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जंगल तो हैं, पर जंगली कुत्तों के लिए अब काफी नहीं

हालिया अध्ययन में ढोल के ज्ञात इलाकों में 12 देशों में उपयुक्त आवासों का मैप बनाया गया, जिसमें तीन मुख्य क्षेत्रों को हाइलाइट किया गया: पश्चिमी भारत, मध्य भारत, और हिमालय की तलहटी से होते हुए दक्षिण पूर्व एशिया तक। तस्वीर: gailhampshire/Flickr (CC BY 2.0)।

हालिया अध्ययन में ढोल के ज्ञात इलाकों में 12 देशों में उपयुक्त आवासों का मैप बनाया गया, जिसमें तीन मुख्य क्षेत्रों को हाइलाइट किया गया: पश्चिमी भारत, मध्य भारत, और हिमालय की तलहटी से होते हुए दक्षिण पूर्व एशिया तक। तस्वीर: gailhampshire/Flickr (CC BY 2.0)।

  • ढोल (जंगली कुत्ते) छोटी-छोटी, बंटी हुई आबादी में जीवित हैं, क्योंकि आवास खत्म होने, शिकार की कमी और इंसानी दबावों की वजह से उन्होंने अपने ऐतिहासिक विस्तार का अधिकांश हिस्सा खो दिया है।
  • एक नए अध्ययन में ढोल के संभावित क्षेत्र के तीन मुख्य इलाकों की पहचान की गई है, लेकिन पाया गया कि ये इलाके आपस में ठीक से जुड़े नहीं हैं, जिससे उनके फैलाव और आनुवांशिक आदान-प्रदान में ठहराव आ सकता है।
  • असरदार संरक्षण के लिए, अलग-थलग जंगलों की सुरक्षा से आगे बढ़कर गलियारों को बेहतर बनाना और सीमा पार सहयोग जरूरी है।

कभी पूरे एशिया के अल्पाइन, समशीतोष्ण, उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जंगलों में व्यापक रूप से पाया जाने वाला ढोल या एशियाई जंगली कुत्ता अब अपने पुराने इलाकों के बड़े हिस्सों से खत्म हो गया है। अपनी तीखी सीटी, झुंड में शिकार करने की जबरदस्त क्षमता और अद्भुत सहनशक्ति के लिए मशहूर बड़े इलाके में घूमने वाला यह मांसाहारी जीव अब आवास के नुकसान, शिकार की कमी और बढ़ते इंसानी दबावों के कारण सिर्फ छोटी, बिखरी हुई आबादी में ही बचा है।

हाल ही में बड़े पैमाने पर किए गए एक अध्ययन में ऐसे उपयुक्त आवासों का पता लगाया गया है जहां ये मायावी जंगली कुत्ते हो सकते हैं। यह अध्ययन ढोल के ज्ञात इलाकों के 12 देशों में किया गया, जिन्हें तीन क्षेत्रों में बांटा गया: चीन, भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश) और दक्षिण-पूर्व एशिया (म्यांमार, थाईलैंड, लाओस, वियतनाम, कंबोडिया, मलेशिया और इंडोनेशिया)।

शोधकर्ताओं ने यह आकलन किया कि किन भू-भागों में अभी भी ढोल के लिए जरूरी पारिस्थितिकी परिस्थितियां मौजूद हैं। इसके बाद उन्होंने मैक्सएंट (मैक्सिमम एंट्रोपी) मॉडलिंग नामक गणना करने के तरीके का इस्तेमाल किया और 24 पर्यावरणीय कारकों (जैसे जलवायु, पारिस्थितिकी, भूभौतिकीय खासियतें और मानवीय असर) के आधार पर यह अनुमान लगाया कि आवास कितने अच्छे हैं। ये सभी कारक बड़े और व्यापक क्षेत्र में फैले मांसाहारी जीवों के वितरण को प्रभावित करने के लिए जाने जाते हैं। अध्ययन के प्रमुख लेखक और आईयूसीएन ढोल वर्किंग ग्रुप के सदस्य मानसून पोखरेल खाटिवाड़ा बताती हैं, “मैक्सएंट किसी भू-भाग में वितरण की संभावना का पता लगाता है जो सिर्फ ऐसी पर्यावरणीय परिस्थितियों से मेल खाती है। इस तरह यह सिर्फ उन्हीं जगहों पर आवास की उपयुक्तता का अनुमान लगाता है, जहां दिए गए पर्यावरणीय कारक इसकी पुष्टि करते हैं।”

