- लक्षद्वीप में कचरे का संकट दिन-ब-दिन गंभीर होता जा रहा है। सामुदायिक कूड़ेदान हटा दिए गए हैं और अब कचरा समुद्र के पास खुले डंपिंग यार्ड में जमा किया जा रहा है।
- पर्यटकों की संख्या में उछाल, प्लास्टिक का बढ़ता इस्तेमाल और समुचित योजना नहीं होने से कचरा निपटान की समस्या और गंभीर बन गई है जिसका असर समुद्र तट, लैगून और निवासियों की रोजमर्रा की जिंदगी पर दिख रहा है।
- प्लास्टिक प्रदूषण अब मछलियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन गया है। इस समस्या के लिए स्थानीय लोग प्रशासनिक नाकामियों और लचर कचरा-प्रबंधन प्रणाली को जिम्मेदार ठहराते हैं।
लक्षद्वीप प्रशासन ने साल 2023 में द्वीप की जैव-विविधता को फिर से बहाल करने के तौर-तरीकों पर एक प्रतियोगिता आयोजित की थी। इसमें पुरस्कार जीतने वाली लघु फिल्म ने लोगों को इधर-उधर कचरा फेंकने की बजाए सामुदायिक कूड़ेदान का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया था।
दो साल बाद, एक अन्य वीडियो में दिखाया गया कि ये सामुदायिक कूड़ेदान हटा दिए गए हैं। वीडियो पोस्ट करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सबिथ पी.के. ने कहा, “यह विडंबना लक्षद्वीप में कचरा प्रबंधन से जुड़े संकट को दिखाती है।”
लक्षद्वीप की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार भारत का यह सबसे छोटा केंद्र शासित प्रदेश 36 द्वीपों से मिलकर बना है। इनमें से 10 द्वीपों पर आबादी है। पिछले कुछ सालों में, अरब सागर में स्थित चागोस रिज का हिस्सा रहे इस द्वीपसमूह के कई द्वीप निजी कंपनियों को पट्टे पर दिए गए हैं। उदाहरण के तौर पर, सुहेली द्वीप को लैगून विला के लिए एक निजी होटल को पट्टे पर दिया गया है। वहीं निर्जन द्वीप बंजरम और थिन्नकारा को रिसॉर्ट पर्यटन के लिए पट्टे पर दिया गया है।
सबिथ कहते हैं कि लक्षद्वीप में कचरा निपटान की लचर व्यवस्था सबसे तात्कालिक समस्या बन गई है। यहां जमीन सीमित है और लगभग सभी चीजें मुख्य भूमि से प्लास्टिक और दूसरे नॉन-बायोडिग्रेडेबल चीजों में लपेटकर लाई जाती हैं। सबिथ राजनीतिक और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए छोटे वीडियो और व्लॉग का इस्तेमाल करते हैं।
कचरा प्रबंधन में खामियां
दिसंबर 2020 में प्रफुल्ल पटेल के केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक के तौर पर कार्यभार संभालने से पहले, लक्षद्वीप में कचरा इकट्ठा करने की व्यवस्था बहुत पुरानी थी। पर्यावरण और वन विभाग के तहत काम करने वाले सफाई कर्मचारी सभी 10 आबाद द्वीपों में कचरा इकट्ठा करते थे। इकट्ठा किए गए कचरे को हर द्वीप पर कचरा रखने वाले मुख्य स्थल (CGD) में ले जाया जाता था जो स्थानीय निवासियों से लीज पर ली गई जगहों पर बने थे। यहां कचरे को छांटा जाता था। जो कचरा रीसायकल नहीं हो पाता था, उसे अनुबंध वाले खरीदारों के जरिए मुख्य भूमि पर वापस भेज दिया जाता था, जबकि डायपर और सैनिटरी नैपकिन जैसी चीजों को स्थानीय स्तर पर जला दिया जाता था, क्योंकि उन्हें वापस लेने से इनकार कर दिया जाता था।
फिर 2021 में सामुदायिक कूड़ेदानों में जमा होने वाले कचरे का प्रबंधन करने के लिए निविदा सूचना जारी की गई, जिसमें बताया गया कि दस आबाद द्वीपों पर कुल 3,737 कूड़ेदान लगाए गए थे और इनसे हर दिन लगभग 12 टन प्लास्टिक/ठोस कचरा निकलता था।

