- बिहार के समस्तीपुर में बढ़ता तापमान, अनियमित होती बारिश और बढ़ती वाष्पन दर से पारंपरिक खेती में जोखिम लगातार बढ़ता जा रहा है।
- इन परिस्थितियों में सौर ऊर्जा से चलने वाली घरों की बिजली, पानी के पंप, और कोल्ड स्टोरेज किसानों और ग्रामीण परिवारों का खर्च में कमी ला रहे हैं।
- यह तकनीक खेती की लागत घटा रही है, कार्बन उत्सर्जन कम कर रही है और किसानों को सिर्फ उपभोक्ता नहीं, बल्कि ऊर्जा उत्पादन में भागीदार बना रही है।
बिहार के समस्तीपुर में दोपहर का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच रहा है और खेतों में सिंचाई मुश्किल होती जा रही है। ठहरा गोपालपुर गांव की किसान पिंकी देवी अब अपने खेत में सोलर पंप से पानी दे रही हैं। वे कहती हैं, “पहले डीज़ल पंप से सिंचाई महंगी पड़ती थी और बारिश पर भी भरोसा नहीं था, अब सोलर पंप से खेत में पानी मिल जाता है।”
पिंकी देवी का यह अनुभव इलाके के अन्य किसानों के अनुभव से मेल खाता है, जहां मौसम में बदलाव खेती के तरीकों को प्रभावित कर रहा है।
कृषि मौसम विज्ञान विभाग और डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2025 के बीच समस्तीपुर में तापमान बढ़ा है और बारिश का पैटर्न अधिक अनियमित हुआ है, जिससे खेती पर दबाव बढ़ा है।
इस अवधि में औसत अधिकतम तापमान 2020 के 29.5 डिग्री सेल्सियस से बढ़कर 2025 में 31.4 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि औसत न्यूनतम तापमान भी 18.3 डिग्री सेल्सियस से बढ़कर 19.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। कुल वार्षिक वर्षा में तेज उतार-चढ़ाव देखा गया, जहां 2021 में यह 1,883 मिमी से अधिक थी, वहीं 2022, 2024 और 2025 (जनवरी से अगस्त) में यह 700–850 मिमी के आसपास सिमट गई।
इसी दौरान औसत वाष्पन दर 2020 में 2.0 मिमी प्रति दिन से बढ़कर 2025 में 4.0 मिमी प्रति दिन तक पहुंच गई, जिससे खेतों में नमी बनाए रखना कठिन होता गया है। आर्द्रता के स्तर अपेक्षाकृत ऊंचे बने रहे, लेकिन सायंकालीन आर्द्रता में गिरावट दर्ज की गई, जबकि औसत धूप की अवधि में हल्की कमी देखी गई।
स्थानीय किसानों और व्यापारियों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में फल, सब्जी और अनाज की गुणवत्ता और उत्पादन में 10 से 20 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव केवल ऊर्जा के स्रोत का परिवर्तन नहीं है। यह एक “जस्ट ट्रांजिशन” है, जिसमें किसान पारंपरिक ईंधनों से टिकाऊ और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं। परंपरागत स्रोतों से सिंचाई पर आने वाली लागत को यह चार गुना काम करता है।

यह बदलाव केवल ऊर्जा के स्रोत तक सीमित नहीं है, बल्कि नीति स्तर पर भी इसे बढ़ावा दिया जा रहा है।
सौर ऊर्जा के क्षेत्र में किसानों की भागीदारी को बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें ‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना‘, प्रधानमंत्री किसान उर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (PM-KUSUM) आदि योजनाएं चला रही हैं। इन योजनाओं के तहत आर्थिक रूप से कमजोर किसानों को सोलर पंप, सौर ऊर्जा संयंत्र और अन्य उपकरणों पर 60 प्रतिशत तक अनुदान मिल रहा है।