टीम ने 1996 और 2018 के बीच दर्ज किए गए 1,604 सत्यापित ढोल ऑब्जर्वेशन का डेटासेट तैयार किया। यह डेटा 2019 में हुई एक कार्यशाला में शामिल हुए प्रतिभागियों द्वारा उपलब्ध कराया गया था, जिसे आईयूसीएन ढोल वर्किंग ग्रुप, IUCN कंजर्वेशन प्लानिंग स्पेशलिस्ट ग्रुप, स्मिथसोनियन कंजर्वेशन बायोलॉजी इंस्टीट्यूट, कासेटसार्ट यूनिवर्सिटी और थाईलैंड के खाओ याई नेशनल पार्क ने संयुक्त रूपसे तैयार किया था। ढोल अधिकतर संरक्षित जंगलों में देखे जाते हैं, इसलिए डेटा को स्थानीय सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके फिल्टर किया गया, ताकि ऑब्जर्वेशन रिकॉर्ड समान दूरी पर हों, जिससे नमूनों में पक्षपात कम हो सके।

इसके बाद दो मॉडल चलाए गए, इसमें एक बड़े पैमाने का मॉडल था जिससे उपयुक्तता वाले बड़े क्षेत्रों की पहचान की गई। वहीं छोटे पैमाने वाले मॉडल में ढोल की मौजूदगी वाले संभावित इलाकों पर गहराई से ध्यान क्रेंदित किया गया। दोनों मॉडलों को स्वतंत्र डेटासेट और सांख्यिकीय परीक्षण से सत्यापित किया गया, जिनमें पूर्वानुमान की सटीकता अधिक थी।

मध्य भारत के संरक्षित क्षेत्रों में से एक बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व, जहां ढोल देखे जा सकते हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि कानूनी रूप से संरक्षित वन यह तय करने का सबसे अच्छे संकेतक हैं कि किसी क्षेत्र में ढोल जीवित रह सकते हैं या नहीं, जबकि वन्यजीव गलियारे और आसपास के परिदृश्य उनकी आबादी को आपस में जोड़े और बनाए रखने में मदद करते हैं। तस्वीर: स्वरूप सिंहा रॉय/विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0)।
मध्य भारत के संरक्षित क्षेत्रों में से एक बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व, जहां ढोल देखे जा सकते हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि कानूनी रूप से संरक्षित वन यह तय करने का सबसे अच्छे संकेतक हैं कि किसी क्षेत्र में ढोल जीवित रह सकते हैं या नहीं, जबकि वन्यजीव गलियारे और आसपास के परिदृश्य उनकी आबादी को आपस में जोड़े और बनाए रखने में मदद करते हैं। तस्वीर: स्वरूप सिंहा रॉय/विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY-SA 4.0)।

बंटे हुए जंगल

मॉडल से ढोल के तीन मुख्य आवासों का पता चला, पश्चिमी भारत, मध्य भारत और हिमालय की तलहटी से लेकर दक्षिण पूर्व एशिया तक।

अन्य क्षेत्रों के मुकाबले दक्षिण पूर्व एशिया में ढोल के संभावित आवास का सबसे बड़ा हिस्सा (56%) पाया गया। अलग-अलग देशों में देखें, तो भारत में संभावित इलाकों का सबसे बड़ा हिस्सा है। वहीं भूटान, थाईलैंड, कंबोडिया और मलेशिया में आवासों के भीतर ढोल की मौजूदगी की सबसे अधिक संभावना पाई गई।

खातिवाड़ा बताती हैं कि यह आबादी असल वितरण के बजाय शोध की बेहतर कोशिशों को भी दिखा सकती है। “हमारा ऑब्जर्वेशन डेटा इन इलाकों में ज्यादा पक्षपाती था और उपलब्ध पर्यावरणीय चर इन इलाकों में ढोल के वितरण की संभावना से मेल खाते हैं। ऑब्जर्वेशन में यह पक्षपात उन इलाकों में फील्ड वर्क को प्राथमिकता देने से हो सकता है जहां इस प्रजाति के देखे जाने की संभावना सबसे अधिक थी,” वह कहती हैं।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि कानूनी तौर पर सुरक्षित जंगल यह तय करने का सबसे बड़ा संकेत हैं कि किसी इलाके में ढोल जिंदा रह पाएंगे या नहीं। इसका मतलब है कि संरक्षण की कोशिश सिर्फ अलग-थलग अभयारण्य पर निर्भर नहीं रह सकती। अगर आबादी को आपस में जुड़ा हुआ और लंबी अवधि में बनाए रखना है, तो गलियारों और आस-पास के क्षेत्रों को भी सुरक्षित करना होगा।


