीं होनी चाहिए। वह कहते हैं कि मार्च में आंधी चलने से भी फोग (बाड़ी) के मंजर झड़ जाते हैं।
जी सिंह मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “सिंचाई के लिए जो भूजल इस्तेमाल किया जा रहा है उसमें लवणता होती है। चूंकि, फोग प्रमुख रूप से धोरों पर पाया जाता है, इसलिए भूजल से सिंचाई करने के कारण रेत में फोग कम हो रहा है।”
रेगिस्तान में हवा जब रेत को एक जगह से दूसरी जगह उड़ाकर जमा कर देती है, तो जो ऊँचे-नीचे टीले बनते हैं, उन्हें धोरे कहा जाता है। राजस्थान और थार क्षेत्र में यही शब्द आम बोलचाल में इस्तेमाल होता है।

एक रिसर्च के मुताबिक ये पौधे अपने प्राकृतिक माहौल में किसी भी बदलाव के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं और तेजी से लुप्तप्राय हो जाते हैं।
वैसे फोगला को तैयार करने में मेहनत भी खूब लगती है। इसकी झाड़ी में आम जैसे मंजर आते हैं। इसलिए पहले इसकी पतली-पतली डालियां तोड़ी जाती है। फिर इसे धूप में दो से तीन तक सुखाया जाता है और कचरा निकाला जाता है। इसके बाद यह तैयार होता है।
फलौदी जिले के किसान शिव कुमार मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “पूरे दिन मेहनत करने के बाद महज दो किलो फोगला तैयार हो पाता है और उस मेहनत के हिसाब से भाव भी कम मिलता है।”
सजना देवी भी मानती हैं कि फोगला के सूखे हुए मंजर को झाड़ने के बाद उसे पहली मोटी चलनी और फिर महीन चलनी से छाना जाता है। फिर उसे फटका जाता है और आखिर में ठंडल निकालकर साफ किया जाता है।
वैसे पांच साल पहले तक 150 से 200 रुपए किलो बिकने वाला फोगला अब खुदरा में 400 रुपए किलो तक बिक रहा है। थोक में भी फोगला के दाम 300 रुपए किलो हैं।
नागौर में फोगला के कारोबारी धीरज सकलेचा मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं, “होली के बाद से इसकी आवक एक महीने तक चलती है। पूरे साल में महज 400 से 500 बोरी फोगला ही आता है।” इस फसल को लेकर उदासीनता पर वह कहते हैं कि इसे इस्तेमाल करने या फायदों पर जागरूकता की बहुत कमी है।
वहीं ओसियां में सूखा साग के कारोबारी विजय किशन सोनी कहते हैं कि पहले फोगला की बाड़ी बहुत ज्यादा थी, लेकिन खेती बढ़ने के साथ इसकी झाड़ियां कम होने लगी हैं। वह भी मानते हैं कि इसे खाने के तरीकों के बारे में बीकानेर, नागौर और चूरू जिले के लोग ही जानते हैं, इसलिए इसके बारे में लोगों को पता नहीं है।
नागौर में सूखा साग के कारोबारी रामस्वरूप चांडक का मानना है कि मेहनत ज्यादा होने से नई पीढ़ी अब इसे खाना नहीं चाहती है, इसलिए मांग धीरे-धीरे कम होती जा रही है। उनके मुताबिक पहले के मुकाबले फोग की आवक महज एक-चौथाई रह गई है।
फोग को लेकर दिलचस्पी कम होने की एक और वजह कोल्ड स्टोरेज की व्यवस्था नहीं होना है। आउ मंडी में ही सूखा साग का कारोबार करने वाले दिनेश डागा कहते हैं, “किसानों को इसे तुरंत बेचना पड़ता है, क्योंकि कुछ महीने में ही यह बंदरग हो जाता है और फिर इसे कोई नहीं खरीदता है।”
फायदा बना नुकसान
फोगला को उसके आर्थिक, पारिस्थितिकी और औषधीय सेवाओं के लिए रेगिस्तान की सबसे अहम प्रजातियों (keystone species) में एक माना जाता है। लेकिन, इस प्रजाति का सदियों से जलावन के तौर पर भी इस्तेमाल होता रहा है।
केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान की 2005 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, “सरकार ने फोग की लकड़ी से कोयला बनाने पर प्रतिबंध के बावजूद खास तौर पर बीकानेर जिले में फोग की लकड़ी से कोयला बनाने वाली कई अवैध इकाइयां मौजूद है। फोग की लकड़ी को हटाना नियमित व्यवसाय है और अब ट्रैक्टरों और बुलडोजरों के आने से इसे जड़ सहित आसानी से हटाया जा सकता है।“
जोधपुर स्थित शुष्क वन अनुसंधान संस्थान में वन पारिस्थितिकी संकाय की प्रमुख भावना शर्मा लंबे समय से धोरों को बनाए रखने में फोग सहित स्थानीय वनस्पतियों की अहमियत पर काम कर रही हैं। उन्होंने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “फोग की झाड़ियों की आंच बहुत तेज होती है। इसलिए जब ईंट-भट्टे बने, तो इनकी बहुत ज्यादा कटाई हुई और इसका इस्तेमाल भट्टियों में हुआ। फोगला के खत्म होने की एक वजह यह भी रही।”