नेट-मीटरिंग और ग्रिड कनेक्शन के जरिए अतिरिक्त बिजली का उपयोग या बिक्री संभव है, जिससे कई राज्यों में किसानों को प्रति यूनिट 2 से 3 रुपये तक की आय मिल रही है। पीएम-कुसुम-C घटक के तहत पंप क्षमता से अधिक सोलर प्लांट लगाने की अनुमति मिलने से अतिरिक्त उत्पादन किसानों की कमाई में बदल रहा है।
बिहार के समस्तीपुर जिले के ठहरा गोपालपुर गांव की 40 वर्षीय महिला किसान पिंकी देवी ने वर्ष 2020 में सोलर पैनल आधारित सिंचाई पंप लगाया। इससे पहले उनके गांव में किसान डीज़ल पंप से सिंचाई करते थे, जिसकी लागत लगभग ₹160 प्रति घंटे पड़ती थी और एक घंटे में करीब एक कट्ठा खेत की ही सिंचाई हो पाती थी। बिहार में एक कट्ठा करीब 1361 वर्ग फ़ीट होता है।
सोलर पंप लगने के बाद यह खर्च घटकर ₹40–50 प्रति कट्ठा रह गया है। पिंकी देवी के अनुसार, अब मक्का, धान और आलू जैसी फसलों में पानी की कमी नहीं रहती, हालांकि बादल छाने पर पंप की गति धीमी हो जाती है।
पिंकी देवी सोलर पैनलों के नीचे धनिया और पालक जैसी फसलें उगाकर एक ही जमीन से दोहरा उत्पादन भी कर रही हैं और अपने खेत के अलावा लगभग 40 से 50 एकड़ क्षेत्र में सिंचाई सेवा देकर अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं।
रूफटॉप सोलर ने बदला बिजली का हिसाब
समस्तीपुर स्थित सुनील एंटरप्राइजेज के निदेशक संजीव झा के अनुसार, उत्तरी बिहार में अब तक करीब 14,000 घरेलू उपभोक्ताओं को पीएम सूर्य घर योजना से जोड़ा जा चुका है। वे बताते हैं कि अधिकतम लगभग ₹ दो लाख की लागत में ऐसा रूफटॉप सोलर सिस्टम लगाया जा सकता है, जो रोज़ाना 5 से 15 यूनिट तक बिजली पैदा करता है। “कई उपभोक्ताओं का बिजली बिल अब शून्य हो गया है, जो पहले ₹8,000 से ₹10,000 तक पहुंच जाता था,” झा कहते हैं। उनके मुताबिक, इस योजना के तहत सरकार अधिकतम ₹78,000 तक की सब्सिडी देती है और शेष राशि बैंक ऋण के माध्यम से जुटाई जा सकती है।
संजीव झा पहले बिजली विभाग में मीटर रीडर के रूप में कार्यरत थे, लेकिन स्मार्ट मीटर लागू होने के बाद उनकी नौकरी चली गई। इसके बाद शुरू किया गया उनका यह उद्यम अब सैकड़ों उपभोक्ताओं को सौर ऊर्जा अपनाने में मदद कर रहा है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एस.के. पटेल के अनुसार, कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों में डीज़ल आधारित मशीनों को सौर ऊर्जा पर चलाने से ईंधन खर्च कम होने के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन में भी सीधी कमी आती है। वे बताते हैं कि वैज्ञानिक मानकों के अनुसार एक लीटर डीज़ल के जलने से औसतन लगभग 2.6 से 2.7 किलोग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जित होती है, इसलिए डीज़ल की हर बचत सीधे कार्बन फुटप्रिंट घटाने में मदद करती है। उनके मुताबिक, यदि कोई सिंचाई पंप, मिनी-ग्रिड या कृषि मशीनरी सालाना करीब 500 लीटर डीज़ल की जगह सौर ऊर्जा से संचालित होती है, तो इससे लगभग 1.3 टन CO₂ उत्सर्जन की सीधी बचत संभव है।
महिलाओं की आर्थिक भूमिका
