- भारतीय वनस्पति सर्वे के शोधकर्ताओं ने अरुणाचल प्रदेश में ब्रिजियोपोरस कनाडी नामक फंगस की एक नई प्रजाति की खोज की है।
- यहां पर इस प्रजाति का एक विशाल नमूना मिला है। य़ह अब तक का सबसे बड़ा नमूना है और उसकी त्रिज्या तीन मीटर से भी अधिक है।
- यह खोज राज्य में अज्ञात फंगस की किस्मों को सामने लाती है। साथ ही, यह पारिस्थितिकी तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने में लकड़ी को सड़ाने/गलाने वाले फंगस की महत्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित करती है।
रॉबर्ट मैकफर्लेन ने अपनी किताब ‘अंडरलैंड’ में लिखा था, “फंगस (कवक) समय के साथ अजीब व्यवहार करते हैं। दरअसल यह कहना आसान नहीं है कि एक फंगस कहां शुरू होता है और कहां खत्म, या कब उसका जन्म होता है और वह कब मरता है।” नियमों को चुनौती देने वाले और साधारण दिखने वाले फंगस के इस साम्राज्य ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों और लेखकों को हमेशा हैरान और प्रभावित किया है। इनसे उन्हें कई महत्वपूर्ण जानकारियां मिली हैं।
उदाहरण के लिए, फंगस और पौधों के बीच सहजीवी संबंध लाखों वर्षों से विकसित होता आया है। फंगस पेड़ों से कार्बन लेते हैं और बदले में उन्हें नाइट्रोजन जैसे जरूरी पोषक तत्व देते हैं। मिट्टी के नीचे फैला फंगस का जाल वृक्षों के बीच संदेश भेजने के लिए एक विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की तरह काम करता है। एक मरता हुआ पेड अपने बचे हुए पोषक तत्वों को फंगस के जरिए अन्य पेड़ों तक पहुंचा सकता है। तो वहीं, कीटों से ग्रस्त एक पेड़ अपने आस-पास के पेड़ों को बचाने के लिए चेतावनी भेज सकता है।
भारत में कवकों की विविधता के बारे में हमारी समझ अभी भी बहुत कम है, लेकिन हाल ही में अरुणाचल प्रदेश में मिली एक ‘विशालकाय’ नई प्रजाति ने इस विषय को चर्चा में ला दिया है।
लकड़ी खाने वाली फंगस
‘ब्रिजियोपोरस’ दशकों तक एक ऐसा वंश माना जाता था जिसमें केवल एक ही प्रजाति (ब्रिजोपोरस नोबिलिसिमस) शामिल थी। इसके बाद चीन में एक दूसरी प्रजाति (बी. साइनेंसिस) खोजी गई। अब अरुणाचल में मिली यह नई प्रजाति इस वंश का तीसरा सदस्य है।
इस अध्ययन के मुख्य लेखक और भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (बीएसआई) के शोधकर्ता अरविंद परिहार ने बताया, “टैक्सोनॉमी एक ऐसा क्षेत्र है जो लगातार बदलता रहता है, जहां वैज्ञानिक अपनी समझ और रिसर्च के आधार पर प्रजातियों को समय-समय पर नए वर्गों में बांटते रहते हैं। पहले मिली प्रजाति ‘बी. साइनेंसिस’ को बाद में ‘ऑक्सीपोरस’ नाम के दूसरे वंश में डाल दिया गया था।” उन्होंने आगे बताया, “इस वजह से, अरुणाचल में हमारी यह खोज अब इस वंश की दुनिया में दूसरी ज्ञात प्रजाति बन गई है। इसे हमने ‘ब्रिजियोपोरस कनाडी’ नाम दिया है।” परिहार पिछले 15 सालों से बड़े आकार के फंगस पर शोध कर रहे हैं। इस शोध पत्र के अन्य लेखक भी बीएसआई से ही जुड़े हैं।

परिहार और उनके साथियों को पश्चिम कामेंग जिले के जंगलों में पुराने ‘ऐबीज़’ या देवदारों के पेड़ों पर उगने वाली इस नई प्रजाति के कम से कम 40 नमूने मिले, जो काफी मोटे और चमड़े जैसे सख्त थे। जिस समय यह खोज हुई, उस समय यह टीम पूरे राज्य में जंगली और खाने योग्य मशरूमों का सर्वे कर रही थी।
इस प्रजाति की सबसे खास बात इसका विशाल आकार है। सबसे छोटा फंगस 9 सेंटीमीटर (त्रिज्या) का था, जबकि सबसे बड़ा 3 मीटर से भी ज्यादा चौड़ा था। परिहार कहते हैं, “यह इतना बड़ा था कि मैं इस पर बैठ सकता था और इतना मजबूत कि उसके बावजूद भी यह पेड़ से मजबूती से जुड़ा रहता।” इसके अलावा यह फंगस मुख्य रूप से देवदार के सूखे या मरे हुए पेड़ों पर देखा गया। जो पेड़ जिंदा थे और जिन पर यह फंगस उगा था, वे भी आखिरकार मर गए। स्थानीय समुदाय के लोग इस कवक के बारे में जानते तो थे, लेकिन वे इसे जंगलों से नहीं निकालते थे क्योंकि यह न तो खाने के काम आता है और न ही बाजार में इसकी कोई कीमत है।