जी सिंह भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। वह कहते हैं, “फोग की झाड़ी को जड़ से उखाड़ कर जलावन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए इसे फिर से पनपने का मौका ही नहीं मिलता है। एक ऊंट गाड़ी में एक से सवा टन तक लकड़ी आती है। फोग के एक सामान्य पेड़ से 15 किलो तक जलावन मिल जाता है।”
सजना देवी भी कहती हैं कि इसकी आंच बहुत तेज होती है, इसलिए खाना बनाने के लिए हम इसकी टहनियों को तोड़ते थे।
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धोरों को बनाए रखने में अहम भूमिका
जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण राजस्थान में धोरे तेजी से कम होते जा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक 1970 से 2013 के बीच पश्चिमी राजस्थान में धोरों में 16 फीसदी तक की कमी आई है।
इसलिए, धोरों को स्थिर रखने में अलग-अलग वनस्पतियों की भूमिका पर शोध भी तेज हुए हैं। इनके जरिए धोरों को बांध कर रखने में अलग-अलग वनस्पतियों से मिलने वाली मदद को परखा गया है। केंद्रीय शुष्क वन अनुसंधान संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक पी सी मोहराणा मोंगाबे-हिंदी से कहते हैं कि फोग में खास तरह का केमिकल होता है जो रेत को बांध कर रखता है।
फोगला मजबूत झाड़ी मानी जाती है जो धोरों पर बहुत अच्छे से फलती-फूलती है। जानकारों का कहना है कि रेत में इसकी मुख्य जड़ डेढ़ मीटर तक अंदर जाती है। इसका आच्छादन महज छह मीटर तक होता है जबकि इसकी जड़ व्यास (डायमीटर) में 26 से 27 मीटर तक फैलती है। इस तरह देखें तो आच्छादन के मुकाबले जड़े चार गुना से ज्यादा फैलती हैं।
जी सिंह ने 1996 में धोरों को स्थिर रखने में सबसे अच्छी वनस्पतियों पर बीकानेर जिले में एक शोध किया था। जिले के गाधवाला फॉरेस्ट में करीब 13 हेक्टेयर में 12 से 13 प्रजाति के पेड़ लगाए गए थे। इसमें बड़े धोरे ढाई से तीन एकड़ में थे। इसमें मुख्य रूप से फोग, सोनामुखी (जिससे कायम चूर्ण बनता है), विलायती बबूल और इजरायली बबूल के पेड़ लगाए गए थे।
वह बताते हैं, “हमलोगों ने पाया कि इसमें सबसे अच्छा कॉम्बिनेशन फोग और सोनामुखी का था। यह धोरों को स्थिर रखने में सबसे ज्यादा कामयाब रहा, क्योंकि फोग को बहुत कम पानी चाहिए और इस तरह उसने दूसरी वनस्पतियों को फलने-फूलने में मदद की। इस तरह फोग जैव-विविधता को बचाने और बढ़ाने में मदद करता है।“ वह अपने अनुभव से कहते हैं कि फोग की एक सामान्य झाड़ी 80 से 85 टन रेत को बांधे रखने में मददगार होती है।

ऐसा ही एक शोध जोधपुर स्थित शुष्क वन अनुसंधान संस्थान की अगुवाई में बीकानेर के ही उदासर में चल रहा है। यहां तीन साल पहले करीब 12 एकड़ ऐसे धोरों में स्थानीय बेर, फोग, सोनामुखी, सावन और धामन घास जैसी स्थानीय वनस्पतियां लगाई गई, जहां 20 साल पुराने इजरायली बबूल (अकेशिया टोटलिस\Acacia tortilis) के पेड़ हैं। जब ये पेड़ छोटे थे, तो इन्होंने धोरों को बांधने में अच्छी भूमिका निभाई, लेकिन जैसे-जैसे ये बड़े होते गए, रेत का कटाव शुरू हो गया, क्योंकि इनके तनों के बीच से हवा गुजरने लगी। एक और समस्या यह हुई कि जहां इजरायली बबूल होता है, वहां पर दूसरी झाड़ी कम आती हैं।
इस चल रही स्टडी से फिलहाल सामने आए कुछ नतीजों के बारे में भावना शर्मा कहती हैं, “बाहर वाली जमीन के तुलना में अनुसंधान वाली जगह पर स्थानीय प्रजातियां बढ़ गई हैं। हमने वहां पौधों को सुरक्षा देकर पानी उपलब्ध कराया। इससे स्थानीय प्रजातियां फिर से फलने-फूलने लगी। यह ऐसी प्रजातियां हैं जो धोरों की सतह को कवर करके रेत को बांधे रखती हैं। इससे किसी एक प्रजाति की जगह जैव-विविधता पर व्यापक असर हुआ।” वह कहती हैं कि यहां पर लगाए गए फोग के साथ समस्या यह हुई कि उसकी जड़ को सूअर खोद-खोद कर खाने लगे, क्योंकि उसमें पानी होता है।
बैनर तस्वीर- बीकानेर जिले के सिंजगुरु चौक पर बैठे ग्रामीण, जिनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी कभी फोगला और दूसरी पारंपरिक प्रजातियों से जुड़ी थी। तस्वीर- विशाल कुमार जैन/मोंगाबे