पूर्व में सफाईकर्मी रह चुके हबीब के अनुसार यह व्यवस्था भी खामियों से भरी थी। उन्होंने कहा, “तब भी कचरा अलग-अलग करने की प्रक्रिया में दिक्कतें आती थी। वेंडर अक्सर डायपर या सैनिटरी पैड जैसी चीजों को मुख्य भूमि पर भेजने से इनकार कर देते थे। जिस कचरे को वे ले जाने के लिए तैयार होते थे, उसमें भी परिवहन संबंधी दिक्कतों के कारण देरी होती थी। पिछले चार सालों से लक्षद्वीप से कोई कचरा बाहर नहीं भेजा गया है। सभी कचरा डिपो में इंसीनेरेटर लगाए गए थे, लेकिन पिछले आठ सालों से ये सभी बंद पड़े हैं।”
हबीब उन 3,500 कर्मचारियों में शामिल थे जिन्हें मार्च 2022 में बड़े पैमाने पर नौकरी से निकाल दिया गया था। अब वह नारियल के बागानों में काम करते हैं और अपने कई पुराने साथियों की तरह मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।
कर्मचारियों को निकाले जाने के बाद पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग ने 2021 में कचरा प्रबंधन की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों को सौंप दीं। दो दशक पहले भी यही व्यवस्था थी।
हालांकि, कचरा उठाने के काम को ठेका पर देने की नाकाम कोशिश के बाद, पंचायतों ने सड़कों से सामुदायिक कूड़ेदान हटा दिए।
किल्टन में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता महदा हुसैन ने कहा, “अब हफ्ते में सिर्फ एक बार एक गाड़ी घरों से कचरा इकट्ठा करती है और इसे बिना अलग किए कचरा डिपो में डाल देती है। शुरुआती स्तर पर कचरा अलग-अलग नहीं किए जाने की वजह से CGD डंपिंग यार्ड बन गया है, जिसका पारिस्थितिकी पर गंभीर दुष्प्रभाव हो रहा है। कभी-कभी तो कचरे के ढेर में आग लग जाती है, जिससे नुकसान बड़ा हो जाता है।”
पिछले साल जुलाई में, हुसैन ने CGD में लगी आग के बाद पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) में शिकायत की थी। मंत्रालय ने इसे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और लक्षद्वीप प्रदूषण नियंत्रण समिति को भेज दिया था।
पहले चेतलत में रहने वाली और अब मिनिकॉय की फातिमा कुरैशा ने कहा कि मंत्रालय के सख्त निर्देशों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई है। कचरे का ढेर बड़ा होता जा रहा है और इससे कचरा समुद्र में जा रहा है, क्योंकि यार्ड तट के पास है।
पर्यटन में तेजी और बढ़ता कचरा संकट
कचरा प्रबंधन व्यवस्था के नाकाम होने के साथ ही द्वीपों पर बड़ा बदलाव भी हुआ है: पर्यटन में जबरदस्त तेजी आई है। पर्यटकों की संख्या में इस तेजी से पहले से ही खराब सिस्टम पर और दबाव बढ़ा दिया है।
हाल के सालों में, लक्षद्वीप में सैलानियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। अप्रैल से जून 2024 के बीच द्वीपों पर आने वाले पर्यटकों की संख्या में साल-दर-साल के हिसाब से 107% की बढ़ोतरी देखी गई। 2024 में इस अवधि के दौरान 22,990 सैलानी आए, जबकि 2023 में इसी अवधि में यह तादात 11,074 थी। ट्रैवल प्लेटफॉर्म MakeMyTrip ने भी लक्षद्वीप के लिए ऑनलाइन सर्च में 3,400% की बढ़ोतरी की जानकारी दी है।