समस्तीपुर के खानपुर प्रखंड की रेणु देवी (42) ने दो वर्ष पहले एक निजी कंपनी के सहयोग से अपने घर में सोलर इनवर्टर स्थापित कराया था। लगभग ₹60,000 की लागत से लगे इस सिस्टम के बाद उनका मासिक बिजली बिल ₹800 से घटकर ₹120 रह गया। बाद में उन्होंने हाइब्रिड मॉडल अपनाया, जिसमें सौर ऊर्जा, बैटरी और ग्रिड तीनों का संयुक्त उपयोग होता है। वर्तमान में उनका बिजली बिल शून्य है। रेणु देवी के अनुसार, यह मॉडल घरेलू बिजली खर्च कम करने और ऊर्जा पर निर्भरता घटाने में मददगार साबित हो सकता है।

समस्तीपुर के संत कबीर आश्रम के सेवादार शशि प्रकाश (36) ने आश्रम की दैनिक जरूरतों को सौर ऊर्जा पर स्थानांतरित कर दिया है। उनके अनुसार, जहां पहले आश्रम का मासिक बिजली बिल हजारों रुपये में आता था, वह अब सैकड़ों रुपये तक सीमित हो गया है। शशि प्रकाश बताते हैं कि सोलर सिस्टम से पानी का पंप, दूध निकालने की मशीन और इनवर्टर जैसी सुविधाएं संचालित की जा रही हैं। “अब बिजली कनेक्शन मौजूद है, लेकिन उसका इस्तेमाल बहुत कम करना पड़ता है,” वे कहते हैं। उनके मुताबिक, यदि छोटे संस्थान और आश्रम इस तरह की व्यवस्था अपनाएं, तो न केवल बिजली खर्च में कमी लाई जा सकती है।
सौर ऊर्जा से खेती में नवाचार
समस्तीपुर के कल्याणपुर लदौरा पंचायत के 70 वर्षीय किसान लक्ष्मण सिंह बताते हैं कि सामूहिक प्रयास और तकनीक के सहारे खेती से जुड़े पुराने ढांचे बदले जा सकते हैं। वे कृषि कल्याणपुर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड का संचालन करते हैं, जिससे वर्तमान में करीब 300 किसान जुड़े हैं। वर्ष 2024 में नाबार्ड और SELCO फाउंडेशन के सहयोग से यहां 10 टन क्षमता वाला सौर ऊर्जा आधारित कोल्ड स्टोरेज स्थापित किया गया। इस परियोजना की कुल लागत लगभग 26 लाख रुपये रही, जिसमें से 12.5 लाख रुपये कंपनी ने स्वयं लगाए, जबकि शेष राशि सब्सिडी के रूप में प्राप्त हुई।
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यह सोलर कोल्ड स्टोरेज अब स्थानीय किसानों के लिए भंडारण की एक किफायती सुविधा बन गया है। किसान फल, फूल, सब्जी, दूध और दही जैसे उत्पाद यहां बाज़ार दर से लगभग आधे किराए पर, ₹300 प्रति क्विंटल शुल्क देकर सुरक्षित रख सकते हैं, जिससे उन्हें उपज बेचने के लिए बेहतर समय और कीमत मिल पाती है। लक्ष्मण सिंह के अनुसार, पहले बिजली और डीज़ल आधारित कोल्ड स्टोरेज में प्रति क्विंटल करीब ₹600 खर्च आता था और व्यवस्था पूरी तरह बाहरी संचालकों पर निर्भर रहती थी। सौर ऊर्जा अपनाने से न केवल भंडारण लागत घटी है, बल्कि रखरखाव का खर्च भी कम हुआ है।
यशवन्त कुमार पिछले तीन वर्षों से सेल्को सोलर लाइट प्राइवेट लिमिटेड में समस्तीपुर के जिला प्रभारी के रूप में कार्यरत हैं। कुमार पिछले 10 सालों से इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं और अब तक 2,000 से अधिक युवाओं को सोलर इंस्टॉलेशन और मेंटेनेंस का प्रशिक्षण दे चुके हैं। उनके अनुसार, बिहार जैसे राज्यों में सौर ऊर्जा केवल पर्यावरणीय समाधान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक बदलाव का भी एक अहम जरिया बन रही है।
यह रिपोर्ट आईआईटी कानपुर, क्लाइमेट ट्रेंड्स और अर्थ जर्नलिज़्म नेटवर्क द्वारा प्रदान की गई JTRCC फेलोशिप के सहयोग से तैयार की गई है।
बैनर तस्वीरः सौर पंप अपनाने से रेणू देवी की सिंचाई लागत घटी और फसल उत्पादन में सुधार हुआ। तस्वीर- रामजी कुमार