परिहार ने बताया, “हम इसके नमूने को ईटानगर स्थित अपने ऑफिस में ले आए, जहां हमने इसे धूप में सुखाकर सरंक्षित किया। इसकी बाहरी बनावट का अध्ययन किया और इसके रंग, आकार, मोटाई, लंबाई और चौड़ाई जैसे पहलुओं को दर्ज किया।” टीम ने सूक्ष्म स्तर (माइक्रोस्कोपिक) पर भी इसका अध्ययन किया और एक खास बायोइनफॉर्मेटिक्स सॉफ्टवेयर की मदद से इसकी डीएनए जांच भी की।
यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह एक नई प्रजाति है, वैज्ञानिकों ने ‘जेनबैंक’ में मौजूद इस वंश की अन्य प्रजातियों के डीएनए की तुलना ‘बी. कनाडी’ के डीएनए से की। उनकी बनावट और विकास के इतिहास में अंतर पाए जाने के बाद ही इसे एक अलग प्रजाति के रूप में मान्यता दी गई। फिलहाल यह सैंपल पश्चिम बंगाल के हावड़ा स्थित ‘सेंट्रल नेशनल हर्बेरियम’ में रखा गया है।

वनों की सुरक्षा में जुटे लोगों को भी पहचान मिले
फंगस की विविधता को समझने की राह में कई चुनौतियां हैं, जैसे फंड की कमी और फील्डवर्क के दौरान आने वाली रुकावटें। कवक अक्सर मानसून के दौरान ही उगते हैं, लेकिन उस समय भारी बारिश की वजह से घने जंगलों तक पहुंचना बहुत मुश्किल हो जाता है। अगर जैसे-तैसे सैंपल इकट्ठा कर भी लिया जाए, तो उसकके बाद भी चुनौतियां कम नहीं होतीं। परिहार बताते हैं, “हमें उनका अध्ययन करने के लिए घंटों तक माइक्रोस्कोप में देखना पड़ता है। सैंपल मिलने के पहले ही दिन उनकी कम से कम 50-60 विशेषताओं को रिकॉर्ड करना जरूरी है। उसके बाद ही उन्हें सुखाकर एयरटाइट बैग में सुरक्षित रखा जाता है।”
वैज्ञानिक समुदाय की ओर से कम ध्यान दिए जाने के बावजूद, फंगस में बहुत कुछ ऐसा है जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। परिहार कहते हैं, “फंगस को देखने का हमारा नजरिया बहुत सीमित है। ज्यादातर लोग केवल यही सवाल करते हैं कि क्या यह जहरीला है या इसे खाया जा सकता है? लेकिन हकीकत यह है कि सभी फंगस हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को बचाए रखने के लिए चुपचाप अपना काम करते रहते हैं। अगर ये न हों, तो जंगलों की सूखी लकड़ियां और पत्ते कभी अपघटित नहीं होंगे और पूरा जंगल कचरे के ढेर से भर जाएगा।”
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ब्रिजियोपोरस प्रजातियां वनों के रखरखाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये वनों में मौजूद कचरे, खासकर सूखी हुई लकड़ी को सड़ाकर उसे विघटित करने का काम करती हैं। अध्ययन के अनुसार, लकड़ी सड़ाने वाले ये कवक पोषक तत्वों और कार्बन के चक्र की जटिल प्रक्रिया में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। इनके पास लकड़ी के सख्त हिस्सों (सेल्यूलोज और लिग्निन) को गलाने की अनोखी क्षमता होती है। जंगल के कचरे और लकड़ी का इस तरह गलना मिट्टी की सेहत, उसके सूक्ष्मजीवों और नए पौधों के उगने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है। संक्षेप में कहें, तो ये कवक जंगलों को स्वस्थ रखने और उन्हें दोबारा नया जीवन देने में मदद करते हैं।
ब्रिजोपोरस प्रजातियां जंगलों की देखभाल के लिए बहुत जरूरी हैं। वे वनों के कचरे, खासकर सूखी लकड़ियों को गलाकर खत्म करती हैं। स्टडी में कहा गया है, “लकड़ी को सड़ाने वाले फंगस, फंगसों का एक महत्वपूर्ण समूह हैं। इनमें सेलूलोज और लिग्निन को गलाने की खास क्षमता होती है, जिस कारण ये कार्बन और पोषक तत्वों के चक्र में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।”
यह खबर मोंगाबे इंडिया टीम द्वारा रिपोर्ट की गई थी और पहली बार हमारी अंग्रेजी वेबसाइट पर 24 सितंबर 2025 को प्रकाशित हुई थी।
बैनर तस्वीर: देवदार के एक पेड़ पर उगा बी. कनाडी। इस जीनस की प्रजातियां वनों के रखरखाव के लिए काफी महत्वपूर्ण है। ये वनों के कचरे खासकर सूखी लकड़ी को गलाकर खत्म करती है।