आगत्ती के एक टूर ऑपरेटर ने सरकार की कार्रवाई के डर से नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया, “आम धारणा यह है कि लक्षद्वीप में कचरे का संकट पर्यटन की वजह से और बढ़ गया है, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है।” उन्होंने कहा, “बंगाराम को छोड़कर, 2000 के दशक तक लक्षद्वीप में पर्यटन सीमित था। हाल के सालों में इसमें तेजी आई है, क्योंकि भारत सरकार इन द्वीपों पर पर्यटन को बढ़ाना चाहती है। भारत और मालदीव के बीच कूटनीति तनाव के दौरान 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लक्षद्वीप का दौरा किया था। लेकिन यह बढ़ोतरी बिना किसी योजना या तैयारी के हुई। अकेले आगत्ती के दक्षिणी हिस्से में कम से कम 89 रिसॉर्ट और कमरे हैं। हर फैसिलिटी को हर कमरे में रोजाना कम से कम दो बोतलबंद पानी देना होता है। इसका मतलब है कि हर दिन सैकड़ों सिंगल-यूज बोतलें फेंकी जाती हैं। फिर भी, यहां बोतल क्रशर नहीं हैं और ना ही कचरा फेंकने के लिए कोई तय जगह है।” उन्होंने आगे कहा कि सरकार हर सैलानी से प्रतिदिन ₹200 की हेरिटेज फीस लेती है, लेकिन उनका दावा है कि इस रकम का आज तक इस्तेमाल नहीं किया गया है।

आगत्ती के एक मछुआरे मुहम्मद शाहजहां ने कहा, “गैर-सरकारी या स्थानीय क्लब कभी-कभी बीच की सफाई करते हैं और इसके अलावा कोई व्यवस्था काम नहीं कर रही है।” “मछुआरे होने के नाते, हम अक्सर तटों के किनारे से कचरा उठाते हैं, लेकिन सामुदायिक कूड़ेदान नहीं होने से यह भी मुश्किल हो जाता है।”
कवरत्ती के गोताखोर समीर अमन ने कहा, “पानी के अंदर हर जगह डाइपर पड़े हैं।” “पर्यटन बढ़ने से पहले भी, गोताखोर बिना सोचे-समझे कचरा फेंकने और कचरा प्रबंधन में खामियों की शिकायत करते थे। हम इसे द्वीपों में अपनी गोताखोरी के दौरान सबसे पहले देखते हैं। हम अपनी तरफ से सफाई करने की पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन अब हालात से निपटने के लिए बड़ी, संगठित कोशिश की जरूरत है।”
अन्य क्षेत्रों पर असर
पिछले कुछ दशकों में पर्यटन के अलावा मछली पालन सेक्टर भी तेजी से बढ़ा है। मछली का उत्पादन 1950 के दशक में लगभग 500 टन से बढ़कर 2024-25 में 16,891 मीट्रिक टन हो गया है। तटों पर प्लास्टिक की मौजूदगी पर साल 2020 में किए गए एक अध्ययन में यह नतीजा निकला कि लक्षद्वीप में प्लास्टिक प्रदूषण की दो मुख्य वजहें मछली पकड़ना और पर्यटन हैं। अब, तेजी से पर्यटन बढ़ने और कचरे की बढ़ती मात्रा का असर मछली पालन पर भी पड़ने लगा है।
लक्षद्वीप में रहने वाले समुद्री सामाजिक-पारिस्थितिकी के अध्येता जॉन एडम ने कहा, “पिछले कुछ सालों में, पर्यटन की वजह से द्वीपों पर पैदा होने वाले कचरे की मात्रा तेजी से बढ़ी है। कचरे के प्रबंधन में खामियों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। हालांकि, पर्यटन की तुलना में मछली पालन सेक्टर बहुत कम कचरा पैदा करता है, लेकिन इस प्रदूषण से वहां दिक्कते पैदा हो रही हैं। समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और उन पर निर्भर आजीविका इसका खामियाजा भुगत रहे हैं।”
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उन्होंने कहा कि द्वीपों पर प्लास्टिक बहुत ज्यादा जमा हो गया है और इसका माइक्रोप्लास्टिक में बदलना समुद्री खाद्य श्रृंखला के लिए खतरा है। “जब प्लवक (प्लैंकटन) इन माइक्रोप्लास्टिक को खा लेते हैं, तो वे तेजी से खाद्य श्रृंखला में ऊपर आते हैं और आखिर में इंसानों तक पहुंच जाते हैं।”