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खातिवाड़ा कहती हैं, “ढोल का संरक्षण सिर्फ यह पता लगाकर नहीं हो सकता कि उनका सही आवास कहां है। काम करने वाले गलियारे और आपसी संपर्क की लंबे समय तक उन्हें जीवित रहने में अहम भूमिका है।”

बड़े भू-भाग को ध्यान में रखने वाला यह नजरिया बहुत जरूरी है, क्योंकि अध्ययन में पाया गया कि ढोल के बचे हुए आवास आपस में ठीक से जुड़े हुए नहीं हैं, जिससे उनका फैलाव और आनुवांशिक आदान-प्रदान सीमित हो जाता है। ढोल जैसी दूर-दूर तक घूमने वाली प्रजातियों के लिए आपसी संपर्क बनाए रखना और भी जरूरी है। अगर जंगल के बंटे हुए क्षेत्रों को आपस में जोड़ने वाले गलियारे नहीं होंगे, तो छोटी आबादी अलग-थलग पड़ जाएगी, जिससे अंत:प्रजनन बढ़ेगा और बीमारी या स्थानीय रूप से खत्म होने का खतरा बढ़ जाएगा। अगर आस-पास के भू-भाग आवाजाही और शिकार में मदद नहीं करते हैं, तो सिर्फ संरक्षित इलाकों पर ध्यान केंद्रित करने वाली संरक्षण रणनीतियां विफल हो सकती हैं।

खातिवाड़ा कहती हैं, “हमारा सुझाव है कि इन तीनों क्षेत्रों में संरक्षण उपायों पर ध्यान दिया जाए और ढोल की आबादी के बीच आपसी संपर्क को बेहतर बनाया जाए।”

कर्नाटक के बांदीपुर में ढोल। तस्वीर: माइक प्रिंस/विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY 2.0)।
कर्नाटक के बांदीपुर में ढोल। तस्वीर: माइक प्रिंस/विकिमीडिया कॉमन्स (CC BY 2.0)।

क्षेत्रीय सहयोग पर जोर

दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के कुछ हिस्सों सहित दुनिया भर में वयस्क ढोल की आबादी सिर्फ 4,500 से 10,500 के बीच होने का अनुमान है, जिनमें से 1,000-2,000 वयस्क परिपक्व जीव हैं जो बच्चे पैदा कर सकते हैं।

जिन इलाकों में अभी भी ढोल के आवास बचे हैं, वहां भी उन्हें लगातार दबाव का सामना करना पड़ रहा है। खेती, सड़कों और शहरों के विस्तार के लिए जंगलों को लगातार काटा जा रहा है या उनमें बदलाव किया जा रहा है। खातीवाड़ा कहती हैं, “इंसानों की आबादी बढने और शहरीकरण की जरूरत ही आवास के नुकसान के मुख्य कारण हैं। ऐसा सिर्फ ढोल के साथ नहीं बल्कि दूर-दूर तक फैली हुई दूसरी प्रजातियों के साथ भी है।”

चराई भी ढोल की गतिविधियों पर असर डाल सकती है और कभी-कभी इंसानों के साथ टकराव की वजह बन जाती है। पालतू कुत्तों से बीमारियां जंगली झुंडों में पहुंच सकती हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर उनकी संख्या कम हो सकती है। यहां तक कि अगर शिकार जानवरों की आबादी कम हो गई हो, तो जो जंगल देखने में सही लगते हैं, वे भी व्यावहारिक रूप से बेकार हो सकते हैं।

चूंकि, ढोल देश की सीमाओं को पार करते हैं, इसलिए लंबे समय में उनके संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बहुत जरूरी है। खातिवाड़ा व्यावहारिक प्राथमिकताओं पर जोर देती हैं। वह कहती हैं, “सीमापार समन्वित बैठकें शुरू करना, सीमा पार संरक्षण से जुड़ी पहलों को मजबूत करना, उनके पुराने इलाके के उत्तरी हिस्से में निगरानी को बेहतर बनाना, संरक्षित क्षेत्रों से बाहर संरक्षण पर ध्यान देना और सही आवासों के बीच काम करने वाले गलियारे, आपसी संपर्क और दूसरी बाधाओं को खत्म करने के लिए काम करना जरूरी है।”

 


यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर  4 दिसंबर, 2025 को प्रकाशित हुई थी।


बैनर तस्वीर:हालिया अध्ययन में ढोल के ज्ञात इलाकों में 12 देशों में उपयुक्त आवासों का मैप बनाया गया, जिसमें तीन मुख्य क्षेत्रों को हाइलाइट किया गया: पश्चिमी भारत, मध्य भारत, और हिमालय की तलहटी से होते हुए दक्षिण पूर्व एशिया तक। तस्वीर: gailhampshire/Flickr (CC BY 2.0)।

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