- सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित हाई-लेवल समिति ने जोजरी नदी से प्रभावित लूणावास, धवा, मेलबा और डोली जैसे गांवों का दौरा शुरू किया, जहां लोगों ने जहरीले और बदबूदार पानी से जुड़ी रोज़मर्रा की मुश्किलें साझा कीं।
- मोंगाबे-हिंदी की पहले इस मुद्दे पर रिपोर्ट की जिसके अनुसार, केमिकलयुक्त पानी के कारण करीब 16 लाख लोग स्वास्थ्य, आजीविका और कृषि संकट झेल रहे हैं, जिस पर व्यापक कवरेज के बाद शीर्ष अदालत ने स्वतः संज्ञान लिया।
- स्थानीय निवासी और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों ने समिति के सामने प्रदूषित डिस्चार्ज पूरी तरह रोकने, बर्बाद ज़मीन के लिए 15 साल का मुआवज़ा देने और जैव-विविधता बहाली के ठोस उपाय लागू करने की मांग रखी।
- कोर्ट के आदेश के तहत समिति को जोजरी, लूणी और बांडी नदियों में वैध–अवैध डिस्चार्ज की पहचान, समयबद्ध पुनर्जीवन योजना तैयार करने और स्थानीय समुदायों से निरंतर संवाद के साथ 27 फरवरी 2026 तक स्टेटस रिपोर्ट सौंपनी है।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से जोजरी नदी में प्रदूषण की गंभीर समस्या के स्थायी समाधान के लिए बनाई गई हाई-लेवल समिति ने 22 दिसंबर से प्रभावित गांवों का दौरा शुरू कर दिया है। समिति के अध्यक्ष और रिटायर्ड जज संगीत लोढ़ा और अन्य सदस्यों ने सोमवार को लूणावास, धवा, मेलबा समेत कई गांवों का दौरा किया और गंदे पानी के चलते गांव वालों को हो रही दिक्कतों की जानकारी ली। समिति ने बुधवार को डोली गांव का दौरा किया जहां महिलाओं ने अपनी पीड़ा बयां की।
आपको बता दें कि मोंगाबे-हिंदी ने इस साल 26 जून को जोजरी नदी पर व्यापक खबर प्रकाशित की थी। इस दौरान डोली गांव में भी महिलाओं से बात की गई थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि सालों से करीब 16 लाख लोग इस केमिकलयुक्त पानी से पीड़ित हैं। मीडिया में व्यापक कवरेज के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 16 सितंबर, 2025 को खुद से इस मसले का संज्ञान लिया था और दो सदस्यीय खंडपीठ ने 21 नवंबर को विस्तृत आदेश दिया था।
मेलबा गांव के निवासी और इलाके में वन्यजीव संरक्षण के लिए काम करने वाले श्रवण पटेल ने समिति के सामने रखी गई मांगों को मोंगाबे-हिंदी के साथ साझा किया। उन्होंने कहा, “हमने समति से नदी में प्रदूषित पानी के बहाव को पूरी तरह बंद करने की मांग की है। जो जमीन पूरी तरह बर्बाद हो गई है उसके लिए 15 साल का मुआवजा मांगा गया है। साथ ही, वन्यजीव और जैव-विविधता को फिर से बहाल करने के लिए स्थायी उपाय करने की मांग की गई है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की कोर्ट ने उच्च-स्तरीय पारिस्थितिकी तंत्र निगरानी समिति (हाई लेवल इको-सिस्टम ओवरसाइट कमेटी) गठित करने का निर्देश दिया था। इस समिति का अध्यक्ष हाईकोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश को बनाया गया है। समिति को 27 फरवरी, 2026 को अपनी पहली स्टेटस रिपोर्ट कोर्ट को सौंपनी है।
कोर्ट ने समिति के गठन को जरूरी बताते हुए कहा था, “इस समिति का गठन बड़े स्तर पर नुकसान, जरूरी सुधारात्मक कार्रवाइयों की जटिलता और लगातार संस्थागत निगरानी पक्की करने की अनिवार्यता को देखते हुए आवश्यक है, ताकि राष्ट्रीय हरित अधिकरण और इस न्यायालय के निर्देशों को पूरी तरह लागू किया जा सके।”
समिति को जोजरी, बांडी और लूणी नदियों में होने वाले सभी वैध और अवैध डिस्चार्ज का व्यापक तौर पर पता लगाने का निर्देश दिया था।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि समिति जोजरी, लूनी और बांडी नदियों को समयबद्ध तरीके से उनके पुराने स्वरूप मे लाने के लिए ब्लूप्रिंट तैयार करके इसका कार्यान्यवन पक्का करेगी और इसके लिए प्रभावित ग्राम पंचायतों और स्थानीय समुदायों के साथ समय-समय पर बातचीत की जाएगी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि ये निर्देश महज प्रशासनिक नहीं हैं, बल्कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार की रक्षा करने के इस न्यायालय के संवैधानिक कर्तव्य से निकले हैं। इस अधिकार की लगातार व्याख्या में स्वच्छ जल का अधिकार, प्रदूषण-मुक्त हवा, स्वस्थ पर्यावरण तथा मानव गरिमा के अनुकूल परिस्थितियां शामिल हैं।
बैनर तस्वीरः धवा-डोली वन्यजीव अभयारण्य कभी काले हिरण, चिंकारा और प्रवासी पक्षियों जैसे वन्यजीवों और खेजड़ी, केर, रोहिडा जैसे देशी रेगिस्तानी वनस्पतियों का आश्रय स्थल था। लेकिन जोजरी नदी के अत्यधिक प्रदूषित होने के कारण यहां की वनस्पति और वन्यजीव दोनों में भारी गिरावट आई है। तस्वीर- निर्मल वर्मा/मोंगाबे