एनवायरनमेंटल साइंस एंड पॉल्यूशन रिसर्च में पब्लिश एक अध्ययन के मुताबिक कवरत्ती के आसपास स्किपजैक टूना मछली की आंतों में माइक्रोप्लास्टिक पाए गए हैं। यह लक्षद्वीप के लिए चिंताजनक है, जहां टूना प्रोसेसिंग, कैनिंग और निर्यात कुछ ही कामयाब आर्थिक गतिविधियों में से हैं।

मेडिकल कचरे से बढ़ता संकट
पहले, लक्षद्वीप में मेडिकल कचरे के निपटान की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों के पास ही थी। किल्टन के वरिष्ठ सफाई कर्मचारी अब्दुल सलाम ने बताया कि निपटान के लिए कोई खास सुविधा न होने से इस कचरे को दूसरे सामानों के साथ मुख्य कचरा डिपो में फेंक दिया जाता था। कुछ साल पहले, कर्मचारियों ने बिना सही उपकरण या सुरक्षा गियर के खतरनाक कचरे को अलग करने से इनकार कर दिया था। तब से, मेडिकल कचरे के निपटान की पूरी जिम्मेदारी चिकित्सा विभाग और अलग-अलग अस्पतालों पर है।
लक्षद्वीप में दो मुख्य अस्पताल हैं। एक कवरत्ती में और दूसरा मिनिकॉय में। साथ ही, आगत्ती में एक स्पेशलिटी अस्पताल और पूरे द्वीपों में कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) हैं। दिसंबर 2024 में खुले में बायोमेडिकल कचरा जलाने के आरोप के बाद कवरत्ती के इंदिरा गांधी अस्पताल को आलोचना झेलनी पड़ी थी। अस्पताल ने इस दावे से इनकार किया था। इस घटना के एक गवाह सदाकत ने कहा, “हर दिन जितना बायोमेडिकल कचरा निकलता है और इसकी खतरनाक प्रकृति को देखते हुए, असली सवाल यह है: इसका क्या किया जा रहा है? लक्षद्वीप में कहीं भी इसके निपटान के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं है।”
शोधकर्ता चेतावनी देते हैं कि लक्षद्वीप के कचरे के संकट को वैश्विक महासागरीय प्रदूषण के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। स्थानीय गैर-लाभकारी संस्था से जुड़े एक शोधकर्ता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ” अनियंत्रित पर्यटन के साथ लचर कचरा प्रबंधन नाजुक समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा पैदा कर रहा है।”
स्थानीय स्तर पर कॉन्टेंट बनाने वाले क्रिएटर के लिए यह स्थिति शासन की समस्या को दिखाती है। “हमारी फिल्म सामाजिक उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई थी। जिन सामुदायिक कूड़ेदानों को हमने लोगों को इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया था, आज वे गायब हो गए हैं। अब वह कचरा कहां जा रहा है?” लघु फिल्म बेंजाअल के डायरेक्टर नवाज के.आर. ने सवाल उठाया।
लक्षद्वीप में यूथ कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष अजमल अहमद ने कहा कि यह संकट व्यापक प्रशासनिक नाकामी की मिसाल है। उन्होंने कहा, “परिवहन से लेकर कचरा प्रबंधन तक, लक्षद्वीप को नौकरशाही के ऐसे तंत्र द्वारा चलाया जा रहा है जिसकी अगुवाई गैर-निर्वाचित प्रशासक करता है। अभी फोकस पर्यटन के लिए बड़े प्रोजेक्ट बनाने पर है, जबकि कचरा प्रबंधन जैसी बुनियादी सेवाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 2 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: कदमाथ में (सूखी टूना मछली) प्रोसेसिंग यार्ड के पास फेंका हुआ कचरा। तस्वीर: मुनीरा बेगम सी.पी.